श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 911–920
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 911–920
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वासोभिरन्नैर्गोभिश्च शुभैर्नैवेशिकैरपि ।
शुभैः सुरगणैश्चापि स्तोष्या एव द्विजास्तथा ।
एतदेव परं गुह्यमलोभेन समाचर ॥ ४५ ॥
अन्न, वस्त्र, गौ तथा सुंदर गृह देकर और कल्याणकारी देवताओंकी आराधना करके भी ब्राह्मणोंको ही संतुष्ट करना चाहिये । तुम लोभ छोड़कर इसी परम गोपनीय धर्मका आचरण करो ॥ ४५ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि ब्रह्मभगीरथसंवादे त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें ब्रह्मा और भगीरथका संवादविषयक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०३ ॥
Fara * यज्ञकर्ता पुरुष ‘ शम्या ' नामक एक काठका डंडा खूब जोर लगाकर फेंकता है, वह जितनी दूरपर जाकर गिरता है उतने दूरमें यज्ञकी वेदी बनायी जाती है; उस वेदीपर जो यज्ञ किया जाता है उसे ' शम्याक्षेप' अथवा ' शम्याप्रास’ यज्ञ कहते हैं ।
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चतुरधिकशततमोऽध्यायः आयुकी वृद्धि और क्षय करनेवाले शुभाशुभ कर्मोंके वर्णनसे गृहस्थाश्रमके कर्तव्योंका विस्तारपूर्वक निरूपण युधिष्ठिर उवाच
शतायुरुक्तः पुरुषः शतवीर्यश्च जायते ।
कस्मान्म्रियन्ते पुरुषा बाला अपि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा - पितामह! शास्त्रोंमें कहा गया है कि ' मनुष्यकी आयु सौ वर्षोंकी होती है । वह सैकड़ों प्रकारकी शक्ति लेकर जन्म धारण करता है । ' किंतु देखता हूँ कि
कितने ही मनुष्य बचपनमें ही मर जाते हैं । ऐसा क्यों होता है? ॥ १ ॥
आयुष्मान् केन भवति अल्पायुर्वापि मानवः ।
केन वा लभते कीर्तिं केन वा लभते श्रियम् ॥ २ ॥
मनुष्य किस उपायसे दीर्घायु होता है अथवा किस कारणसे उसकी आयु कम हो जाती है? क्या करनेसे वह कीर्ति पाता है या क्या करनेसे उसे सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है? ॥ २ ॥
तपसा ब्रह्मचर्येण जपहोमैस्तथौषधैः ।
कर्मणा मनसा वाचा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ३ ॥
पितामह! मनुष्य मन, वाणी अथवा शरीरके द्वारा तप, ब्रह्मचर्य, जप, होम तथा औषध आदिमेंसे किसका आश्रय ले, जिससे वह श्रेयका भागी हो, वह मुझे बताइये ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
अत्र तेऽहं प्रवक्ष्यामि यन्मां त्वमनुपृच्छसि ।
अल्पायुर्येन भवति दीर्घायुर्वापि मानवः ॥ ४ ॥
येन वा लभते कीर्तिं येन वा लभते श्रियम् ।
यथा वर्तयन् पुरुषः श्रेयसा सम्प्रयुज्यते ॥ ५ ॥
