श्रीगणेशाय नमः।

वीतहव्योपाख्यान : क्या एक क्षत्रिय राजा कठिन तपस्या और कृपा से ब्राह्मणत्व प्राप्त कर सकता है?

कर्म और पात्रता का परिवर्तन

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ६ · अनुशासनपर्व → दानधर्मपर्व · अध्याय 30 · पृष्ठ 385–395

1,098 शब्द · 6 मिनटका पाठ · 9 श्लोक

भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा

क्षत्रिय से ब्राह्मण बनने की दुर्लभता पर चर्चा के समय

युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह की ओर देखा और जिज्ञासावश पूछा— "कुरुकुल में उत्पन्न! वक्ताओं में श्रेष्ठ पितामह! आपके मुख से यह महान उपाख्यान मैंने सुन लिया। आप कह रहे हैं कि अन्य वर्णों के लिए इसी शरीर से ब्राह्मणत्व की प्राप्ति बहुत ही कठिन है। परन्तु सुना जाता है कि पूर्वकाल में विश्वामित्र जी ने इसी शरीर से ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया था; आप जो उसे सर्वथा दुर्लभ बता रहे हैं, ये दोनों बातें परस्पर विरुद्ध सी जान पड़ती हैं। मेरे सुनने में यह भी आया है कि राजा वीतहव्य क्षत्रिय से ब्राह्मण हो गये थे। गङ्गानन्दन प्रभो! अब मैं पहले उसी प्रसङ्ग को सुनना चाहता हूँ। वे नृपशिरोमणि वीतहव्य किस कर्म से, किस वर अथवा तपस्या से ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए? यह मुझे विस्तारपूर्वक बताने की कृपा करें।"

युधिष्ठिर उवाच

स केन कर्मणा प्राप्तो ब्राह्मण्यं राजसत्तमः ।
वरेण तपसा वापि तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥

वे नृपशिरोमणि वीतहव्य किस कर्मसे, किस वर अथवा तपस्यासे ब्राह्मणत्वको प्राप्त हुए? यह मुझे विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 30 · श्लोक 4पृष्ठ 386

भीष्म बोले— "राजन्! महायशस्वी राजर्षि राजा वीतहव्य ने जिस प्रकार लोक-सम्मानित दुर्लभ ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था, उसे बताता हूँ, सुनो। पूर्वकाल में धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करने वाले महामनस्वी राजा मनु के एक धर्मात्मा पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम शर्याति था। राजा शर्याति के वंश में हैहय और तालजङ्घ नामक दो राजा बड़े विख्यात हुए। हैहय (जिसका दूसरा नाम वीतहव्य भी था) की दस स्त्रियाँ थीं। उन स्त्रियों के गर्भ से सौ शूरवीर पुत्र उत्पन्न हुए जो युद्ध से पीछे हटने वाले नहीं थे। वे सभी बलवान थे और उन्होंने धनुर्वेद तथा वेद के सभी विषयों में परिश्रम किया था। वीतहव्य के पुत्रों ने हर्यश्व के राज्य पर आक्रमण किया और उसे गङ्गा-यमुना के बीच युद्ध में मार गिराया। उसके पश्चात हर्यश्व के पुत्र सुदेव को काशिकाज पद पर अभिषिक्त किया गया। सुदेव धर्मपूर्वक पृथ्वी का पालन करने लगे, इसी बीच वीतहव्य के सभी पुत्रों ने आक्रमण करके उन्हें भी परास्त कर दिया। वे उन्हें धराशायी कर रणभूमि से लौट गए।"

तमथाजी विनिर्जित्य प्रतिजग्मुर्यथागतम् ।
सौदेवस्त्वथ काशीशो दिवोदासोऽभ्यषिच्यत ॥

समराङ्गणमें सुदेवको धराशायी करके वे हैहय- राजकुमार जैसे आये थे वैसे लौट गये । तत्पश्चात् सुदेवके पुत्र दिवोदासका काशिराजके पदपर अभिषेक किया गया ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 30 · श्लोक 15पृष्ठ 388

