श्रीगणेशाय नमः।

भङ्गास्वनोपाख्यान : स्त्री और पुरुष के संयोग में विषयसुख की अनुभूति किसको अधिक होती है?

स्त्रीत्व का विशेष सुख

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ६ · अनुशासनपर्व → दानधर्मपर्व · अध्याय 12 · पृष्ठ 122–134

1,090 शब्द · 6 मिनटका पाठ · 9 श्लोक

भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा

विषयसुख और स्त्री-पुरुष के संयोग पर चर्चा के समय

युधिष्ठिर ने पूछा— "राजन्! स्त्री और पुरुष के संयोग में विषयसुख की अनुभूति किसको अधिक होती है? इस संशय के विषय में आप यथावत् रूप से बताने की कृपा करें।"

भीष्मजी बोले— "राजन्! इस विषय में भी भङ्गास्वन के साथ इन्द्र का पहले जो वैर हुआ था, उस प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया जाता है। पूर्व काल की बात है, भङ्गास्वन नाम से प्रसिद्ध एक अत्यन्त धर्मात्मा राजर्षि थे। पुत्रहीन होने के कारण उन्होंने पुत्र प्राप्ति हेतु 'अग्निष्टुत' नामक यज्ञ का आयोजन किया था। उस यज्ञ में इन्द्र की प्रधानता न होने के कारण देवराज इन्द्र उससे द्वेष रखने लगे। वह यज्ञ मनुष्यों के प्रायश्चित्त के अवसर पर अथवा पुत्र की कामना होने पर अभीष्ट मानकर किया जाता है।

जब महाभाग देवराज इन्द्र को उस यज्ञ की बात मालूम हुई, तब वे मन को वश में रखने वाले उस राजर्षि भङ्गास्वन का कोई छिद्र ढूँढ़ने लगे। बहुत खोजने पर भी वे उस महामना नरेश का कोई दोष न देख सके। कुछ काल के अनन्तर राजा भङ्गास्वन शिकार खेलने के लिए वन में गए। 'यही बदला लेने का अवसर है,' ऐसा निश्चय करके इन्द्र ने राजा को मोह में डाल दिया।

इन्द्र द्वारा मोहित और भ्रान्त हुए राजर्षि भङ्गास्वन एकमात्र घोड़े के साथ इधर-उधर भटकने लगे। उन्हें दिशाओं का भी पता नहीं चल रहा था। वे भूख-प्यास से पीड़ित तथा परिश्रम और तृष्णा से विकल होकर घूमते रहे। घूमते-घूमते उन्होंने उत्तम जल से भरा हुआ एक सुन्दर सरोवर देखा। उन्होंने घोड़े को उस सरोवर में स्नान कराकर पानी पिलाया और स्वयं भी जल में उतरे। जैसे ही उन्होंने स्नान किया, वे राजा स्त्रीभाव को प्राप्त हो गए।

अपने आप को स्त्री रूप में देखकर राजा को बड़ी लज्जा हुई। उनके अन्तःकरण में भारी चिन्ता व्याप्त हो गई; उनकी इन्द्रियाँ और चेतना व्याकुल उठ पड़ीं। वे मन ही मन सोचने लगे— 'आरोहिष्ये कथं त्वश्वं कथं यास्यामि वै पुरम्। इष्टेनाग्निष्टुता चापि पुत्राणां शतमौरसम्' अर्थात् अब मैं कैसे घोड़े पर चढ़ूँगी? कैसे नगर जाऊँगी? मेरे अग्निष्टुत यज्ञ से मुझे सौ महाबलवान् पुत्र प्राप्त हुए हैं, उन सबसे मैं क्या कहूँगी? अपनी स्त्रियों और नगर के लोगों में कैसे जाऊँगी?

ऋषियों ने तो स्त्री के गुण मृदुता और व्याकुलता बताए हैं, जबकि पुरुष के गुण परिश्रम और पराक्रम हैं। मेरा पौरुष नष्ट हो गया और अज्ञात कारण से मुझमें स्त्रीत्व प्रकट हो गया। 'पुनरायात् पुरं तात स्त्रीकृतो नृपसत्तमः' अर्थात् इस स्त्री भाव में अब मैं अश्व पर कैसे चढ़ पाऊँगी?

