उतथ्यगीता : राजसत्ता और राजा के वास्तविक कर्तव्य क्या हैं?
राजा का धर्म और प्रजा-कल्याण
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 90–91 · पृष्ठ 608–623
1,930 शब्द · 10 मिनटका पाठ · 17 श्लोक
भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा
मान्धाता को दिए गए उतथ्य के उपदेशों की कथा सुनाना
भीष्म बोले — राजन्! ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ अङ्गिरापुत्र उतथ्य ने युवनाश्व के पुत्र मान्धाता से प्रसन्नतापूर्वक जिन क्षत्रिय धर्मों का वर्णन किया था, उन्हें सुनो। युधिष्ठिर! ब्रह्मज्ञानियों में शिरोमणि उतथ्य ने जिस प्रकार उन्हें उपदेश दिया था, वह सब प्रसङ्ग मैं तुम्हें पूरा-पूरा बता रहा हूँ, श्रवण करो।
यानङ्गिराः क्षत्रधर्मानुतथ्यो ब्रह्मवित्तमः ।
मान्धात्रे यौवनाश्वाय प्रीतिमानभ्यभाषत ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ अंगिरापुत्र उतथ्यने युवनाश्वके पुत्र मान्धातासे प्रसन्नतापूर्वक जिन क्षत्रिय धर्मोंका वर्णन किया था, उन्हें सुनो ।
उतथ्य बोले — "मान्धाता! राजा धर्म का पालन और प्रचार करने के लिये ही होता है, विषय-सुखों का उपभोग करने के लिये नहीं। तुम्हें यह जानना चाहिये कि राजा सम्पूर्ण जगत् का रक्षक है। यदि राजा धर्माचरण करता है तो देवता बन जाता है, और यदि वह अधर्माचरण करता है तो नरक में ही गिरता है। सम्पूर्ण प्राणी धर्म के ही आधार पर स्थित हैं और धर्म राजा के ऊपर प्रतिष्ठित है। जो राजा अच्छी तरह धर्म का पालन करता है और उसके अनुकूल शासन करता है, वही दीर्घकाल तक इस पृथ्वी का स्वामी बना रहता है।"
राजा चरति चेद् धर्मं देवत्वायैव कल्पते ।
स चेदधर्मं चरति नरकायैव गच्छति ॥
यदि राजा धर्माचरण करता है तो देवता बन जाता है, और यदि वह अधर्माचरण करता है तो नरकमें ही गिरता है ।
उतथ्य ने आगे कहा — "परम धर्मात्मा और श्री-सम्पन्न राजा धर्म का साक्षात् स्वरूप कहलाता है। यदि वह धर्म का पालन नहीं करता, तो लोग देवताओं की भी निन्दा करते हैं और वह धर्मात्मा नहीं, पापात्मा कहलाता है। जो अपने धर्म के पालन में तत्पर रहते हैं, उन्हींसे अभीष्ट मनोरथ की सिद्धि होती है; सारा संसार उसी मङ्गलमय धर्म का अनुसरण करता है। तात! यदि पाप की प्रवृत्ति का निवारण न किया जाए, तो 'यह मेरी वस्तु है' ऐसा कहना श्रेष्ठ पुरुषों के लिये असम्भव हो जाता है और उस समय कोई भी धार्मिक व्यवस्था टिकने नहीं पाती है। जब जगत् में पाप का बल बढ़ जाता है, तब मनुष्यों को अपनी स्त्री, अपने पशु और अपने खेत या घर का भी कुछ ठिकाना दिखाई नहीं देता।"
ममेदमिति नैवैतत् साधूनां तात धर्मतः ।
न वै व्यवस्था भवति यदा पापो न वार्यते ॥
तात! यदि पापकी प्रवृत्तिका निवारण न किया जाय तो यह मेरी वस्तु है, ऐसा कहना श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये असम्भव हो जाता है और उस समय कोई भी धार्मिक व्यवस्था टिकने नहीं पाती है ।
