श्रीगणेशाय नमः।

विपुलोपाख्यान : गुरुपत्नी की रक्षा के लिए किसी को क्या आत्मिक और शारीरिक त्याग करना पड़ता है?

धर्मनिष्ठता और आत्म-संयम

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ६ · अनुशासनपर्व → दानधर्मपर्व · अध्याय 40–43 · पृष्ठ 439–465

2,513 शब्द · 13 मिनटका पाठ · 22 श्लोक

भीष्म से कहा गया

पापियों से बचाव और स्त्रियों के प्रति धर्म की रक्षा हेतु।

भीष्मजी ने कहा— "महाबाहो! कुरुनन्दन! तुम नारियों के सम्बन्ध में जो कुछ कह रहे हो, उसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है। इस विषय में मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास सुनाता हूँ कि पूर्वकाल में महात्मा विपुल ने किस प्रकार अपनी गुरुपत्नी की रक्षा की थी। भरतश्रेष्ठ! ब्रह्माजी ने जिस प्रकार और किस उद्देश्य से युवतियों की सृष्टि की है, वह सब मैं तुम्हें बताऊँगा।"

भीष्म उवाच

अत्र ते वर्तयिष्यामि इतिहासं पुरातनम् ।
यथा रक्षा कृता पूर्वं विपुलेन महात्मना ॥

इस विषयमें मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास बताऊँगा कि पूर्वकालमें महात्मा विपुलने किस प्रकार एक स्त्री (गुरुपत्नी ) - की रक्षा की थी ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 40 · श्लोक 2पृष्ठ 440

भीष्मजी आगे कहने लगे— "हे वत्स! स्त्रियों से बढ़कर पापिष्ठ दूसरा कोई नहीं है। यौवन के मद में उन्मत्त रहने वाली स्त्रियाँ वास्तव में प्रज्वलित अग्निके समान हैं। वे मयदानव की रची हुई माया हैं; वे देवत्व को प्राप्त कर लेती हैं और फिर देवताओं को भयभीत कर देती हैं। छुरे की धार, विष, सर्प और आग— ये सब विनाश के हेतु एक ओर हैं, और तरूणी स्त्रियाँ एक ओर!

भीष्म उवाच

न हि स्त्रीभ्यः परं पुत्र पापीयः किंचिदस्ति वै ।
अग्निर्हि प्रमदा दीप्तो मायाश्च मयजा विभो ॥

बेटा! स्त्रियोंसे बढ़कर पापिष्ठ दूसरा कोई नहीं है । यौवन- मदसे उन्मत्त रहनेवाली स्त्रियाँ वास्तवमें प्रज्वलित अग्निके समान हैं। प्रभो! वे मयदानवकी रची हुई माया हैं ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 40 · श्लोक 4पृष्ठ 440

जब यह सारी प्रजा धार्मिक थी, तब देवता स्वयं देवत्व को प्राप्त हो जाते थे, जिससे देवताओं को बड़ा भय हुआ। तब वे देवता ब्रह्माजी के पास गए और उनसे अपने मन की बात निवेदन करके, मुँह नीचे किए चुपचाप बैठ गए। उन देवताओं की व्यथा जानकर भगवान ब्रह्मा ने मनुष्यों को मोह में डालने के लिए 'कृत्या' रूप नारियों की सृष्टि की। कुन्तीनन्दन! सृष्टिके प्रारम्भ में यहाँ सब स्त्रियाँ पतिव्रता ही थीं; ये दुष्ट स्त्रियाँ तो प्रजापतिकी इस नूतन सृष्टिसे ही उत्पन्न हुई हैं, जिन्हें उनकी इच्छा के अनुसार कामभाव प्रदान किया गया है। वे मतवाली युवतियाँ कामलोलुप होकर पुरुषों को सदा बाधा देती रहती हैं।

पूर्वसर्गे तु कौन्तेय साध्व्यो नार्य इहाभवन् ॥

असाध्व्यस्तु समुत्पन्नाः कृत्याः सर्गात् प्रजापतेः ।
ताभ्यः कामान् यथाकामं प्रादाद्धि स पितामहः ॥

कुन्तीनन्दन! सृष्टिके प्रारम्भमें यहाँ सब स्त्रियाँ पतिव्रता ही थीं । कृत्यारूप दुष्ट स्त्रियाँ तो प्रजापतिकी इस नूतन सृष्टिसे ही उत्पन्न हुई हैं । प्रजापतिने उन्हें उनकी इच्छाके अनुसार कामभाव प्रदान किया ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 40 · श्लोक 8-9पृष्ठ 441

