नकुलाख्यान : क्या केवल भव्य यज्ञ ही स्वर्ग प्राप्ति का मार्ग है?
श्रद्धापूर्ण दान की महिमा
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड ६ · पर्व → अनुगीतापर्व · अध्याय 90 · पृष्ठ 2036–2055
2,437 शब्द · 13 मिनटका पाठ · 22 श्लोक
वैशम्पायन ने जनमेजय से कहा
अश्वमेध यज्ञ के उपरान्त हुई अद्भुत घटना सुनाने हेतु
जनमेजय ने पूछा—"ब्रह्मन्! मेरे प्रपितामह बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिर के यज्ञ में यदि कोई आश्चर्यजनक घटना हुई हो, तो आप उसे बताने की कृपा करें।"
सक्तूनिमान् प्रगृह्य त्वं देहि विप्राय सत्तम ।
इत्येव सुकृतं मन्ये तस्मादेतत् करोम्यहम् ॥
तब उनके पुत्रने कहा- सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ पिताजी! आप मेरे हिस्सेका यह सत्तू लेकर ब्राह्मणको दे दीजिये । मैं इसीमें पुण्य मानता हूँ, इसलिये ऐसा कर रहा हूँ ।
वैशम्पायन जी ने कहा—"नृपश्रेष्ठ! प्रभो! युधिष्ठिर का वह महान् अश्वमेध-यज्ञ जब पूरा हुआ, उसी समय एक बड़ी उत्तम किन्तु महान् आश्चर्य में डालने वाली घटना घटित हुई। मैं उसे बतलाता हूँ; सुनो भरतश्रेष्ठ!"
श्रूयतां राजशार्दूल महदाश्चर्यमुत्तमम् ।
अश्वमेधे महायज्ञे निवृत्ते यदभूत् प्रभो ॥
वैशम्पायनजीने कहा - नृपश्रेष्ठ! प्रभो! युधिष्ठिरका वह महान् अश्वमेध- यज्ञ जब पूरा हुआ, उसी समय एक बड़ी उत्तम किंतु महान् आश्चर्यमें डालनेवाली घटना घटित हुई, उसे बतलाता हूँ; सुनो ।
उस यज्ञ में श्रेष्ठ ब्राह्मणों, जातिवालों, सम्बन्धियों, बन्धु-बान्धवों, अन्धों तथा दीन-दरिद्रों के तृप्त हो जाने पर जब युधिष्ठिर के महान् दान का चारों ओर शोर हो गया और धर्मराज के मस्तक पर फूलों की वर्षा होने लगी, उसी समय वहाँ एक नेवला आया। अनघ! उसकी आँखें नीली थीं और उसके शरीर के एक ओर का भाग सोने का था। पृथ्वीनाथ! उसने आते ही एक बार वज्र के समान भयङ्कर गर्जना की। उस बिलनिवासी धृष्ट एवं महान् नेवले ने वैसी गर्जना करके समस्त मृगों और पक्षियों को भयभीत कर दिया और फिर मनुष्य की भाषा में कहा—"राजाओं! तुम्हारा यह यज्ञ कुरुक्षेत्र निवासी एक उञ्छवृत्तिधारी उदार ब्राह्मण के सेरभर सत्तू दान के बराबर भी नहीं हुआ है।"
सक्तुप्रस्थेन वो नायं यज्ञस्तुल्यो नराधिपाः ।
उञ्छवृत्तेर्वदान्यस्य कुरुक्षेत्रनिवासिनः ॥
' राजाओ! तुम्हारा यह यज्ञ कुरुक्षेत्रनिवासी एक उञ्छवृत्तिधारी उदार ब्राह्मणके सेरभर सत्तू दान करनेके बराबर भी नहीं हुआ है '
नेवले की वह बात सुनकर समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मणों को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे सब ब्राह्मण उस नेवले के पास जाकर उसे चारों ओर से घेरकर पूछने लगे—"नकुल! इस यज्ञ में तो साधु पुरुषों का ही समागम हुआ है, तुम कहाँ से आ गये? तुममें कौन-सा बल और कितना शास्त्रज्ञान है? तुम किसके सहारे रहते हो? हमें किस तरह तुम्हारा परिचय प्राप्त होगा? तुम कौन हो, जो हमारे इस यज्ञ की निन्दा करते हो? हमने नाना प्रकार की यज्ञ-सामग्री एकत्रित करके शास्त्रीय विधिकी अवहेलना न करते हुए इस यज्ञ को पूर्ण किया है। इसमें शास्त्रसङ्गत