श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 741–750
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 741–750
पृष्ठ 741
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
मृगराज! मुझे तो संतोषके सिवा और कोई वस्तु रुचती ही नहीं है । मैं सुख, भोग और उनके आधारभूत ऐश्वर्यको नहीं चाहता ॥ २५ ॥
न योक्ष्यति हि मे शीलं तव भृत्यैः पुरातनैः ।
ते त्वां विभेदयिष्यन्ति दुःशीलाश्च मदन्तरे ॥ २६ ॥
आपके पुराने सेवकोंके साथ मेरे शीलस्वभावका मेल नहीं खायेगा । वे दुष्ट स्वभावके जीव हैं । अतः मेरे निमित्त वे लोग आपके कान भरते रहेंगे ॥ २६ ॥
संश्रयः श्लाघनीयस्त्वमन्येषामपि भास्वताम् ।
कृतात्मा सुमहाभागः पापकेष्वप्यदारुणः ॥ २७ ॥
आप अन्यान्य तेजस्वी प्राणियोंके भी स्पृहणीय आश्रय हैं। आपकी बुद्धि सुशिक्षित है । आप महान् भाग्यशाली तथा अपराधियोंके प्रति भी दयालु हैं ॥ २७ ॥
दीर्घदर्शी महोत्साहः स्थूललक्ष्यो महाबलः ।
कृती चामोघकर्तासि भाग्यैश्च समलंकृतः ॥ २८ ॥
आप दूरदर्शी, महान् उत्साही, स्थूललक्ष्य ( जिसका उद्देश्य बहुत स्पष्ट हो वह ), महाबली, कृतार्थ, सफलतापूर्वक कार्य करनेवाले तथा भाग्यसे अलंकृत हैं ॥ २८ ॥
किं तु स्वेनास्मि संतुष्टो दुःखवृत्तिरनुष्ठिता ।
सेवायां चापि नाभिज्ञः स्वच्छन्देन वनेचरः ॥ २ ९ ॥
इधर मैं अपने आपमें ही संतुष्ट रहनेवाला हूँ । मैंने ऐसी जीविका अपनायी है, जो अत्यन्त दुःखमयी है । मैं राजसेवाके कार्यसे अनभिज्ञ और वनमें स्वच्छन्दतापूर्वक घूमनेवाला हूँ ॥ २ ९ ॥
राजोपक्रोशदोषाश्च सर्वे संश्रयवासिनाम् ।
व्रतचर्या तु निःसंगा निर्भया वनवासिनाम् ॥ ३० ॥
जो राजाके आश्रयमें रहते हैं, उन्हें राजाकी निन्दासे सम्बन्ध रखनेवाले सभी दोष प्राप्त होते हैं । इधर मेरे जैसे वनवासियोंकी व्रतचर्या सर्वथा असंग और भयसे रहित होती है ॥ ३० ॥
नृपेणाहूयमानस्य यत् तिष्ठति भयं हृदि ।
न तत् तिष्ठति तुष्टानां वने मूलफलाशिनाम् ॥ ३१ ॥
राजा जिसे अपने सामने बुलाता है, उसके हृदयमें जो भय खड़ा होता है, वह वनमें फल - मूल खाकर संतुष्ट रहनेवाले लोगोंके मनमें नहीं होता ॥ ३१ ॥
पानीयं वा निरायासं स्वाद्वन्नं वा भयोत्तरम् ।
विचार्य खलु पश्यामि तत्सुखं यत्र निर्वृतिः ॥ ३२ ॥
एक जगह बिना किसी भयके केवल जल मिलता है और दूसरी जगह अन्तमें भय देनेवाला स्वादिष्ट अन्न प्राप्त होता है – इन दोनोंको यदि विचार करके मैं देखता हूँ तो मुझे वहाँ ही सुख जान पड़ता है, जहाँ कोई भय नहीं है ॥ ३२ ॥
पृष्ठ 742
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अपराधैर्न तावन्तो भृत्याः शिष्टा नराधिपैः ।
