श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 431–440
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 431–440
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बोद्धव्यस्तादृशस्तात नरं श्वानं हि तं विदुः ॥ १४ ॥
जो ब्राह्मण अपने पाण्डित्यका अभिमान करके व्यर्थके तर्कका आश्रय लेकर वेदोंकी निन्दा करता है, आन्वीक्षिकी निरर्थक तर्कविद्यामें अनुराग रखता है, सत्पुरुषोंकी सभामें कोरी तर्ककी बातें कहकर विजय पाता, शास्त्रानुकूल युक्तियोंका प्रतिपादन नहीं करता, जोर- जोरसे हल्ला मचाता और ब्राह्मणोंके प्रति सदा अतिवाद ( अमर्यादित वचन) -का प्रयोग करता है, जो सबपर संदेह करता है, जो बालकों और मूर्खोका-सा व्यवहार करता तथा कटुवचन बोलता है, तात! ऐसे मनुष्यको अस्पृश्य समझना चाहिये । विद्वान् पुरुषोंने ऐसे पुरुषको कुत्ता माना है ॥ १२–१४ ॥
यथा श्वा भषितुं चैव हन्तुं चैवावसज्जते ।
एवं सम्भाषणार्थाय सर्वशास्त्रवधाय च ॥। १५ ॥
जैसे कुत्ता भूँकने और काटनेके लिये निकट आ जाता है, उसी प्रकार वह बहस करने और शास्त्रोंका खण्डन करनेके लिये इधर-उधर दौड़ता - फिरता है ( ऐसा व्यक्ति दानका पात्र नहीं है ) ॥ १५ ॥
लोकयात्रा च द्रष्टव्या धर्मश्चात्महितानि च ।
एवं नरो वर्तमानः शाश्वतीर्वर्धते समाः ॥ १६ ॥
मनुष्यको जगत्के व्यवहारपर दृष्टि डालनी चाहिये । धर्म और अपने कल्याणके उपायोंपर भी विचार करना चाहिये । ऐसा करनेवाला मनुष्य सदा ही अभ्युदयशील होता है ॥ १६ ॥
ऋणमुन्मुच्य देवानामृषीणां च तथैव च ।
पितॄणामथ विप्राणामतिथीनां च पञ्चमम् ॥ १७ ॥
पर्यायेण विशुद्धेन सुविनीतेन कर्मणा ।
एवं गृहस्थः कर्माणि कुर्वन् धर्मान्न हीयते ॥ १८ ॥
जो यज्ञ- यागादि करके देवताओंके ऋणसे, वेदोंका स्वाध्याय करके ऋषियोंके ऋणसे, श्रेष्ठ पुत्रकी उत्पत्ति तथा श्राद्ध करके पितरोंके ऋणसे, दान देकर ब्राह्मणोंके ऋणसे और आतिथ्य सत्कार करके अतिथियोंके ऋणसे मुक्त होता है तथा क्रमशः विशुद्ध और विनययुक्त प्रयत्नसे शास्त्रोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करता है, वह गृहस्थ कभी धर्मसे भ्रष्ट नहीं होता ॥ १७-१८ ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पात्रपरीक्षायां सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पात्रकी परीक्षाविषयक सैंतीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥
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अष्टत्रिंशोऽध्यायः पञ्चचूड़ा अप्सराका नारदजीसे स्त्रियोंके दोषोंका वर्णन करना युधिष्ठिर उवाच
स्त्रीणां स्वभावमिच्छामि श्रोतुं भरतसत्तम ।
स्त्रियो हि मूलं दोषाणां लघुचित्ता हि ताः स्मृताः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा — भरतश्रेष्ठ! मैं स्त्रियोंके स्वभावका वर्णन सुनना चाहता हूँ; क्योंकि
सारे दोषोंकी जड़ स्त्रियाँ ही हैं । वे ओछी बुद्धिवाली मानी गयी हैं ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
नारदस्य च संवादं पुंश्चल्या पञ्चचूडया ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! इस विषयमें देवर्षि नारदका अप्सरा पञ्चचूड़ाके साथ जो संवाद हुआ था, उसी प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २ ॥
लोकाननुचरन् सर्वान् देवर्षिर्नारदः पुरा ।
ददर्शाप्सरसं ब्राह्मीं पञ्चचूडामनिन्दिताम् ॥ ३ ॥
पहलेकी बात है, सम्पूर्ण लोकोंमें विचरते हुए देवर्षि नारदने एक दिन ब्रह्मलोककी अनिन्द्य सुन्दरी अप्सरा पञ्चचूड़ाको देखा ॥ ३ ॥
तां दृष्ट्वा चारुसर्वाङ्गीं पप्रच्छाप्सरसं मुनिः ।