और न्याययुक्त प्रत्येक कर्तव्य-कर्म का यथोचित पालन किया गया है। इसमें शास्त्रीय दृष्टि से पूजनीय पुरुषों की विधिवत् पूजा की गयी है। अग्नि में मन्त्र पढ़कर आहुति दी गयी है और देने योग्य वस्तुओं का ईर्ष्यारहित होकर दान किया गया है। यहाँ नाना प्रकार के दानों से ब्राह्मणों को, उत्तम युद्ध के द्वारा क्षत्रियों को, श्राद्ध के द्वारा पितामहों को, रक्षा के द्वारा वैश्यों को, सम्पूर्ण कामनाओं की पूर्ति करके उत्तम स्त्रियों को, दया से शूद्रों को, दान से बची हुई वस्तुएँ देकर अन्य मनुष्यों को तथा राजा के शुद्ध बर्ताव से ज्ञाति एवं सम्बन्धियों को सन्तुष्ट किया गया है। इसी प्रकार पवित्र हविष्य के द्वारा देवताओं को और रक्षा का भार लेकर शरणागतों को प्रसन्न किया गया है। यह सब होने पर भी तुमने क्या देखा या सुना है, जिससे इस यज्ञ पर आक्षेप करते हो? इन ब्राह्मणों के निकट इनके इच्छानुसार पूछे जाने पर तुम सच-सच बताओ; क्योंकि तुम्हारी बातें विश्वास के योग्य जान पड़ती हैं। तुम स्वयं भी बुद्धिमान दिखाई देते हो और दिव्यरूप धारण किये हुए हो। इस समय तुम्हारा ब्राह्मणों के साथ समागम हुआ है, इसलिये तुम्हें हमारे प्रश्न का उत्तर अवश्य देना चाहिये।"
यदत्र तथ्यं तद् ब्रूहि सत्यं सत्यं द्विजातिषु ।
यथाश्रुतं यथादृष्टं पृष्टो ब्राह्मणकाम्यया ॥
श्रद्धेयवाक्यः प्राज्ञस्त्वं दिव्यं रूपं बिभर्षि च ।
समागतश्च विप्रैस्त्वं तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥
' यह सब होनेपर भी तुमने क्या देखा या सुना है, जिससे इस यज्ञपर आक्षेप करते हो? इन ब्राह्मणोंके निकट इनके इच्छानुसार पूछे जानेपर तुम सच- सच बताओ; क्योंकि तुम्हारी बातें विश्वासके योग्य जान पड़ती हैं । तुम स्वयं भी बुद्धिमान् दिखायी देते और दिव्यरूप धारण किये हुए हो । इस समय तुम्हारा ब्राह्मणोंके साथ समागम हुआ है, इसलिये तुम्हें हमारे प्रश्नका उत्तर अवश्य देना चाहिये '
उन ब्राह्मणों के इस प्रकार पूछने पर नेवले ने हँसकर कहा—"विप्रवृन्द! मैंने आप लोगों से मिथ्या अथवा घमण्ड में आकर कोई बात नहीं कही है। मैंने जो कहा है कि 'द्विजवरो! आप लोगों का यह यज्ञ उञ्छवृत्ति वाले ब्राह्मणों के द्वारा किये हुए सेरभर सत्तू दान के बराबर भी नहीं है', इसे आपने ठीक-ठीक सुना है। श्रेष्ठ ब्राह्मणों! इसका कारण अवश्य आप लोगों को बताने योग्य है। अब मैं यथार्थ रूप से जो कुछ कहता हूँ, उसे आप लोग शान्तचित्त होकर सुनें। कुरुक्षेत्र निवासी उञ्छवृत्तिधारी दानी ब्राह्मण के सम्बन्ध में मैंने जो कुछ देखा और अनुभव किया है, वह बड़ा ही उत्तम एवं अद्भुत है। ब्राह्मणों! उस दान के प्रभाव से पत्नी, पुत्र और पुत्रवधू सहित उन द्विजश्रेष्ठ ने जिस प्रकार स्वर्गलोक पर अधिकार पा लिया और वहाँ उन्होंने मेरा यह आधा शरीर सुवर्णमय कर दिया, वह प्रसङ्ग बता रहा हूँ।"
इत्यवश्यं मयैतद् वो वक्तव्यं द्विजसत्तमाः ।
शृणुताव्यग्रमनसः शंसतो मे यथातथम् ॥
‘ श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इसका कारण अवश्य आपलोगोंको बताने योग्य है। अब मैं यथार्थरूपसे जो कुछ कहता हूँ, उसे आप लोग शान्तचित्त होकर सुनें ।