प्रजापति ने स्त्रियों को शय्या, आसन, अलङ्कार, अन्न, पान, दुर्वचन और रति प्रदान की है। तात! लोकस्रष्टा ब्रह्मा जैसा पुरुष भी स्त्रियों की रक्षा नहीं कर सकता, फिर साधारण पुरुषों की क्या बात! क्योंकि वे सदा असंयमशील होती हैं। किन्तु पूर्वकाल में महात्मा विपुल ने अपनी गुरुपत्नी की रक्षा की थी।

भीष्म उवाच

एवमेव महाबाहो नात्र मिथ्यास्ति किंचन ।
यथा ब्रवीषि कौरव्य नारीं प्रति जनाधिप ॥

भीष्मजीने कहा – महाबाहो! कुरुनन्दन! ऐसी ही बात है । नरेश्वर! नारियोंके सम्बन्धमें तुम जो कुछ कह रहे हो, उसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 40 · श्लोक 1पृष्ठ 440

उस समय देवशर्मा नाम के एक महा-भाग्यशाली ऋषि थे। उनकी रुचि नाम की एक पत्नी थी, जो इस पृथ्वी पर अद्वितीय सुन्दरी थी। उसका रूप देखकर देवता, गन्धर्व और दानव भी मतवाले हो जाते थे। इन्द्र उस स्त्री पर विशेष रूप से आसक्त थे। महामुनि देवशर्मा नारियों के चरित्र को जानते थे; वे जानते थे कि इन्द्र बड़े ही पर-स्त्रीलम्पट हैं, इसलिए वे अपनी स्त्री की उनसे यत्नपूर्वक रक्षा करते थे।

वाचा च वधबन्धैर्वा क्लेशैर्वा विविधैस्तथा ॥

न शक्या रक्षितुं नार्यस्ता हि नित्यमसंयताः । वाणीके द्वारा एवं वध और बन्धनके द्वारा रोककर अथवा नाना प्रकारके क्लेश देकर भी स्त्रियोंकी रक्षा नहीं की जा सकती; क्योंकि वे सदा असंयमशील होती हैं ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 40 · श्लोक 14पृष्ठ 442

एक समय ऋषिने यज्ञ करने का विचार किया। वे सोचने लगे— 'यदि मैं यज्ञ में लग जाऊँ तो मेरी स्त्री की रक्षा कैसे होगी?' तब उन्होंने अपने प्रिय शिष्य भृगुवंशी विपुल को बुलाकर कहा— 'वत्स! मैं यज्ञ करने के लिये जाऊँगा। तुम मेरी इस पत्नी रुचिकी यत्नपूर्वक रक्षा करना; क्योंकि देवराज इन्द्र सदा इसे प्राप्त करने की चेष्टामें लगा रहता है। तुम्हें इन्द्रकी ओरसे सदा सावधान रहना चाहिये, क्योंकि वह अनेक प्रकार के रूप धारण करता है।'

देवशर्मोवाच यज्ञकारो गमिष्यामि रुचिं चेमां सुरेश्वरः ॥

यतः प्रार्थयते नित्यं तां रक्षस्व यथाबलम् । देवशर्मा बोले- वत्स! मैं यज्ञ करनेके लिये जाऊँगा । तुम मेरी इस पत्नी रुचिकी यत्नपूर्वक रक्षा करना; क्योंकि देवराज इन्द्र सदा इसे प्राप्त करनेकी चेष्टामें लगा रहता है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 40 · श्लोक 22पृष्ठ 443

विपुल ने अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी, जितेन्द्रिय तथा कठोर तप में लीन धर्मज्ञ ऋषि की आज्ञा 'बहुत अच्छा' कहकर स्वीकार कर ली। फिर विपुल ने पूछा— 'मुने! इन्द्र जब आता है तब उसके कौन-कौन से रूप होते हैं? उसका शरीर और तेज कैसा होता है?'

भीष्म उवाच

इत्युक्तो विपुलस्तेन तपस्वी नियतेन्द्रियः ॥

सदैवोग्रतपा राजन्नग्न्यर्कसदृशद्युतिः ।
धर्मज्ञः सत्यवादी च तथेति प्रत्यभाषत ।
पुनश्चेदं महाराज पप्रच्छ प्रस्थितं गुरुम् ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! गुरुके ऐसा कहनेपर अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी, जितेन्द्रिय तथा सदा ही कठोर तपमें लगे रहनेवाले धर्मज्ञ एवं सत्यवादी विपुलने ' बहुत अच्छा ' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली । महाराज! फिर जब गुरुजी प्रस्थान करने लगे तब उसने पुनः इस प्रकार पूछा ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 40 · श्लोक 24-25पृष्ठ 443