काफी कठिन प्रयत्न करके वे स्त्री रूपधारी नरेश घोड़े पर चढ़कर अपने नगर पहुँचे। उन्हें देखकर राजा के पुत्र, स्त्रियाँ और सेवक बड़े आश्चर्य में पड़ गए। तब वक्ताओं में श्रेष्ठ भङ्गास्वन ने कहा— 'मैं अपनी सेना से घिरकर शिकार खेलने निकला था, परन्तु दैव की प्रेरणा से भ्रान्त होकर एक भयानक वन में जा पहुँचा। वहाँ प्यास से पीड़ित होकर मैंने एक मनोहर सरोवर देखा और उसमें स्नान करते ही दैव ने मुझे स्त्री बना दिया।'

अपने सौ पुत्रों को उन्होंने बताया— 'पुत्रो! तुम लोग आपस में प्रेमपूर्वक रहकर राज्य का उपभोग करो, अब मैं वन चला जाऊँगा।' यह कहकर वे स्त्री रूप में एक आश्रम में जाकर एक तपस्वी के आश्रय में रहने लगीं। उस तपसी से उनके सौ पुत्र हुए। जब वे रानी अपने उन पुत्रों को लेकर पुराने पुत्रों के पास पहुँचीं, तो बोलीं— 'पुत्रो! जब मैं पुरुष रूप में थी तब तुम मेरे सौ पुत्र हुए थे और जब स्त्री रूप में आयी हूँ तब ये मेरे सौ पुत्र हुए हैं। तुम सब भ्रातृभाव से इस राज्य का उपभोग करो।'

तापसेनास्य पुत्राणामाश्रमेष्वभवच्छतम् ।
अथ साऽऽदाय तान् सर्वान् पूर्वपुत्रानभाषत ॥

पुरुषत्वे सुता यूयं स्त्रीत्वे चेमे शतं सुताः ।
एकत्र भूज्यतां राज्यं भ्रातृभावेन पुत्रकाः ॥

उस तपस्वीसे आश्रममें उसके सौ पुत्र हुए । तब वह रानी अपने उन पुत्रोंको लेकर पहलेवाले पुत्रोंके पास गयी और उनसे इस प्रकार बोली - ' पुत्रो! जब मैं पुरुषरूपमें थी तब तुम मेरे सौ पुत्र हुए थे और जब स्त्रीरूपमें आयी हूँ तब ये मेरे सौ पुत्र हुए हैं । तुम सब लोग एकत्र होकर साथ - साथ भ्रातृभावसे इस राज्यका उपभोग करो'

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 12 · श्लोक 24-25पृष्ठ 130

वे सब भाई मिलकर राज्य भोगने लगे, जिसे देखकर इन्द्र क्रोधित हो गए। उन्होंने सोचा कि मैंने तो इस राजर्षि का उपकार ही किया है। इन्द्र ने ब्राह्मण का वेश धरकर नगर में जाकर राजकुमारों के बीच फूट डाल दी। वे बोले— 'राजकुमारों! जो एक पिता के पुत्र हैं, उनमें भी प्रेम नहीं रहता। देवता और असुर भी कश्यप के ही पुत्र हैं, फिर भी विवाद करते हैं। तुम लोग तो भङ्गास्वन के पुत्र हो और दूसरे सौ भाई एक तपस के लड़के हैं; तुम दोनों में प्रेम कैसे रह सकता है?' इस फूट के कारण भाइयों ने आपस में युद्ध किया और एक-दूसरे को मार गिराया।

युधिष्ठिर उवाच

स्त्रीपुंसयोः सम्प्रयोगे स्पर्शः कस्याधिको भवेत् ।
एतस्मिन् संशये राजन् यथावद् वक्तुमर्हसि ॥

युधिष्ठिरने पूछा- राजन्! स्त्री और पुरुषके संयोगमें विषयसुखकी अनुभूति किसको अधिक होती है ( स्त्रीको या पुरुषको )? इस संशयके विषयमें आप यथावत्रूपसे बतानेकी कृपा करें ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 12 · श्लोक 1पृष्ठ 127

