हरिणकृशकाख्यान : अत्यन्त शक्तिशाली शत्रु को केवल वाणी के बल पर कैसे वश में करें?
साम नीति की विजय
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ६ · अनुशासनपर्व → दानधर्मपर्व · अध्याय 124 · पृष्ठ 1050–1063
1,452 शब्द · 8 मिनटका पाठ · 13 श्लोक
भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा
धर्म और साम के श्रेष्ठता पर चर्चा के समय
युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह से पूछा— "भरतश्रेष्ठ! आपके मत में साम और दान में कौन-सा श्रेष्ठ है? इनमें जो उत्कृष्ट हो, उसे बताइये।"
साम्नि चापि प्रदाने च ज्यायः किं भवतो मतम् ।
प्रब्रूहि भरतश्रेष्ठ यदत्र व्यतिरिच्यते ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! आपके मतमें साम और दानमें कौन-सा श्रेष्ठ है? इनमें जो उत्कृष्ट हो, उसे बताइये ।
भीष्मजी ने उत्तर दिया— "बेटा! कोई मनुष्य साम से प्रसन्न होता है और कोई दान से। अतः पुरुष के स्वभाव को समझकर दोनों में से एक को अपनाना चाहिए। राजन्! अब तुम साम के गुणों को सुनो। साम के द्वारा मनुष्य भयानक से भयानक प्राणी को वश में कर सकता है।" इस विषय में उन्होंने एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया, जिसके अनुसार एक ब्राह्मण किसी जङ्गल में राक्षस के चङ्गुल में फँसकर भी साम नीति के द्वारा उससे मुक्त हो गया था।
साम्ना प्रसाद्यते कश्चिद् दानेन च तथा परः ।
पुरुषप्रकृतिं ज्ञात्वा तयोरेकतरं भजेत् ॥
भीष्मजीने कहा- बेटा! कोई मनुष्य सामसे प्रसन्न होता है और कोई दानसे । अतः पुरुषके स्वभावको समझकर दोनोंमेंसे एकको अपनाना चाहिये ।
एक बुद्धिमान एवं वाचाल ब्राह्मण एक निर्जन वन में घूम रहा था। तभी अचानक एक भयानक राक्षस ने उसे खाने की इच्छा से पकड़ लिया। बेचारा ब्राह्मण बड़े कष्ट में पड़ गया, किन्तु उसकी बुद्धि अच्छी थी और वह शास्त्रों का विद्वान भी था। उस अत्यन्त भयानक राक्षस को देखकर वह न तो घबराया और न ही व्यतिथित हुआ; बल्कि उसने उस राक्षस के प्रति साम नीति का ही प्रयोग किया।
स बुद्धिश्रुतिसम्पन्नस्तं दृष्ट्वातीव भीषणम् ।
सामैवास्मिन् प्रयुयुजे न मुमोह न विव्यथे ॥
ब्राह्मणकी बुद्धि तो अच्छी थी ही, वह शास्त्रोंका विद्वान् भी था । इसलिये उस अत्यन्त भयानक राक्षसको देखकर भी वह न तो घबराया और न व्यथित ही हुआ । बल्कि उसके प्रति उसने साम नीतिका ही प्रयोग किया ।
राक्षस ने ब्राह्मण के शान्तिमय वचनों की प्रशंसा की और उनके सामने अपना प्रश्न रखते हुए कहा— "यदि मेरे प्रश्न का उत्तर दे दोगे, तो तुम्हें छोड़ दूँगा! बताओ, मैं किस कारण से अत्यन्त दुर्बल और सफेद (पाण्डु) हो गया हूँ?"
