श्रीगणेशाय नमः।

सावित्रीव्रतोपाख्यान : पापमोचनी और धर्मफल प्राप्त करने हेतु कौन सा मन्त्र श्रेष्ठ है?

सावित्रीमन्त्र और आत्मिक शुद्धि

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ६ · अनुशासनपर्व → दानधर्मपर्व · अध्याय 150 · पृष्ठ 1450–1462

1,307 शब्द · 7 मिनटका पाठ · 20 श्लोक

युधिष्ठिर से कहा गया

धर्म की प्राप्ति हेतु युधिष्ठिर द्वारा पितामह भीष्म से प्रश्न पूछने पर।

विष्णुसहस्रनाम कथन के उपरान्त, जब युधिष्ठिर के मन में धर्म की प्राप्ति की जिज्ञासा जागी, तब उन्होंने अपने पितामह की ओर देखा। युधिष्ठिर ने अत्यन्त विनयपूर्वक पूछा— "पितामह! आप महाज्ञानी हैं और सम्पूर्ण शास्त्रों के विशेषज्ञ हैं। अतः मैं आपसे पूछता हूँ कि प्रतिदिन किस स्तोत्र या मन्त्र का जप करने से धर्म के महान फल की प्राप्ति हो सकती है?"

युधिष्ठिर उवाच

पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
किं जप्यं जपतो नित्यं भवेद् धर्मफलं महत् ॥

युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! आप महाज्ञानी और सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशेषज्ञ हैं । अतः मैं पूछता हूँ कि प्रतिदिन किस स्तोत्र या मन्त्रका जप करनेसे धर्मके महान् फलकी प्राप्ति हो सकती है?

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 150 · श्लोक 1पृष्ठ 1452

भीष्मजी ने युधिष्ठिर की ओर देखते हुए कहा— "राजन्! महर्षि वेदव्यास द्वारा बताया गया एक विशेष मन्त्र है, जिसे तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। सावित्री देवी ने इस दिव्य मन्त्र की सृष्टि की है और यह तत्काल ही मनुष्य को पापों से छुटकारा दिलाने वाला है। हे अनघ! पाण्डवश्रेष्ठ! मैं तुम्हें इस मन्त्र की सम्पूर्ण विधि बताता हूँ। जो मनुष्य रात-दिन इस मन्त्र का जप करता है, वह कभी पापों से लिप्त नहीं होता। राजकुमार! जो इस मन्त्र को सुनता है, वह दीर्घजीवी और सफल मनोरथ प्राप्त करता है तथा इहलोक और परलोक में भी आनन्द भोगता है।"

भीष्म उवाच

व्यासप्रोक्तमिमं मन्त्रं शृणुष्वैकमना नृप ।
सावित्र्या विहितं दिव्यं सद्यः पापविमोचनम् ॥

भीष्मजीने कहा- राजन्! महर्षि वेदव्यासका बताया हुआ यह एक मन्त्र है, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो । सावित्री देवीने इस दिव्यमन्त्रकी सृष्टि की है तथा यह तत्काल ही पापसे छुटकारा दिलानेवाला है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 150 · श्लोक 4पृष्ठ 1452

भीष्मजी ने आगे बताया कि प्राचीन काल में क्षत्रियधर्म का पालन करने वाले और सदा सत्य व्रत में लीन रहने वाले राजर्षि इस मन्त्र का सदा जप किया करते थे। जो राजा अपने मन और इन्द्रियों को वश में करके शान्तिपूर्वक प्रतिदिन इसका जप करते हैं, उन्हें सर्वोत्तम सम्पत्ति प्राप्त होती है। यह मन्त्र इस प्रकार है— "महान् व्रतधारी वसिष्ठ को नमस्कार है, वेदनिधि पराशर को नमस्कार है। विशाल सर्परूपधारी अनन्त (शेषनाग) को नमस्कार है, अक्षय सिद्धगणों को नमस्कार है, ऋषिवृन्द को नमस्कार है। परात्पर, देवाधिदेव, वरदाता परमेश्वर को नमस्कार है; सहस्र मस्तक वाले शिव को और सहस्रों नाम धारण करने वाले भगवान जनार्दन को नमस्कार है।"

इदमाह्निकमव्यग्रं कुर्वद्भिर्नियतैः सदा ।
नृपैर्भरतशार्दूल प्राप्यते श्रीरनुत्तमा ॥