यह समाचार सुनकर तापसी फूट-फूटकर रोने लगी। उसी समय ब्राह्मण वेश में इन्द्र उसके पास आए और पूछा— 'सुमुखि! तुम किस दुःख से रो रही हो?' वह स्त्री करुणा भरे स्वर में बोली— 'ब्रह्मन्! मेरे दो सौ पुत्र काल के द्वारा मारे गए। मैं पहले राजा था, तब मेरे सौ पुत्र हुए थे। एक दिन शिकार खेलते समय मैं वन में भ्रमित होकर भटक गया और सरोवर में स्नान करते ही पुरुष से स्त्री बन गया। फिर इस आश्रम में तपसी से मेरे सौ पुत्र हुए। मैंने उन्हें नगर में प्रतिष्ठित किया, परन्तु काल की प्रेरणा से वे आपस में लड़कर नष्ट हो गए।'

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
भंगास्वनेन शक्रस्य यथा वैरमभूत् पुरा ॥

भीष्मजीने कहा- राजन्! इस विषयमें भी भंगास्वनके साथ इन्द्रका पहले जो वैर हुआ था, उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 12 · श्लोक 2पृष्ठ 127

इन्द्र ने कठोर वाणी में कहा— 'भद्रे! जब तुम राजा थीं, तब तुमने मेरा आवाहन न करके वह यज्ञ किया था जिससे मुझे दुःख पहुँचा। खोटी बुद्धि वाली स्त्री! मैं वही इन्द्र हूँ और तुमसे मैंने ही अपने वैर का बदला लिया है।'

इन्द्रो ज्ञात्वा तु तं यज्ञं महाभागः सुरेश्वरः ।
अन्तरं तस्य राजर्षेरन्विच्छन्नियतात्मनः ॥

महाभाग देवराज इन्द्रको जब उस यज्ञकी बात मालूम हुई तब वे मनको वशमें रखनेवाले राजर्षि भंगास्वनका छिद्र ढूँढ़ने लगे ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 12 · श्लोक 5पृष्ठ 128

इन्द्र को देखकर वे राजर्षि उनके चरणों में सिर रखकर बोले— 'सुरश्रेष्ठ! आप प्रसन्न हों। मैंने पुत्र की इच्छा से वह यज्ञ किया था, उसके लिए मुझे क्षमा करें।' उनके इस प्रणाम से इन्द्र सन्तुष्ट हुए और वर देने के लिए बोले— 'राजन्! तुम्हारे कौन से पुत्र जीवित हो जाएँ? वे जो स्त्री रूप में तुमसे उत्पन्न हुए हैं, अथवा जो पुरुष अवस्था में थे?'

अग्निष्टुतं स राजर्षिरिन्द्रद्विष्टं महाबलः ।
प्रायश्चित्तेषु मर्त्यानां पुत्रकामेषु चेष्यते ॥

उन महाबली राजर्षिने अग्निष्टुत नामक यज्ञका आयोजन किया था। उसमें इन्द्रकी प्रधानता न होनेके कारण इन्द्र उस यज्ञसे द्वेष रखते हैं । वह यज्ञ मनुष्योंके प्रायश्चित्तके अवसरपर अथवा पुत्रकी कामना होनेपर अभीष्ट मानकर किया जाता है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 12 · श्लोक 4पृष्ठ 128

तापसी ने हाथ जोड़कर कहा— 'देवेन्द्र! स्त्री रूप में मुझसे जो पुत्र उत्पन्न हुए हैं, वे ही जीवित हो जाएँ।'

इन्द्र ने विस्मित होकर पूछा— 'तुमने पुरुष रूप वाले पुत्रों के बजाय स्त्री रूप वाले पुत्रों को ही क्यों चुना? मैं इसका कारण सुनना चाहता हूँ।'

स्त्री ने उत्तर दिया— 'इन्द्र! स्त्री का अपने पुत्रों पर अधिक स्नेह होता है, वैसा स्नेह पुरुष का नहीं होता। अतः जो स्त्री रूप में जन्मे हैं, वे ही जीवित रहें।'