यह सुनकर ब्राह्मण ने दो घड़ी तक विचार किया और फिर शान्त भाव से उस राक्षस के प्रश्न का उत्तर देना आरम्भ किया। ब्राह्मण बोला— "राक्षस! निश्चय ही तुम सुहृद्जनों से अलग होकर परदेश में दूसरे लोगों के साथ रहते हो और अनुपम विषयों का उपभोग करते हो; इसीलिए चिन्ता के कारण तुम दुबले एवं सफेद होते जा रहे हो। तुम्हारी साम नीति की विजय होगी, हे निशाचर! तुम्हारे मित्र तुम्हारे द्वारा भलीभाँति सम्मानित होने पर भी अपने स्वभाव दोष के कारण तुमसे विमुख रहते हैं; इसीलिए तुम चिन्तावश दुबले होकर सफेद पड़ते जा रहे हो।"
विदेशस्थो विलोकस्थो विना नूनं सुहृज्जनैः ।
विषयानतुलान् भुङ्क्षे तेनासि हरिणः कृशः ॥
ब्राह्मण बोला – राक्षस! निश्चय ही तुम सुहृद्जनोंसे अलग होकर परदेशमें दूसरे लोगोंके साथ रहते और अनुपम विषयोंका उपभोग करते हो; इसीलिये चिन्ताके कारण तुम दुबले एवं सफेद होते जा रहे हो ।
ब्राह्मण ने तर्क देते हुए आगे कहा— "जो गुणों में तुम्हारी अपेक्षा निम्न श्रेणी के हैं, वे जड़ मनुष्य भी धन और ऐश्वर्य में अधिक होने के कारण निश्चय ही सदा तुम्हारी अवहेलना किया करते हैं; इसीलिए तुम दुर्बल और सफेद होते जा रहे हो। तुम गुणवान्, विद्वान् एवं विनीत होने पर भी सम्मान नहीं पाते और गुणहीन तथा मूढ़ व्यक्तियों को सम्मानित होते देखते हो; इसीलिये तुम्हारे शरीर का रङ्ग फीका पड़ गया है और तुम दुर्बल हो गए हो। जीवन-निर्वाह का कोई उपाय न होने से तुम क्लेश उठाते होगे, किन्तु अपने गौरव के कारण जीविका के प्रतिग्रह आदि उपायों की निन्दा करते हुए उन्हें स्वीकार नहीं करते होगे; यही तुम्हारी उदासी और दुर्बलता का कारण है।"
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
गृहीत्वा रक्षसा मुक्तो द्विजातिः कानने यथा ॥
इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जिसके अनुसार कोई ब्राह्मण किसी जंगलमें किसी राक्षसके चंगुलमें फँसकर भी सामनीतिके द्वारा उससे मुक्त हो गया था ।
ब्राह्मण ने अपनी बात जारी रखी— "साधो! तुम सज्जनता के कारण अपने शरीर को कष्ट देकर भी जब किसी का उपकार करते हो, तब वह तुम्हें अपनी शक्ति से पराजित समझता है; इसीलिए तुम कृशकाय और सफेद होते जा रहे हो। जिनका चित्त काम और क्रोध से आक्रान्त है और जो कुमार्ग पर चलकर कष्ट भोग रहे हैं, सम्भवतः ऐसे ही लोगों के लिये तुम सदा चिन्तित रहते हो; इसलिये तुम दुर्बल होकर सफेद पड़ते जा रहे हो। यद्यपि तुम उत्तम बुद्धि के द्वारा सम्मान के योग्य हो, तो भी अज्ञानी पुरुष तुम्हारी हँसी उड़ाते हैं और दुराचारी मनुष्य तुम्हारा तिरस्कार करते हैं; इसी चिन्ता से तुम्हारा शरीर सूखकर पीला पड़ता जा रहा है।"
सम्पीड्यात्मानमार्यत्वात् त्वया कश्चिदुपस्कृतः ।
जितं त्वां मन्यते साधो तेनासि हरिणः कृशः ॥