नकुल बोला—"ब्राह्मणों! कुरुक्षेत्र निवासी द्विज के द्वारा दिये गये न्यायोपार्जित थोड़े-से अन्न के दान का जो उत्तम फल देखने में आया है, उसे मैं आप लोगों को बतलाता हूँ। कुछ दिनों पहले की बात है, धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में, जहाँ बहुत से धर्मज्ञ महात्मा रहा करते थे, कोई ब्राह्मण रहते थे। वे उञ्छवृत्ति से अपना जीवन-निर्वाह करते थे। कबूतर के समान अन्न का दाना चुनकर लाते और उसी से कुटुम्ब का पालन करते थे। वे अपनी स्त्री, पुत्र और पुत्रवधू के साथ रहकर तपस्या में संलग्न थे। ब्राह्मण देवता शुद्ध आचार-विचार से रहने वाले धर्मात्मा और जितेन्द्रिय थे। वे उत्तम व्रतधारी द्विज सदा छठे काल में अर्थात् तीन-तीन दिन पर ही स्त्री-पुत्र आदि के साथ भोजन किया करते थे। यदि किसी दिन उस समय भोजन न मिला, तो दूसरा छठा काल आने पर ही वे द्विजश्रेष्ठ अन्न ग्रहण करते थे।
हन्त वो वर्तयिष्यामि दानस्य फलमुत्तमम् ।
न्यायलब्धस्य सूक्ष्मस्य विप्रदत्तस्य यद् द्विजाः ॥
नकुल बोला -ब्राह्मणो! कुरुक्षेत्रनिवासी द्विजके द्वारा दिये गये न्यायोपार्जित थोड़े - से अन्नके दानका जो उत्तम फल देखनेमें आया है, उसे मैं आपलोगोंको बतलाता हूँ ।
ब्राह्मणों! सुनो। एक समय वहाँ बड़ा भयङ्कर अकाल पड़ा। उन दिनों उन धर्मात्मा ब्राह्मण के पास अन्न का सङ्ग्रह तो था नहीं, खेतों का अन्न भी सूख गया था; अतः वे सर्वथा निर्धन हो गये थे। सब बारम्बार छठा काल आता, किन्तु उन्हें भोजन नहीं मिलता था; अतः वे सब के-भूखे ही रह जाते थे। एक दिन ज्येष्ठ शुक्लपक्ष में दोपहरी के समय उस परिवार के सब लोग उञ्छ लाने के लिये चले। वे तपस्या में लगे हुए वे ब्राह्मण देवता गर्मी और भूख दोनों से कष्ट पा रहे थे। भूख और परिश्रम से पीड़ित होने पर भी वे उञ्छ न पा सके; उन्हें अन्न का एक दाना भी नहीं मिला। अतः परिवार के सभी लोगों के साथ उसी तरह भूख से पीड़ित रहकर ही उन्होंने वह समय काटा। वे श्रेष्ठ ब्राह्मण बड़े कष्ट से अपने प्राणों की रक्षा करते थे।
उष्णार्तश्च क्षुधार्तश्च विप्रस्तपसि संस्थितः ॥
उञ्छमप्राप्तवानेव ब्राह्मणः क्षुच्छ्रमान्वितः ।
स तथैव क्षुधाविष्टः सार्धं परिजनेन ह ॥
क्षपयामास तं कालं कृच्छ्रप्राणो द्विजोत्तमः । तपस्यामें लगे हुए वे ब्राह्मणदेवता गर्मी और भूख दोनोंसे कष्ट पा रहे थे । भूख और परिश्रमसे पीड़ित होनेपर भी वे उञ्छ न पा सके । उन्हें अन्नका एक दाना भी नहीं मिला; अतः परिवारके सभी लोगोंके साथ उसी तरह भूखसे पीड़ित रहकर ही उन्होंने वह समय काटा । वे श्रेष्ठ ब्राह्मण बड़े कष्टसे अपने प्राणोंकी रक्षा करते थे ।
तदनन्तर एक दिन पुनः छठा काल आने तक उन्होंने सेरभर जौ का उपार्जन किया। उन तपस्वी ब्राह्मणों ने उस जौ का सत्तू तैयार किया और जप तथा नैत्यिक नियम पूर्ण करके अग्नि में विधिपूर्वक आहुति देने के पश्चात् वे सब लोग एक-एक कुडव अर्थात् एक-एक पाव सत्तू बाँटकर खाने के लिये उद्यत हुए। वे भोजन के लिये अभी बैठे ही थे कि कोई ब्राह्मण अतिथि उनके यहाँ आ पहुँचा। उस अतिथि को आया देख वे मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए। उस