देवशर्मा ने उसे विस्तार से बताया— 'बेटा! इन्द्र बहुत सी मायाओं के जानकार हैं। वे कभी किरीट-मुकुट और वज्र धारण कर आते हैं, तो कभी चाण्डाल के समान दिखायी देते हैं। कभी ऋषि बन जाते हैं, तो कभी विशाल या दुर्बल शरीर वाले। वे कभी गोरे, कभी साँवले तो कभी काले रङ्ग के रूप बदलते रहते हैं। वे एक क्षण में कुरूप और दूसरे ही क्षण में रूपवान हो जाते हैं; कभी जवान तो कभी बूढ़े। वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र का रूप ले लेते हैं। वे तोते, कौए, हंस, कोयल, सिंह, व्याघ्र या हाथी के शरीर भी धारण कर लेते हैं। वे कभी पक्षी बन जाते हैं, तो कभी पशु या बहुरूपिया। वे मक्खी और मच्छर के रूप में भी आते हैं। उन्हें कोई पकड़ नहीं सकता, यहाँ तक कि विधाता भी उन्हें काबू में नहीं कर सकते। वे वायु बनकर तुरन्त प्रकट हो जाते हैं।'

मक्षिकामशकादीनां वपुर्धारयतेऽपि च ।
न शक्यमस्य ग्रहणं कर्तुं विपुल केनचित् ॥

अपि विश्वकृता तात येन सृष्टमिदं जगत् ।
पुनरन्तर्हितः शक्रो दृश्यते ज्ञानचक्षुषा ॥

वे मक्खी और मच्छर आदिके भी रूप धारण करते हैं । विपुल! कोई भी उन्हें पकड़ नहीं सकता । तात! औरोंकी तो बात ही क्या है? जिन्होंने इस संसारको बनाया है वे विधाता भी उन्हें अपने काबूमें नहीं कर सकते। अन्तर्धान हो जानेपर इन्द्र केवल ज्ञानदृष्टिसे दिखायी देते हैं ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 40 · श्लोक 36-37पृष्ठ 445

देवशर्मा ने गम्भीर स्वर में कहा— 'विपुल! तुम यत्नपूर्वक रुचिकी रक्षा करना, जिससे दुरात्मा इन्द्र यज्ञ में रखे हुए हविष्य को चाटने की इच्छा वाले कुत्ते की भाँति मेरी पत्नी को स्पर्श न कर सके।' ऐसा कहकर मुनि यज्ञ के लिए चले गये।

गात्राणि गात्रैरस्याहं सम्प्रवेक्ष्ये हि रक्षितुम् ।
यद्युच्छिष्टामिमां पत्नीमद्य पश्यति मे गुरुः ॥

शप्स्यत्यसंशयं कोपाद् दिव्यज्ञानो महातपाः । ' मैं गुरुपत्नीकी रक्षा करनेके लिये अपने सम्पूर्ण अंगोंसे इसके सम्पूर्ण अंगोंमें समा जाऊँगा । यदि आज मेरे गुरुजी अपनी इस पत्नीको किसी पर-पुरुषद्वारा दूषित हुई देख लेंगे तो कुपित होकर मुझे निस्संदेह शाप दे देंगे; क्योंकि वे महा तपस्वी गुरु दिव्यज्ञानसे सम्पन्न हैं ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 40 · श्लोक 47पृष्ठ 446

गुरु की बात सुनकर विपुल बड़ी चिन्ता में पड़ गये। उन्होंने मन ही मन सोचा— 'मैं गुरुपत्नी की रक्षा कैसे करूँ? क्योंकि इन्द्र मायावी और दुर्धर्ष है। कुटी या आश्रम के दरवाजों को बन्द करके भी उसका आना नहीं रोका जा सकता। वह वायु का रूप धारण कर आएगा। मैं पुरुषार्थ से इसकी रक्षा नहीं कर सकता, अतः योगबल का ही आश्रय लेना होगा। यदि आज गुरुजी अपनी पत्नी को किसी पर-पुरुष द्वारा दूषित देखते हैं, तो वे मुझे निस्सन्देह शाप दे देंगे। मुझे गुरुपत्नी के शरीर में समा जाना होगा। जिस प्रकार कमल के पत्ते पर पड़ी जल की बूँद निर्लिप्त रहती है, उसी प्रकार मैं भी अनासक्त भाव से उनके भीतर निवास करूँगा। मैं रजोगुण से मुक्त हूँ; अतः एक राह चलने वाले बटोही की भाँति मैं सावधानी से उनके शरीर में निवास करूँगा।'