उपघातैर्यथा भृत्या दूषिता निधनं गताः ॥ ३३ ॥
राजाओंने किन्हीं वास्तविक अपराधोंके कारण उतने सेवकोंको दण्ड नहीं दिया होगा, जितने कि लोगोंके झूठे लगाये गये दोषोंसे कलंकित होकर राजाके हाथसे मारे गये हैं ॥ ३३ ॥
यदि त्वेतन्मया कार्यं मृगेन्द्र यदि मन्यसे ।
समयं कृतमिच्छामि वर्तितव्यं यथा मयि ॥ ३४ ॥
मृगराज! यदि आप मुझसे मन्त्रित्वका कार्य लेना ही ठीक समझते हैं तो मैं आपसे एक शर्त कराना चाहता हूँ, उसीके अनुसार आपको मेरे साथ बर्ताव करना उचित होगा ॥ ३४ ॥
मदीया माननीयास्ते श्रोतव्यं च हितं वचः ।
कल्पिता या च मे वृत्तिः सा भवेत् त्वयि सुस्थिरा ॥ ३५ ॥
मेरे आत्मीयजनोंका आपको सम्मान करना होगा । मेरी कही हुई हितकर बातें आपको सुननी होंगी । मेरे लिये जो जीविकाकी व्यवस्था आपने की है, वह आपहीके पास सुस्थिर एवं सुरक्षित रहे ॥ ३५ ॥
न मन्त्रयेयमन्यैस्ते सचिवैः सह कर्हिचित् ।
नीतिमन्तः परीप्सन्तो वृथा ब्रूयुः परे मयि ॥ ३६ ॥
मैं आपके दूसरे मन्त्रियोंके साथ बैठकर कभी कोई परामर्श नहीं करूँगा; क्योंकि दूसरे नीतिज्ञ मन्त्री मुझसे ईर्ष्या करते हुए मेरे प्रति व्यर्थकी बातें कहने लगेंगे ॥ ३६ ॥
एक एकेन संगम्य रहो ब्रूयां हितं वचः ।
न च ते ज्ञातिकार्येषु प्रष्टव्योऽहं हिताहिते ॥ ३७ ॥
मैं अकेला एकान्तमें अकेले आपसे मिलकर आपको हितकी बातें बताया करूँगा ।
आप भी अपने जाति - भाइयोंके कार्योंमें मुझसे हिताहितकी बात न पूछियेगा ॥ ३७ ॥
मया सम्मन्त्र्य पश्चाच्च न हिंस्याः सचिवास्त्वया ।
मदीयानां च कुपितो मा त्वं दण्डं निपातयेः ॥ ३८ ॥
मुझसे सलाह लेनेके बाद यदि आपके पहलेके मन्त्रियोंकी भूल प्रमाणित हो तो भी उन्हें प्राणदण्ड न दीजियेगा तथा कभी क्रोधमें आकर मेरे आत्मीयजनोंपर भी प्रहार न कीजियेगा ॥ ३८ ॥
एवमस्त्विति तेनासौ मृगेन्द्रेणाभिपूजितः ।
प्राप्तवान् मतिसाचिव्यं गोमायुर्व्याघ्रयोनितः ॥ ३ ९ ॥
' अच्छा, ऐसा ही होगा' यह कहकर शेरने उसका बड़ा सम्मान किया । सियार बाघराजाके बुद्धिदायक सचिवके पदपर प्रतिष्ठित हो गया ॥ ३ ९ ॥ तं तथा सुकृतं दृष्ट्वा पूज्यमानं स्वकर्मसु ।
पृष्ठ 743
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्राद्विषन् कृतसंघाताः पूर्वभृत्या मुहुर्मुहुः ॥ ४० ॥
सियार बहुत अच्छा कार्य करने लगा और उसको अपने सभी कार्योंमें बड़ी प्रशंसा प्राप्त होने लगी । इस प्रकार उसे सम्मानित होता देख पहलेके राजसेवक संगठित हो बारंबार उससे द्वेष करने लगे ॥ ४० ॥
मित्रबुद्धया च गोमायुं सान्त्वयित्वा प्रसाद्य च ।
दोषैस्तु समतां नेतुमैच्छन्नशुभबुद्धयः ॥ ४१ ॥
उनके मनमें दुष्टता भरी थी । वे सियारके पास मित्रभावसे आते और उसे समझा-बुझाकर प्रसन्न करके अपने ही समान दोषके पथपर चलानेकी चेष्टा करते थे ॥
