श्रीगणेशाय नमः।

गोदानमाहात्म्य : गोदान और भूमिदान की श्रेष्ठता एवं पात्रता का निर्णय कैसे करें?

पवित्र दान और पात्र चयन

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ६ · अनुशासनपर्व → दानधर्मपर्व · अध्याय 69 · पृष्ठ 629–634

666 शब्द · 4 मिनटका पाठ · 14 श्लोक

भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा

दान की उत्तम विधि और भूमिदान के महत्व पर चर्चा

भीष्म पितामह के सान्निध्य में युधिष्ठिर ने जब दान की उत्तम विधि और भूमिदान के महत्व के विषय में प्रश्न किया, तब भीष्म ने उन्हें ज्ञान प्रदान करते हुए कहा— "राजन्! गाय, भूमि और सरस्वती—ये तीनों समान नाम वाली हैं। इन तीनों वस्तुओं का दान करना चाहिए और इनके दान का फल भी एक समान ही है। ये वस्तुएँ मनुष्यों की सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाली हैं।" भीष्म ने आगे स्पष्ट किया कि जो ब्राह्मण अपने शिष्य को धर्मानुकूल ब्राह्मी सरस्वती यानी वेदवाणी का उपदेश कराता है, वह भूमिदान और गोदान के समान ही फल का भागी होता है।

स्तुति महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 69
युधिष्ठिर उवाच

भूय एव कुरुश्रेष्ठ दानानां विधिमुत्तमम् ।
कथयस्व महाप्राज्ञ भूमिदानं विशेषतः ॥

श्लोक 1पृष्ठ 630
युधिष्ठिर उवाच

पृथिवीं क्षत्रियो दद्याद् ब्राह्मणायेष्टिकर्मिणे ।
विधिवत् प्रतिगृह्णीयान्न त्वन्यो दातुमर्हति ॥

केवल क्षत्रिय राजा ही यज्ञ करनेवाले ब्राह्मणको पृथ्वीका दान कर सकता है और उसीसे ब्राह्मण विधि - पूर्वक भूमिका प्रतिग्रह ले सकता है । दूसरा कोई यह दान नहीं कर सकता ।

श्लोक 2पृष्ठ 630
युधिष्ठिर उवाच

सर्ववर्णैस्तु यच्छक्यं प्रदातुं फलकाङ्क्षिभिः ।
वेदे वा यत् समाख्यातं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥

श्लोक 3पृष्ठ 630
भीष्म उवाच

तुल्यनामानि देयानि त्रीणि तुल्यफलानि च ।
सर्वकामफलानीह गावः पृथ्वी सरस्वती ॥

भीष्मजीने कहा – युधिष्ठिर! गाय, भूमि और सरस्वती – ये तीनों समान नामवाली हैं -इन तीनों वस्तुओंका दान करना चाहिये । इन तीनोंके दानका फल भी समान ही है । ये तीनों वस्तुएँ मनुष्योंकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण करनेवाली हैं ।

श्लोक 4पृष्ठ 630
भीष्म उवाच

यो ब्रूयाच्चापि शिष्याय धर्म्यं ब्राह्मीं सरस्वतीम् ।
पृथिवीगोप्रदानाभ्यां तुल्यं स फलमश्नुते ॥

जो ब्राह्मण अपने शिष्यको धर्मानुकूल ब्राह्मी सरस्वती ( वेदवाणी ) का उपदेश करता है, वह भूमिदान और गोदानके समान फलका भागी होता है ।

श्लोक 5पृष्ठ 630
भीष्म उवाच

तथैव गाः प्रशंसन्ति न तु देयं ततः परम् ।
संनिकृष्टफलास्ता हि लघ्वर्थाश्च युधिष्ठिर ॥

इसी प्रकार गोदानकी भी प्रशंसा की गयी है। उससे बढ़कर कोई दान नहीं है । युधिष्ठिर! गोदानका फल निकट भविष्यमें मिलता है तथा वे गौएँ शीघ्र अभीष्ट अर्थकी सिद्धि करती हैं ।

श्लोक 6पृष्ठ 630

मातरः सर्वभूतानां गावः सर्वसुखप्रदाः ।
वृद्धिमाकाङ्क्षता नित्यं गावः कार्याः प्रदक्षिणाः ॥

गौएँ सम्पूर्ण प्राणियोंकी माता कहलाती हैं । वे सबको सुख देनेवाली हैं । जो अपने अभ्युदयकी इच्छा रखता हो, उसे गौओंको सदा दाहिने करके चलना चाहिये ।