भरतसिंह! जो राजा मन और इन्द्रियोंको वशमें करके शान्तिपूर्वक प्रतिदिन इस मन्त्रका जप करते हैं, उन्हें सर्वोत्तम सम्पत्ति प्राप्त होती है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 150 · श्लोक 9पृष्ठ 1453

इसके पश्चात, देवताओं के परिचय हेतु सूत ने बताया कि अजैकपाद्, अहिर्बुध्न्य, पिनाकी, अपराजित, ऋत, पितृरूप त्र्यम्बक, महेश्वर, वृषाकपि, शम्भु, हवन और ईश्वर—ये ग्यारह रुद्र विख्यात हैं। वेद के शतरद्रिय प्रकरण में महात्मा रुद्र के सैकड़ों नाम बताए गए हैं। वहीं, अंश, भग, मित्र, जलेश्वर, वरुण, धाता, अर्यमा, जयन्त, भास्कर, त्वष्टा और पूषा के साथ इन्द्र तथा विष्णु—ये बारह आदित्य कहलाते हैं, जो सभी कश्यप के पुत्र हैं। इसके अतिरिक्त, आठ वसु भी हैं: धर, ध्रुव, सोम, सावित्र, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास। वहीं सूर्य के वीर्य से उत्पन्न दो अश्विनीकुमार प्रसिद्ध हैं— नासत्य और दस्र। ये सब मिलाकर तैंतीस देवता हुए।

आयुष्मान् भवते चैव यं श्रुत्वा पार्थिवात्मज ।
पुरुषस्तु सुसिद्धार्थः प्रेत्य चेह च मोदते ॥

राजकुमार! जो इस मन्त्रको सुनता है, वह पुरुष दीर्घजीवी तथा सफलमनोरथ होता है, इहलोक और परलोकमें भी आनन्द भोगता है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 150 · श्लोक 7पृष्ठ 1453

ये देवगण जगत् के कर्मों पर दृष्टि रखते हैं और यज्ञ, दान तथा सुकृत को जानने वाले हैं। वे अदृश्य रहकर समस्त प्राणियों के शुभाशुभ कर्मों का निरीक्षण करते हैं। इनमें मृत्यु, काल, विश्वेदेव और मूर्तिमान पितृगण प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त तपस्वी मुनि और मोक्ष में संलग्न सिद्ध महर्षि भी सम्पूर्ण जगत् के प्रति दृष्टि रखते हैं। प्रजापति ब्रह्माजी ने जिन लोकों की रचना की है, ये सभी वहाँ अपने दिव्य तेज से निवास करते हैं। जो मनुष्य शुद्ध भाव से इनका कीर्तन करता है, उसे प्रचुर मात्रा में धर्म, अर्थ और काम की प्राप्ति होती है और वह ब्रह्माजी द्वारा रचे मङ्गलमय पवित्र लोकों में जाता है।

सेवितं सततं राजन् पुरा राजर्षिसत्तमैः ।
क्षत्रधर्मपरैर्नित्यं सत्यव्रतपरायणैः ॥

राजन्! प्राचीनकालमें क्षत्रियधर्मका पालन करनेवाले और सदा सत्य व्रतके आचरणमें संलग्न रहनेवाले राजर्षिशिरोमणि इस मन्त्रका सदा ही जप किया करते थे ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 150 · श्लोक 8पृष्ठ 1453

इन तैंतीस देवताओं के अतिरिक्त, नन्दीश्वर, महाकाय, ग्रामणी, वृषभध्वज, गणेश, विनायक, सौम्यगण, रुद्रगण, योगगण, भूतगण, नक्षत्र, नदियाँ, आकाश, पक्षिराज गरुड़, पृथ्वी पर तप से सिद्ध हुए महात्मा, स्थावर-जङ्गम, हिमालय, समस्त पर्वत, चारों समुद्र, भगवान शङ्कर के समान पराक्रमी अनुचरगण, विष्णुदेव, जिष्णु, स्कन्द और अम्बिका—इन सबके नामों का शुद्ध कीर्तन करने वाले मनुष्य के सब पाप नष्ट हो जाते हैं।

स्तुति महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 150

नमो वसिष्ठाय महाव्रताय पराशरं वेदनिधिं नमस्ये ।
नमोऽस्त्वनन्ताय महोरगाय नमोऽस्तु सिद्धेभ्य इहाक्षयेभ्यः ॥

नमोऽस्त्वृषिभ्यः परमं परेषां देवेषु देवं वरदं वराणाम् ।
सहस्रशीर्षाय नमः शिवाय सहस्रनामाय जनार्दनाय ॥