अतिथि को प्रणाम करके उन्होंने उससे कुशल-मङ्गल पूछा। वह ब्राह्मण परिवार के सब लोग विशुद्धचित्त, जितेन्द्रिय, श्रद्धालु, मन को वश में रखने वाले, दोषदृष्टि से रहित, क्रोधहीन, सज्जन, ईर्ष्यारहित और धर्मज्ञ थे। उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने अभिमान, मद और क्रोध को सर्वथा त्याग दिया था। क्षुधा से कष्ट पाते हुए उस अतिथि ब्राह्मण को अपने ब्रह्मचर्य और गोत्र का परस्पर परिचय देते हुए वे कुटी में ले गये।
विशुद्धमनसो दान्ताः श्रद्धादमसमन्विताः ।
अनसूयवो विक्रोधाः साधवो वीतमत्सराः ॥
त्यक्तमानमदक्रोधा धर्मज्ञा द्विजसत्तमाः ।
स ब्रह्मचर्यं गोत्रं ते तस्य ख्यात्वा परस्परम् ॥
कुटीं प्रवेशयामासुः क्षुधार्तमतिथिं तदा । ब्राह्मण - परिवारके सब लोग विशुद्धचित्त, जितेन्द्रिय, श्रद्धालु, मनको वशमें रखनेवाले, दोषदृष्टिसे रहित, क्रोधहीन, सज्जन, ईर्ष्यारहित और धर्मज्ञ थे । उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने अभिमान, मद और क्रोधको सर्वथा त्याग दिया था । क्षुधासे कष्ट पाते हुए उस अतिथि ब्राह्मणको अपने ब्रह्मचर्य और गोत्रका परस्पर परिचय देते हुए वे कुटीमें ले गये ।
तत्पश्चात् वहाँ उञ्छवृत्ति वाले ब्राह्मण ने कहा—'भगवन्! अनघ! आपके लिये ये अर्घ्य, पाद्य और आसन मौजूद हैं तथा न्यायपूर्वक उपार्जित किये हुए ये परम पवित्र सत्तू आपकी सेवा में प्रस्तुत हैं। द्विजश्रेष्ठ! मैंने प्रसन्नतापूर्वक इन्हें आपको अर्पण किया है। आप स्वीकार करें।' राजेन्द्र! ब्राह्मण के ऐसा कहने पर अतिथिने एक पाव सत्तू लेकर खा लिया; परन्तु उतने से वह तृप्त नहीं हुआ।"
इत्युक्तः प्रतिगृह्याथ सक्तूनां कुडवं द्विजः ।
भक्षयामास राजेन्द्र न च तुष्टिं जगाम सः ॥
राजेन्द्र! ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर अतिथिने एक पाव सत्तू लेकर खा लिया; परंतु उतनेसे वह तृप्त नहीं हुआ ।
राजेन्द्र! ब्राह्मण के ऐसे कहने पर अतिथिने एक पाव सत्तू लेकर खा लिया; परन्तु उतने से वह तृप्त नहीं हुआ। यह देखकर उन उञ्छवृत्तिवाले द्विजने चिन्तन किया कि यह ब्राह्मण अतिथि कैसे सन्तुष्ट होगा? उनके मन में आहार का विचार चलने लगा।
तस्य भार्याब्रवीद् वाक्यं मद्भागो दीयतामिति ।
गच्छत्वेष यथाकामं परितुष्टो द्विजोत्तमः ॥
तब ब्राह्मणकी पत्नीने कहा - ' नाथ! यह मेरा भाग इन्हें दे दीजिये, जिससे ये ब्राह्मणदेवता इच्छानुसार तृप्तिलाभ करके यहाँसे पधारें'
तभी उनकी पत्नी ने आगे आकर कहा, 'नाथ! यह मेरा भाग इन्हें दे दीजिये, जिससे ये ब्राह्मणदेवता इच्छानुसार तृप्तिलाभ करके यहाँ से पधारें।' अपनी पतिव्रता पत्नी के इन वचनों को सुनकर उन द्विजश्रेष्ठ ने उसे रोक दिया। उन्होंने देखा कि उनकी पत्नी स्वयं भी क्षुधा से कष्ट पा रही है, थकी हुई है और अत्यन्त दुर्बल हो गई है; उसका शरीर तो अब केवल चमड़े से ढकी हड्डियों का ढाँचा मात्र रह गया है और वह काँप रही है। उसकी इस अवस्था पर दृष्टि डालकर ब्राह्मण ने कहा— 'शोभने! अपनी स्त्री की रक्षा और पालन-पोषण करना तो कीट-पतङ्गों और पशुओं का भी कर्तव्य है; अतः तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए। जो पुरुष होकर भी स्त्री का पालन-पोषण करता है, वह दया का पात्र है। धर्म, काम, अर्थ, सेवा और वंश-परम्परा— ये सब तो स्त्री के ही अधीन हैं। जो पुरुष स्त्री की रक्षा करने में असमर्थ है, वह संसार में महान अपयश पाता है और परलोक में नरक को प्राप्त होता है।'