"सुदेव के पुत्र दिवोदास का अभिषेक हुआ। दिवोदास बड़े तेजस्वी राजा थे। उन्होंने जब मन को वश में रखने वाले हैहय राजकुमारों के पराक्रम पर विचार किया, तब इन्द्र की आज्ञा से वाराणसी नाम वाली नगरी बसाई। वह पुरी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रों से भरी हुई थी और धन-वैभव से सम्पन्न थी। उस नगरी का एक छोर गङ्गा के उत्तर तट तक और दूसरा गोमती के दक्षिण किनारे तक फैला था; वह इन्द्र की अमरावतीपुरी के समान जान पड़ती थी। इसी बीच हैहय राजकुमारों ने पुनः धावा बोल दिया। महातेजस्वी राजा दिवोदास ने पुरी से बाहर निकलकर उन राजकुमारों के साथ युद्ध किया। उनका वह युद्ध देवासुर सङ्ग्राम के समान भयङ्कर था। राजा दिवोदास ने एक हजार दिन तक शत्रुओं के साथ युद्ध किया, किन्तु इस सङ्घर्ष में उनके बहुत-से सिपाही, हाथी और घोड़े मारे गए। उनका खजाना खाली हो गया और वे बड़ी दयनीय दशा में अपनी राजधानी छोड़कर भाग निकले।"

युधिष्ठिर उवाच

श्रुतं मे महदाख्यानमेतत् कुरुकुलोद्वह ।
सुदुष्प्रापं यद् ब्रवीषि ब्राह्मण्यं वदतां वर ॥

युधिष्ठिरने पूछा— कुरुकुलमें उत्पन्न! वक्ताओंमें श्रेष्ठ पितामह! आपके मुखसे यह महान् उपाख्यान मैंने सुन लिया । आप कह रहे हैं कि अन्य वर्णोंके लिये इसी शरीरसे ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति बहुत ही कठिन है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 30 · श्लोक 1पृष्ठ 386

"बुद्धिमान भरद्वाज के रमणीय आश्रम पर राजा दिवोदास हाथ जोड़े हुए पहुँचे। बृहस्पतिके ज्येष्ठ पुत्र भरद्वाज जी बड़े शीलवान थे और दिवोदास के पुरोहित भी। उन्होंने राजा को देखकर पूछा— 'नरेश्वर! तुम्हें यहाँ आने की क्या आवश्यकता पड़ी? मुझे अपना सब समाचार बता दो। तुम्हारा जो भी प्रिय कार्य होगा, मैं उसे करूँगा।' राजा रोते हुए बोले— 'भगवन्! सङ्ग्राम में वीतहव्य के पुत्रों ने मेरे कुल का विनाश कर डाला। मैं अकेला ही अत्यन्त सन्तप्त होकर आपकी शरण में आया हूँ। भगवन्! मैं आपका शिष्य हूँ और आप मेरे गुरु हैं; अपने स्नेह से मेरी रक्षा कीजिये। उन पापकर्मियों ने मेरे कुल में केवल मुझ एक ही व्यक्ति को शेष छोड़ा है।' यह सुनकर महर्षि भरद्वाज ने कहा— 'सुदेवनन्दन! तुम डरो मत। मैं तुम्हारे लिए पुत्रेष्टि यज्ञ करूँगा, जिसकी सहायता से तुम हजारों वीतहव्य-पुत्रों को मार गिराओगे।'

तमुवाच महाभागो भरद्वाजः प्रतापवान् ।
न भेतव्यं न भेतव्यं सौदेव व्येतु ते भयम् ॥

यह सुनकर प्रतापी महर्षि महाभाग भरद्वाजने कहा- ' सुदेवनन्दन! तुम न डरो, न डरो । तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिये ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 30 · श्लोक 28पृष्ठ 389