( यह मन्त्र इस प्रकार है - ) महान् व्रतधारी वसिष्ठको नमस्कार है, वेदनिधि पराशरको नमस्कार है, विशाल सर्परूपधारी अनन्त ( शेषनाग) - को नमस्कार है, अक्षय सिद्धगणको नमस्कार है, ऋषिवृन्दको नमस्कार है तथा परात्पर, देवाधिदेव, वरदाता परमेश्वरको नमस्कार है एवं सहस्र मस्तकवाले शिवको और सहस्रों नाम धारण करनेवाले भगवान् जनार्दनको नमस्कार है ।

श्लोक 10-11पृष्ठ 1453

अजैकपादहिर्बुध्न्यः पिनाकी चापराजितः ।
ऋतश्च पितृरूपश्च त्र्यम्बकश्च महेश्वरः ॥

अजैकपाद्, अहिर्बुध्न्य, पिनाकी, अपराजित, ऋत, पितृरूप त्र्यम्बक, महेश्वर, वृषाकपि, शम्भु, हवन और ईश्वर–ये ग्यारह रुद्र विख्यात हैं; जो तीनों लोकोंके स्वामी हैं ।

श्लोक 12पृष्ठ 1453

वृषाकपिश्च शम्भुश्च हवनोऽथेश्वरस्तथा ।
एकादशैते प्रथिता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वराः ॥

अजैकपाद्, अहिर्बुध्न्य, पिनाकी, अपराजित, ऋत, पितृरूप त्र्यम्बक, महेश्वर, वृषाकपि, शम्भु, हवन और ईश्वर–ये ग्यारह रुद्र विख्यात हैं; जो तीनों लोकोंके स्वामी हैं ।

श्लोक 13पृष्ठ 1453

शतमेतत् समाम्नातं शतरुद्रे महात्मनाम् ।
अंशो भगश्च मित्रश्च वरुणश्च जलेश्वरः ॥

तथा धातार्यमा चैव जयन्तो भास्करस्तथा ।
त्वष्टा पूषा तथैवेन्द्रो द्वादशो विष्णुरुच्यते ॥

इत्येते द्वादशादित्याः काश्यपेया इति श्रुतिः । वेदके शतरुद्रिय प्रकरणमें महात्मा रुद्रके सैकड़ों नाम बताये गये हैं । अंश, भग, मित्र, जलेश्वर, वरुण, धाता, अर्यमा, जयन्त, भास्कर, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र तथा विष्णु — ये बारह आदित्य कहलाते हैं । ये सब - के - सब कश्यपके पुत्र हैं ।

श्लोक 14-153पृष्ठ 1454

धरो ध्रुवश्च सोमश्च सावित्रोऽथानिलोऽनलः ॥

श्लोक 16पृष्ठ 1454

नासत्यश्चापि दस्रश्च स्मृतौ द्वावश्विनावपि ॥

श्लोक 17पृष्ठ 1454

अतः परं प्रवक्ष्यामि लोकानां कर्मसाक्षिणः ॥

अपि यज्ञस्य वेत्तारो दत्तस्य सुकृतस्य च ।
अदृश्याः सर्वभूतेषु पश्यन्ति त्रिदशेश्वराः ॥

शुभाशुभानि कर्माणि मृत्युः कालश्च सर्वशः ।
विश्वेदेवाः पितृगणा मूर्तिमन्तस्तपोधनाः ॥

मुनयश्चैव सिद्धाश्च तपोमोक्षपरायणाः ।
शुचिस्मिताः कीर्तयतां प्रयच्छन्ति शुभं नृणाम् ॥

अब मैं जगत्के कर्मपर दृष्टि रखनेवाले तथा यज्ञ, दान और सुकृतको जाननेवाले देवताओंका परिचय देता हूँ । ये देवगण स्वयं अदृश्य रहकर समस्त प्राणियोंके शुभाशुभकर्मों को देखते रहते हैं । इनके नाम ये हैं- मृत्यु, काल, विश्वेदेव और मूर्तिमान् पितृगण । इनके सिवा तपस्वी मुनि तथा तप एवं मोक्षमें संलग्न सिद्ध महर्षि भी सम्पूर्ण जगत्पर हितकी दृष्टि रखते हैं। ये सब अपना नाम- कीर्तन करनेवाले मनुष्योंको शुभ फल देते हैं ।