योगेनाथ प्रवेशो हि गुरुपत्न्याः कलेवरे ॥

एवमेव शरीरेऽस्या निवत्स्यामि समाहितः ।
असक्तः पद्मपत्रस्थो जलबिन्दुर्यथाचलः ॥

‘ अतः मुझे गुरुपत्नीके शरीरमें योगबलसे प्रवेश करना चाहिये । जिस प्रकार कमलके पत्तेपर पड़ी हुई जलकी बूँद उसपर निर्लिप्त भावसे स्थिर रहती है उसी प्रकार मैं भी अनासक्त भावसे गुरुपत्नीके भीतर निवास करूँगा ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 40 · श्लोक 50-51पृष्ठ 447

इस प्रकार धर्म पर दृष्टि डालकर और अपनी तथा गुरु की प्रचुर तपस्या को ध्यान में रखकर, भृगुवंशी विपुल ने रक्षा का उपाय निश्चित किया। वे महा-तपस्वी विपुल गुरुपत्नी के पास बैठ गये और पास ही बैठी हुई निर्दोष अङ्गों वाली उस रुचिको अनेक प्रकार की कथा-वार्ता सुनाकर अपनी बातों में लुभाने लगे।"

अथवा पौरुषेणेयं न शक्या रक्षितुं मया ॥ ।
४५ ॥ बहुरूपो हि भगवान् श्रूयते पाकशासनः ।
सोऽहं योगबलादेनां रक्षिष्ये पाकशासनात् ॥

‘ अथवा पुरुषार्थके द्वारा मैं इसकी रक्षा नहीं कर सकता; क्योंकि ऐश्वर्यवाली पाकशासन इन्द्र बहुरूपिया सुने जाते हैं । अतः योगबलका आश्रय लेकर ही मैं इन्द्रसे इसकी रक्षा करूँगा ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 40 · श्लोक 46पृष्ठ 446

विपुल मुनि ने अपने दोनों नेत्रों की किरणों को रुचिका के नेत्रों की किरणों से जोड़ दिया और फिर आकाश में प्रविष्ट होने वाली वायु की भाँति, बिना किसी चेष्टा के, छाया के समान उसके शरीर में प्रवेश कर गए। वे उस स्थिर भाव से रुचिका के शरीर में समा गए कि उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो कोई छाया अन्तर्हित हो गई हो। इस प्रकार, उन्होंने गुरुपत्नी के शरीर को स्तम्भित कर उसकी रक्षा हेतु स्वयं को उसमें संलग्न कर लिया। जब तक महात्मा विपुल के गुरु देवशर्मा अपना यज्ञ पूर्ण करके अपने घर नहीं लौटे, तब तक विपुल इसी प्रकार अपनी गुरुपत्नी की रक्षा करते रहे।

तदनन्तर किसी समय, देवराज इन्द्र ने सोचा—'यही ऋषिपत्नी रुचिका को प्राप्त करने का अच्छा अवसर है।' यह विचार मन में लेकर उन्होंने एक अत्यन्त दिव्य और लुभावना रूप धारण किया और उस आश्रम में प्रवेश किया। वहाँ पहुँचकर इन्द्र ने देखा कि विपुल का शरीर चित्रलिखित की भाँति निश्चेष्ट पड़ा है और उनके नेत्र स्थिर हैं। दूसरी ओर, पूर्ण चन्द्रमा के समान मुख वाली रुचिका बैठी हुई थी, जिसके नेत्र विकसित कमलदल के समान विशाल थे और जिसका शरीर अत्यन्त सुशोभित था। इन्द्र का अनुपम रूप देखकर रुचिका के मन में उन्हें देखने और उनकी अगवानी करने की तीव्र इच्छा जागी। वह सहसा उठने ही वाली थी कि तभी विपुल ने योगबल से उसके शरीर को स्तब्ध कर दिया। वह हिल भी न सकी।

तब देवराज इन्द्र ने अत्यन्त मधुर वाणी में उसे समझाते हुए कहा—"पवित्र मुस्कान वाली देवी! मुझे देवताओं का राजा इन्द्र समझो! मैं तुम्हारे लिए ही यहाँ तक आया हूँ। तुम्हारा चिन्तन करने से मेरे हृदय में जो काम उत्पन्न हुआ है, वह मुझे बड़ा कष्ट दे रहा है। सुन्दरी! अब देर न करो, समय बीत रहा है।"

इस बीच, गुरुपत्नी के शरीर में बैठे हुए विपुल मुनि ने इन्द्र की यह बात सुन ली और उसे देख भी लिया। रुचिका तो विपुल द्वारा स्तब्ध कर दी गई थी, इसलिए वह न तो उठ सकी और न ही इन्द्र को कोई उत्तर दे सकी। विपुल ने उसकी चेष्टाओं को देखकर उसकी समस्त इन्द्रियों को योग-सम्बन्धी बन्धनों से बाँध दिया था। जब शचीपति इन्द्र ने रुचिका को काम-विकार से शून्य पाया, तो वे लज्जित होकर बोले—"सुन्दरी! आओ, आओ।"