भीष्मजीने कहा – युधिष्ठिर! तुम मुझसे जो पूछ रहे हो, इसका उत्तर देता हूँ । मनुष्य जिस कारणसे अल्पायु होता है, जिस उपायसे दीर्घायु होता है, जिससे वह कीर्ति और सम्पत्तिका भागी होता है तथा जिस बर्तावसे पुरुषको श्रेयका संयोग प्राप्त होता है, वह सब बताता हूँ, सुनो ॥
आचाराल्लभते ह्यायुराचाराल्लभते श्रियम् ।
आचारात् कीर्तिमाप्नोति पुरुषः प्रेत्य चेह च ॥ ६ ॥
सदाचारसे ही मनुष्यको आयुकी प्राप्ति होती है, सदाचारसे ही वह सम्पत्ति पाता है तथा सदाचारसे ही उसे इहलोक और परलोकमें भी कीर्तिकी प्राप्ति होती है ॥ ६ ॥
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दुराचारो हि पुरुषो नेहायुर्विन्दते महत् ।
त्रसन्ति यस्माद् भूतानि तथा परिभवन्ति च ॥ ७ ॥
दुराचारी पुरुष, जिससे समस्त प्राणी डरते और तिरस्कृत होते हैं, इस संसारमें बड़ी आयु नहीं पाता ॥
तस्मात् कुर्यादिहाचारं यदीच्छेद् भूतिमात्मनः ।
अपि पापशरीरस्य आचारो हन्त्यलक्षणम् ॥ ८ ॥
अतः यदि मनुष्य अपना कल्याण करना चाहता हो तो उसे इस जगत्में सदाचारका पालन करना चाहिये । जिसका सारा शरीर ही पापमय है, वह भी यदि सदाचारका पालन करे तो वह उसके शरीर और मनके बुरे लक्षणोंको दबा देता है ॥ ८ ॥
आचारलक्षणो धर्मः संतश्चारित्रलक्षणाः ।
साधूनां च यथावृत्तमेतदाचारलक्षणम् ॥ ९ ॥
सदाचार ही धर्मका लक्षण है।| सच्चरित्रता ही श्रेष्ठ पुरुषोंकी पहचान है । श्रेष्ठ पुरुष जैसा बर्ताव करते हैं; वही सदाचारका स्वरूप अथवा लक्षण है ॥ ९ ॥
अप्यदृष्टं श्रवादेव पुरुषं धर्मचारिणम् ।
भूतिकर्माणि कुर्वाणं तं जनाः कुर्वते प्रियम् ॥ १० ॥
जो मनुष्य धर्मका आचरण करता और लोक- कल्याणके कार्यमें लगा रहता है, उसका दर्शन न हुआ हो तो भी मनुष्य केवल नाम सुनकर उससे प्रेम करने लगते हैं ॥ १० ॥
ये नास्तिका निष्क्रियाश्च गुरुशास्त्राभिलङ्घिनः ।
अधर्मज्ञा दुराचारास्ते भवन्ति गतायुषः ॥ ११ ॥
जो नास्तिक, क्रियाहीन, गुरु और शास्त्रकी आज्ञाका उल्लंघन करनेवाले, धर्मको न जाननेवाले और दुराचारी हैं, उन मनुष्योंकी आयु क्षीण हो जाती है ॥ ११ ॥
विशीला भिन्नमर्यादा नित्यं संकीर्णमैथुनाः ।
अल्पायुषो भवन्तीह नरा निरयगामिनः ॥ १२ ॥
जो मनुष्य शीलहीन, सदा धर्मकी मर्यादा भंग करनेवाले तथा दूसरे वर्णकी स्त्रियोंके साथ सम्पर्क रखनेवाले हैं; वे इस लोकमें अल्पायु होते और मरनेके बाद नरकमें पड़ते हैं ॥ १२ ॥
सर्वलक्षणहीनोऽपि समुदाचारवान् नरः ।
श्रद्दधानोऽनसूयुश्च शतं वर्षाणि जीवति ॥ १३ ॥
सब प्रकारके शुभ लक्षणोंसे हीन होनेपर भी जो मनुष्य सदाचारी, श्रद्धालु और दोषदृष्टिसे रहित होता है, वह सौ वर्षोंतक जीवित रहता है ॥ १३ ॥
