वामदेवगीता : एक आदर्श राजा को धर्म और सत्ता के बीच सन्तुलन कैसे बनाना चाहिए?
राजधर्म और आत्म-संयम
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ५ · शान्तिपर्व → राजधर्मानुशासनपर्व · अध्याय 92–94 · पृष्ठ 623–635
1,946 शब्द · 10 मिनटका पाठ · 17 श्लोक
युधिष्ठिर से कहा गया
युधिष्ठिर द्वारा धर्मपरायण राजा के आचरण पर प्रश्न पूछने पर।
युधिष्ठिर ने कुरुश्रेष्ठ पितामह की ओर देखते हुए पूछा— "पितामह! धर्मात्मा राजा यदि धर्म में स्थित रहना चाहे, तो उसे किस प्रकार का बर्ताव करना चाहिए? यह मैं आपसे पूछता हूँ; आप मुझे बताइए।"
कथं धर्मे स्थातुमिच्छन् राजा वर्तेत धार्मिकः ।
पृच्छामि त्वां कुरुश्रेष्ठ तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
युधिष्ठिरने पूछा— कुरुश्रेष्ठ पितामह! धर्मात्मा राजा यदि धर्ममें स्थित रहना चाहे तो उसे किस प्रकार बर्ताव करना चाहिये? यह मैं आपसे पूछता हूँ; आप मुझे बताइये ।
भीष्मजी ने उत्तर दिया— "राजन्! इस विषय में लोग तत्त्वज्ञानी महात्मा वामदेवजी द्वारा दिए हुए उपदेश रूप एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं। वसुमना नामक एक प्रसिद्ध राजा हुए, जो ज्ञानवान्, धैर्यवान् और पवित्र आचार-विचार वाले थे। उन्होंने एक दिन तपस्वी महर्षि वामदेवजी से पूछा—"
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
गीतं दृष्टार्थतत्त्वेन वामदेवेन धीमता ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! इस विषयमें लोग तत्त्वज्ञानी महात्मा वामदेवजीद्वारा दिये हुए उपदेशरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ।
'भगवन्! मैं किस बर्ताव का पालन करता रहूँ, जिससे अपने धर्म से कभी न गिरूँ? आप अपने अर्थ और धर्मयुक्त वचनों द्वारा मुझे इसी बात का उपदेश दीजिए।'
तमब्रवीद् वामदेवस्तेजस्वी तपतां वरः ।
हेमवर्णं सुखासीनं ययातिमिव नाहुषम् ॥
तब तपस्वी पुरुषोंमें श्रेष्ठ तेजस्वी महर्षि वामदेवने नहुषपुत्र ययातिके समान सुखपूर्वक बैठे हुए सुवर्णकी - सी कान्तिवाले राजा वसुमनासे कहा ।
तब तपस्वी पुरुषों में श्रेष्ठ तेजस्वी महर्षि वामदेव ने, नहुष पुत्र ययातिके समान सुखपूर्वक बैठे हुए सुवर्ण की सी कान्ति वाले राजा वसुमना से कहा— 'राजन्! तुम धर्म का ही अनुसरण करो। धर्म से बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है; क्योंकि धर्म में स्थित रहने वाले राजा इस सारी पृथ्वी को जीत लेते हैं। जो भूपाल धर्म को अर्थ-सिद्धि की अपेक्षा भी बड़ा मानता है और उसी को बढ़ाने में अपने मन और बुद्धि का उपयोग करता है, वह धर्म के कारण बड़ी शोभा पाता है। इसके विपरीत जो राजा अधर्म पर ही दृष्टि रखकर बलपूर्वक उसमें प्रवृत्त होता है, उसे धर्म और अर्थ दोनों पुरुषार्थ शीघ्र छोड़कर चले जाते हैं। जो दुष्ट एवं पापिष्ठ मन्त्रियों की सहायता से धर्म को हानि पहुँचाता है, वह सब लोगों का वध्य हो जाता है और अपने परिवार के साथ ही शीघ्र सङ्कट में पड़ जाता है।'
अधर्मदर्शी यो राजा बलादेव प्रवर्तते ।
क्षिप्रमेवापयातोऽस्मादुभौ प्रथममध्यमौ ॥