"जब पाप को रोका नहीं जाता, तब देवता पूजा को नहीं जानते, पितरों को स्वधा का अनुभव नहीं होता और अतिथियों की कहीं पूजा नहीं होती। जब पाप का निवारण नहीं किया जाता, तब ब्रह्मचर्य व्रत करने वाले द्विज वेदों का अध्ययन छोड़ देते हैं और ब्राह्मण यज्ञों का अनुष्ठान नहीं कर पाते। महाराज! जब पाप का निवारण नहीं किया जाता, तब बूढ़े जन्तुओं की भाँति मनुष्यों का मन घबराहट में पड़ा रहता है।"
वृद्धानामिव सत्त्वानां मनो भवति विह्वलम् ।
मनुष्याणां महाराज यदा पापो न वार्यते ॥
महाराज! जब पापका निवारण नहीं किया जाता है, तब बूढ़े जन्तुओंकी भाँति मनुष्योंका मन घबराहटमें पड़ा रहता है ।
उतथ्य ने गम्भीर स्वर में कहा — "लोक और परलोक दोनों को दृष्टि में रखकर महर्षियों ने स्वयं ही राजा नामक एक महान शक्तिशाली मनुष्य की सृष्टि की। उन्होंने सोचा था कि 'यह साक्षात् धर्मस्वरूप होगा'। अतः जिसमें धर्म विराज रहा हो, उसीको राजा कहते हैं। वृष नाम है भगवान् धर्म का। जो धर्म के विषय में 'अलम्' यानी बस कह देता है, उसे देवता 'वृषल' समझते हैं; अतः धर्म की सदा ही वृद्धि करनी चाहिये। धर्म की वृद्धि होने पर समस्त प्राणियों का अभ्युदय होता है और उसका ह्रास होने पर सबका ह्रास हो जाता है।"
वृषो ही भगवान् धर्मो यस्तस्य कुरुते ह्यलम् ।
वृषलं तं विदुर्देवास्तस्माद्धर्मं विवर्धयेत् ॥
वृष नाम है भगवान् धर्मका । जो धर्मके विषयमें ' अलम्' ( बस ) कह देता है, उसे देवता ‘ वृषल' समझते हैं; अतः धर्मकी सदा ही वृद्धि करनी चाहिये ।
"नरेन्द्र! धन से धर्म की उत्पत्ति होती है। ब्रह्माजी ने प्राणियों के कल्याणार्थ ही धर्म की सृष्टि की है, इसलिये राजा को चाहिये कि वह अपने देश में प्रजा-जनों पर अनुग्रह करने के लिये धर्म का प्रचार करे। भरतभूषण! तुम भी काम और क्रोध की अवहेलना करके निरन्तर धर्म का ही पालन करो; क्योंकि धर्म ही राजाओं के लिये सबसे बढ़कर कल्याण करने वाला है। मान्धाता! धर्म का मूल ब्राह्मण है; इसलिये ब्राह्मणों का सदा सम्मान करना चाहिये। उनकी प्रत्येक कामना को ईर्ष्यारहित होकर पूर्ण करना उचित है। उनकी इच्छा पूर्ण न करने से राजाओं के ऊपर भय आता है और मित्र शत्रु बन जाते हैं।"
त्रायते हि यदा सर्वं वाचा कायेन कर्मणा ।
पुत्रस्यापि न मृष्येच्च स राज्ञो धर्म उच्यते ॥
जब वह मन, वाणी और शरीरके द्वारा सबकी रक्षा करता है और पुत्रके भी अपराधको क्षमा नहीं करता, तब उसका वह बर्ताव भी ' राजाका धर्म' कहा जाता है ।
उतथ्य ने चेतावनी दी — "विरोचन कुमार बलि बाल्यकाल से ही सदा ब्राह्मणों पर दोषारोपण करते थे, इसलिये उनकी राजलक्ष्मी उनसे हटकर देवराज इन्द्र के पास चली गयी। उस लक्ष्मी को इन्द्र के पास देखकर राजा बलि को बड़ा पश्चात्ताप हुआ। यह अभिमान और असूया का फल है! मान्धाता, तुम सचेत हो जाओ, कहीं तुम्हारी भी शत्रुतापिनी लक्ष्मी तुम्हें छोड़ न दे। भूपाल! अब भी चेतो। जो दर्प (अभिमान) को जीत लेता है, वही राजा होता है और जो उससे पराजित हो जाता है, वह दास बन जाता है।"
एतत् फलमसूयाया अभिमानस्य वा विभो ।
तस्माद् बुध्यस्व मान्धातर्मा त्वां जह्यात् प्रतापिनी ॥