अन्यथा ह्युषिताः पूर्वं परद्रव्याभिहारिणः ।
अशक्ताः किञ्चिदादातुं द्रव्यं गोमायुयन्त्रिताः ॥ ४२ ॥
उसके आनेके पहले वे और ही प्रकारसे रहा करते थे । दूसरोंका धन हड़प लिया करते थे, परंतु अब वैसा नहीं कर सकते थे । सियारने उन सबपर ऐसी कड़ी पाबंदी लगा दी थी कि वे किसीकी कोई भी वस्तु लेनेमें असमर्थ हो गये थे ॥ ४२ ॥
व्युत्थानं च विकांक्षद्भिः कथाभिः प्रतिलोभ्यते ।
धनेन महता चैव बुद्धिरस्य विलोभ्यते ॥ ४३ ॥
उनकी यही इच्छा थी कि सियार भी डिग जाय; इसलिये वे तरह -तरहकी बातोंमें उसे फुसलाते और बहुत - सा धन देनेका लोभ देकर उसकी बुद्धिको प्रलोभनमें फँसाना चाहते थे ॥ ४३ ॥
न चापि स महाप्राज्ञस्तस्माद् धैर्याच्चचाल ह ।
अथास्य समयं कृत्वा विनाशाय तथा परे ॥ ४४ ॥
पंरतु सियार बड़ा बुद्धिमान् था । अतः वह उनके प्रलोभनमें आकर धैर्यसे विचलित नहीं हुआ । तब दूसरे- दूसरे सभी सेवकोंने मिलकर उसके विनाशके लिये प्रतिज्ञा की और तदनुसार प्रयत्न आरम्भ कर दिया ॥ ४४ ॥
ईप्सितं तु मृगेन्द्रस्य मांसं यत् यत्र संस्कृतम् ।
अपनीय स्वयं तद्धि तैर्न्यस्तं तस्य वेश्मनि ॥ ४५ ॥
एक दिन उन सेवकोंने शेरके खानेके लिये जो मांस तैयार करके रखा गया था, उसके स्थानसे हटाकर सियारके घरमें रख दिया ॥ ४५ ॥
यदर्थं चाप्यपहृतं येन तच्चैव मन्त्रितम् ।
तस्य तद् विदितं सर्वं कारणार्थं च मर्षितम् ॥ ४६ ॥
जिसने जिस उद्देश्यसे उस मांसको चुराया और जिसने ऐसा करनेकी सलाह दी, वह सब कुछ सियारको मालूम हो गया तो भी किसी कारणवश उसने चुपचाप सह लिया ॥ ४६ ॥
समयोऽयं कृतस्तेन साचिव्यमुपगच्छता ।
पृष्ठ 744
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
नोपघातस्त्वया कार्यो राजन् मैत्रीमिहेच्छता ॥ ४७ ॥
मन्त्रीपदपर आते समय सियारने यह शर्त करा ली थी कि राजन्! यदि आप मुझसे मैत्री चाहते हैं तो किसीके बहकावेमें आकर मेरा विनाश न कर डालियेगा ॥ भीष्म उवाच
क्षुधितस्य मृगेन्द्रस्य भोक्तुमभ्युत्थितस्य च ।
भोजनायोपहर्तव्यं तन्मांसं नोपदृश्यते ॥ ४८ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! उधर शेरको जब भूख लगी और वह भोजनके लिये उठा, तब उसके खानेके लिये जो परोसा जानेवाला था, वह मांस उसे नहीं दिखायी दिया ॥ ४८ ॥
मृगराजेन चाज्ञप्तं दृश्यतां चोर इत्युत ।
कृतकैश्चापि तन्मांसं मृगेन्द्रायोपवर्णितम् ॥ ४ ९ ॥
सचिवेनापनीतं ते विदुषा प्राज्ञमानिना । तब मृगराजने सेवकोंको आज्ञा दी कि चोरका पता लगाओ । तब जिनकी यह करतूत थी, उन्हीं लोगोंने उस मांसके बारेमें शेरको बताया- ' महाराज! अपनेको अत्यन्त बुद्धिमान् और पण्डित माननेवाले आपके मन्त्री महोदयने ही इस मांसका अपहरण किया है ' ॥ ४ ९ ¾ ॥ सरोषस्त्वथ शार्दूलः श्रुत्वा गोमायुचापलम् ॥ ५० ॥