इसके विपरीत जो राजा अधर्मपर ही दृष्टि रखकर बलपूर्वक उसमें प्रवृत्त होता है, उसे धर्म और अर्थ दोनों पुरुषार्थ शीघ्र छोड़कर चल देते हैं ।
महर्षि ने आगे कहा— 'जो राजा अर्थ-सिद्धि की चेष्टा नहीं करता और स्वेच्छाचारी होकर बढ़-बढ़कर बातें बनाता है, वह सारी पृथ्वी का राज्य पाकर भी शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। परन्तु जो कल्याणकारी गुणों को ग्रहण करने वाला, अनिन्दक, जितेन्द्रिय और बुद्धिमान होता है, वह राजा उसी प्रकार वृद्धिको प्राप्त करता है, जैसे नदियों के प्रवाह से समुद्र बढ़ता है। राजा को चाहिए कि वह सदा धर्म, अर्थ, काम, बुद्धि और मित्रों से सम्पन्न होने पर भी कभी अपने को पूर्ण न माने—सदा उन सबके सङ्ग्रह को बढ़ाने की ही चेष्टा करे। राजा की जीवनयात्रा इन्हीं सबों पर अवलम्बित है। इन सबको सुनने और ग्रहण करने से राजा को यश, कीर्ति, लक्ष्मी और प्रजा की प्राप्ति होती है।'
धर्ममेवानुवर्तस्व न धर्माद् विद्यते परम् ।
धर्मे स्थिता हि राजानो जयन्ति पृथिवीमिमाम् ॥
वामदेवजी बोले — राजन्! तुम धर्मका ही अनुसरण करो । धर्मसे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है; क्योंकि धर्ममें स्थित रहनेवाले राजा इस सारी पृथ्वीको जीत लेते हैं ।
वामदेवजी ने स्पष्ट किया— 'जो इस प्रकार धर्म के प्रति आग्रह रखने वाला एवं धर्म और अर्थ का चिन्तन करने वाला है तथा अर्थ पर भलीभाँति विचार करके उसका सेवन करता है, वह निश्चय ही महान फल का भागी होता है। जो दुःसाहसी, दान न देने वाला और स्नेहशून्य तथा दण्ड के द्वारा प्रजा को बार-बार सताता है, वह राजा शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। जो बुद्धिहीन राजा पाप करके भी अपनी बुद्धि के द्वारा अपने को पापी नहीं समझता, वह इस लोक में अपकीर्ति से कलङ्कित होकर परलोक में नरक का भागी होता है।'
अथ पापकृतं बुद्धया न च पश्यत्यबुद्धिमान् ।
अकीर्त्याभिसमायुक्तो भूयो नरकमश्नुते ॥
जो बुद्धिहीन राजा पाप करके भी अपनी बुद्धिके द्वारा अपनेको पापी नहीं समझता, वह इस लोकमें अपकीर्तिसे कलंकित हो परलोकमें नरकका भागी होता है ।
महर्षि ने मार्ग दिखाते हुए कहा— 'जो सबका मान करने वाला, दानी, स्नेहयुक्त तथा दूसरों के वशवर्ती होकर रहता है, उस पर यदि कोई सङ्कट आ जाए तो सब लोग उसे अपना ही सङ्कट मानकर उसको मिटाने की चेष्टा करते हैं। जिसको धर्म के विषय में शिक्षा देने वाला कोई गुरु नहीं है और जो दूसरों से भी कुछ नहीं पूछता है तथा धन मिल जाने पर सुखभोग में आसक्त हो जाता है, वह दीर्घकाल तक सुख नहीं भोग पाता है। परन्तु जो धर्म के विषय में गुरु को प्रधान मानकर उनके उपदेश के अनुसार चलता है, जो स्वयं ही अर्थ-सम्बन्धी सारे कार्यों को देखता है तथा सब प्रकार के लाभों में धर्म को ही प्रधान समझता है, वह चिरकाल तक सुख का उपभोग करता है।'
गुरुप्रधानो धर्मेषु स्वयमर्थानवेक्षिता ।
धर्मप्रधानो लाभेषु स चिरं सुखमश्नुते ॥
जो धर्मके विषयमें गुरुको प्रधान मानकर उनके उपदेशके अनुसार चलता है, जो स्वयं ही अर्थ - सम्बन्धी सारे कार्योंको देखता है तथा सब प्रकारके लाभोंमें धर्मको ही प्रधान लाभ समझता है, वह चिरकालतक सुखका उपभोग करता है ।