प्रभो! यह अभिमान और असूयाका फल है, अतः मान्धाता! तुम सचेत हो जाओ, कहीं तुम्हारी भी शत्रुतापिनी लक्ष्मी तुमको छोड़ न दे ।
"यदि तुम चिरकाल तक राजसिंहासन पर विराजमान रहना चाहते हो, तो ऐसा बर्ताव करो जिससे तुम्हारे द्वारा दर्प और अधर्म का सेवन न हो। मतवाले, प्रमादी, बालक और विशेषतः पागलों से बचो; उनके निकट-सम्पर्क से भी दूर रहो। इसी तरह जिसे एक बार कैद किया गया हो, उस मन्त्री से, परायी स्त्रियों से, दुर्गम पर्वतों से तथा हाथी, घोड़े और सर्पों से राजा को सदा सावधान रहना चाहिये। कृपणता, अभिमान, दम्भ और क्रोध का सर्वथा परित्याग कर दो।"
निगृहीतादमात्याच्च स्त्रीभ्यश्चैव विशेषतः ।
पर्वताद् विषमाद् दुर्गाद्धस्तिनोऽश्वात् सरीसृपात् ॥
एतेभ्यो नित्ययत्तः स्यान्नक्तंचर्यां च वर्जयेत् ।
अत्यागं चाभिमानं च दम्भं क्रोधं च वर्जयेत् ॥
इसी तरह जिसको एक बार कैद किया हो, उस मन्त्रीसे, विशेषतः परायी स्त्रियोंसे, ऊँचे - नीचे और दुर्गम पर्वतसे तथा हाथी, घोड़े और सर्पोंसे राजाको बचकर रहना चाहिये । इनकी ओरसे सदा सावधान रहे और रातमें घूमना-फिरना छोड़ दे । कृपणता, अभिमान, दम्भ और क्रोधका भी सर्वथा परित्याग कर दे ।
"जब राजा धर्म की ओर से प्रमाद करता है, तब उत्तम कुलों में पापी और राक्षस जन्म लेते हैं—नपुंसक, काने, लँगड़े, लूले, गूँगे तथा बुद्धिहीन बालक। क्षत्रिय के प्रमाद से भयानक दोष प्रकट होते हैं। गर्मी के मौसम में सर्दी और सर्दी के मौसम में गर्मी पड़ने लगती है; कभी सूखा पड़ जाता है, कभी अत्यधिक वर्षा होती है तथा प्रजामें नाना प्रकार के रोग फैल जाते हैं। आकाश में भयानक ग्रह और धूमकेतु आदि तारे उगने लगते हैं जो राष्ट्र के विनाश की सूचना देते हैं।"
अपरिचित स्त्रियों, बाँझ स्त्रियों, वेश्याओं, परायी स्त्रियों तथा कुमारी कन्याओंके साथ राजा मैथुन न करे ॥ कुलेषु पापरक्षांसि जायन्ते वर्णसंकरात् ।
अपुमांसोऽङ्गहीनाश्च स्थूलजिह्वा विचेतसः ॥
एते चान्ये च जायन्ते यदा राजा प्रमाद्यति ।
तस्माद् राज्ञा विशेषण वर्तितव्यं प्रजाहिते ॥
जब राजा धर्मकी ओरसे प्रमाद करता है, तब वर्णसंकरताके कारण उत्तम कुलोंमें पापी और राक्षस जन्म लेते हैं । नपुंसक, काने, लँगड़े, लूले, गूँगे तथा बुद्धिहीन बालकोंकी उत्पत्ति होती है । ये तथा और भी बहुत -सी कुत्सित संतानें जन्म लेती हैं । इसलिये राजाको विशेषरूपसे धर्मपरायण एवं सावधान होकर प्रजाके हितसाधनमें तत्पर रहना चाहिये ।
"जो राजा अपनी रक्षा नहीं करता, वह प्रजा की भी रक्षा नहीं कर सकता। पहले उसकी प्रजा क्षीण होती है, फिर वह स्वयं नष्ट हो जाता है। जब दो मनुष्य मिलकर एक की वस्तु छीन लेते हैं और कुमारी कन्याओं पर बलात्कार होने लगता है, तब इन अपराधों का कारण राजा को ही बताया जाता है। जब राजा धर्म छोड़कर प्रमाद में पड़ जाता है, तब मनुष्यों में से कोई अपने धन को 'यह मेरा है' ऐसा समझकर स्थिर नहीं रह पाता।"
अरक्षितात्मा यो राजा प्रजाश्चापि न रक्षति ।
प्रजाश्च तस्य क्षीयन्ते ततः सोऽनुविनश्यति ॥
जो राजा अपनी रक्षा नहीं करता, वह प्रजाकी भी रक्षा नहीं कर सकता । पहले उसकी प्रजाएँ क्षीण होती हैं; फिर वह स्वयं भी नष्ट हो जाता है ।