बभूवामर्षितो राजा वधं चास्य व्यरोचयत् । सियारकी यह चपलता सुनकर शेर गुस्से से भर गया । उससे यह बात सही नहीं गयी; अतः मृगराजने उसका वध करनेका ही विचार कर लिया ॥ ५०३ ॥
छिद्रं तु तस्य तद् दृष्ट्वा प्रोचुस्ते पूर्वमन्त्रिणः ॥ ५१ ॥
सर्वेषामेव सोऽस्माकं वृत्तिभङ्गे प्रवर्तते ।
निश्चित्यैव पुनस्तस्य ते कर्माण्यपि वर्णयन् ॥ ५२ ॥
उसका यह छिद्र देखकर पहलेके मन्त्री आपसमें कहने लगे, वह हम सब लोगोंकी जीविका नष्ट करनेपर तुला हुआ है; अतः हम भी उससे बदला लें, ऐसा निश्चय करके वे उसके अपराधोंका वर्णन करने लगे- ॥
इदं तस्येदृशं कर्म किं तेन न कृतं भवेत् ।
श्रुतश्च स्वामिना पूर्वं यादृशो नैव तादृश: ॥ ५३ ॥
‘ महाराज! जब उसके द्वारा ऐसा कर्म किया जा सकता है, तब वह और क्या नहीं कर सकता? स्वामीने पहले उसके बारेमें जैसा सुन रक्खा है, वह वैसा नहीं है ॥
वाङ्मात्रेणैव धर्मिष्ठः स्वभावेन तु दारुणः ।
धर्मच्छमा ह्ययं पापो वृथाचारपरिग्रहः ॥ ५४ ॥
पृष्ठ 745
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
' वह बातोंसे ही धर्मात्मा बना हुआ है । स्वभावसे तो बड़ा क्रूर है । भीतरसे यह बड़ा पापी है; परंतु ऊपरसे धर्मात्मापनका ढोंग बनाये हुए है । उसका सारा आचार - विचार व्यर्थ दिखावेके लिये है ॥ ५४ ॥
कार्यार्थं भोजनार्थेषु व्रतेषु कृतवान् श्रमम् ।
यदि विप्रत्ययो ह्येष तदिदं दर्शयाम ते ॥ ५५ ॥
‘ उसने तो अपना काम बनाने और पेट भरनेके लिये ही व्रत करनेमें परिश्रम किया है । यदि आपको विश्वास न हो तो यह लीजिये, हम अभी उसके यहाँ से मांस ले आकर दिखाते हैं ॥ ५५ ॥
तन्मांसं चैव गोमायोस्तैः क्षणादाशु ढौकितम् ।
मांसापनयनं ज्ञात्वा व्याघ्रः श्रुत्वा च तद्वचः ॥ ५६ ॥
आज्ञापयामास तदा गोमायुर्वध्यतामिति । ऐसा कहकर वे क्षणभरमें ही सियारके घरसे उस मांसको उठा लाये । मांसके अपहरणकी बात जानकर और उन सेवकोंकी बातें सुनकर शेरने उस समय यह आज्ञा दे दी कि सियारको प्राणदण्ड दे दिया जाय ॥ ५६ ॥
शार्दूलस्य वचः श्रुत्वा शार्दूलजननी ततः ॥ ५७ ॥
मृगराजं हितैर्वाक्यैः सम्बोधयितुमागमत् ।
पुत्र नैतत् त्वया ग्राह्यं कपटारम्भसंयुतम् ॥ ५८ ॥
शेरकी यह बात सुनकर उसकी माता हितकर वचनोंद्वारा उसे समझानेके लिये वहाँ आयी और बोली —‘ बेटा! इसमें कुछ कपटपूर्ण षड्यन्त्र हुआ मालूम पड़ता है; अतः तुम्हें इसपर विश्वास नहीं करना चाहिये ॥
कर्मसंघर्षजैर्दोषैर्दुष्येताशुचिभिः शुचिः ।
नोच्छ्रितं सहते कश्चित् प्रक्रिया वैरकारिका ॥ ५ ९ ॥