बबन्ध योगबन्धैश्च तस्याः सर्वेन्द्रियाणि सः ।
तां निर्विकारां दृष्ट्वा तु पुनरेव शचीपतिः ॥

उवाच व्रीडितो राजंस्तां योगबलमोहिताम् ।
एह्येहीति ततः सा तु प्रतिवक्तुमियेष तम् ॥

उन्होंने गुरुपत्नी रुचिकी सम्पूर्ण इन्द्रियोंको योग- सम्बन्धी बन्धनोंसे बाँध लिया था । राजन्! योगबलसे मोहित हुई रुचिको काम-विकारसे शून्य देख शचीपति इन्द्र लज्जित हो गये और फिर उससे बोले – ' सुन्दरी! आओ, आओ। ' उनका आवाहन सुनकर वह फिर उन्हें कुछ उत्तर देनेकी इच्छा करने लगी ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 41 · श्लोक 12-13पृष्ठ 450

उनका आवाहन सुनकर रुचिका पुनः उत्तर देने का प्रयास करने लगी, किन्तु विपुल ने उसकी वाणी को बदल दिया। उसके मुख से सहसा निकल पड़ा—"अजी! यहाँ तुम्हारे आने का क्या प्रयोजन है?" जब उस चन्द्रोपम मुख से यह संस्कृत वाणी प्रकट हुई, तो पराधीन रुचिका लज्जित हो गई। इन्द्र उसकी बात सुनकर मन ही मन दुखी हुए और उसकी स्थिति को देखते हुए दिव्य दृष्टि से उसकी ओर देखा। जैसे ही उनकी दृष्टि विपुल मुनि पर पड़ी, वे डर गए। दर्पण में प्रतिबिम्ब की भाँति विपुल उनके शरीर के भीतर स्पष्ट परिलक्षित हो रहे थे। घोर तपस्या से युक्त विपुल मुनि को देखते ही इन्द्र शाप के भय से थर-थर काँपने लगे।

पुरन्दरश्च तत्रस्थो बभूव विमना भृशम् ।
स तद्वैकृतमालक्ष्य देवराजो विशाम्पते ॥

अवैक्षत सहस्राक्षस्तदा दिव्येन चक्षुषा ।
स ददर्श मुनिं तस्याः शरीरान्तरगोचरम् ॥

वहाँ खड़े हुए इन्द्र उसकी पूर्वोक्त बात सुनकर मन- ही- मन बहुत दुःखी हुए । प्रजानाथ! उसके मनोविकार एवं भाव - परिवर्तनको लक्ष्य करके सहस्र नेत्रोंवाले देवराज इन्द्रने दिव्य दृष्टिसे उसकी ओर देखा । फिर तो उसके शरीरके भीतर विपुल मुनिपर उनकी दृष्टि पड़ी ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 41 · श्लोक 16-17पृष्ठ 451

तभी महातपस्वी विपुल ने अपना शरीर रुचिका से निकालकर अपने वास्तविक रूप में आकर कहा—"पापात्मा पुरन्दर! तेरी बुद्धि बड़ी खोटी है। तू सदा इन्द्रियों का गुलाम बना रहता है। यदि यही दशा रही, तो देवता और मनुष्य तुझे अधिक काल तक पूजा नहीं करेंगे। क्या तू भूल गया कि महर्षि गौतम ने तेरे शरीर पर हजार चिह्न बनाकर तुझे जीवित छोड़ा था? तू महाचञ्चल और मूर्ख है। यह स्त्री मेरे द्वारा सुरक्षित है, तू जैसे आया है वैसे ही लौट जा। मैं अपने तेज से तुझे जलाकर भस्म कर सकता हूँ, पर दया करके ऐसा नहीं कर रहा। मेरे गुरु अत्यन्त भयङ्कर हैं, वे तुझे देखते ही क्रोध से दग्ध कर देंगे। आज से फिर कभी ऐसा काम न करना; ब्राह्मणों का सम्मान कर, अन्यथा तुझे काल के गाल में जाना पड़ेगा। यह मत समझ कि तू अमर है; किसी तपस्वी का अपमान मत कर, क्योंकि तपस्या से कोई भी कार्य असाध्य नहीं है।"

विपुल उवाच

अजितेन्द्रिय दुर्बुद्धे पापात्मक पुरन्दर ।
न चिरं पूजयिष्यन्ति देवास्त्वां मानुषास्तथा ॥