वामदेवजी ने चेतावनी दी— 'राजन्! जिस राज्य में अत्यन्त बलवान राजा दुर्बल प्रजा पर अधर्म या अत्याचार करने लगता है, वहाँ उसके अनुचर भी उसी बर्ताव को अपनी जीविका का साधन बना लेते हैं। वे उस पापप्रवर्तक राजा का ही अनुसरण करते हैं; अतः उद्दण्ड मनुष्यों से भरा हुआ वह राष्ट्र शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। अच्छी अवस्था में रहने पर मनुष्य के जिस बर्ताव के दूसरे लोग भी आश्रय लेते हैं, सङ्कट में पड़ जाने पर उसी मनुष्य के उसी बर्ताव को उसके स्वजन भी सहन नहीं करते। दुःसाहसी प्रकृति वाला जो राजा जहाँ कुछ उद्दण्डतापूर्ण बर्ताव करता है, वहाँ शास्त्रोक्त मर्यादा का उल्लङ्घन करने वाला वह राजा शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।'
राजानमनुवर्तन्ते तं पापाभिप्रवर्तकम् ।
अविनीतमनुष्यं तत् क्षिप्रं राष्ट्रं विनश्यति ॥
वे उस पापप्रवर्तक राजाका ही अनुसरण करते हैं; अतः उद्दण्ड मनुष्योंसे भरा हुआ वह राष्ट्र शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ।
'जो क्षत्रिय राज्य में रहने वाले विजित या अविजित मनुष्यों की अत्यन्त आचरण में लायी हुई वृत्तिका का अनुवर्तन नहीं करता, वह क्षत्रिय धर्म से गिर जाता है। यदि कोई राजा पहले का उपकारी हो और किसी कारणवश वर्तमानकाल में द्वेष करने लगा हो, तो उस समय जो भूपाल उसे युद्ध में बन्दी बनाकर द्वेषवश उसका सम्मान नहीं करता, वह भी क्षत्रिय धर्म से गिर जाता है। राजा यदि समर्थ हो तो उत्तम सुख का अनुभव करे और करावे तथा आपत्ति में पड़ जाए तो उसके निवारण का प्रयत्न करे। ऐसा करने से वह सब प्राणियों का प्रिय होता है और कभी राजलक्ष्मी से भ्रष्ट नहीं होता।'
महर्षि ने उपदेश जारी रखा— 'राजा को चाहिए कि यदि किसी का अप्रिय किया हो, तो उसका प्रिय भी करे। इस प्रकार यदि अप्रिय पुरुष भी प्रिय करने लगता है, तो थोड़े ही समय में वह प्रिय हो जाता है। मिथ्या भाषण करना छोड़ दे, बिना याचना या प्रार्थना किए ही दूसरों का प्रिय करे। किसी कामना से, क्रोध से तथा द्वेष से भी धर्म का त्याग न करे। विद्वान् राजा छल-कपट छोड़कर ही बर्ताव करे। सत्य को कभी न छोड़े। इन्द्रिय-संयम, धर्माचरण, सुशीलता, क्षत्रियधर्म तथा प्रजा के हित का कभी परित्याग न करे। यदि कोई कुछ पूछे तो उसका उत्तर देने में सङ्कोच न करे, बिना विचारे कोई बात मुँह से न निकाले, किसी काम में जल्दबाजी न करे और किसी की निन्दा न करे; ऐसा बर्ताव करने से शत्रु भी अपने वश में हो जाता है।'
मृषावादं परिहरेत् कुर्यात् प्रियमयाचितः ।
न कामान्न च संरम्भान्न द्वेषाद् धर्ममुत्सृजेत् ॥
मिथ्या भाषण करना छोड़ दे, बिना याचना या प्रार्थना किये ही दूसरोंका प्रिय करे । किसी कामनासे, क्रोधसे तथा द्वेषसे भी धर्मका त्याग न करे ।