' काममें लाग - डाँट हो जानेसे जिनके मनमें शुद्धभाव नहीं है, वे लोग निर्दोषपर ही दोषारोपण करते हैं । किसीको अपनेसे ऊँची अवस्थामें देख कर कोई- कोई ईर्ष्यावश सहन नहीं कर पाते । यही वैरभाव उत्पन्न करनेवाली प्रक्रिया है ॥ ५ ९ ॥
शुचेरपि हि युक्तस्य दोष एव निपात्यते ।
मुनेरपि वनस्थस्य स्वानि कर्माणि कुर्वतः ॥ ६० ॥
उत्पाद्यन्ते त्रयः पक्षा मित्रोदासीनशत्रवः । ' कोई कितना ही शुद्ध और उद्योगी क्यों न हो, लोग उसपर दोषारोपण कर ही देते हैं । अपने धार्मिक कर्मोंमें लगे हुए वनवासी मुनिके भी शत्रु, मित्र और उदासीन— ये तीन पक्ष पैदा हो जाते हैं ॥ ६० ॥
लुब्धानां शुचयो द्वेष्याः कातराणां तरस्विनः ॥ ६१ ॥
मूर्खाणां पण्डिता द्वेष्या दरिद्राणां महाधनाः ।
पृष्ठ 746
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अधार्मिकाणां धर्मिष्ठा विरूपाणां सुरूपिणः ॥ ६२ ॥
‘ लोभी लोग निर्लोभीसे, कायर बलवानोंसे, मूर्ख विद्वानोंसे, दरिद्र बड़े -बड़े धनियोंसे, पापाचारी धर्मात्माओंसे और कुरूप सुन्दर रूपवालोंसे द्वेष करते हैं ॥ ६१-६२ ॥
बहवः पण्डिता मूर्खा लुब्धा मायोपजीविनः ।
कुर्युर्दोषमदोषस्य बृहस्पतिमतेरपि ॥ ६३ ॥
' विद्वानोंमें भी बहुत- से ऐसे अविवेकी, लोभी और कपटी होते हैं, जो बृहस्पतिके समान बुद्धि रखनेवाले निर्दोष व्यक्तिमें भी दोष ढूँढ निकालते हैं ॥ ६३ ॥
शून्यात् तच्च गृहान्मांसं यद्यप्यपहृतं तव ।
नेच्छते दीयमानं च साधु तावद् विमृश्यताम् ॥ ६४ ॥
' एक ओर तो तुम्हारे सूने घरसे मांसकी चोरी हुई है और दूसरी ओर एक व्यक्ति ऐसा है, जो देनेपर भी मांस लेना नहीं चाहता - इन दोनों बातोंपर पहले अच्छी तरह विचार करो ॥ ६४ ॥
असभ्याः सभ्यसंकाशाः सभ्याश्चासभ्यदर्शनाः ।
दृश्यन्ते विविधा भावास्तेषु युक्तं परीक्षणम् ॥ ६५ ॥
‘ संसारमें बहुतसे असभ्य प्राणी सभ्यकी तरह और सभ्यलोग असभ्यके समान देखे जाते हैं । इस तरह अनेक प्रकारके भाव दृष्टिगोचर होते हैं; अतः उनकी परीक्षा कर लेनी उचित है ॥ ६५ । |
तलवद् दृश्यते व्योम खद्योतो हव्यवाडिव ।
न चैवास्ति तलं व्योम्नि खद्योते न हुताशनः ॥ ६६ ॥
' आकाश औंधी की हुई कड़ाहीके तले ( भीतरी भागों ) के समान दिखायी देता है और जुगनू अग्निके सदृश दृष्टिगोचर होता है; परंतु न तो आकाशमें तल है और न जुगनूमें अग्नि ही है ॥ ६६ ॥
तस्मात् प्रत्यक्षदृष्टोऽपि युक्तो ह्यर्थः परीक्षितुम् ।
परीक्ष्य ज्ञापयन्नर्थान्न पश्चात् परितप्यते ॥ ६७ ॥
‘ इसलिये प्रत्यक्ष दिखायी देनवाली वस्तुकी भी परीक्षा करनी उचित है । जो परीक्षा लेकर भले - बुरेकी जाँच करके किसी कार्यके लिये आज्ञा देता है, उसे पीछे पछताना नहीं पड़ता ॥ ६७ ॥