अक्रोधनः सत्यवादी भूतानामविहिंसकः ।
अनसूयुरजिह्मश्च शतं वर्षाणि जीवति ॥ १४ ॥
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जो क्रोधहीन, सत्यवादी, किसी भी प्राणीकी हिंसा न करनेवाला, अदोषदर्शी और कपटशून्य है, वह सौ वर्षोंतक जीवित रहता है ॥ १४ ॥
लोष्ठमर्दी तृणच्छेदी नखखादी च यो नरः ।
नित्योच्छिष्टः संकुसुको नेहायुर्विन्दते महत् ॥ १५ ॥
जो ढेले फोड़ता, तिनके तोड़ता, नख चबाता तथा सदा ही उच्छिष्ट ( अशुद्ध ) एवं चंचल रहता है, ऐसे कुलक्षणयुक्त मनुष्यको दीर्घायु नहीं प्राप्त होती ॥ १५ ॥
ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थौ चानुचिंतयेत् ।
उत्थायाचम्य तिष्ठेत पूर्वां संध्यां कृताञ्जलिः ॥ १६ ॥
प्रतिदिन ब्राह्ममुहूर्तमें ( अर्थात् सूर्योदयसे दो घड़ी पहले ) जागे तथा धर्म और अर्थके विषयमें विचार करे । फिर शय्यासे उठकर शौच-स्नानके पश्चात् आचमन करके हाथ जोड़े हुए प्रातःकालकी संध्या करे ॥ १६ ॥
एवमेवापरां संध्यां समुपासीत वाग्यतः ।
नेक्षेतादित्यमुद्यन्तं नास्तं यान्तं कदाचन ॥ १७ ॥
इसी प्रकार सायंकालमें भी मौन रहकर संध्योपासना करे । उदय और अस्तके समय सूर्यकी ओर कदापि न देखे ॥ १७ ॥
नोपसृष्टं न वारिस्थं न मध्यं नभसो गतम् ।
ऋषयो नित्यसंध्यत्वाद् दीर्घमायुरवाप्नुवन् ॥ १८ ॥
तस्मात् तिष्ठेत् सदा पूर्वां पश्चिमां चैव वाग्यतः । ग्रहण और मध्याह्नके समय भी सूर्यकी ओर दृष्टिपात न करे तथा जलमें स्थित सूर्यके प्रतिबिम्बकी ओर भी न देखे । ऋषियोंने प्रतिदिन संध्योपासन करनेसे ही दीर्घ आयु प्राप्त की थी । इसलिये सदा मौन रहकर द्विजमात्रको प्रातःकाल और सायंकालकी संध्या अवश्य करनी चाहिये ॥ १८३ ॥
ये न पूर्वामुपासन्ते द्विजाः संध्यां न पश्चिमाम् ॥ १ ९ ॥ सर्वांस्तान् धार्मिको राजा शूद्रकर्माणि कारयेत् । जो द्विज न तो प्रातःकालकी संध्या करते हैं और न सायंकालकी ही, उन सबसे धार्मिक राजा शूद्रोचित कर्म करावे ॥ १ ९ ३ ॥ परदारा न गन्तव्या सर्ववर्णेषु कर्हिचित् ॥ २० ॥
नहीदृशमनायुष्यं लोके किंचन विद्यते ।
यादृशं पुरुषस्येह परदारोपसेवनम् ॥ २१ ॥
किसी भी वर्णके पुरुषको कभी भी परायी स्त्रियोंसे संसर्ग नहीं करना चाहिये । परस्त्री-सेवनसे मनुष्यकी आयु जल्दी ही समाप्त हो जाती है । संसारमें परस्त्री- समागमके समान पुरुषकी आयुको नष्ट करनेवाला दूसरा कोई कार्य नहीं है ॥ २०-२१ ॥ यावन्तो रोमकूपाः स्युः स्त्रीणां गात्रेषु निर्मिताः ।
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तावद् वर्षसहस्राणि नरकं पर्युपासते ॥ २२ ॥