उतथ्य ने उपदेश समाप्त करते हुए कहा — "राजन्! राजा धर्म का आचरण करे और मेघ समय पर वर्षा करता रहे। यदि श्रेष्ठ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा चौथे शूद्र वर्ण के मनुष्य अपने-अपने पृथक्-पृथक् कर्मों को जानकर उनमें संलग्न नहीं रहते, तो उनका होना न होना एक समान है। इनमें जो क्षत्रिय, वस्त्रों की मैल दूर करने वाले धोबी के समान चरित्र-दोष को दूर करना जानता है, वही प्रजा का पिता और अधिपति है। भरतश्रेष्ठ! सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—ये सब राजा के आचरणों में ही स्थित हैं। राजा ही युगों का प्रवर्तक होने के कारण 'युग' कहलाता है।"
नक्षत्राण्युपतिष्ठन्ति ग्रहा घोरास्तथागते ।
उत्पाताश्चात्र दृश्यन्ते बहवो राजनाशनाः ॥
आकाशमें भयानक ग्रह और धूमकेतु आदि तारे उगते हैं तथा राष्ट्रके विनाशकी सूचना देनेवाले बहुतसे उत्पात दिखायी देने लगते हैं ।
भीष्म बोले— “हे भरतनन्दन! उतथ्य ने जब मान्धाता को धर्म और राजधर्म का यह गम्भीर उपदेश दिया, तब राजा के कर्तव्यों की मर्यादा स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा:
चातुर्वर्ण्य तथा वेदाश्चातुराश्रम्यमेव च ।
सर्वं प्रमुह्यते ह्येतद् यदा राजा प्रमाद्यति ॥
जब राजा प्रमाद करता है, तब चारों वर्ण, चारों वेद और चारों आश्रम सभी मोहमें पड़ जाते हैं ।
मान्धाता! ध्यान रहे, जब राजा प्रमाद करने लगता है, तो उसके जीवन के आधार स्तम्भ डगमगा जाते हैं। चारों वर्ण, चारों वेद और चारों आश्रम—सब मोह में पड़ जाते हैं। यहाँ तक कि गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि जैसी पवित्र अग्नि तथा ऋक्, साम और यजुर्वेद के समस्त यज्ञ भी विकृत हो जाते हैं। राजा ही प्राणियों का जीवनदाता है और वही उनका विनाश करने वाला भी। जो धर्मात्मा है, वह प्रजा का रक्षक है; किन्तु जो पापात्मा है, वह उसका सर्वनाश कर देता है। जब राजा प्रमाद में डूबता है, तो उसकी स्त्री, पुत्र, बान्धव और सुहृद् सब शोक करते हैं। यहाँ तक कि उसके हाथी, घोड़े, गौ, ऊँट, खच्चर और गदहे जैसे पशु भी दुःख पाते हैं।
अग्नित्रेता त्रयी विद्या यज्ञाश्च सहदक्षिणाः ।
सर्व एव प्रमाद्यन्ति यदा राजा प्रमाद्यति ॥
जब राजा प्रमादी हो जाता है, तब गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि-ये तीन अग्नि; ऋक्, साम और यजु — ये तीन वेद एवं दक्षिणाओंके साथ सम्पूर्ण यज्ञ भी विकृत हो जाते हैं ।
विधाता ने बलवान राजा की सृष्टि केवल दुर्बल प्राणियों की रक्षा के लिए की है। निर्बल का महान समुदाय राजा के बल पर ही टिका हुआ है। हे भूपाल! जो प्राणी राजा से सम्बन्ध रखते हैं, वे सब उसके अधर्म होने पर शोक करते हैं। तुम सावधान रहना; दुर्बल मनुष्य, मुनि और विषधर सर्प—इनकी दृष्टि अत्यन्त दुःसह होती है। किसी दुर्बल को कभी अपमानित न करना, क्योंकि उनकी आँखें तुम्हें तुम्हारे बान्धवों सहित जलाकर भस्म कर सकती हैं। वे उन्हें जड़-मूल सहित दग्ध कर देते हैं। याद