न दुष्करमिदं पुत्र यत् प्रभुर्घातयेत् परम् ।
श्लाघनीया यशस्या च लोके प्रभवतां क्षमा ॥ ६८ ॥
‘ बेटा! यदि शक्तिशाली राजा दूसरेको मरवा डाले तो यह उसके लिये कोई कठिन काम नहीं है; परंतु शक्तिशाली पुरुषोंमें यदि क्षमाका भाव हो तो संसारमें उसीकी बड़ाई की जाती है और उसीसे राजाओंका यश बढ़ता है ॥ ६८ ॥
स्थापितोऽयं त्वया पुत्र सामन्तेष्वपि विश्रुतः ।
पृष्ठ 747
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दुःखेनासाद्यते पात्रं धार्यतामेष ते सुहृत् ॥ ६ ९ ॥ ' बेटा! तुमने ही इस सियारको मन्त्रीके पदपर बिठाया है, और तुम्हारे सामन्तोंमें भी इसकी ख्याति बढ़ गयी है । कोई सुपात्र व्यक्ति बड़ी कठिनाईसे प्राप्त होता है । यह सियार तुम्हारा हितैषी सुहृद् है; इसलिये तुम इसकी रक्षा करो ॥ ६ ९ ॥
दूषितं परदोषेहिं गृह्णीते योऽन्यथा शुचिम् ।
स्वयं संदूषितामात्यः क्षिप्रमेव विनश्यति ॥ ७० ॥
‘ जो दूसरोंके मिथ्या कलंक लगानेपर किसी निर्दोषको भी दण्ड देता है, वह दुष्ट मन्त्रियोंवाला राजा शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ' ॥ ७० ॥
तस्मादप्यरिसंघाताद् गोमायोः कश्चिदागतः ।
धर्मात्मा तेन चाख्यातं यथैतत् कपटं कृतम् ॥ ७१ ॥
तदनन्तर उन्हीं शत्रुओंके समूहमेंसे किसी धर्मात्मा सियारने ( जो शेरका गुप्तचर बना था, ) आकर गीदड़के साथ जो यह छल- कपट किया गया था, वह सब सिंहको कह सुनाया ॥ ७१ ॥
ततो विज्ञातचरितः सत्कृत्य स विमोक्षितः ।
परिष्वक्तश्च सस्नेहं मृगेन्द्रेण पुनः पुनः ॥ ७२ ॥
इससे शेरको सियारकी सच्चरित्रताका पता चल गया और उसने उसका सत्कार करके उसे इस अभियोगसे मुक्त कर दिया। इतना ही नहीं, मृगराजने स्नेहपूर्वक बारंबार अपने सचिवको गलेसे लगाया ॥ ७२ ॥
अनुज्ञाप्य मृगेन्द्रं तु गोमायुर्नीतिशास्त्रवित् ।
तेनामर्षेण संतप्तः प्रायमासितुमैच्छत ॥ ७३ ॥
तत्पश्चात् नीतिशास्त्रके ज्ञाता सियारने मृगराजकी आज्ञा लेकर अमर्षसे संतप्त हो उपवास करके प्राण त्याग देनेका विचार किया ॥ ७३ ॥
शार्दूलस्तं तु गोमायुं स्नेहात् प्रोत्फुल्ललोचनः ।
अवारयत् स धर्मिष्ठं पूजया प्रतिपूजयन् ॥ ७४ ॥
शेरने धर्मात्मा गीदड़का भलीभाँति आदर- सत्कार करके उसे उपवाससे रोक दिया ।
उस समय उसके नेत्र स्नेहसे खिल उठे थे ॥ ७४ ॥
तं स गोमायुरालोक्य स्नेहादागतसम्भ्रमम् ।
उवाच प्रणतो वाक्यं बाष्पगद्गदया गिरा ॥ ७५ ॥
सियारने देखा, मालिकका हृदय स्नेहसे आकुल हो रहा है, तब उसने उसे प्रणाम करके अश्रुगद्गद वाणीसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया— ॥ ७५ ॥
पूजितोऽहं त्वया पूर्वं पश्चाच्चैव विमानितः ।