प्रपतेद् यशसो दीप्तात् स च लोकान् न चाप्नुयात् ।
धर्मकामार्थकार्याणि शुश्रूषा कुलसंततिः ॥
दारेष्वधीनो धर्मश्च पितॄणामात्मनस्तथा । ‘ वह उज्ज्वल कीर्तिसे भ्रष्ट हो जाता है और उसे उत्तम लोकोंकी प्राप्ति नहीं होती । धर्म, काम और अर्थ - सम्बन्धी कार्य, सेवा- शुश्रूषा तथा वंशपरम्पराकी रक्षा – ये सब स्त्रीके ही अधीन हैं । पितरोंका तथा अपना धर्म भी पत्नीके ही आश्रित है ।
ब्राह्मण ने आगे कहा, 'सत्तू का यह भाग ले लो और मुझ पर प्रसन्न हो जाओ।' तब ब्राह्मणी ने अत्यन्त करुणा के साथ कहा, 'ब्रह्मन्! हम दोनों के धर्म और अर्थ समान हैं, अतः आप मुझ पर प्रसन्न हों और मेरे हिस्से का यह पावभर सत्तू लेकर अतिथि को दे दें। स्त्रियों का सत्य, धर्म, स्वर्ग और उनकी सारी अभिलाषाएं तो पति के ही अधीन हैं। माता का रज और पिता का वीर्य मिलकर ही वंश चलाते हैं; स्त्री के लिए तो पति ही सबसे बड़ा देवता है। आप मेरा भरण-पोषण करते हैं और मुझे पुत्र प्रदान करने वाले वरदाता हैं, इसलिए मेरे हिस्से का यह सत्तू अतिथि को अर्पण कर दीजिए। आप भी तो उपवास से थके हुए और क्षीणकाय हो रहे हैं, मैं आपके कष्ट सह लूँगी।'
पालनाद्धि पतिस्त्वं मे भर्तासि भरणाच्च मे ॥
पुत्रप्रदानाद् वरदस्तस्मात् सक्तून् प्रयच्छ मे । आप पालन करनेके कारण मेरे पति, भरण- पोषण करनेसे भर्ता और पुत्र प्रदान करनेके कारण वरदाता हैं, इसलिये मेरे हिस्सेका सत्तू अतिथिदेवताको अर्पण कीजिये ।
पत्नी के ऐसा कहने पर ब्राह्मण ने सत्तू लिया और अतिथि से कहा— 'साधु पुरुषों में श्रेष्ठ ब्राह्मण! आप यह सत्तू पुनः ग्रहण कीजिये।' अतिथि ने वह सत्तू खाया, किन्तु उसका पेट नहीं भरा। यह देखकर उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मण को बड़ी चिन्ता हुई। तभी उनके पुत्र ने आगे आकर कहा, 'सत्पुरुषों में श्रेष्ठ पिताजी! आप मेरे हिस्से का यह सत्तू लेकर ब्राह्मण को दे दीजिये। मैं इसी में पुण्य मानता हूँ और यही मेरा कर्तव्य है कि मैं अपने वृद्ध पिता का पालन-पोषण करूँ; यह तो तीनों लोकों में प्रसिद्ध सनातन श्रुति है।'
तमुञ्छवृत्तिरालक्ष्य ततश्चिन्तापरोऽभवत् ॥
अतिथि ब्राह्मण उस सत्तूको भी लेकर खा गया; किंतु संतुष्ट नहीं हुआ । यह देखकर उञ्छवृत्तिवाले ब्राह्मणको बड़ी चिन्ता हुई ।
पिता ने उसे समझाते हुए कहा, 'बेटा! तुम हजार वर्ष के हो जाओ तब भी हमारे लिए बालक ही रहोगे। मैं बूढ़ा हूँ और भूखा रहकर भी प्राण धारण कर सकता हूँ; तुम सत्तू खाकर बलवान बनो। मैं तो दीर्घकाल से तपस्या कर रहा हूँ, इसलिए मुझे मरने का भय नहीं है।' पुत्र ने उत्तर दिया, 'तात! पुरुष की रक्षा करने के कारण ही सन्तान को पुत्र कहा गया है। पुत्र तो पिता की आत्मा होता है, अतः आप अपने इस आत्मभूत पुत्र के द्वारा अपनी रक्षा कीजिये।' ब्राह्मण ने मुस्कुराकर कहा, 'बेटा! तुम्हारे शील और संयम की मैंने अनेक बार परीक्षा ली है, अतः मैं तुम्हारा सत्तू लेता हूँ।' ऐसा कहकर उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक वह सत्तू अतिथि को परोस दिया।