रखना, निर्बल का बल अत्यन्त शक्तिशाली होता है; जो बलवान व्यक्ति दुर्बलों द्वारा दग्ध हो जाता है, उसका कुछ भी शेष नहीं बचता। यदि अपमानित और तिरस्कृत मनुष्य को राजा रक्षक के रूप में न मिले, तो दैव का दण्ड उसे मार डालता है। युद्ध में दुर्बलों को जीतकर उन्हें उपभोग की वस्तु मत बनाना; जैसे आग आश्रय देने वाले काष्ठ को जला देती है, वैसे ही इन दुर्बलों की दृष्टि तुम्हें जला देगी। झूठे अपराधों से रोते हुए दीन-दुखियों के आँसू उनके पुत्रों और पशुओं का विनाश कर देते हैं। पाप का फल तुरन्त नहीं दिखता, पर वह आता अवश्य है; जैसे बीज तुरन्त फल नहीं देता, वैसे ही किया गया पाप समय आने पर पुत्रों और नाती-पोतों को नष्ट कर देता है। जब सताए हुए लोग अपना रक्षक नहीं पाते, तो पापी को दैव भयङ्कर दण्ड देता है।
राजैव कर्ता भूतानां राजैव च विनाशकः ।
धर्मात्मा यः स कर्तास्यादधर्मात्मा विनाशकः ॥
राजा ही प्राणियोंका कर्ता ( जीवनदाता ) और राजा ही उनका विनाश करनेवाला है । जो धर्मात्मा है, वह प्रजाका जीवनदाता है और जो पापात्मा है, वह उसका विनाश करनेवाला है ।
जब बाहर के लोग समूह बनाकर भिक्षु बनकर आने लगें, तो समझ लेना कि राजा का विनाश निकट है। यदि तुम्हारे कर्मचारी अन्यायपूर्ण व्यवहार करें या प्रजा की प्रार्थना को ठुकराकर धन का अपहरण करें, तो वह तुम्हारे महान विनाश का सूचक है। जैसे एक विशाल वृक्ष कट जाने पर उस पर बसे पक्षी निराश्रय हो जाते हैं, वैसे ही तुम्हारा पतन होगा। जब राज्य के लोग धर्म का पालन करते हैं, तब तुम पापमुक्त रहते हो; किन्तु यदि वे अधर्म करने लगें, तो तुम पुण्य से हीन हो जाते हो।
दुर्बलांस्तात बृध्येथा नित्यमेवाविमानितान् ।
मा त्वां दुर्बलचक्षूंषि प्रदहेयुः सबान्धवम् ॥
तात! तुम दुर्बल प्राणियोंको सदा ही अपमानका पात्र न समझना, दुर्बलोंकी आँखें तुम्हें बन्धु - बान्धवों - सहित जलाकर भस्म न कर डालें, इसके लिये सदा सावधान रहना ।
सच्चा राजा वह है जो अपने मन्त्रियों का सम्मान करे और उन्हें युद्ध या मन्त्रणा में नियुक्त करे; उसका राज्य बढ़ता है। जो प्रजा के पुण्यकर्म देखकर उनका यथार्थ सम्मान करता है, वह परम उत्तम धर्म प्राप्त करता है। राजधर्म कहता है कि तुम सबको उचित विभाग देकर स्वयं उपभोग करो, मन्त्रियों का अनादर न करो और शत्रु को दण्डित करो। अपने मन, वाणी और शरीर से सबकी रक्षा करो; यहाँ तक कि पुत्र के अपराध को भी क्षमा कर दो। जब राजा दुर्बलों को वस्तुएँ देकर स्वयं भोजन करता है, तो वह त्याग ही राजधर्म है। डाकुओं को भगाना और सङ्ग्राम में विजयी होना भी धर्म है। यदि कोई प्रिय व्यक्ति भी पाप करे, तो उसे दण्ड देने से न हिचकना। व्यापारियों की रक्षा करना और राग-द्वेष त्यागकर यज्ञ करना भी तुम्हारा धर्म है। दीन, अनाथ और वृद्धों के आँसू पोंछकर उनके हृदय में हर्ष जगाना ही वास्तविक सद्भाव है। सत्य का पालन, भूदान और अतिथियों का सत्कार तुम्हें महान बनाता है।