स्त्रियोंके शरीरमें जितने रोमकूप होते हैं, उतने ही हजार वर्षोंतक व्यभिचारी पुरुषोंको नरकमें रहना पड़ता है ॥ २२ ॥
प्रसाधनं च केशानामञ्जनं दन्तधावनम् ।
पूर्वाह्न एव कार्याणि देवतानां च पूजनम् ॥ २३ ॥
केशोंको सँवारना, आँखोंमें अंजन लगाना, दाँत-मुँह धोना और देवताओंकी पूजा करना — ये सब कार्य दिनके पहले प्रहरमें ही करने चाहिये ॥ २३ ॥
पुरीषमूत्रे नोदीक्षेन्नाधितिष्ठेत् कदाचन ।
नातिकल्यं नातिसायं न च मध्यन्दिने स्थिते ॥ २४ ॥
नाज्ञातैः सह गच्छेत नैको न वृषलैः सह । मल - मूत्रकी ओर न देखे, उसपर कभी पैर न रखे । अत्यन्त सबेरे, अधिक साँझ हो जानेपर और ठीक दोपहरके समय कहीं बाहर न जाय। न तो अपरिचित पुरुषोंके साथ यात्रा करे, न शूद्रोंके साथ और न अकेला ही ॥ २४३ ॥
पन्था देयो ब्राह्मणाय गोभ्यो राजभ्य एव च ॥ २५ ॥
वृद्धाय भारतप्ताय गर्भिण्यै दुर्बलाय च । ब्राह्मण, गाय, राजा, वृद्ध पुरुष, गर्भिणी स्त्री, दुर्बल और भारपीड़ित मनुष्य यदि सामनेसे आते हों तो स्वयं किनारे हटकर उन्हें जानेका मार्ग देना चाहिये ॥ २५३ ॥
प्रदक्षिणं च कुर्वीत परिज्ञातान् वनस्पतीन् ॥ २६ ॥
चतुष्पथान् प्रकुर्वीत सर्वानेव प्रदक्षिणान् । मार्गमें चलते समय अश्वत्थ आदि परिचित वृक्षों तथा समस्त चौराहोंको दाहिने करके जाना चाहिये ॥ मध्यन्दिने निशाकाले अर्धरात्रे च सर्वदा ॥ २७ ॥
चतुष्पथं न सेवेत उभे संध्ये तथैव च । दोपहरमें, रातमें, विशेषतः आधी रातके समय और दोनों संध्याओंके समय कभी चौराहोंपर न रहे ॥ उपानहौ च वस्त्रं च धृतमन्यैर्न धारयेत् ॥ २८ ॥
ब्रह्मचारी च नित्यं स्यात् पादं पादेन नाक्रमेत् ।
अमावास्यां पौर्णमास्यां चतुर्दश्यां च सर्वशः ॥ २ ९ ॥
अष्टम्यां सर्वपक्षाणां ब्रह्मचारी सदा भवेत् ।
आक्रोशं परिवादं च पैशुन्यं च विवर्जयेत् ॥ ३० ॥
दूसरोंके पहने हुए वस्त्र और जूते न पहने । सदा ब्रह्मचर्यका पालन करे । पैरसे पैरको न दबावे । सभी पक्षोंकी अमावास्या, पौर्णमासी, चतुर्दशी और अष्टमी तिथिको सदा ब्रह्मचारी
रहे— स्त्री - समागम न करे । किसीकी निंदा, बदनामी और चुगली न करे ॥ २८–३० ॥
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नारुन्तुदः स्यान्न नृशंसवादी न हीनतः परमभ्याददीत । ययास्य वाचा पर उद्विजेत न तां वदेद् रुशतीं पापलोक्याम् ॥ ३१ ॥
दूसरोंके मर्मपर आघात न करे । क्रूरतापूर्ण बात न बोले, औरोंको नीचा न दिखावे । जिसके कहनेसे दूसरोंको उद्वेग होता हो वह रुखाईसे भरी हुई बात पापियोंके लोकमें ले
जानेवाली होती है । अतः वैसी बात कभी न बोले ॥ ३१ ॥
वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति यैराहतः शोचति रात्र्यहानि । परस्य वा मर्मसु ये पतन्ति तान् पण्डितो नावसृजेत् परेषु ॥ ३२ ॥