विपुलने कहा – ' पापात्मा पुरन्दर! तेरी बुद्धि बड़ी खोटी है । तू सदा इन्द्रियोंका गुलाम बना रहता है । यदि यही दशा रही तो अब देवता तथा मनुष्य अधिक कालतक तेरी पूजा नहीं करेंगे ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 41 · श्लोक 20पृष्ठ 451

भीष्म बोले—"राजन्! महात्मा विपुल का वह कथन सुनकर इन्द्र बहुत लज्जित हुए और बिना कुछ कहे वहीं अन्तर्धान हो गए। उनके जाने के एक ही मुहूर्त बाद, महातपस्वी देवशर्मा अपना यज्ञ पूर्ण करके आश्रम लौटे। विपुल ने उन्हें सुरक्षित अपनी भार्या रुचिका सौंपी और फिर स्वयं गुरु की सेवा में उपस्थित हो गए। जब गुरुदेव विश्राम करके पत्नी के साथ बैठे, तब विपल ने इन्द्र की सारी करतूत उन्हें सुनाई। यह सुनकर प्रतापी मुनि देवशर्मा अपने शिष्य के शील और धर्म-परायणता से अत्यन्त सन्तुष्ट हुए और बोले—'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा!' उन्होंने विपुल को इच्छानुसार वर माँगने को कहा। विपुल ने केवल यही वर माँगा—'मेरी धर्म में निरन्तर स्थिति बनी रहे।'

विपुलस्य गुरौ वृत्तिं भक्तिमात्मनि तत्प्रभुः ।
धर्मे च स्थिरतां दृष्ट्वा साधु साध्वित्यभाषत ॥

विपुलकी गुरुसेवावृत्ति, अपने प्रति भक्ति और धर्मविषयक दृढ़ता देखकर गुरुने ' बहुत अच्छा, बहुत अच्छा ' कहकर उनकी प्रशंसा की ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 41 · श्लोक 33पृष्ठ 453

इसके बाद, विपुल ने गुरु की आज्ञा पाकर अत्यन्त कठोर तपस्या आरम्भ की। इस तपस्या से उनकी शक्ति बहुत बढ़ गई और वे अपने आप को बड़ा भारी तपस्वी मानने लगे। उन्हें लगा कि उन्होंने दोनों लोक जीत लिए हैं। इसी बीच, रुचिका की बड़ी बहन प्रभावती का विवाह अङ्गराज चित्ररथ से हुआ था। एक दिव्य लोक की सुन्दरी द्वारा आकाश मार्ग से गिराए गए कुछ दिव्य पुष्पों को लेकर रुचिका अपनी बहन के यहाँ चली गई। जब उसने वे फूल अपनी बहन को दिखाए, तो प्रभावती ने भी वैसे ही फूल मँगवाए। लौटकर रुचिका ने यह बात अपने स्वामी देवशर्मा को बताई। तब देवशर्मा ने विपुल को बुलाकर उन फूलों को लाने का आदेश दिया। गुरु की आज्ञा पाकर महातपस्वी विपुल तुरन्त उस स्थान की ओर चल दिए जहाँ वे फूल गिरे थे और वहाँ उन्हें कई अन्य फूल भी मिले जो अभी कुम्हलाए नहीं थे।"

स ततस्तानि जग्राह दिव्यानि रुचिराणि च ।
प्राप्तानि स्वेन तपसा दिव्यगन्धानि भारत ॥

भारत! तदनन्तर अपने तपसे प्राप्त हुए उन दिव्य सुगन्धसे युक्त मनोहर दिव्य पुष्पोंको विपुलने उठा लिया ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 42 · श्लोक 15पृष्ठ 457

भीष्म पितामह कहते हैं— हे राजन्! तदनन्तर, गुरु की आज्ञा का पालन करने वाले महातपस्वी विपुल ने अपने तप से प्राप्त उन दिव्य, सुगन्धित और मनोहर पुष्पों को उठा लिया। मन ही मन अत्यन्त प्रसन्न होकर वे तुरन्त चम्पा के वृक्षों से घिरी उस चम्पा नगरी की ओर चल दिए।

किन्तु मार्ग में एक निर्जन वन उन्हें रोक लिया। वहाँ उन्होंने स्त्री-पुरुष का एक जोड़ा देखा, जो एक-दूसरे का हाथ थामे कुम्हार के चाक के समान तीव्र गति से घूम रहे थे। जैसे ही एक ने अपनी चाल तेज़ की, दूसरे ने नहीं की; और देखते ही देखते दोनों के बीच विवाद छिड़ गया। वे एक-दूसरे पर दोषारोपण करने लगे— 'तुम जल्दी चलते हो', 'नहीं, मैं नहीं!' अन्ततः बात शपथ तक जा पहुँची। उन दोनों ने विपुल को लक्ष्य करते हुए कहा— "हममें से जो भी झूठ बोलेगा, उसकी वही गति होगी जो परलोक में ब्राह्मण विपुल की नियत है!"

