श्रीगणेशाय नमः।

ब्रह्मगीता : परम सत्य का अनुभव केवल बुद्धि द्वारा ही क्यों सम्भव है?

आत्म-साक्षात्कार और विवेक

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ६ · पर्व → अनुगीतापर्व · अध्याय 20 · पृष्ठ 1678–1684

772 शब्द · 4 मिनटका पाठ · 7 श्लोक

वासुदेव ने अर्जुन से कहा

अर्जुन के संशयों को दूर करने हेतु आत्मज्ञान की व्याख्या।

श्रीकृष्ण कहते हैं— भरतश्रेष्ठ अर्जुन! इसी विषय में पति-पत्नी के संवादरूप एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया जाता है।

वासुदेव उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
दम्पत्योः पार्थ संवादो योऽभवद् भरतर्षभ ॥

श्रीकृष्ण कहते हैं- भरतश्रेष्ठ! अर्जुन! इसी विषयमें पति- पत्नीके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 20 · श्लोक 1पृष्ठ 1680

एक एकान्त स्थान में, जहाँ शान्ति व्याप्त थी, वहाँ एक ब्राह्मण बैठे थे जो ज्ञान-विज्ञान के पारगामी विद्वान् थे। वे वहीं विराजमान थे कि उनकी पत्नी, एक ब्राह्मणी, अपने उन पतिदेव के समीप पहुँची। उनके मुख पर चिन्ता की लकीरें थीं। वह बोली— ‘प्राणनाथ! मैंने सुना है कि स्त्रियाँ पति के कर्मानुसार प्राप्त हुए लोकों को जाती हैं; किन्तु आप तो कर्म छोड़कर बैठे हैं और मेरे प्रति कठोरता का बर्ताव करते हैं। आपको इस बात का पता नहीं है कि मैं अनन्यभाव से आपके ही आश्रित हूँ। ऐसी दशा में आप जैसे पति का आश्रय लेकर मैं किस लोक में जाऊँगी? आपको पतिरूप में पाकर मेरी क्या गति होगी?’

वासुदेव उवाच

ब्राह्मणी ब्राह्मणं कंचिज्ज्ञानविज्ञानपारगम् ।
दृष्ट्वा विविक्त आसीनं भार्या भर्तारमब्रवीत् ॥

कं नु लोकं गमिष्यामि त्वामहं पतिमाश्रिता ।
न्यस्तकर्माणमासीनं कीनाशमविचक्षणम् ॥

भार्याः पतिकृताँल्लोकानाप्नुवन्तीति नः श्रुतम् ।
त्वामहं पतिमासाद्य कां गमिष्यामि वै गतिम् ॥

एक ब्राह्मण, जो ज्ञान- विज्ञानके पारगामी विद्वान् थे, एकान्त स्थानमें बैठे हुए थे, यह देखकर उनकी पत्नी ब्राह्मणी अपने उन पतिदेवके पास जाकर बोली — ‘ प्राणनाथ! मैंने सुना है कि स्त्रियाँ पतिके कर्मानुसार प्राप्त हुए लोकोंको जाती हैं; किंतु आप तो कर्म छोड़कर बैठे हैं और मेरे प्रति कठोरताका बर्ताव करते हैं । आपको इस बातका पता नहीं है कि मैं अनन्यभावसे आपके ही आश्रित हूँ। ऐसी दशामें आप- जैसे पतिका आश्रय लेकर मैं किस लोकमें जाऊँगी? आपको पतिरूपमें पाकर मेरी क्या गति होगी '

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 20 · श्लोक 2–4पृष्ठ 1680

पत्नी के इन वचनों को सुनकर वे शान्तचित्त ब्राह्मण हँसे और बोले— ‘सौभाग्यशालिनि! तुम पाप से सदा दूर रहती हो; अतः तुम्हारे इस कथन के लिये मैं बुरा नहीं मानता। संसार में जो ग्रहण करने योग्य दीक्षा और व्रत आदि हैं तथा इन आँखों से दिखाई देने वाले जो स्थूल कर्म हैं, उन्हींको वस्तुतः कर्म माना जाता है। किन्तु जिन्हें ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई है, वे लोग कर्म के द्वारा मोह का ही सङ्ग्रह करते हैं। इस लोक में कोई दो घड़ी भी बिना कर्म किए रह सके, ऐसा सम्भाव नहीं है। मन से, वाणी से तथा क्रिया द्वारा जो भी शुभ या अशुभ कार्य होता है, वह तथा जन्म, स्थिति, विनाश एवं शरीरभेद आदि कर्म प्राणियों में विद्यमान हैं।’