वचनरूपी बाण मुँहसे निकलते हैं, जिनसे आहत होकर मनुष्य रात-दिन शोकमें पड़ा रहता है । अतः जो दूसरोंके मर्मस्थानोंपर चोट करते हैं, ऐसे वचन विद्वान् पुरुष दूसरोंके प्रति कभी न कहे ॥ ३२ ॥
रोहते सायकैर्विद्धं वनं परशुना हतम् ।
वाचा दुरुक्तं बीभत्सं न संरोहति वाक्क्षतम् ॥ ३३ ॥
बाणोंसे बिंधा और फरसेसे कटा हुआ वन पुनः अंकुरित हो जाता है, किंतु दुर्वचनरूपी शस्त्रसे किया हुआ भयंकर घाव कभी नहीं भरता है ॥ ३३ ॥
कर्णिनालीकनाराचान् निर्हरन्ति शरीरतः ।
वाक्शल्यस्तु न निर्हर्तुं शक्यो हृदिशयो हि सः ॥ ३४ ॥
कर्णि, नालीक और नाराच — ये शरीरमें यदि गड़ जायँ तो चिकित्सक मनुष्य इन्हें शरीरसे निकाल देते हैं, किंतु वचनरूपी बाणको निकालना असंभव होता है; क्योंकि वह हृदयके भीतर चुभा होता है ॥ ३४ ॥
हीनांगानतिरिक्तांगान् विद्याहीनान् विगर्हितान् ।
रूपद्रविणहीनांश्च सत्त्वहीनांश्च नाक्षिपेत् ॥ ३५ ॥
हीनांग ( अंधे - काने आदि ), अधिकांग (छांगुर आदि), विद्याहीन, निन्दित, कुरूप, निर्धन और निर्बल मनुष्योंपर आक्षेप करना उचित नहीं है ॥ ३५ ॥
नास्तिक्यं वेदनिन्दां च देवतानां च कुत्सनम् ।
द्वेषस्तम्भोऽभिमानं च तैक्ष्ण्यं च परिवर्जयेत् ॥ ३६ ॥
नास्तिकता, वेदोंकी निंदा, देवताओंको कोसना, द्वेष, उद्दण्डता, अभिमान और कठोरता – इन दुर्गुणोंका त्याग कर देना चाहिये ॥ ३६ ॥
परस्य दण्डं नोद्यच्छेत् क्रुद्धो नैनं निपातयेत् ।
अन्यत्र पुत्राच्छिष्याच्च शिक्षार्थं ताडनं स्मृतम् ॥ ३७ ॥
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क्रोधमें आकर पुत्र या शिष्यके सिवा दूसरे किसीको न तो डंडा मारे, न उसे पृथ्वीपर ही गिरावे । हाँ, शिक्षाके लिये पुत्र या शिष्यको ताड़ना देना उचित माना गया है ॥ ३७ ॥
न ब्राह्मणान् परिवदेन्नक्षत्राणि न निर्दिशेत् ।
तिथिं पक्षस्य न ब्रूयात् तथास्यायुर्न रिष्यते ॥ ३८ ॥
ब्राह्मणोंकी निंदा न करे, घर- घर घूम- घूमकर नक्षत्र और किसी पक्षकी तिथि न बताया करे । ऐसा करनेसे मनुष्यकी आयु क्षीण नहीं होती है ॥ ३८ ॥
(अमावास्यामृते नित्यं दंतधावनमाचरेत् ।
इतिहासपुराणानि दानं वेदं च नित्यशः ॥
गायत्रीमननं नित्यं कुर्यात् संध्यां समाहितः । ) अमावास्याके सिवा प्रतिदिन दन्तधावन करना चाहिये । इतिहास, पुराणोंका पाठ, -वेदोंका स्वाध्याय, दान, एकाग्रचित्त होकर संध्योपासना और गायत्रीमंत्रका जप – ये सब कर्म नित्य करने चाहिये ॥
कृत्वा मूत्रपुरीषे तु रथ्यामाक्रम्य वा पुनः ।
पादप्रक्षालनं कुर्यात् स्वाध्याये भोजने तथा ॥ ३ ९ ॥