साधो! तुम सज्जनताके कारण अपने शरीरको कष्ट देकर भी जब किसीका उपकार करते हो; तब वह तुम्हें अपनी शक्तिसे पराजित समझता है; इसीलिये तुम कृशकाय और सफेद होते जा रहे हो ।
"निश्चय ही कोई शत्रु मुँह से मित्रता की बातें करता हुआ आया, श्रेष्ठ पुरुष के समान बर्ताव करने लगा और तुम्हें ठगकर चला गया; इसलिये तुम दुर्बल और सफेद होते जा रहे हो। तुम्हारी अर्थगति-कार्यपद्धति सबको विदित है, तुम रहस्य की बातें समझाने में कुशल और विद्वान् हो, तो भी गुणज्ञ पुरुष तुम्हारा आदर नहीं करते हैं; इसी से तुम सफेद और दुर्बल हो रहे हो। तुम दुराग्रही दुष्ट पुरुषों के बीच में ही संशयरहित होकर उत्तम बात कहते हो, तो भी तुम्हारे गुण वहाँ प्रकाशित नहीं होते; इसलिये तुम दुर्बल होते और फीके पड़ते जा रहे हो।"
कश्चिद् वाग्बुद्धिसम्पन्नो ब्राह्मणो विजने वने ।
गृहीतः कृच्छ्रमापन्नो रक्षसा भक्षयिष्यता ॥
एक बुद्धिमान् एवं वाचाल ब्राह्मण किसी निर्जन वनमें घूम रहा था । उसी समय किसी राक्षसने आकर उसे खानेकी इच्छासे पकड़ लिया । बेचारा ब्राह्मण बड़े कष्टमें पड़ गया ।
ब्राह्मण ने सम्भावनाओं का क्रम बढ़ाते हुए कहा— "अथवा यह भी हो सकता है कि तुम धन, बुद्धि और विद्या से हीन होकर भी केवल शारीरिक शक्ति से सम्पन्न होकर ऊँचा पद चाहते रहे हो और इसमें तुम्हें सफलता न मिली हो; इसलिये तुम पाण्डु वर्ण के हो गये हो और तुम्हारा शरीर सूखता जा रहा है। मुझे यह भी जान पड़ता है कि तुम्हारा मन तपस्या में लगा है और इसलिये तुम जङ्गल में रहना चाहते हो, परन्तु तुम्हारे भाई-बन्धु इस बात को पसन्द नहीं करते हैं; इसलिये तुम सफेद और दुर्बल हो गये हो। वृत्तिर्वा दुर्जनापेक्षा तेनासि हरिणः कृशः ॥ बुढ़ापे के लिये तुम्हारे पास धन का सङ्ग्रह देखकर दूसरों ने तुम्हारी उस निजी सम्पत्ति का अपहरण कर लिया हो अथवा जीविका के लिये दुष्ट पुरुषों की अपेक्षा रखनी पड़ती हो; शायद इसी चिन्ता से तुम्हारा शरीर दुबला होता और पीला पड़ता जा रहा हो।"
धनबुद्धिश्रुतैर्हीनः केवलं तेजसान्वितः ।
महत् प्रार्थयसे नूनं तेनासि हरिणः कृशः ॥
अथवा यह भी हो सकता है कि तुम धन, बुद्धि और विद्यासे हीन होकर भी केवल शारीरिक शक्तिसे सम्पन्न होकर ऊँचा पद चाहते रहे हो और इसमें तुम्हें सफलता न मिली हो; इसीलिये तुम पाण्डुवर्णके हो गये हो और तुम्हारा शरीर भी सूखता जा रहा है ।
"इष्टभार्यस्य ते नूनं प्रातिवेश्यो महाधनः। युवा सुललितः कामी तेनासि हरिणः कृशः ॥ यह भी सम्भव है कि तुम्हारी स्त्री परम सुन्दरी होने के कारण तुम्हें बहुत प्रिय हो और तुम्हारे पड़ोस में ही कोई बहुत सुन्दर, महाधनी और कामी नवयुवक निवास करता हो! इसी चिन्ता से तुम दुबले और पीले पड़ते जा रहे हो। निश्चय ही तुम धनवानों के बीच परम उत्तम और समयोचित बात कहते होगे, किन्तु वह उन्हें पसन्द न आती होगी; इसलिये तुम सफेद और दुर्बल हो रहे हो। दृढपूर्वं श्रुतं मूर्ख कुपितं हृदयप्रियम्। अनुनेतुं न शक्नोषि तेनासि हरिणः कृशः ॥ तुम्हारा कोई पहले का दृढ़ निश्चय वाला प्रिय व्यक्ति मूर्खता के कारण तुम पर कुपित हो गया होगा और तुम उसे किसी तरह समझा-बुझाकर शान्त नहीं कर पाते होगे; इसलिये तुम दुर्बल और फीके पड़ते जा रहे हो।"