प्राणधारणमात्रेण शक्यं कर्तुं तपस्त्वया ।
प्राणो हि परमो धर्मः स्थितो देहेषु देहिनाम् ॥
प्राणधारणमात्रसे आप तप कर सकते हैं । देहधारियोंके शरीरोंमें स्थित हुआ प्राण ही परम धर्म है ।
परन्तु वह सत्तू खाकर भी ब्राह्मण देवता का पेट नहीं भरा। यह देखकर वे धर्मात्मा ब्राह्मण बड़े सङ्कोच में पड़ गए। तभी उनकी पुत्रवधू, जो बड़ी सुशीला थी, अत्यन्त प्रसन्नता के साथ अपने श्वशुर के पास आई और बोली— 'विप्रवर! आपकी सन्तान से ही मुझे सन्तान प्राप्त होगी, अतः आप मेरे परम पूज्य हैं। मेरे हिस्से का यह सत्तू लेकर आप अतिथि को अर्पित कीजिये। पुत्रों के माध्यम से ही मनुष्य अक्षय स्वर्ग प्राप्त करता है। आप प्रतिदिन कठिन व्रत और तपस्या करते हैं, आज मैं भूखी हूँ तो आप मेरा सत्तू कैसे ले सकते हैं? मुझे आपकी सेवा के लिए ही यह शरीर और प्राण प्राप्त हुए हैं।'
इत्युक्त्वाऽऽदाय तान् सक्तून् प्रीतात्मा द्विजसत्तमः ।
प्रहसन्निव विप्राय स तस्मै प्रददौ तदा ॥
यों कहकर श्रेष्ठ ब्राह्मणने प्रसन्नतापूर्वक वह सत्तू ले लिया और हँसते हुए- से उस ब्राह्मण अतिथिको परोस दिया ।
श्वशुर ने कहा— 'बेटी! हवा और धूप से तुम्हारा शरीर सूख गया है, तुम्हारी कान्ति फीकी पड़ गई है। तुम इतनी दुर्बल हो कि मैं तुम्हारा हिस्सा लेकर धर्म की हानि नहीं कर सकता। तुम तो सदा गुरुजनों की सेवा में लीन रहती हो, मैं तुम्हें पुण्य से वञ्चित नहीं होने दूँगा।' ऐसा कहकर ब्राह्मण ने उसकी भी सहायता ली और उसका सत्तू भी अतिथि को दे दिया। इस दान से वह ब्राह्मण अतिथि अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ। वास्तव में, उस श्रेष्ठ द्विज के रूप में साक्षात् धर्म ही वहाँ उपस्थित थे। वे प्रवचन कुशल धर्म सन्तुष्ट होकर बोले— 'द्विजश्रेष्ठ! तुमने अपनी शक्ति के अनुसार न्यायपूर्वक अर्जित शुद्ध अन्न का जो दान दिया है, उससे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। स्वर्ग में रहने वाले देवता भी तुम्हारे इस दान की घोषणा कर रहे हैं।'
कर्षितों सुव्रताचारे क्षुधाविह्वलचेतसम् ॥
कथं सक्तून् ग्रहीष्यामि भूत्वा धर्मोपघातकः ।
कल्याणवृत्ते कल्याणि नैवं त्वं वक्तुमर्हसि ॥
श्वशुरने कहा — बेटी! हवा और धूपके मारे तुम्हारा सारा शरीर सूख रहा है —शिथिल होता जा रहा है । तुम्हारी कान्ति फीकी पड़ गयी है । उत्तम व्रत और आचारका पालन करनेवाली पुत्री! तुम बहुत दुर्बल हो गयी हो । क्षुधाके कष्टसे तुम्हारा चित्त अत्यन्त व्याकुल है । तुम्हें ऐसी अवस्थामें देखकर भी तुम्हारे हिस्सेका सत्तू कैसे ले लूँ । ऐसा करनेसे तो मैं धर्मकी हानि करनेवाला हो जाऊँगा । अतः कल्याणमय आचरण करनेवाली कल्याणि! तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ।