परेषामास्पदं नीतो वस्तुं नार्हाम्यहं त्वयि ॥ ७६ ॥
पृष्ठ 748
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
‘महाराज! पहले तो आपने मुझे सम्मान दिया और पीछे अपमानित कर दिया, शत्रुओंकी - सी अवस्थामें डाल दिया; अतः अब मैं आपके पास रहनेके योग्य नहीं हूँ ॥ ७६ ॥
असंतुष्टाश्च्युताः स्थानान्मानात् प्रत्यवरोपिताः ।
स्वयं चोपहृता भृत्या ये चाप्युपहिताः परैः ॥ ७७ ॥
परिक्षीणाश्च लुब्धाश्च क्रुद्धा भीताः प्रतारिताः ।
हृतस्वा मानिनो ये च त्यक्तादाना महेप्सवः ॥ ७८ ॥
संतापिताश्च ये केचिद् व्यसनौघप्रतीक्षिणः ।
अन्तर्हिताः सोपहितास्ते सर्वे परसाधनाः ॥ ७९ ॥
‘ जो अपने पदसे गिरा दिये जानेके कारण असंतुष्ट हों, अपमानित किये गये हों, जो स्वयं राजासे पुरस्कृत होकर दूसरोंके द्वारा कलंक लगाये जानेके कारण उस आदरसे वंचित कर दिये गये हों, जो क्षीण, लोभी, क्रोधी, भयभीत और धोखेमें डाले गये हों, जिनका सर्वस्व छीन लिया गया हो, जो मानी हों, जिनकी आय छिन गयी हो, जो महत्त्वपूर्ण पद पाना चाहते हों, जिन्हें सताया गया हो, जो किसी राजापर आनेवाले संकटसमूहकी प्रतीक्षा कर रहे हों, छिपे रहते हों और मनमें कपटभाव रखते हों, वे सभी सेवक शत्रुओंका काम बनानेवाले होते हैं ॥ ७७–७९ ॥
अवमानेन युक्तस्य स्थानभ्रष्टस्य वा पुनः ।
कथं यास्यसि विश्वासमहं तिष्ठामि वा कथम् ॥ ८० ॥
जब मैं एक बार अपने पदसे भ्रष्ट और अपमानित हो गया, तब पुनः आप मुझपर कैसे विश्वास कर सकेंगे? अथवा मैं ही कैसे आपके पास रह सकूँगा? ॥
समर्थ इति संगृह्य स्थापयित्वा परीक्षितः ।
कृतं च समयं भित्त्वा त्वयाहमवमानितः ॥ ८१ ॥
‘ आपने योग्य समझकर मुझे अपनाया और मन्त्रीके पदपर बिठाकर मेरी परीक्षा ली ।
इसके बाद अपनी की हुई प्रतिज्ञाको तोड़कर मेरा अपमान किया ॥ ८१ ॥
प्रथमं यः समाख्यातः शीलवानिति संसदि ।
न वाच्यं तस्य वैगुण्यं प्रतिज्ञां परिरक्षता ॥ ८२ ॥
‘ पहले भरी सभामें शीलवान् कहकर जिसका परिचय दिया गया हो, प्रतिज्ञाकी रक्षा करनेवाले पुरुषको उसका दोष नहीं बताना चाहिये ॥ ८२ ॥
एवं चावमतस्येह विश्वासं मे न यास्यसि ।
त्वयि चापेतविश्वास ममोद्वेगो भविष्यति ॥ ८३ ॥
' जब मैं इस प्रकार यहाँ अपमानित हो गया तो अब आपपर मेरा विश्वास न होगा और आप भी मुझपर विश्वास नहीं कर सकेंगे। ऐसी दशामें आपसे मुझे सदा भय बना रहेगा ॥ ८३ ॥
पृष्ठ 749
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शंकितस्त्वमहं भीतः परच्छिद्रानुदर्शिनः ।
अस्निग्धाश्चैव दुस्तोषाः कर्म चैतद् बहुच्छलम् ॥ ८४ ॥