नूनं त्वां सुगुणैर्युक्तं पूजयानं सुहृद्ध्रुवम् ।
ममार्थ इति जानीते तेनासि हरिणः कृशः ॥
अवश्य ही तुम सद्गुणोंसे युक्त होनेके कारण दूसरे लोगोंद्वारा पूजित होते हो; परंतु तुम्हारा मित्र समझता है कि यह मेरे ही प्रभावसे आदर पा रहा है । इसीलिये तुम चिन्तासे दुर्बल एवं पीले होते जा रहे हो ।
"निश्चय ही कोई मनुष्य अपनी इच्छा के अनुसार किसी अभीष्ट कार्य में नियुक्त करके सदा अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है; इसलिये तुम श्वेत वर्ण के और दुबले हो रहे हो। अवश्य ही तुम सद्गुणों से युक्त होने के कारण दूसरे लोगों द्वारा पूजित होते हो; परन्तु तुम्हारा मित्र समझता है कि यह मेरे ही प्रभाव से आदर पा रहा है; इसलिये तुम चिन्ता से दुर्बल एवं पीले होते जा रहे हो। निश्चय ही तुम लज्जावश किसी पर अपना आन्तरिक अभिप्राय नहीं प्रकट करना चाहते, क्योंकि तुम्हें अपनी अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति के विषय में सन्देह है; इसलिये तुम सूखते और पीले पड़ते जा रहे हो।"
"संसार में नाना प्रकार की बुद्धि और भिन्न-भिन्न रुचि रखने वाले लोग रहते हैं। उन सबको तुम अपने गुणों से वश में करना चाहते हो; इसलिये क्षीणकाय और पाण्डु वर्ण के हो रहे हो। अथवा यह भी हो सकता है कि तुम विद्वान् न होकर भी विद्या से मिलने वाले यश को पाना चाहते हो। डरपोक और कायर होने पर भी पराक्रम जनित कीर्ति पाने की अभिलाषा रखते हो और अपने पास बहुत थोड़ा धन होने पर भी दानवीर होने का यश पाने के लिये उत्सुक हो; इसलिये तुम कृशकाय और पीले हो रहे हो। तुमने कोई कार्य किया, जिसका चिरकाल से अभिलषित फल तुम्हें प्राप्त होने वाला था, किन्तु तुम्हें वह प्राप्त हुआ नहीं और दूसरे लोग उसे हर ले गये; इसलिये तुम्हारी कान्ति फीकी पड़ गयी है।"
चिराभिलषितं किंचित्फलमप्राप्तमेव ते ।
कृतमन्यैरपहृतं तेनासि हरिणः कृशः ॥
तुमने कोई कार्य किया, जिसका चिरकालसे अभिलषित कोई फल तुम्हें प्राप्त होनेवाला था, किंतु तुम्हें तो वह प्राप्त हुआ नहीं और दूसरे लोग उसे हर ले गये । इसीलिये तुम्हारे शरीरकी कान्ति फीकी पड़ गयी है और दिनोंदिन दुबले होते जा रहे हो ।