मान्धाता! जिस राजा में निग्रह और अनुग्रह दोनों हों, वह इहलोक और परलोक दोनों में फल पाता है। दुष्टों को दण्ड देना और धार्मिकों पर अनुग्रह करना—यही तुम्हें परमेश्वर के समान बनाता है। अपनी इन्द्रियों को संयम में रखो, अन्यथा मर्यादा से गिर जाओगे। ऋत्विकों, पुरोहितों और आचार्यों का बिना अवहेलना सत्कार करो। जैसे यमराज सभी पर समान रूप से शासन करते हैं, वैसे ही तुम भी बिना भेदभाव के प्रजा पर नियन्त्रण रखो। राजा की उपमा हजार नेत्रों वाले इन्द्र से दी गई है; अतः जो धर्म तुम निश्चित कर लो, वही श्रेष्ठ है।
सावधान रहकर क्षमा, विवेक, धृति और बुद्धि की शिक्षा ग्रहण करो। समस्त प्राणियों की भलाई-बुराई को जानने की इच्छा रखो। सबको अपने अनुकूल बनाओ, दान दो और मीठे वचन बोलो। नगर और गाँव की रक्षा इस तरह करो कि उन्हें सुख मिले। जो राजा दक्ष नहीं है, वह राज्य के इस भारी भार को नहीं उठा सकता। तुम्हें बुद्धिमान, शूरवीर और दण्ड नीति जानने वाला होना चाहिए; जो दण्ड देने से हिचकता है, वह नपुंसक है।
मन्त्रियों के साथ रहकर तपस्वियों और आश्रम-वासियों की बुद्धियों की परीक्षा करो। ऐसा करने से तुम्हारा धर्म कभी नष्ट नहीं होगा। अर्थ और काम की अपेक्षा धर्म ही श्रेष्ठ है। यदि मनुष्यों का सम्मान किया जाए, तो वे अपने परिवार तक त्याग देते हैं। स्मरण रहे—प्रमाद का त्याग करो और भीतर-बाहर से पवित्र रहो। राजा को सदा सावधान रहकर अपना और शत्रु का 'छिद्र' (कमजोरी) देखना चाहिए, ताकि शत्रु तुम्हारा छिद्र न देख सके। इन्द्र, यम और वरुण भी इसी मार्ग पर चलते हैं। तुम भी इन राजर्षियों के आचार का पालन करो।"
तस्मादर्थाच्च कामाच्च धर्म एवोत्तरो भवेत् ।
अस्मिँल्लोके परे चैव धर्मात्मा सुखमेधते ॥
इस तरह विचार करनेसे अर्थ और कामकी अपेक्षा धर्म ही श्रेष्ठ सिद्ध होता है । धर्मात्मा पुरुष इहलोकमें और परलोकमें भी सुख भोगता है ।
भीष्म बोले— “हे भरतवंशी! उतथ्य के इस दिव्य उपदेश को सुनकर मान्धाता ने निःशङ्क होकर उनकी आज्ञा का पालन किया और देखते ही देखते सारी पृथ्वी का एकछत्र राज्य प्राप्त कर लिया। हे पृथ्वीनाथ! तुम भी मान्धाता की भाँति धर्म का पालन करते हुए इस पृथ्वी की रक्षा करो, जिससे तुम स्वर्गलोक प्राप्त कर सको।”
स एवमुक्तो मान्धाता तेनोतथ्येन भारत ।
कृतवानविशङ्कश्च एकः प्राप च मेदिनीम् ॥
भीष्मजी कहते हैं— भरतनन्दन! उतथ्यके इस प्रकार उपदेश देनेपर मान्धाताने निःशंक होकर उनकी आज्ञाका पालन किया और सारी पृथ्वीका एकछत्र राज्य पा लिया ।
In English
The Teachings of Utathya to Mandhata
The sage Utathya instructs King Mandhata on the duties of a righteous ruler. He explains that a king must protect his people, uphold dharma, and avoid pride or injustice to ensure stability in his kingdom.
This page answers
- What are the duties of a king according to utathya?
- Why did bali lose his prosperity?
- How does a king cause social and natural disorder?
- What happens when a king neglects the weak?
Also written: Utathyagita, Utathya, Bhishma, Yudhishthira, Mandhata, उतथ्यगीता