श्लोक 7पृष्ठ 631

संताड्या न तु पादेन गवां मध्ये न च व्रजेत् ।
मंगलायतनं देव्यस्तस्मात् पूज्याः सदैव हि ॥

गौओंको लात न मारे । उनके बीचसे होकर न निकले । वे मंगलकी आधारभूत देवियाँ हैं, अतः उनकी सदा ही पूजा करनी चाहिये ।

श्लोक 8पृष्ठ 631

प्रचोदनं देवकृतं गवां कर्मसु वर्तताम् ।
पूर्वमेवाक्षरं चान्यदभिधेयं ततः परम् ॥

देवताओंने भी यज्ञके लिये भूमि जोतते समय बैलोंको डंडे आदिसे हाँका था । अतः पहले यज्ञके लिये ही बैलोंको जोतना या हाँकना श्रेयस्कर माना गया है । उससे भिन्न कर्मके लिये बैलोंको जोतना या डंडे आदिसे हाँकना निन्दनीय है ।

श्लोक 9पृष्ठ 631

प्रचारे वा निवाते वा बुधो नोद्वेजयेत गाः ।
तृषिता ह्यभिवीक्षन्त्यो नरं हन्युः सबान्धवम् ॥

विद्वान् पुरुषको चाहिये कि जब गौएँ स्वच्छन्दता-पूर्वक विचर रही हों अथवा किसी उपद्रवशून्य स्थानमें बैठी हों तो उन्हें उद्वेगमें न डाले । जब गौएँ प्याससे पीड़ित हो जलकी इच्छासे अपने स्वामीकी ओर देखती हैं ( और वह उन्हें पानी नहीं पिलाता है ), तब वे रोषपूर्ण दृष्टिसे बन्धु - बान्धवोंसहित उसका नाश कर देती हैं ।

श्लोक 10पृष्ठ 631

पितृसद्मानि सततं देवतायतनानि च ।
पूयन्ते शकृता यासां पूतं किमधिकं ततः ॥

जिनके गोबरसे लीपनेपर देवताओंके मन्दिर और पितरोंके श्राद्धस्थान पवित्र होते हैं, उनसे बढ़कर पावन और क्या हो सकता है?

श्लोक 11पृष्ठ 631

घासमुष्टिं परगवे दद्यात् संवत्सरं तु यः ।
अकृत्वा स्वयमाहारं व्रतं तत् सार्वकामिकम् ॥

जो एक वर्षतक प्रतिदिन स्वयं भोजनके पहले दूसरेकी गायको एक मुट्ठी घास खिलाता है, उसका वह व्रत समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला होता है ।

श्लोक 12पृष्ठ 631

स हि पुत्रान् यशोऽर्थं च श्रियं चाप्यधिगच्छति ।
नाशयत्यशुभं चैव दुःस्वप्नं चाप्यपोहति ॥

वह अपने लिये पुत्र, यश, धन और सम्पत्ति प्राप्त करता है तथा अशुभ कर्म और दुःस्वप्नका नाश कर देता है ।

श्लोक 13पृष्ठ 631
युधिष्ठिर उवाच

देयाः किंलक्षणा गावः काश्चापि परिवर्जयेत् ।
कीदृशाय प्रदातव्या न देयाः कीदृशाय च ॥

युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! किन लक्षणोंवाली गौओंका दान करना चाहिये और किनका दान नहीं करना चाहिये? कैसे ब्राह्मणको गाय देनी चाहिये और कैसे ब्राह्मणको नहीं देनी चाहिये?

श्लोक 14पृष्ठ 632

इस स्तुतिके श्लोक 1–22 में से आरम्भके 14 यहाँ दिये गये हैं। पूरी स्तुति मूल ग्रन्थमें पढ़ें →

"इसी प्रकार गोदान की भी बहुत प्रशंसा की गई है। इससे बढ़कर कोई दान नहीं है, युधिष्ठिर!" भीष्म के स्वर में गौओं के प्रति श्रद्धा थी। उन्होंने बताया कि गोदान का फल निकट भविष्य में मिलता है और वे गौएँ शीघ्र ही अभीष्ट अर्थ की सिद्धि करा देती हैं। "गौएँ सम्पूर्ण प्राणियों की माता कहलाती हैं और सबको सुख देने वाली हैं।" उन्होंने उपदेश दिया कि जो अपने अभ्युदय की इच्छा रखता हो, उसे गौओं को सदा दाहिने करके चलना चाहिए; उन्हें लात न मारे और उनके बीच से होकर न निकले। वे मङ्गल की आधारभूत देवियाँ हैं, अतः उनकी सदा ही पूजा करनी चाहिए।