आकाश से भूतल पर पुष्पवृष्टि होने लगी। देवर्षि, गन्धर्व और देवताओं के अग्रणी पुरुष विस्मित होकर खड़े थे। वे उस ब्राह्मण के दान की स्तुति करते हुए कहने लगे— 'द्विजश्रेष्ठ! ब्रह्मलोक में विमानों में विचरने वाले ब्रह्मर्षि भी तुम्हारे दर्शन की इच्छा रखते हैं। तुम स्वर्गलोक जाओ, क्योंकि तुमने अपने पितरों का उद्धार कर दिया है और भविष्य की अनेक पीढ़ियाँ तुम्हारे पुण्य प्रताप से तर जाएँगी। अपने ब्रह्मचर्य, दान, यज्ञ और तपस्या के प्रभाव से तुम स्वर्गलोक को प्राप्त करो।'
पितृलोकगताः सर्वे तारिताः पितरस्त्वया ॥
अनागताश्च बहवः सुबहूनि युगान्युत । ' तुमने पितृलोकमें गये हुए अपने समस्त पितरोंका उद्धार कर दिया। अनेक युगोंतक भविष्यमें होनेवाली जो संतानें हैं, वे भी तुम्हारे पुण्य- प्रतापसे तर जायँगी '
देवता उस ब्राह्मण के उत्तम व्रत और श्रद्धा से अत्यन्त प्रसन्न थे। उन्होंने कहा— 'इस प्राण-सङ्कट के समय भी तुमने शुद्ध हृदय से सत्तू का यह दान दिया है; इस पुण्यकर्म ने तुम्हें स्वर्ग पर विजय दिला दी है।' वास्तव में, भूख मनुष्य की बुद्धि और धार्मिक विचारों को नष्ट कर देती है, वह धैर्य खो देता है; किन्तु जो भूख को जीत लेता है, वही स्वर्ग प्राप्त करता है। जब दान की रुचि जाग्रत होती है, तब धर्म का ह्रास नहीं होता। उस ब्राह्मण ने पत्नी के प्रेम और पुत्र के स्नेह पर दृष्टि न डालकर केवल धर्म को ही श्रेष्ठ माना।
ब्रह्मचर्येण दानेन यज्ञेन तपसा तथा ॥
असंकरेण धर्मेण तस्माद् गच्छ दिवं द्विज । ‘ अतः ब्रह्मन्! तुम अपने ब्रह्मचर्य, दान, यज्ञ, तप तथा संकरतारहित धर्मके प्रभावसे स्वर्गलोकमें चलो ।
स्वर्ग का द्वार अत्यन्त सूक्ष्म है, जिसकी अगरा लोभ रूपी बीज से बनी है। उसे केवल वे तपस्वी ब्राह्मण देख पाते हैं जो क्रोध और इन्द्रियों को जीत चुके हैं। दान में श्रद्धा का महत्त्व काल से भी बड़ा है। राजा रन्तिदेव ने भी सङ्कट के समय शुद्ध हृदय से जल का दान कर स्वर्ग प्राप्त किया था। अन्यायपूर्वक प्राप्त धन से किए गए बड़े दान की अपेक्षा, न्यायोपार्जित थोड़े से अन्न का श्रद्धापूर्वक दान धर्म को अधिक प्रसन्न करता है। जैसे उशीनर के पुत्र राजा शिबि ने अपने शरीर का मांस देकर स्वर्ग पाया, वैसे ही साधु पुरुष अपनी शक्ति अनुसार पुण्य अर्जन कर लेते हैं।
सर्वमेतद्धि यस्मात् ते दत्तं शुद्धेन चेतसा ॥
कृच्छ्रकाले ततः स्वर्गो विजितः कर्मणा त्वया । ‘ इस प्राण- संकटके समय भी यह सब सत्तू तुमने शुद्ध हृदयसे दान किया है; इसलिये तुमने उस पुण्यकर्मके प्रभावसे स्वर्गलोकपर विजय प्राप्त कर ली है ।
देवता बोले— 'तुम इस दिव्य विमान पर अपने परिवार सहित चढ़ो।' धर्म स्वयं प्रकट हुआ और कहा— 'तुमने अपने शरीर का उद्धार कर लिया है, अब तुम पत्नी, पुत्र और पुत्रवधू के साथ स्वर्गलोक जाओ।' धर्म के ये वचन सुनकर वह उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मण अपने परिवार सहित उस विमान पर आरूढ़ होकर स्वर्गलोक चला गया।
कालः परतरो दानाच्छ्रद्धा चैव ततः परा ।
स्वर्गद्वारं सुसूक्ष्मं हि नरैर्मोहान्न दृश्यते ॥
‘ मनुष्यके लिये सबसे पहले न्यायपूर्वक धनकी प्राप्तिका उपाय जानना ही सूक्ष्म विषय है । उस धनको सत्पात्रकी सेवामें अर्पण करना उससे भी श्रेष्ठ है । साधारण समयमें दान देनेकी अपेक्षा उत्तम समयपर दान देना और भी अच्छा है; किंतु श्रद्धाका महत्त्व कालसे भी बढ़कर है । स्वर्गका दरवाजा अत्यन्त सूक्ष्म है । मनुष्य मोहवश उसे देख नहीं पाते हैं ।