त्वं शीघ्रं गच्छसीत्येकोऽब्रवीन्नेति तथा परः ।
नेति नेति च तौ राजन् परस्परमथोचतुः ॥

नरेश्वर! एकने कहा — ' तुम जल्दी -जल्दी चलते हो । ' दूसरेने कहा, ' नहीं । ' इस प्रकार दोनों एक- दूसरेपर दोषारोपण करते हुए एक- दूसरेको ' नहीं- नहीं ' कह रहे थे ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 42 · श्लोक 19पृष्ठ 457

यह सुनकर विपुल के मुख पर विषाद छा गया। वे सोचने लगे, 'मैं इतनी कठोर तपस्या करने वाला हूँ, फिर भी मेरी दुर्गति होगी? क्या मेरा कोई ऐसा पाप हुआ है जिसके कारण मुझे वह अनिष्ट झेलना पड़ेगा जो इस जोड़े को मिलने वाला है?' दुखी और दीनचित्त होकर वे अपने दुष्कर्मों का स्मरण करने लगे। तभी उन्हें छह अन्य पुरुष दिखाई दिए, जो सोने-चाँदी के पासे लेकर हर्ष और लोभ में डूबे जुआ खेल रहे थे। उन छह पुरुषों ने भी वही शपथ दोहरा दी— "जो बेईमानी करेगा, उसे वही गति मिलेगी जो विपुल को मिलने वाली है!"

यह सुनकर विपुल का हृदय शोक की अग्नि में जलने लगा। उन्होंने जन्म से लेकर अब तक के अपने समस्त कर्मों को टटोल लिया, किन्तु उन्हें कहीं भी धर्म के साथ पाप का मिश्रण नहीं दिखा। वे व्याकुल होकर कई दिन और रातें सोचने में बिताने लगे। अन्ततः उनके मन में यह विचार उठा— 'जब मैंने गुरुपत्नी की रक्षा हेतु उनके शरीर में सूक्ष्म रूप से प्रवेश किया था, तब मेरी इन्द्रियाँ उनकी इन्द्रियों से और मेरा मुख उनके मुख से संयुक्त हुआ था। क्या यह अनुचित कार्य था? मैंने गुरुजी को यह सत्य क्यों नहीं बताया?' उन्हें लगा कि शायद यही उनका पाप है।

एतदात्मनि कौरव्य दुष्कृतं विपुलस्तदा ।
अमन्यत महाभाग तथा तच्च न संशयः ॥

महाभाग कुरुनन्दन! उस समय विपुलने अपने मनमें इसीको पाप माना और निस्संदेह बात भी ऐसी ही थी ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 42 · श्लोक 32पृष्ठ 460

तपस्वी विपुल चम्पा नगरी पहुँचे और वे पुष्प लेकर अपने गुरुदेव का विधिपूर्वक पूजन किया। जब महातेजस्वी देवशर्मा ने अपने प्रिय शिष्य को देखा, तो उन्होंने पूछा— "विपुल! उस महान वन में तुमने क्या देखा? वे लोग तो तुम्हें जानते हैं, उन्हें तुम्हारी अन्तरात्मा और मेरी पत्नी रुचिका का पूरा परिचय है।"

भीष्म उवाच

देवशर्मोवाच किं ते विपुल दृष्टं वै तस्मिन् शिष्य महावने ।
ते त्वां जानन्ति विपुल आत्मा च रुचिरेव च ॥

देवशर्माने पूछा — मेरे प्रिय शिष्य विपुल! तुमने उस महान् वनमें क्या देखा था? वे लोग तो तुम्हें जानते हैं । उन्हें तुम्हारी अन्तरात्माका तथा मेरी पत्नी रुचिका भी पूरा परिचय प्राप्त है ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 43 · श्लोक 2पृष्ठ 461

विपुल ने सङ्कोचवश पूछा— "ब्रह्मर्षे! वह स्त्री-पुरुष का जोड़ा कौन था? और वे छह पुरुष कौन थे जो मुझे पहचानते थे?"