श्लोक 18–21पृष्ठ 1454

प्रजापतिकृतानेताँल्लोकान् दिव्येन तेजसा ।
वसन्ति सर्वलोकेषु प्रयताः सर्वकर्मसु ॥

प्रजापति ब्रह्माजीने जिन लोकोंकी रचना की है, उन सबमें ये अपने दिव्य तेजसे निवास करते हैं तथा शुद्धभावसे सबके कर्मोंका निरीक्षण करते हैं ।

श्लोक 22पृष्ठ 1454

प्राणानामीश्वरानेतान् कीर्तयन् प्रयतो नरः ।
धर्मार्थकामैर्विपुलैर्युज्यते सह नित्यशः ॥

ये सबके प्राणोंके स्वामी हैं। जो मनुष्य शुद्धभावसे नित्य इनका कीर्तन करता है, उसे प्रचुरमात्रामें धर्म, अर्थ और कामकी प्राप्ति होती है ।

श्लोक 23पृष्ठ 1455

लोकांश्च लभते पुण्यान् विश्वेश्वरकृतान् शुभान् ।
एते देवास्त्रयस्त्रिंशत् सर्वभूतगणेश्वराः ॥

वह लोकनाथ ब्रह्माजीके रचे हुए मंगलमय पवित्र लोकोंमें जाता है । ऊपर बताये हुए तैंतीस देवता सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी हैं ।

श्लोक 24पृष्ठ 1455

नन्दीश्वरो महाकायो ग्रामणीर्वृषभध्वजः ।
ईश्वराः सर्वलोकानां गणेश्वरविनायकाः ॥

सौम्या रौद्रा गणाश्चैव योगभूतगणास्तथा ।
ज्योतींषि सरितो व्योम सुपर्णः पतगेश्वरः ॥

पृथिव्यां तपसा सिद्धाः स्थावराश्च चराश्च ह ।
हिमवान् गिरयः सर्वे चत्वारश्च महार्णवाः ॥

भवस्यानुचराश्चैव हरतुल्यपराक्रमाः ।
विष्णुर्देवोऽथ जिष्णुश्च स्कन्दश्चाम्बिकया सह ॥

कीर्तयन् प्रयतः सर्वान् सर्वपापैः प्रमुच्यते । इसी प्रकार नन्दीश्वर, महाकाय, ग्रामणी, वृषभध्वज, सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी गणेश, विनायक, सौम्यगण, रुद्रगण, योगगण, भूतगण, नक्षत्र, नदियाँ, आकाश, पक्षिराज गरुड़, पृथ्वीपर तपसे सिद्ध हुए महात्मा, स्थावर, जंगम, हिमालय, समस्त पर्वत, चारों समुद्र, भगवान् शंकरके तुल्य पराक्रमवाले उनके अनुचरगण, विष्णुदेव, जिष्णु, स्कन्द और अम्बिका— इन सबके नामोंका शुद्धभावसे कीर्तन करनेवाले मनुष्यके सब पाप नष्ट हो जाते हैं ।

श्लोक 25–283पृष्ठ 1455

अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि मानवानृषिसत्तमान् ॥

यवक्रीतश्च रैभ्यश्च अर्वावसुपरावसू ।
औशिजश्चैव कक्षीवान् बलश्चाङ्गिरसः सुतः ॥

ऋषिर्मेधातिथेः पुत्रः कण्वो बर्हिषदस्तथा ।
ब्रह्मतेजोमयाः सर्वे कीर्तिता लोकभावनाः ॥

अब श्रेष्ठ महर्षियोंके नाम बता रहा हूँ— यवक्रीत, रैभ्य, अर्वावसु, परावसु, उशिजके पुत्र कक्षीवान्, अंगिरानन्दन बल, मेधातिथिके पुत्र कण्व ऋषि और वर्हिषद — ये सब ऋषि ब्रह्मतेजसे सम्पन्न और लोकस्रष्टा बतलाये गये हैं ।

श्लोक 29–31पृष्ठ 1455

लभन्ते हि शुभं सर्वे रुद्रानलवसुप्रभाः ।
भुवि कृत्वा शुभं कर्म मोदन्ते दिवि दैवतैः ॥

इनका तेज रुद्र, अग्नि तथा वसुओंके समान है । ये पृथ्वीपर शुभकर्म करके अब स्वर्गमें देवताओंके साथ आनन्दपूर्वक रहते हैं और शुभफलका उपभोग करते हैं ।