"एक बात यह भी ध्यान में आती है कि तुम्हें तो अपना कोई दोष दिखाई नहीं देता तथापि दूसरे लोग अकारण ही तुम्हें कोसते रहते हैं; शायद इसलिये तुम कान्तिहीन और दुर्बल होते जा रहे हो। तुम विरक्त साधुओं को गृहस्थ, दुर्जनों को वनवासी तथा सन्न्यासियों को मठ-मन्दिर में आसक्त देखते हो; इसलिये सफेद और दुर्बल हो रहे हो। तुम्हारे स्नेही बन्धु-बान्धव रोग आदि से पीड़ित होकर महान दुःख भोगते हैं और तुम उन्हें उस पीड़ा जनित कष्ट से मुक्त नहीं कर पाते हो तथा अपने आपको भी अर्थ-लाभ से हीन पाते हो; शायद इसलिये तुम सफेद और दुबले-पतले हो गये हो। तुम्हारी बातें धर्म, अर्थ और काम के अनुकूल होती हैं, तो भी दूसरे लोग उन पर ठीक विश्वास नहीं करते हैं; इसलिये तुम कान्तिहीन और कृशकाय हो रहे हो।"
धर्म्यमर्थ्यं च काम्यं च काले चाभिहितं वचः ।
न प्रतीयन्ति ते नूनं तेनासि हरिणः कृशः ॥
तुम्हारी बातें धर्म, अर्थ और कामके अनुकूल एवं सामयिक होती हैं, तो भी दूसरे लोग उनपर ठीक विश्वास नहीं करते हैं । इसलिये तुम कान्तिहीन एवं कृशकाय हो रहे हो ।
"मनीषी होने पर भी तुम जीवन-निर्वाह की इच्छा से ही अज्ञानी पुरुषों के दिये हुए धन को लेकर उसी पर गुजारा करते हो; इसलिये तुम कान्तिहीन और दुर्बल हो। पापियों को आगे बढ़ते और कल्याणकारी कर्मों में लगे हुए पुण्यात्मा पुरुषों को दुःख उठाते देखकर अवश्य ही तुम सदा इस परिस्थितिकी निन्दा करते हो; इसलिये तुम दुर्बल और पाण्डु वर्ण के हो गये हो। एक दूसरे से विरोध रखने वाले अपने सुहृदों को रोककर तुम निश्चय ही उनका प्रिय करना चाहते हो; इसलिये तुम चिन्ता के कारण श्रीहीन और दुर्बल हो गये हो। वेदज्ञ ब्राह्मणों को वेदविरुद्ध कर्म में तत्पर और विद्वानों को इन्द्रियों के अधीन देखकर मेरी समझ में तुम निरन्तर चिन्तित रहते हो; सम्भवतः इसलिये तुम्हारा शरीर सफेद पड़ गया है और तुम दुर्बल हो गये हो।"
पापात् प्रवर्धतो दृष्ट्वा कल्याणानावसीदतः ।
ध्रुवं गर्हयसे नित्यं तेनासि हरिणः कृशः ॥
पापियोंको आगे बढ़ते और कल्याणकारी कर्मोंमें लगे हुए पुण्यात्मा पुरुषोंको दुःख उठाते देखकर अवश्य ही तुम सदा इस परिस्थितिकी निन्दा करते हो; इसीलिये दुर्बल और पाण्डुवर्णके हो गये हो ।
ऐसा कहकर जब उस ब्राह्मण ने राक्षस का समादर किया, तब राक्षस ने भी ब्राह्मण का विशेष सत्कार किया। उसने ब्राह्मण को अपना मित्र बना लिया और उसे धन देकर मुक्त कर दिया।
एवं सम्पूजितं रक्षो विप्रं तं प्रत्यपूजयत् ।
सखायमकरोच्चैनं संयोज्यार्थैर्मुमोच ह ॥
ऐसा कहकर जब उस ब्राह्मणने राक्षसका समादर किया, तब राक्षसने भी ब्राह्मणका विशेष सत्कार किया । उसने ब्राह्मणको अपना मित्र बना लिया और उसे धन देकर छोड़ दिया ।
In English
The Brahmin and the Rakshasa
Bhishma explains the power of persuasive speech to Yudhishthira using a story about a learned Brahmin. While wandering in a forest, the Brahmin is captured by a rakshasa who asks why he has become weak and pale. The Brahmin provides many possible reasons for the creature's condition, which impresses the rakshasa and leads him to release the man.
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