मल- मूत्र त्यागने और रास्ता चलनेके बाद तथा स्वाध्याय और भोजन करनेके पहले पैर धो लेने चाहिये ॥ ३ ९ ॥
त्रीणि देवाः पवित्राणि ब्राह्मणानामकल्पयन् ।
अदृष्टमद्भिर्निर्णिक्तं यच्च वाचा प्रशस्यते ॥ ४० ॥
जिसपर किसीकी दूषित दृष्टि न पड़ी हो, जो जलसे धोया गया हो तथा जिसकी ब्राह्मणलोग वाणीद्वारा प्रशंसा करते हों - ये ही तीन वस्तुएँ देवताओंने ब्राह्मणोंके उपयोगमें लाने योग्य और पवित्र बतायी हैं ॥
संयावं कृसरं मांसं शष्कुलीं पायसं तथा ।
आत्मार्थं न प्रकर्तव्यं देवार्थं तु प्रकल्पयेत् ॥ ४१ ॥
जौके आटेका हलवा, खिचड़ी, फलका गूदा, पूड़ी और खीर– ये सब वस्तुएँ अपने लिये नहीं बनानी चाहिये । देवताओंको अर्पण करनेके लिये ही इनको तैयार करना चाहिये ॥ ४१ ॥
नित्यमग्निं परिचरेद् भिक्षां दद्याच्च नित्यदा ।
वाग्यतो दन्तकाष्ठं च नित्यमेव समाचरेत् ॥ ४२ ॥
प्रतिदिन अग्निकी सेवा करे, नित्यप्रति भिक्षुको भिक्षा दे और मौन होकर प्रतिदिन दन्तधावन किया करे ॥ ( न संध्यायां स्वपेन्नित्यं स्नायाच्छुद्धः सदा भवेत् । )
न चाभ्युदितशायी स्यात् प्रायश्चित्ती तथा भवेत् ।
मातापितरमुत्थाय पूर्वमेवाभिवादयेत् ॥ ४३ ॥
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आचार्यमथवाप्यन्यं तथायुर्विन्दते महत् । सायंकालमें न सोये, नित्य स्नान करे और सदा पवित्रतापूर्वक रहे । सूर्योदय होनेतक कभी न सोये । यदि किसी दिन ऐसा हो जाय तो प्रायश्चित्त करे । प्रतिदिन प्रातःकाल सोकर उठनेके बाद पहले माता- पिताको प्रणाम करे। फिर आचार्य तथा अन्य गुरुजनोंका अभिवादन करे । इससे दीर्घायु प्राप्त होती है ॥ ४३३ ॥
वर्जयेद् दन्तकाष्ठानि वर्जनीयानि नित्यशः ॥ ४४ ॥
भक्षयेच्छास्त्रदृष्टानि पर्वस्वपि विवर्जयेत् । शास्त्रोंमें जिन काष्ठोंका दाँतन निषिद्ध माना गया है, उन्हें सदा ही त्याग दे — कभी काममें न ले । शास्त्रविहित काष्ठका ही दन्तधावन करे; परंतु पर्वके दिन उसका भी परित्याग कर दे ॥ ४४ ॥
उदङ्मुखश्च सततं शौचं कुर्यात् समाहितः ॥ ४५ ॥
अकृत्वा देवपूजां च नाचरेद् दन्तधावनम् ।
सदा एकाग्रचित्त हो दिनमें उत्तरकी ओर मुँह करके ही मल-मूत्रका त्याग करे ।
दन्तधावन किये बिना देवताओंकी पूजा न करे ॥ ४५३ ॥
अकृत्वा देवपूजां च नाभिगच्छेत् कदाचन ।
अन्यत्र तु गुरुं वृद्धं धार्मिकं वा विचक्षणम् ॥ ४६ ॥
देवपूजा किये बिना गुरु, वृद्ध, धार्मिक तथा विद्वान् पुरुषको छोड़कर दूसरे किसीके पास न जाय ॥ ४६ ॥
अवलोक्यो न चादर्शो मलिनो बुद्धिमत्तरैः ।
न चाज्ञातां स्त्रियं गच्छेद् गर्भिणीं वा कदाचन ॥ ४७ ॥
अत्यन्त बुद्धिमान् पुरुषोंको मलिन दर्पणमें कभी अपना मुँह नहीं देखना चाहिये ।