जब वे सब स्वर्ग चले गए, तब मैं अपने बिल से बाहर निकला। वहाँ सत्तू की गन्ध थी, गिरे हुए जल की कीचड़ थी और दिव्य पुष्प बिखरे थे। उस महात्मा ब्राह्मण के दान करते समय गिरे अन्न के कणों और उसकी तपस्या के प्रभाव से मेरा आधा शरीर सुवर्णमय हो गया था। मैं सोचने लगा कि क्या मेरा दूसरा भाग भी स्वर्ण का हो सकता है? इसी आशा में मैं अनेक तपोवनों और यज्ञस्थलों में गया, किन्तु कहीं भी ऐसा नहीं हुआ।
गोप्रदानसहस्राणि द्विजेभ्योऽदान्नृगो नृपः ॥
एकां दत्त्वा स पारक्यां नरकं समपद्यत । ' राजा नृगने ब्राह्मणोंको हजारों गौएँ दान की थीं; किंतु एक ही गौ दूसरेकी दान कर दी, जिससे अन्यायतः प्राप्त द्रव्यका दान करनेके कारण उन्हें नरकमें जाना पड़ा ।
तभी मैंने इस महान यज्ञ का शोर सुना और यहाँ आया। मैंने हँसकर कहा— 'यह यज्ञ उस ब्राह्मण द्वारा दिए गए सेरभर सत्तू के बराबर भी नहीं है।' उस समय सेरभर सत्तू के कुछ कणों ने मेरा आधा शरीर सोने का कर दिया था, किन्तु यह विशाल यज्ञ भी मुझे वैसा न बना सका। इतना कहकर मैं वहाँ से गायब हो गया और वे ब्राह्मण अपने घर चले गए।
ततस्तु सक्तुगन्धेन क्लेदेन सलिलस्य च ॥
दिव्यपुष्पविमर्दाश्च साधोर्दानलवैश्च तैः ।
विप्रस्य तपसा तस्य शिरो मे काञ्चनीकृतम् ॥
तदनन्तर सत्तूकी गन्ध सूँघने, वहाँ गिरे हुए जलकी कीचसे सम्पर्क होने, वहाँ गिरे हुए दिव्य पुष्पोंको रौंदने और उन महात्मा ब्राह्मणके दान करते समय गिरे हुए अन्नके कणोंमें मन लगानेसे तथा उन उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणकी तपस्याके प्रभावसे मेरा मस्तक सोनेका हो गया ।
वैशम्पायन बोले— 'हे जनमेजय! अश्वमेध यज्ञ में घटी यह अद्भुत घटना मैंने तुम्हें सुना दी। विस्मय न करना, क्योंकि अनेक ऋषि केवल तपस्या के बल से दिव्य लोक प्राप्त कर चुके हैं। किसी प्राणी से द्रोह न करना, सन्तोष रखना, शील और सदाचार का पालन करना, इन्द्रियों को वश में रखकर सत्य बोलना और न्यायोपार्जित वस्तु का श्रद्धापूर्वक दान करना— ये गुण बड़े-बड़े यज्ञों के समान हैं।'
In English
The Golden-Bodied Mongoose and the Brahmin's Sacrifice
During Yudhishthira's Ashvamedha sacrifice, a golden-bodied mongoose appears and criticizes the scale of the ritual. The mongoose tells a story about a poor Brahmin family in Kurukshetra who shared their meager food with a guest despite facing a severe famine. This act of selfless giving resulted in the family gaining heavenly rewards and transformed the mongoose's body.
This page answers
- What did the golden mongoose say to the brahmins?
- How did the poor brahmin family feed the guest?
- Why was the mongoose's body half gold?
- What happened during the famine in kurukshetra?
Also written: Nakulakhyana, Nakula, Yudhishthira, Nevala, Putravadhu, Janamejaya, नकुलाख्यान