स्त्र्युवाच स्त्रियास्त्वभ्यधिकः स्नेहो न तथा पुरुषस्य वै ।
तस्मात् ते शक्र जीवन्तु ये जाताः स्त्रीकृतस्य वै ॥

- स्त्रीने कहा – इन्द्र! स्त्रीका अपने पुत्रोंपर अधिक स्नेह होता है, वैसा स्नेह पुरुषका नहीं होता है । अतः इन्द्र! स्त्रीरूपमें आनेपर मुझसे जिनका जन्म हुआ है, वे ही जीवित हो जायँ ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 12 · श्लोक 47पृष्ठ 133

भीष्मजी कहते हैं— राजन्! इन्द्र प्रसन्न होकर बोले— 'सत्यवादिनि! तुम्हारे सभी पुत्र जीवित हो जाएँ। उत्तम व्रत वाले राजेन्द्र! दूसरा वर माँग लो; क्या तुम पुनः पुरुष होना चाहते हो या स्त्री ही रहना चाहते हो?'

भीष्म उवाच

वरं च वृणु राजेन्द्र यं त्वमिच्छसि सुव्रत ।
पुरुषत्वमथ स्त्रीत्वं मत्तो यदभिकाङ्क्षते ॥

‘ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले राजेन्द्र! तुम मुझसे अपनी इच्छाके अनुसार दूसरा वर भी माँग लो । बोलो, फिरसे पुरुष होना चाहते हो या स्त्री ही रहनेकी इच्छा है? जो चाहो वह मुझसे ले लो '

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 12 · श्लोक 49पृष्ठ 133

स्त्री ने कहा— 'इन्द्र! मैं स्त्रीत्व का ही वरण करती हूँ। अब मैं पुरुष होना नहीं चाहती।'

इन्द्र ने पूछा— 'प्रभो! तुम्हें पुरुषत्व त्यागकर स्त्री बने रहने की इच्छा क्यों है?'

उस स्त्री ने उत्तर दिया— 'देवेन्द्र! स्त्री का पुरुष के साथ संयोग होने पर स्त्री को ही पुरुष की अपेक्षा अधिक विषयसुख प्राप्त होता है। मैं सच कहती हूँ, स्त्री रूप में मैंने अधिक रति-सुख का अनुभव किया है, अतः मैं इसी से सन्तुष्ट हूँ।'

रमिताभ्यधिकं स्त्रीत्वे सत्यं वै देवसत्तम ।
स्त्रीभावेन हि तुष्यामि गम्यतां त्रिदशाधिप ॥

‘ देवश्रेष्ठ! सुरेश्वर! मैं सच कहती हूँ, स्त्रीरूपमें मैंने अधिक रति- सुखका अनुभव किया है, अतः स्त्रीरूपसे ही संतुष्ट हूँ । आप पधारिये'

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 12 · श्लोक 53पृष्ठ 134

तब 'एवमस्तु' कहकर इन्द्र उस तपसी से विदा लेकर स्वर्गलोक चले गए।"

एवमस्त्विति चोक्त्वा तामापृच्छ्य त्रिदिवं गतः ।
एवं स्त्रिया महाराज अधिका प्रीतिरुच्यते ॥

महाराज! तब ‘ एवमस्तु' कहकर उस तापसीसे विदा ले इन्द्र स्वर्गलोकको चले गये । इस प्रकार स्त्रीको विषय- भोगमें पुरुषकी अपेक्षा अधिक सुख प्राप्ति बतायी जाती है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 12 · श्लोक 54पृष्ठ 134

In English

The Story of King Bhangasvan and Indra

King Bhangasvan performs a sacrifice that angers Indra, who subsequently causes the king to turn into a woman after he bathes in a lake. The transformed king has one hundred more sons as a woman, but Indra later incites a war between these new sons and the king's original hundred sons. After the conflict, the king chooses to remain a woman because she finds more pleasure in that form.

This page answers

  • Why did indra turn bhangasvan into a woman?
  • How many sons did bhangasvan have as a man and a woman?
  • Why did the brothers fight each other?
  • Why did bhangasvan choose to stay a woman instead of becoming a man again?

Also written: Bhangasvanopakhyana, Bhangasvana, Indra, Dharma, भङ्गास्वनोपाख्यान