अपरिचित तथा गर्भिणी स्त्रीके पास भी न जाय ॥ ४७ ॥
(दारसंग्रहणात् पूर्वं नाचरेन्मैथुनं बुधः ।
अन्यथा त्ववकीर्णः स्यात् प्रायश्चित्तं समाचरेत् ॥
नोदीक्षेत् परदारांश्च रहस्येकासनो भवेत् । इन्द्रियाणि सदा यच्छेत् स्वप्ने शुद्धमना भवेत् ॥ ) विद्वान् पुरुष विवाहसे पहले मैथुन न करे, अन्यथा वह ब्रह्मचर्य व्रतको भंग करनेका अपराधी माना जाता है । ऐसी दशामें उसे प्रायश्चित्त करना चाहिये । वह परायी स्त्रीकी ओर न तो देखे और न एकान्तमें उसके साथ एक आसनपर बैठे ही । इन्द्रियोंको सदा अपने वशमें रखे । स्वप्नमें भी शुद्ध मनवाला होकर रहे ॥
उदक्शिरा न स्वपेत तथा प्रत्यक्शिरा न च ।
प्राकृशिरास्तु स्वपेद् विद्वानथवा दक्षिणाशिराः ॥ ४८ ॥
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उत्तर तथा पश्चिमकी ओर सिर करके न सोये । विद्वान् पुरुषको पूर्व अथवा दक्षिणकी ओर सिर करके ही सोना चाहिये ॥ ४८ ॥
न भग्ने नावशीर्णे च शयने प्रस्वपीत च ।
नान्तर्धाने न संयुक्ते न च तिर्यक् कदाचन ॥ ४ ९ ॥
टूटी और ढीली खाटपर नहीं सोना चाहिये । अँधेरेमें पड़ी हुई शय्यापर भी सहसा शयन करना उचित नहीं है ( उजाला करके उसे अच्छी तरह देख लेना चाहिये ) । किसी दूसरेके साथ एक खाटपर न सोये । इसी तरह पलंगपर कभी तिरछा होकर नहीं, सदा सीधे ही सोना चाहिये ॥ ४ ९ ॥
न चापि गच्छेत् कार्येण समयाद् वापि नास्तिकैः ।
आसनं तु पदाऽऽकृष्य न प्रसज्जेत् तथा नरः ॥ ५० ॥
नास्तिकोंके साथ काम पड़नेपर भी न जाय । उनके शपथ खाने या प्रतिज्ञा करनेपर भी
उनके साथ यात्रा न करे । आसनको पैरसे खींचकर मनुष्य उसपर न बैठे ॥ ५० ॥
न नग्नः कर्हिचित् स्नायान्न निशायां कदाचन ।
स्नात्वा च नावमृज्येत गात्राणि सुविचक्षणः ॥ ५१ ॥
विद्वान् पुरुष कभी नग्न होकर स्नान न करे । रातमें भी कभी न नहाय । स्नानके पश्चात् अपने अंगोंमें तैल आदिकी मालिश न करावे ॥ ५१ ॥
न चानुलिम्पेदस्नात्वा स्नात्वा वासो न निर्धुनेत् ।
न चैवार्द्राणि वासांसि नित्यं सेवेत मानवः ॥ ५२ ॥
स्नान किये बिना अपने अंगोंमें चन्दन या अंगराग न लगावे । स्नान कर लेनेपर गीले वस्त्र न झटकारे । मनुष्य भीगे वस्त्र कभी न पहने ॥ ५२ ॥
स्रजश्च नावकृष्येत न बहिर्धारयीत च ।
उदक्यया च सम्भाषां न कुर्वीत कदाचन ॥ ५३ ॥
गलेमें पड़ी हुई मालाको कभी न खींचे । उसे कपड़े के ऊपर न धारण करे । रजस्वला स्त्रीके साथ कभी बातचीत न करे ॥ ५३ ॥
नोत्सृजेत पुरीषं च क्षेत्रे ग्रामस्य चान्तिके ।
उभे मूत्रपुरीषे तु नाप्सु कुर्यात् कदाचन ॥ ५४ ॥
बोये हुए खेतमें, गाँवके आस-पास तथा पानीमें कभी मल-मूत्रका त्याग न करे ॥ ५४ ॥