'यदि अपना प्रिय हो जाए तो बहुत प्रसन्न न हो और अप्रिय हो जाए तो अत्यन्त चिन्ता न करे। यदि आर्थिक सङ्कट आ पड़े तो प्रजा के हित का चिन्तन करते हुए तनिक भी सन्तप्त न हो। जो भूपाल अपने गुणों से सदा सबका प्रिय करता है, उसके सभी कर्म सफल होते हैं और सम्पत्ति कभी उसका साथ नहीं छोड़ती। राजा सदा सावधान रहकर अपने उस सेवक को हर तरह से अपनावे, जो प्रतिकूल कार्यों से अलग रहता हो और राजा का निरन्तर प्रिय करने में ही संलग्न हो। जिसमें वे सब गुण मौजूद हों जो राजा को प्रसन्न भी रख सकता हो तथा स्वामी का कार्य सिद्ध करने के लिये सतत सावधान रहता हो, उसको धन की व्यवस्था के कार्य में लगावे।'
अन्त में वामदेवजी ने कहा— 'मूर्ख, इन्द्रियलोलुप, लोभी, दुराचारी, शठ, कपटी, हिंसक, दुर्बद्धि, अनेक शास्त्रों के ज्ञान से शून्य, उच्चभावना से रहित, शराबी, जुआरी, स्त्री-लम्पट और मृगयासक्त पुरुष को जो राजा महत्त्वपूर्ण कार्यों पर नियुक्त करता है, वह लक्ष्मी से हीन हो जाता है। जो नरेश अपने शरीर की रक्षा करके रक्षणीय पुरुषों की भी सदा रक्षा करता है, उसकी प्रजा अभ्युदयशील होती है और वह राजा भी निश्चय ही महान फल का भागी होता है। जो राजा अपने अप्रसिद्ध सुहृदों के द्वारा गुप्तरूप से समस्त भूपतियों की अवस्था का निरीक्षण कराता है, वह अपने इस बर्ताव के द्वारा सर्वश्रेष्ठ हो जाता है।'
ये केचित् भूमिपतयः सर्वांस्तानन्ववेक्षयेत् ।
सुहृद्भिरनभिख्यातैस्तेन राजातिरिच्यते ॥
जो राजा अपने अप्रसिद्ध सुहृदोंके द्वारा गुप्तरूपसे समस्त भूपतियोंकी अवस्थाका निरीक्षण कराता है, वह अपने इस बर्तावके द्वारा सर्वश्रेष्ठ हो जाता है ।
भीष्म बोले— "हे युधिष्ठिर! जब राजा वसुमना ने महर्षि वामदेव से अपने धर्म के विषय में जिज्ञासा की, तब वामदेव ने उन्हें राजधर्म का वह गूढ़ मार्ग बताया जो एक राजा को महान बनाता है।
वामदेव ने कहा— 'नरेश्वर! इस जगत् के सभी पदार्थ अन्त में नष्ट होने वाले हैं; यहाँ कोई भी वस्तु नीरोग या अविनाशी नहीं है। इसलिए राजा को धर्म पर स्थित रहकर अपनी प्रजा का धर्मपूर्वक पालन करना चाहिए। हे राजन! युद्ध के सिवाय किसी अन्य उपाय से पहले अपनी विजय की वृद्धि की चेष्टा करो; क्योंकि युद्ध से जो विजय प्राप्त होती है, उसे निम्न श्रेणी का माना जाता है। अपने राज्य की जड़ को पहले दृढ़ करो। यदि राज्य की जड़ मजबूत न हो, तो अनधिकृत देशों पर अधिकार करने या अप्राप्त वस्तु पाने की इच्छा मत करना, क्योंकि जिसके मूल में ही दुर्बलता है, उसे वैसा लाभ सम्भव नहीं है।
न चाप्यलब्धं लिप्सेत मूले नातिदृढे सति ।
न हि दुर्बलमूलस्य राज्ञो लाभो विधीयते ॥
यदि राज्यकी जड़ मजबूत न हो तो राजाको अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति — अनधिकृत देशोंपर अधिकारकी इच्छा नहीं करनी चाहिये; क्योंकि जिसके मूलमें ही दुर्बलता है, उस राजाको वैसा लाभ होना सम्भव नहीं है ।
एक सुदृढ़ और यशस्वी राजा वही है जिसका देश समृद्धिशाली हो, जो धन-धान्य से सम्पन्न हो, जहाँ के मनुष्य राजा को प्रिय मानते हों और जहाँ हृष्ट-पुष्ट मन्त्री सुशोभित हों। चाण्डाल, म्लेच्छ, पाखण्डी, शास्त्र-विरुद्ध कर्म करने वाले, बलवान, सभी आश्रमों के निवासी तथा गायक और नर्तक— इन सबको प्रयत्नपूर्वक वश में करना चाहिए। जिसके राज्य में ये लोग धन-धान्य की वृद्धि करने वाले और आय बढ़ाने में सहायक होकर रहते हैं, उसी राजा की जड़ मजबूत मानी जाती है। बुद्धिमान राजा को तभी दूसरे का राज्य या धन लेने की चेष्टा करनी चाहिए, जब वह अपने प्रताप को प्रकाशित करने का उपयुक्त अवसर समझे।'