मोहमेव नियच्छन्ति कर्मणा ज्ञानवर्जिताः ।
नैष्कर्म्यं न च लोकेऽस्मिन् मुहूर्तमपि लभ्यते ॥

‘ किंतु जिन्हें ज्ञानकी प्राप्ति नहीं हुई है, वे लोग कर्मके द्वारा मोहका ही संग्रह करते हैं । इस लोकमें कोई दो घड़ी भी बिना कर्म किये रह सके, ऐसा सम्भाव नहीं है ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 20 · श्लोक 7पृष्ठ 1681

ब्राह्मण ने आगे कहा कि जब राक्षसों—दुर्जनों ने जहाँ सोम और घृत आदि दृश्य द्रव्यों का उपयोग होता है, उन कर्म-मार्गों का विनाश आरम्भ कर दिया, तब मैंने उनसे विरक्त होकर स्वयं ही अपने भीतर स्थित हुए आत्मा के स्थान को देखा। वहाँ द्वन्द्वों से रहित वह परब्रह्म परमात्मा विराजमान है, जहाँ सोम अग्निके साथ नित्य समागम करता है तथा जहाँ सब भूतों को धारण करनेवाला धीर समीर निरन्तर चलता रहता है। जहाँ ब्रह्मा आदि देवता तथा उत्तम व्रत का पालन करनेवाले शान्तचित्त जितेन्द्रिय विद्वान् योगयुक्त होकर उस अविनाशी ब्रह्म की उपासना करते हैं। वह अविनाशी ब्रह्म घ्राणेन्द्रिय से सूँघने और जिह्वाद्वारा आस्वादन करने योग्य नहीं है; स्पर्शेन्द्रिय—त्वचा द्वारा उसका स्पर्श भी नहीं किया जा सकता; केवल बुद्धिके द्वारा उसका अनुभव किया जा सकता है। वह नेत्रों का विषय नहीं हो सकता। वह अनिर्वचनीय परब्रह्म श्रवणेन्द्रिय की पहुँच से सर्वथा परे है; गन्ध, रस, स्पर्श, रूप और शब्द आदि कोई भी लक्षण उसमें उपलब्ध नहीं है।

चक्षुषामविषह्यं च यत् किंचिच्छ्रवणात् परम् ।
अगन्धमरसस्पर्शमरूपाशब्दलक्षणम् ॥

'वह नेत्रोंका विषय नहीं हो सकता । वह अनिर्वचनीय परब्रह्म श्रवणेन्द्रियकी पहुँचसे सर्वथा परे है । गन्ध, रस, स्पर्श, रूप और शब्द आदि कोई भी लक्षण उसमें उपलब्ध नहीं है ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 20 · श्लोक 13पृष्ठ 1682

उसीसे सृष्टि आदिका विस्तार होता है और उसी में उसकी स्थिति है। प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान—ये उसीसे प्रकट होते हैं और फिर उसी में प्रविष्ट हो जाते हैं। समान और व्यान के बीच में प्राण और अपान विचरते हैं। उस अपान सहित प्राण के लीन होने पर समान और व्यान का भी लय हो जाता है। अपान और प्राण के बीच में उदान सबको व्याप्त करके स्थित होता है; इसीलिये सोये हुए पुरुष को प्राण और अपान नहीं छोड़ते। प्राणों का आधार होने के कारण विद्वान् पुरुष उसे उदान कहते हैं, इसलिये वेदवादी मुझमें स्थित तप का निश्चय करते हैं।

एवमुक्तः स शान्तात्मा तामुवाच हसन्निव ।
सुभगे नाभ्यसूयामि वाक्यस्यास्य तवानघे ॥

पत्नीके ऐसा कहनेपर वे शान्तचित्तवाले ब्राह्मण देवता हँसते हुए -से बोले –‘सौभाग्यशालिनि! तुम पापसे सदा दूर रहती हो; अतः तुम्हारे इस कथनके लिये मैं बुरा नहीं मानता ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 20 · श्लोक 5पृष्ठ 1681