( देवालयेऽथ गोवृन्दे चैत्ये सस्येषु विश्रमे ।
भक्ष्यान् भूक्त्वा क्षुतेऽध्वानं गत्वा मूत्रपुरीषयोः ॥
द्विराचामेद् यथान्यायं हृद्गतं तु पिबन्नपः । ) देवमन्दिर, गौओंके समुदाय, देवसम्बन्धी वृक्ष और विश्रामस्थानके निकट तथा बढ़ी हुई खेतीमें भी मल- मूत्रका त्याग नहीं करना चाहिये। भोजन कर लेनेपर, छींक आनेपर,
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रास्ता चलनेपर तथा मल- मूत्रका त्याग करनेपर यथोचित शुद्धि करके दो बार आचमन करे ।
आचमनमें इतना जल पीये कि वह हृदयतक पहुँच जाय ॥
अन्नं बुभुक्षमाणस्तु त्रिर्मुखेन स्पृशेदपः ।
भुक्त्वा चान्नं तथैव त्रिर्द्विः पुनः परिमार्जयेत् ॥ ५५ ॥
भोजन करनेकी इच्छावाला पुरुष पहले तीन बार मुखसे झलका स्पर्श ( आचमन ) करे। फिर भोजनके पश्चात् भी तीन आचमन करे । फिर अंगुष्ठके मूलभागसे दो बार मुँहको पोंछे ॥ ५५ ॥
प्राङ्मुखो नित्यमश्नीयाद् वाग्यतोऽन्नमकुत्सयन् ।
प्रस्कन्दयेच्च मनसा भुक्त्वा चाग्निमुपस्पृशेत् ॥ ५६ ॥
भोजन करनेवाला पुरुष प्रतिदिन पूर्वकी ओर मुँह करके मौन भावसे भोजन करे । भोजन करते समय परोसे हुए अन्नकी निन्दा न करे । किंचिन्मात्र अन्न थालीमें छोड़ दे और भोजन करके मन- ही- मन अग्निका स्मरण करे ॥ ५६ ॥
आयुष्यं प्राङ्मुखो भुङ्क्ते यशस्यं दक्षिणामुखः ।
धन्यं पश्चान्मुखो भुङ्क्ते ऋतं भुङ्क्ते उदमुखः ॥ ५७ ॥
जो मनुष्य पूर्व दिशाकी ओर मुँह करके भोजन करता है, उसे दीर्घायु, जो दक्षिणकी ओर मुँह करके भोजन करता है उसे यश, जो पश्चिमकी ओर मुख करके भोजन करता है उसे धन और जो उत्तराभिमुख होकर भोजन करता है उसे सत्यकी प्राप्ति होती है ॥
अग्निमालभ्य तोयेन सर्वान् प्राणानुपस्पृशेत् ।
गात्राणि चैव सर्वाणि नाभिं पाणितले तथा ॥ ५८ ॥
( मनसे ) अग्निका स्पर्श करके जलसे सम्पूर्ण इन्द्रियोंका, सब अंगोंका, नाभिका और दोनों हथेलियोंका स्पर्श करे ॥ ५८ ॥
नाधितिष्ठेत् तुषं जातु केशभस्मकपालिकाः ।
अन्यस्य चाप्यवस्नातं दूरतः परिवर्जयेत् ॥ ५ ९ ॥
भूसी, भस्म, बाल और मुर्देकी खोपड़ी आदिपर कभी न बैठे । दूसरेके नहाये हुए जलका दूरसे ही त्याग कर दे ॥ ५ ९ ॥
शान्तिहोमांश्च कुर्वीत सावित्राणि च धारयेत् ।
निषण्णश्चापि खादेत न तु गच्छन् कदाचन ॥ ६० ॥
शान्ति- होम करे, सावित्रसंज्ञक मन्त्रोंका जप और स्वाध्याय करे । बैठकर ही भोजन करे, चलते - फिरते कदापि भोजन नहीं करना चाहिये ॥ ६० ॥
मूत्रं नोत्तिष्ठता कार्यं न भस्मनि न गोव्रजे ।
आर्द्रपादस्तु भुंजीत नार्द्रपादस्तु संविशेत् ॥ ६१ ॥
खड़ा होकर पेशाब न करे । राखमें और गोशालामें भी मूत्र त्याग न करे, भीगे पैर भोजन तो करे, परंतु शयन न करे ॥ ६१ ॥