वामदेव ने आगे रणनीति समझाते हुए कहा— 'जब राजा साम, दान और भेद, इन तीनों के प्रयोगों को निष्फल देखता आए, तब शत्रु की दुर्बलता जानकर बिना किसी संशय के दण्ड नीति का प्रयोग करे और युद्ध छेड़ दे। परन्तु स्मरण रहे, अपने से प्रबल शत्रुओं पर आक्रमण न करना; केवल अपने से दुर्बल शत्रु पर ही प्रहार करना। राजा स्वयं बलवान होकर भी कभी अपने दुर्बल शत्रु का विश्वास न करे; क्योंकि ये असावधान क्षण में बाज पक्षी की तरह झपट्टा मार देते हैं। यहाँ तक कि जो सर्वगुण सम्पन्न और प्रिय वचन बोलने वाले स्वामी से भी अकारण द्रोह करे, उस पापात्मा पर कभी विश्वास मत करना।'
अपि सर्वगुणैर्युक्तं भर्तारं प्रियवादिनम् ।
अभिद्रुह्यति पापात्मा न तस्माद् विश्वसेज्जनात् ॥
जो पापात्मा मनुष्य अपने सर्वगुणसम्पन्न और सर्वदा प्रिय वचन बोलनेवाले स्वामीसे भी अकारण द्रोह करता है, उसपर कभी विश्वास नहीं करना चाहिये ।
राजा को अपनी सुरक्षा के प्रति भी सावधान रहने को कहा गया। वामदेव बोले— 'जिससे कभी कैद किया गया हो, ऐसे मन्त्री; विशेषतः स्त्रियों से, विषम पर्वत से, दुर्गम स्थान से तथा हाथी, घोड़े और सर्प से सदा सावधान रहना। जो राजा प्रधान मन्त्रियों का त्याग करके निम्न श्रेणी के मनुष्यों को अपना प्रिय बनाता है, वह सङ्कट के घोर समुद्र में पड़कर पीड़ित हो जाता है और उसे कहीं आश्रय नहीं मिलता।'
निगृहीतादमात्याच्च स्त्रीभ्यश्चैव विशेषतः ।
पर्वताद् विषमाद् दुर्गाद्धस्तिनोऽश्वात् सरीसृपात् ।
एतेभ्यो नित्ययुक्तः सन् रक्षेदात्मानमेव तु ॥
जिसको कभी कैद किया गया हो ऐसे मन्त्रीसे, विशेषतः स्त्रियोंसे, विषम पर्वतसे, दुर्गम स्थानसे तथा हाथी, घोड़े और सर्पसे सदा सावधान रहकर राजा अपनी रक्षा करे ।
वामदेव ने स्वभाव और आचरण पर बल देते हुए कहा— 'जो पुरुष दानशील है, सबके लिए आवश्यक वस्तुओं का सम्यक् विभाग करने वाला है, मृदुल स्वभाव का है, शुद्ध आचार-विचार वाला है और मनुष्यों का त्याग नहीं करता, वही राजा बनने योग्य है। जो कल्याणकारी उपदेश सुनकर अपने मत का आग्रह छोड़ देता है, सारा जगत् उसके पीछे चलता है। यदि कोई व्यक्ति अपने ही प्रयोजन की सिद्धि चाहने वाले सुहृदों की बात सहन नहीं कर पाता, अपने अर्थ-सिद्धि के विरोधी वचनों को सुनता है, बुद्धिमान शिष्ट पुरुषों के आचरण को नहीं अपनाता या पराजित व्यक्तियों को उनके परम्परागत आचार से रोकता है, तो वह क्षत्रिय धर्म से गिर जाता है।
योऽर्थकामस्य वचनं प्रातिकूल्यान्न मृष्यते ।
शृणोति प्रतिकूलानि सर्वदा विमना इव ॥
अग्राम्यचरितां वृत्तिं यो न सेवेत नित्यदा ।
जितानामजितानां च क्षत्रधर्मादपैति सः ॥