‘ आप मुझपर संदेह करेंगे और मैं आपसे डरता रहूँगा, इधर पराये दोष ढूँढनेवाले आपके भूत्यलोग मौजूद ही हैं । इनका मुझपर तनिक भी स्नेह नहीं है तथा इन्हें संतुष्ट रखना भी मेरे लिये अत्यन्त कठिन है । साथ ही यह मन्त्रीका कर्म भी अनेक प्रकारके छल-कपटसे भरा हुआ है ॥ ८४ ॥
दुःखेन श्लिष्यते भिन्नं श्लिष्टं दुःखेन भिद्यते ।
भिन्ना श्लिष्टा तु या प्रीतिर्न सा स्नेहेन वर्तते ॥ ८५ ॥
‘ प्रेमका बन्धन बड़ी कठिनाईसे टूटता है, पर जब वह एक बार टूट जाता है, तब बड़ी कठिनाईसे जुट पाता है । जो प्रेम बारंबार टूटता और जुड़ता रहता है, उसमें स्नेह नहीं होता ॥ ८५ ॥
कश्चिदेव हिते भर्तुर्दृश्यते न परात्मनोः ।
कार्यापेक्षा हि वर्तन्ते भावस्निग्धाः सुदुर्लभाः ॥ ८६ ॥
' ऐसा मनुष्य कोई एक ही होता है, जो अपने या दूसरेके हितमें रत न रहकर स्वामीके ही हितमें संलग्न दिखायी देता हो; क्योंकि अपने कार्यकी अपेक्षा रखकर स्वार्थसाधनका उद्देश्य लेकर प्रेम करनेवाले तो बहुत होते हैं, परंतु शुद्धभावसे स्नेह रखनेवाले मनुष्य अत्यन्त दुर्लभ हैं ॥ ८६ ॥
सुदुःखं पुरुषज्ञानं चित्तं ह्येषां चलाचलम् ।
समर्थो वाप्यशङ्को वा शतेष्वेकोऽधिगम्यते ॥ ८७ ॥
' योग्य मनुष्यको पहचानना राजाओंके लिये अत्यन्त दुष्कर है; क्योंकि उनका चित्त चंचल होता है, सैकड़ोंमेंसे कोई एक ही ऐसा मिलता है, जो सब प्रकारसे सुयोग्य होता हुआ भी संदेहसे परे हो ॥ ८७ ॥
अकस्मात् प्रक्रिया नॄणामकस्माच्चापकर्षणम् ।
शुभाशुभे महत्त्वं च प्रकार्तुं बुद्धिलाघवम् ॥ ८८ ॥
' मनुष्यके उत्कर्ष और अपकर्ष ( उन्नति और अवनति ) अकस्मात् होते हैं, किसीका भला करके बुरा करना और उसे महत्त्व देकर नीचे गिराना, यह सब ओछी बुद्धिका परिणाम है ' ॥ ८८ ॥
एवंविधं सान्त्वमुक्त्वा धर्मकामार्थहेतुमत् ।
प्रसादयित्वा राजानं गोमायुर्वनमभ्यगात् ॥ ८९ ॥
इस प्रकार धर्म, अर्थ, काम और मुक्तियोंसे युक्त सान्त्वनापूर्ण वचन कहकर सियारने बाघराजाको प्रसन्न कर लिया और उसकी अनुमति लेकर वह वनमें चला गया ॥ ८ ९ ॥
अगृह्यानुनयं तस्य मृगेन्द्रस्य च बुद्धिमान् ।
गोमायुः प्रायमास्थाय त्यक्त्वा देहं दिवं ययौ ॥ ९ ० ॥
पृष्ठ 750
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वह बड़ा बुद्धिमान् था; अतः शेरकी अनुनय- विनय न मानकर मृत्युपर्यन्त निराहार रहनेका व्रत ले एक स्थानपर बैठ गया और अन्तमें शरीर त्यागकर स्वर्गधाममें जा पहुँचा ॥ ९ ० ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि व्याघ्रगोमायुसंवादे एकादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें व्याघ्र और गीदड़का संवादविषयक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १११ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ९ १ श्लोक हैं । )