"यज्ञ के पश्चात उन्हें प्रतर्दन नाम का पुत्र प्राप्त हुआ। वह पैदा होते ही इतना बढ़ गया कि तुरन्त तेरह वर्ष की अवस्था का दिखाई देने लगा। उसने अपने मुख से सम्पूर्ण वेद और धनुर्वेद का गान किया। महर्षि भरद्वाज ने उसे योगशक्ति से सम्पन्न कर दिया। तत्पश्चात् राजकुमार प्रतर्दन कवच धारण कर, हाथ में धनुष लेकर रथ पर सवार होकर आगे बढ़ा। वह नवोदित सूर्य के समान प्रकाशित हो रहा था। उसे देखकर राजा दिवोदास को हर्ष हुआ और उन्होंने अपने पुत्र को वीतहव्य के पुत्रों का वध करने के लिए भेजा। प्रतर्दन शीघ्र ही रथ सहित गङ्गा पार कर शत्रुओं की राजधानी की ओर चल दिया।"

दिवोदासस्तु विज्ञाय वीर्यं तेषां यतात्मनाम् ।
वाराणसीं महातेजा निर्ममे शक्रशासनात् ॥

दिवोदास बड़े तेजस्वी राजा थे । उन्होंने जब मनको वशमें रखनेवाले हैहयराजकुमारोंके पराक्रमपर विचार किया तब इन्द्रकी आज्ञासे वाराणसी नामवाली नगरी बसायी ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 30 · श्लोक 16पृष्ठ 388

"जब वीतहव्य के पुत्रों ने रथ की घोर घरघराहट सुनी, तो वे विशाल रथों पर सवार होकर बाहर निकले और बाणों की वर्षा करते हुए प्रतर्दन पर चढ़ आए। तब महा तेजस्वी राजा प्रतर्दन ने अपने अस्त्रों से शत्रुओं के अस्त्रों का निवारण किया और वज्र के समान तेजस्वी बाणों से उन सबको मार डाला। भल्लों की मार से उनके मस्तकों के हजारों टुकड़े हो गए और वे कटे हुए पलाश के वृक्ष की भाँति धरती पर गिर पड़े। उन सब पुत्रों के मारे जाने पर राजा वीतहव्य अपना नगर छोड़कर महर्षि भृगु के आश्रम में भाग गए।"

हतेषु तेषु सर्वेषु वीतहव्यः सुतेष्वथ ।
प्राद्रवन्नगरं हित्वा भृगोराश्रममप्युत ॥

उन सब पुत्रोंके मारे जानेपर राजा वीतहव्य अपना नगर छोड़कर महर्षि भृगुके आश्रममें भाग गये ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 30 · श्लोक 44पृष्ठ 391

"आश्रम में पहुँचकर प्रतर्दन ने सभा में पूछा— 'भाइयो! इस आश्रम में महात्मा भृगु के शिष्य कौन-कौन हैं? मैं महर्षि के दर्शन करना चाहता हूँ।' जब वह पहुँचा, तो उसने महर्षि से कहा— 'ब्रह्मन्! राजा वीतहव्य को यहाँ से बाहर निकाल दीजिये। इनके पुत्रों ने मेरे सम्पूर्ण कुल का विनाश कर डाला और सारा राज्य उजाड़ लिया है। बल के घमण्ड में भरे इन सौ पुत्रों को तो मैंने मार दिया; अब केवल ये ही रह गये हैं। क्या इनका वध करके मैं अपने पिता के ऋण से उऋण हो जाऊँगा? क्या इस संसार में कोई क्षत्रिय शेष नहीं बचा?'"