भीष्म ने बैलों के विषय में भी बताया कि देवताओं ने भी यज्ञ के लिए भूमि जोतते समय बैलों को डण्डे आदि से हाँका था, अतः पहले यज्ञ के लिए ही बैलों को जोतना या हाँकना श्रेयस्कर है; इसके भिन्न कर्म निन्दनीय हैं। एक विद्वान पुरुष को चाहिए कि जब गौएँ स्वच्छन्दतापूर्वक विचर रही हों अथवा किसी उपद्रव-रहित स्थान में बैठी हों, तो उन्हें उद्वेग में न डाले। उन्होंने चेतावनी दी— "जब गौएँ प्यास से पीड़ित होकर जल की इच्छा से अपने स्वामी की ओर देखती हैं और वह उन्हें पानी नहीं पिलाता है, तब वे रोषपूर्ण दृष्टि से अपने ही बन्धु-बान्धवों सहित उसका नाश कर देती हैं।" गौओं के गोबर से लीपने पर देवताओं के मन्दिर और पितरों के श्राद्धस्थान पवित्र होते हैं। जो व्यक्ति एक वर्ष तक प्रतिदिन स्वयं भोजन करने से पहले दूसरे की गाय को एक मुट्ठी घास खिलाता है, वह व्रत समस्त कामनाओं को पूर्ण करता है और उसके लिए पुत्र, यश, धन तथा सम्पत्ति प्राप्त होती है, जबकि अशुभ कर्म और दुःस्वप्न नष्ट हो जाते हैं।

इस ज्ञान के बीच युधिष्ठिर ने पुनः प्रश्न किया— "पितामह! किन लक्षणों वाली गौओं का दान करना चाहिए और किनका नहीं? कैसे ब्राह्मण को गाय देनी चाहिए और कैसे ब्राह्मण को नहीं?" भीष्म ने उत्तर दिया— "राजन्! दुराचारी, पापी, लोभी, असत्यवादी तथा देवयज्ञ और श्राद्धकर्म न करने वाले ब्राह्मण को किसी भी तरह गौ नहीं देनी चाहिए। परन्तु जिसके बहुत से पुत्र हों, जो श्रोत्रिय यानी वेदवेत्ता हो और अग्निहोत्री ब्राह्मण हो तथा गौ के लिए याचना कर रहा हो, ऐसे पुरुष को दस गौओं का दान करने वाला दाता उत्तम लोकों को प्राप्त करता है।" जो गोदान ग्रहण करके धर्माचरण करता है, दाता उसके धर्म के फल का अंश भी भागी होता है।

भीष्म ने जीविका के महत्व को समझाते हुए कहा— "जो जन्म देता है, जो भय से बचाता है तथा जो जीविका देता है—ये तीनों पिता के तुल्य हैं। तीन पुत्र पुत्रहीनता के दोष को दूर करते हैं, पर यदि दूध देने वाली दस गौएँ हों, तो वे जीविका के अभाव को दूर कर देती हैं।" उन्होंने योग्य ब्राह्मण का लक्षण बताते हुए कहा कि जो वेदान्तनिष्ठ, बहुज्ञ, ज्ञानानन्द से तृप्त, जितेन्द्रिय, शिष्ट हो, जिसका मन वश में हो, जो यत्नशील और समस्त प्राणियों के प्रति प्रिय वचन बोलने वाला हो; जो भूख के भय से अनुचित कर्म न करे, मृदुल, शान्त, अतिथिप्रेमी, सब पर समान भाव रखने वाला और स्त्री-पुत्र आदि कुटुम्ब से युक्त हो—उस ब्राह्मण की जीविका का अवश्य प्रबन्ध करना चाहिए।

अन्त में भीष्म ने एक गम्भीर चेतावनी देते हुए कहा— "शुभ पात्र को गोदान करने से जो लाभ होते हैं, उसका धन ले लेने पर उतना ही पाप लगता है; अतः किसी भी अवस्था में ब्राह्मणों के धन का अपहरण न करे तथा उनकी स्त्रियों का संसर्ग दूर से ही त्याग दे।"

In English

Bhishma's teachings on the importance of donating cows

Yudhisthira asks Bhishma about the merits of charity and land donation. Bhishma explains the spiritual significance of donating cows, how to treat them, and which types of Brahmins are worthy recipients of such gifts.

This page answers

  • What is the merit of donating a cow according to bhishma?
  • How should one behave around cows?
  • Which brahmins should receive a cow donation?
  • What are the qualities of a worthy recipient of charity?

Also written: Godanamahatmya, Godana, Yudhishthira, Bhishma, गोदानमाहात्म्य