देवशर्मा ने गम्भीर स्वर में कहा— "पुत्र! तुमने जिस जोड़े को देखा, वे 'दिन और रात्रि' हैं। वे चक्र की तरह घूमते रहते हैं और उन्हें तुम्हारे पाप का पता है। और वे छह पुरुष 'छह ऋतुएँ' हैं; वे भी तुम्हें जानते हैं। मनुष्य एकान्त में पापकर्म करके यह न समझे कि उसे कोई नहीं देख रहा; ऋतुएँ और रात-दिन सदा देखते रहते हैं। तुमने मेरी स्त्री की रक्षा करते समय जो कर्म किया, वह मुझे बताया नहीं; अतः तुम्हें वे ही पापाचारियों के लोक मिल सकते थे।"

कुर्वाणं हि नरं कर्म पापं रहसि सर्वदा ।
पश्यन्ति ऋतवश्चापि तथा दिननिशेऽप्युत ॥

एकान्तमें पापकर्म करते हुए पुरुषको ऋतुएँ तथा रात-दिन सदा देखते रहते हैं ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 43 · श्लोक 7पृष्ठ 462

विपुल का हृदय ग्लानि से भरा था, किन्तु देवशर्मा ने आगे कहा— "तुमने मुझसे अपना वह कर्म छिपाया जो भयरूप था। पापकर्म करके न बताने वाले पुरुष उन्हीं लोकों को प्राप्त होते हैं। पर सुनो, अपनी प्राणवल्लभा पत्नी का आलिङ्गन भाव से किया जाता है और पुत्री का वात्सल्य से; तुम्हारा भाव रक्षा का था।"

देवशर्मा ने विपुल की आँखों में देखते हुए कहा— "निष्कषायो विशुद्धस्त्वं रुच्यावेशान्न दूषितः। तुम सर्वथा विशुद्ध हो, इसलिए रुचिका के शरीर में प्रवेश करके भी दूषित नहीं हुए। यदि मैं तुम्हारे इस कर्म में दुराचार देखता, तो क्रोधित होकर तुम्हें शाप दे देता और मुझे कोई पश्चात्ताप नहीं होता। तुमने यथाशक्ति मेरी स्त्री की रक्षा की है, अतः मैं तुम पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम स्वस्थ रहकर स्वर्गलोक जाओगे।"

सज्जन्ति पुरुषे नार्यः पुंसां सोऽर्थश्च पुष्कलः ।
अन्यथारक्षतः शापोऽभविष्यत् ते मतिश्च मे ॥

स्त्रियाँ पुरुषमें आसक्त होती हैं और पुरुषोंका भी इसमें पूर्णतः वैसा ही भाव होता है । यदि तुम्हारा भाव उसकी रक्षा करनेके विपरीत होता तो तुम्हें शाप अवश्य प्राप्त होता और मेरा विचार तुम्हें शाप देनेका अवश्य हो जाता ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 43 · श्लोक 15पृष्ठ 463

इति कहकर महर्षि देवशर्मा अपने शिष्य और पत्नी के साथ स्वर्ग में सुख भोगने लगे।

भीष्म कहते हैं— हे कुन्तीनन्दन! यह कथा गङ्गा तट पर महामुनि मार्कण्डेय ने सुनाई थी। इसका मर्म यह है कि स्त्रियों की सदा रक्षा करनी चाहिए। संसार में स्त्रियाँ सौभाग्यशाली भी होती हैं और दुराचारी भी; उन्हें उनके लक्षणों से पहचाना जा सकता है। दुराचारिणी स्त्रियाँ कुल का नाश करने वाली होती हैं, जिन्हें केवल महामनस्वी पुरुष ही बचा सकते हैं। अतः मनुष्यों को स्त्रियों के प्रति न तो विशेष आसक्ति रखनी चाहिए और न ही ईर्ष्या। धर्म का आश्रय लेकर उनका उपभोग करना चाहिए। इस त्रिलोकी में केवल विपुल जैसा ही पुरुष था जिसने स्त्री की ऐसी रक्षा की।

तस्माद् ब्रवीमि पार्थ त्वां स्त्रियो रक्ष्याः सदैव च ।
उभयं दृश्यते तासु सततं साध्वसाधु च ॥

अतः कुन्तीनन्दन! मैं तुमसे कहता हूँ कि तुम्हें स्त्रियोंकी सदा ही रक्षा करनी चाहिये । स्त्रियोंमें भली और बुरी दोनों बातें हमेशा देखी जाती हैं ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 43 · श्लोक 19पृष्ठ 463

In English

The Story of Vipul and the Protection of Ruchika

To protect his wife Ruchika from Indra, the sage Devasharma asks his disciple Vipul to guard her. Vipul uses yogic power to enter Ruchika's body and paralyze her senses so she cannot respond to Indra's advances. When Indra arrives in various disguises, Vipul reveals himself from within her body to shame and frighten him away.

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