श्लोक 32पृष्ठ 1456

महेन्द्रगुरवः सप्त प्राचीं वै दिशमाश्रिताः ।
प्रयतः कीर्तयेदेतान् शक्रलोके महीयते ॥

महेन्द्रके गुरु सातों महर्षि पूर्व दिशामें निवास करते हैं । जो पुरुष शुद्धचित्तसे इनका नाम लेता है, वह इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है ।

श्लोक 33पृष्ठ 1456

इस स्तुतिके श्लोक 10-11–81 में से आरम्भके 14 यहाँ दिये गये हैं। पूरी स्तुति मूल ग्रन्थमें पढ़ें →

अन्त में, श्रेष्ठ महर्षियों का परिचय देते हुए बताया गया कि यवक्रीत, रैभ्य, अर्वावसु, परावसु, कक्षीवान्, बल, कण्व ऋषि और वर्हिषद—ये सभी ब्रह्मतेज से सम्पन्न और लोकस्रष्टा हैं। इनका तेज रुद्र, अग्नि और वसुओं के समान है। ये पृथ्वी पर शुभकर्म करके स्वर्ग में देवताओं के साथ आनन्द भोगते हैं। महेन्द्र के गुरु सात महर्षि पूर्व दिशा में निवास करते हैं, जिनका नाम लेने वाला इन्द्रलोक में प्रतिष्ठित होता है। दक्षिण दिशा में धर्मराज के ऋत्विज सात मुनि रहते हैं: उन्मुचु, प्रमुचु, स्वस्त्यात्रेय, दृढव्य, ऊर्ध्वबाहु, तृणसोमाङ्गिरा और अगस्त्य। पश्चिम दिशा में वरुण के सात ऋत्विज निवास करते हैं:दृढेयु, ऋतेयु, परिव्याध, एकत, द्वित, त्रित और सारस्वत मुनि। वहीं उत्तर दिशा में कुबेर के गुरु सात ऋषि रहते हैं: अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, गौतम, भरद्वाज, विश्वामित्र और जमदग्नि।

धर्म, काम, काल, वसु, वासुकि, अनन्त और कपिल—ये सात पृथ्वी को धारण करने वाले हैं। परशुराम, व्यास, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा और लोमश जैसे चार दिव्य मुनि भी इस जगत् में शान्ति और कल्याण का विस्तार करते हैं। इनमें से प्रत्येक मुनि सात-सात ऋषियों के समान है। ये ऋषि जिस दिशा में निवास करते हैं, उस दिशा की ओर मुख करके ही इनकी शरण लेनी चाहिए। वहीं संवर्त, मेरुसावर्णि, धर्मात्मा मार्कण्डेय, साङ्ख्य, योग और नारद जैसे सात ऋषि अत्यन्त तपस्वी और तीनों लोकों में विख्यात हैं। इन ऋषियों के कीर्तन से ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है; पुत्रहीन को पुत्र और दरिद्र को धन मिलता है।

इन देवताओं, ऋषियों और पृथ्वी पर शासन करने वाले राजाओं का कीर्तन सम्पूर्ण प्राणियों के लिए मङ्गलमय है। जो मनुष्य प्रतिदिन सुबह और शाम शुद्ध चित्त से इनका नाम लेता है, उसके समस्त कर्मों में उत्तम पुष्टि प्राप्त होती है। ये देवता जगत की रक्षा करते हैं, वर्षा कराते हैं और प्रजा की सृष्टि करते हैं। जो व्यक्ति इनके गुणों का उच्चारण करता है, उसे शुभ कर्मों के भोग प्राप्त होते हैं; उसके पास आग और चोर का भय नहीं रहता और उसका मार्ग कभी रोका नहीं जाता। इन नामों के पाठ से मनुष्य के दुःस्वप्न नष्ट होते हैं और वह पापों से मुक्त होकर कुशलपूर्वक घर लौटता है। जो द्विज इस नामावली का नियमपूर्वक पाठ करता है, वह न्यायशील, क्षमावान और दोष-दृष्टि से रहित होता है। रण में व्याधि से ग्रस्त मनुष्य इसका पाठ कर नीरोग हो जाता है और जो अपने घर के भीतर इसका पाठ करता है, उसके कुल का कल्याण होता है। यहाँ तक कि खेत में इस नाममाला को पढ़ने वाले की खेती जमती है और गाँव के भीतर रहकर पाठ करने वाले की यात्राएँ सकुशल सम्पन्न होती हैं। अपनी, पुत्रों की, पत्नी की, धन की तथा ओषधियों की रक्षा के लिए भी इस नामावली का प्रयोग करना चाहिए। युद्धकाल में इन नामों का पाठ करने वाले क्षत्रिय के शत्रु भाग जाते हैं।