राजोवाच अयं ब्रह्मन्नितो राजा वीतहव्यो विसर्ज्यताम् ।
तस्य पुत्रैर्हि मे कृत्स्नो ब्रह्मन् वंशः प्रणाशितः ॥

राजाने कहा – ब्रह्मन्! राजा वीतहव्यको आप यहाँसे बाहर निकाल दीजिये । विप्रवर! इनके पुत्रोंने मेरे सम्पूर्ण कुलका विनाश कर डाला है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 30 · श्लोक 50पृष्ठ 392

"यह सुनकर धर्मात्मा भृगु ने दया से द्रवित होकर कहा— 'राजन्! यहाँ कोई क्षत्रिय नहीं है। ये सब तो ब्राह्मण हैं।' महर्षि का यथार्थ वचन सुनकर प्रतर्दन अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उनके चरण छूकर बोला— 'भगवन्! यदि ऐसी बात है तो मैं कृतकृत्य हो गया। मैंने इन राजाओं को अपनी जाति त्याग देने के लिये विवश कर दिया है। ब्रह्मर्षि भृगुवंशी! मुझे जाने की आज्ञा दीजिये।' तत्पश्चात् वह राजा जैसे साँप अपने विष को त्याग देता है, वैसे ही क्रोध छोड़कर लौट गया। राजा वीतहव्य भृगु जी के कथनमात्र से ब्रह्मर्षि और ब्रह्मवादी हो गये।"

एतत् तु वचनं श्रुत्वा भृगोस्तथ्यं प्रतर्दनः ॥

पादावुपस्मृश्य शनैः प्रहृष्टो वाक्यमब्रवीत् ।
एवमप्यस्मि भगवन् कृतकृत्यो न संशयः ॥

महर्षि भृगुका यह यथार्थ वचन सुनकर प्रतर्दन बहुत प्रसन्न हुआ और धीरेसे उनके दोनों चरण छूकर बोला- ' भगवन्! यदि ऐसी बात है तो मैं कृतकृत्य हो गया, इसमें संशय नहीं है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 30 · श्लोक 53-54पृष्ठ 393

"राजा वीतहव्य के वंश में महान ऋषियों की परम्परा चली; उनके पुत्र गृत्समद हुए जो दूसरे इन्द्र के समान तेजस्वी थे। गृत्समद के पुत्र सुचेता हुए, सुचेता के पुत्र वर्चा और वर्चा के पुत्र विहव्य हुए। विहव्य के पुत्र का नाम वितत्य था। वितत्य के पुत्र सत्य और सत्य के पुत्र सन्त हुए। सन्त के पुत्र महर्षि श्रवा, श्रव के तम और तम के पुत्र द्विजश्रेष्ठ प्रकाश हुए। प्रकाश का पुत्र वागिन्द्र था जो वेदों में पारङ्गत था। वागिन्द्र के प्रमितिके हुए और अप्सरा से रुरु नामक पुत्र हुआ। रुरु के गर्भ से ब्रह्मर्षि शुनक का जन्म हुआ, जिनके पुत्र शौनक मुनि हैं। इस प्रकार राजा वीतहव्य क्षत्रिय होकर भी भृगु के प्रसाद से ब्राह्मण हो गये।"

एवं विप्रत्वमगमद् वीतहव्यो नराधिपः ।
भृगोः प्रसादाद् राजेन्द्र क्षत्रियः क्षत्रियर्षभ ॥

राजेन्द्र! क्षत्रियशिरोमणे! इस प्रकार राजा वीतहव्य क्षत्रिय होकर भी भृगुके प्रसादसे ब्राह्मण हो गये ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 30 · श्लोक 66पृष्ठ 395

In English

The Story of King Vitahavya's Transformation

King Divodasa loses his kingdom and wealth after a thousand-day war against the hundred sons of Haihaya. The sage Bharadwaja performs a sacrifice for Divodasa, resulting in the birth of the powerful son Pratardan. Pratardan kills the remaining princes, and through the words of Sage Bhrigu, the lineage of Vitahavya is transformed from Kshatriyas into Brahmins.

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