एक दूसरे के सहारे रहनेवाले तथा सबके शरीरों में सञ्चार करनेवाले उन पाँचों प्राणवायुओं के मध्यभाग में, जो समान वायु का स्थान नाभिमण्डल है, उसके बीच में स्थित हुआ वैश्वानर अग्नि सात रूपों में प्रकाशमान है। घ्राण, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कान तथा मन और बुद्धि—ये उस वैश्वानर की सात जिह्वाएँ हैं। सूँघने योग्य गन्ध, दर्शनीय रूप, पीने योग्य रस, स्पर्श करने योग्य वस्तु, सुनने योग्य शब्द, मन के द्वारा मनन करने योग्य और बुद्धि के द्वारा समझने योग्य विषय—ये सात मुझ वैश्वानर की समिधाएँ हैं। सूँघनेवाला, खानेवाला, देखनेवाला, स्पर्श करने वाला, श्रवण करनेवाला, मनन करनेवाला और समझनेवाला—ये सात श्रेष्ठ ऋत्विज हैं।

रक्षोभिर्वध्यमानेषु दृश्यद्रव्येषु वर्त्मसु ।
आत्मस्थमात्मना तेभ्यो दृष्टमायतनं मया ॥

' जब राक्षसों — दुर्जनोंने जहाँ सोम और घृत आदि दृश्य द्रव्योंका उपयोग होता है, उन कर्म- मार्गोंका विनाश आरम्भ कर दिया, तब मैंने उनसे विरक्त होकर स्वयं ही अपने भीतर स्थित हुए आत्माके स्थानको देखा ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 20 · श्लोक 9पृष्ठ 1682

विद्वान् पुरुष इन सात हविस्यों को सात रूपों में विभक्त हुए वैश्वानर में भलीभाँति हवन करके, अर्थात् विषयों की ओर से आसक्ति हटाकर, अपनी तन्मात्रा आदि योनियों में शब्दादि विषयों को उत्पन्न करते हैं। पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, तेज, मन और बुद्धि—ये सात योनि कहलाती हैं। इनके जो समस्त गुण हैं, वे हविष्य रूप हैं जो अग्निजनित गुणों में प्रवेश करते हैं। वे अन्तःकरण में संस्कार रूप से रहकर अपनी योनियों में जन्म लेते हैं। प्रलयकाल में ये अन्तःकरण में ही अवरुद्ध रहते और भूतों की सृष्टि के समय वहीं से प्रकट होते हैं। वहीं से गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द का प्राकट्य होता है। संशय का जन्म भी वहीं होता है और निश्चयात्मिका बुद्धि भी वहीं पैदा होती है; यह सात प्रकार का जन्म माना गया है। इसी प्रकार पुरातन ऋषियों ने श्रुति के अनुसार घ्राण आदिका रूप ग्रहण किया है। ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय—इन तीन आहुतियों से समस्त लोक परिपूर्ण हैं और वे सभी लोक आत्मज्योति से परिपूर्ण होते हैं।

हवींष्यग्निषु होतारः सप्तधा सप्त सप्तसु ।
सम्यक् प्रक्षिप्य विद्वांसो जनयन्ति स्वयोनिषु ॥

' पूर्वोक्त सात होता उक्त सात हविष्योंका सात रूपोंमें विभक्त हुए वैश्वानरमें भलीभाँति हवन करके ( अर्थात् विषयोंकी ओरसे आसक्ति हटाकर) विद्वान् पुरुष अपने तन्मात्रा आदि योनियोंमें शब्दादि विषयोंको उत्पन्न करते हैं ।

महाभारत · पर्व · अनुगीतापर्व · अध्याय 20 · श्लोक 23पृष्ठ 1684

In English

The Dialogue of the Brahmin and His Wife

A learned Brahmin explains the nature of reality to his worried wife. He describes how the Supreme Brahman is beyond physical senses and explains the movement of the five vital breaths and the seven forms of cosmic fire.

This page answers

  • What did the brahmin tell his wife about karma?
  • How can one experience parabrahm?
  • What are the five types of prana?
  • What is the meaning of vaishvanara in this context?

Also written: Brahmagita, Brahma, Brahmani, Vasudeva, Arjuna, ब्रह्मगीता