जो मनके प्रतिकूल होनेके कारण अपने ही प्रयोजनकी सिद्धि चाहनेवाले सुहृद्की बात नहीं सहन करता और अपनी अर्थसिद्धिके विरोधी वचनोंको भी सुनता है, सदा अनमना-सा रहता है, जो बुद्धिमान् शिष्ट पुरुषोंद्वारा आचरणमें लाये हुए बर्तावका सदा सेवन नहीं करता एवं पराजित या अपराजित व्यक्तियोंको उनके परम्परागत आचारका पालन नहीं करने देता, वह क्षत्रिय धर्मसे गिर जाता है ।
द्वेषवश जो अपने ही गुणवान बन्धुओं और कुटुम्बियों का सम्मान नहीं करता, जिसका चित्त चञ्चल है और जो क्रोध को दृढ़ता से पकड़े रहता है, वह सदा मृत्यु के समीप निवास करता है। इसके विपरीत, जो राजा हृदय को प्रिय न होने पर भी गुणवान पुरुषों को प्रीतिजनक बर्ताव से अपने वश में कर लेता है, वह दीर्घकाल तक यशस्वी रहता है। राजा को चाहिए कि वह असमय में कर लगाकर धन सङ्ग्रह न करे; किसी अप्रिय घटना पर चिन्ता की आग में न जले और न ही प्रिय कार्य होने पर अत्यधिक हर्षित हो। उसे सदा यह विचार करना चाहिए कि कौन उससे प्रेम रखता है, कौन भय के कारण आश्रय लिए हुए है, कौन मध्यस्थ है और कौन शत्रु बना हुआ है।'
नैव द्विषन्तो हीयन्ते राज्ञो नित्यमनिघ्नतः ।
क्रोधं निहन्तुं यो वेद तस्य द्वेष्टा न विद्यते ॥
यदि राजा कभी किसी द्वेष करनेवालेको दण्ड न दे तो उससे द्वेष करनेवालोंकी कमी नहीं होती है; परंतु जो क्रोधको मारनेकी कला जानता है, उसका कोई द्वेषी नहीं रहता है ।
अन्त में वामदेव ने जीवन का परम सूत्र दिया— 'जो राजा अपने कर्तव्य को पूर्ण करके ही सुख का अनुभव करना चाहता है, उसका न तो दूसरे लोग अनादर करते हैं और न वह स्वयं सन्तप्त होता है। जो प्रजा के प्रति ऐसा बर्ताव करता है, वह इहलोक और परलोक दोनों को जीतकर विजय में प्रतिष्ठित हो जाता है।'
इदं वृत्तं मनुष्येषु वर्तते यो महीपतिः ।
उभौ लोकौ विनिर्जित्य विजये सम्प्रतिष्ठते ॥
जो राजा प्रजाके प्रति ऐसा बर्ताव करता है, वह इहलोक और परलोक दोनोंको जीतकर विजयमें प्रतिष्ठित होता है ।
भीष्म बोले— 'हे युधिष्ठिर! वामदेव जी के इन उपदेशों को सुनकर राजा वसुमना ने उन सभी निर्देशों का पूरी निष्ठा से पालन किया। यदि तुम भी इस प्रकार का आचरण करोगे, तो निःसन्देह दोनों लोकों को जीत लोगे।'"
इत्युक्तो वामदेवेन सर्वं तत् कृतवान् नृपः ।
तथा कुर्वंस्त्वमप्येतौ लोकौ जेता न संशयः ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! वामदेवजीके इस प्रकार उपदेश देनेपर राजा वसुमना सब कार्य उसी प्रकार करने लगे । यदि तुम भी ऐसा ही आचरण करोगे तो निःसंदेह लोक और परलोक दोनों सुधार लोगे ।
In English
Bhishma's advice on righteous kingship
Yudhisthira asks Bhishma how a righteous king should behave. Bhishma recounts an ancient story where the sage Vamadeva instructs King Vasumana on the importance of dharma, protecting the people, and maintaining a strong kingdom.
This page answers
- What did vamadeva tell king vasumana about dharma?
- How should a king treat his subjects according to vamadeva?
- When should a king use military force?
- What are the qualities of a successful king?
Also written: Vamadevagita, Vamadeva, Yudhishthira, Bhishma, Vasumana, वामदेवगीता