जो मनुष्य प्रस्थान करते समय या परदेश में उत्तम गायत्री मन्त्र का जप करता है, वह परम सिद्धि प्राप्त करता है। गायत्री मन्त्र के जप से द्विज को राजा, पिशाच, राक्षस, आग, पानी, हवा और साँप का भय नहीं रहता। जहाँ इस मन्त्र का जप किया जाता है, वहाँ के घर के किवाड़ों में आग नहीं लगती, बालक की मृत्यु नहीं होती और वहाँ साँप नहीं टिकते। जो लोग इस परब्रह्मस्वरूप गायत्री मन्त्र के गुणों को सुनते हैं, उन्हें कभी दुःख नहीं होता और वे परम गति को प्राप्त करते हैं। गौओं के बीच रहकर इसका जप करने वाले पर गौओं का वात्सल्य बढ़ जाता है। यह होम करने वाले ऋषियों के लिए परम गोपनीय मन्त्र है।

यह सिद्धिको प्राप्त हुए महर्षि वेदव्यास का कहा हुआ यथार्थ इतिहास है, जिसमें पराशर मुनि के दिव्य मत का वर्णन है। वही गायत्री मन्त्र तुमसे कहा गया है; यह सत्य एवं सनातन ब्रह्मरूप है। यह सम्पूर्ण भूतों का हृदय और सनातन श्रुति है। चन्द्र, सूर्य, रघु और कुरु वंश के सभी राजा प्रतिदिन इस मन्त्र का जप करते आए हैं। गायत्री संसार के प्राणियों की परमगति है। प्रतिदिन देवताओं, सप्तर्षियों और ध्रुव का स्मरण करने से समस्त सङ्कटों से छुटकारा मिल जाता है। काश्यप, गौतम, भृगु, अङ्गिरा, अत्रि, शुक्र, अगस्त्य और बृहस्पति जैसे वृद्ध ब्रह्मर्षियों ने सदा इस मन्त्र का सेवन किया है। महर्षि भारद्वाज ने इसका मनन किया और इन्द्र तथा वसुओं ने वसिष्ठ जी से सावित्री-मन्त्र पाकर सम्पूर्ण दानवों को परास्त कर दिया।

भृगु का नाम लेने से धर्म बढ़ता है, वसिष्ठ मुनि को नमस्कार करने से वीर्य बढ़ता है, राजा रघु को प्रणाम करने वाला क्षत्रिय सङ्ग्राम में विजयी होता है और अश्विनीकुमारों का नाम लेने वाले को रोग नहीं सताते। हे राजन्! यह सनातन ब्रह्मरूपा गायत्री का माहात्म्य मैंने तुमसे कहा है। जो विद्वान ब्राह्मण को सौ गौओं के सींगों में सोना मढ़ाकर दान करता है और जो प्रतिदिन इस दिव्य महाभारत कथा का प्रवचन सुनता है, उन दोनों को एक-सा पुण्य फल प्राप्त होता है।

एषा ते कथिता राजन् सावित्री ब्रह्म शाश्वती ।
विवक्षुरसि यच्चान्यत् तत् ते वक्ष्यामि भारत ॥

राजन्! यह सनातन ब्रह्मरूपा गायत्रीका माहात्म्य मैंने तुमसे कहा है । भारत! अब और जो कुछ भी तुम पूछना चाहते हो, वह भी तुम्हें बताऊँगा ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 150 · श्लोक 82पृष्ठ 1462

In English

Bhishma explains the benefits of sacred names and Gayatri

Yudhisthira asks Bhishma which mantra or hymn can bring great spiritual merit. Bhishma describes a specific prayer involving various deities, sages, and natural elements, and concludes by explaining the power of the Gayatri mantra.

This page answers

  • What mantra did bhishma tell yudhisthira to chant?
  • Who are the eleven rudras mentioned in the text?
  • What are the benefits of chanting the names of gods and sages?
  • How does the gayatri mantra protect a person?
  • Which sages reside in the north direction?

Also written: Savitrivratopakhyana, Savitrivrata, Yudhishthira, Bhishma, Suta, सावित्रीव्रतोपाख्यान