संशयो हृदि कश्चिन्मे ब्रूहि तन्मे सुमध्यमे ॥ ४ ॥
मनोहर अंगोंसे युक्त उस अप्सराको देखकर मुनिने उसके सामने अपना प्रश्न रखा –' सुमध्यमे! मेरे हृदयमें एक महान् संदेह है । उसके विषयमें मुझे यथार्थ बात बताओ ' ॥ ४ ॥
भीष्म उवाच
एवमुक्ताथ सा विप्रं प्रत्युवाचाथ नारदम् ।
विषये सति वक्ष्यामि समर्थं मन्यसे च माम् ॥ ५ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! नारदजीके ऐसा कहनेपर पंचचूड़ा अप्सराने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया — ‘ यदि आप मुझे उस प्रश्नका उत्तर देनेके योग्य मानते हैं और वह बताने योग्य है तो अवश्य बताऊँगी ' ॥ ५ ॥
नारद उवाच
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न त्वामविषये भद्रे नियोक्ष्यामि कथंचन ।
स्त्रीणां स्वभावमिच्छामि त्वत्तः श्रोतुं वरानने ॥ ६ ॥
नारदजीने कहा— भद्रे! मैं तुम्हें ऐसी बात बतानेके लिये नहीं कहूँगा जो कहने योग्य न हो; अथवा तुम्हारा विषय न हो । सुमुखि! मैं तुम्हारे मुँहसे स्त्रियोंके स्वभावका वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ ६ ॥
भीष्म उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य देवर्षेरप्सरोत्तमा ।
प्रत्युवाच न शक्ष्यामि स्त्री सती निन्दितुं स्त्रियः ॥ ७ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! नारदजीका यह वचन सुनकर वह उत्तम अप्सरा बोली —‘देवर्षे! मैं स्त्री होकर स्त्रियोंकी निन्दा नहीं कर सकती ॥ ७ ॥
विदितास्ते स्त्रियो याश्च यादृशाश्च स्वभावतः ।
न मामर्हसि देवर्षे नियोक्तुं कार्य ईदृशे ॥ ८ ॥
‘ संसारमें जैसी स्त्रियाँ हैं और उनके जैसे स्वभाव हैं, वे सब आपको विदित हैं; अतः देवर्षे! आप मुझे ऐसे कार्यमें न लगावें ' ॥ ८ ॥
तामुवाच स देवर्षिः सत्यं वद सुमध्यमे ।
मृषावादे भवेद् दोषः सत्ये दोषो न विद्यते ॥ ९ ॥
तब देवर्षिने उससे कहा – ' सुमध्यमे! तुम सच्ची बात बताओ । झूठ बोलनेमें दोष लगता है । सच कहनेमें कोई दोष नहीं है ' ॥ ९ ॥
इत्युक्ता सा कृतमतिरभवच्चारुहासिनी ।
स्त्रीदोषान् शाश्वतान् सत्यान् भाषितुं सम्प्रचक्रमे ॥ १० ॥
उनके इस प्रकार समझानेपर उस मनोहर हास्यवाली अप्सराने कहनेके लिये दृढ़ निश्चय करके स्त्रियोंके सच्चे और स्वाभाविक दोषोंको बताना आरम्भ किया ॥ १० ॥
पञ्चचूडोवाच
कुलीना रूपवत्यश्च नाथवत्यश्च योषितः ।
मर्यादासु न तिष्ठन्ति स दोषः स्त्रीषु नारद ॥ ११ ॥
पंचचूड़ा बोली – नारदजी! कुलीन, रूपवती और सनाथ युवतियाँ भी मर्यादाके भीतर
नहीं रहती हैं । यह स्त्रियोंका दोष है ॥ ११ ॥
न स्त्रीभ्यः किञ्चिदन्यद् वै पापीयस्तरमस्ति वै ।
स्त्रियो हि मूलं दोषाणां तथा त्वमपि वेत्थ ह ॥ १२ ॥
स्त्रियोंसे बढ़कर पापिष्ठ दूसरा कोई नहीं है । स्त्रियाँ सारे दोषोंकी जड़ हैं, इस बातको आप भी अच्छी तरह जानते हैं ॥ १२ ॥
समाज्ञातानृद्धिमतः प्रतिरूपान् वशे स्थितान् ।
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पतीनन्तरमासाद्य नालं नार्यः प्रतीक्षितुम् ॥ १३ ॥
यदि स्त्रियोंको दूसरोंसे मिलनेका अवसर मिल जाय तो वे सद्गुणोंमें विख्यात, धनवान्, अनुपम रूप - सौन्दर्यशाली तथा अपने वशमें रहनेवाले पतियोंकी भी प्रतीक्षा नहीं कर सकतीं ॥ १३ ॥
असद्धर्मस्त्वयं स्त्रीणामस्माकं भवति प्रभो ।
पापीयसो नरान् यद् वै लज्जां त्यक्त्वा भजामहे ॥ १४ ॥
प्रभो! हम स्त्रियोंमें यह सबसे बड़ा पातक है कि हम पापीसे पापी पुरुषोंको भी लाज छोड़कर स्वीकार कर लेती हैं ॥ १४ ॥
स्त्रियं हि यः प्रार्थयते संनिकर्षं च गच्छति ।
ईषच्च कुरुते सेवां तमेवेच्छन्ति योषितः ॥ १५ ॥
जो पुरुष किसी स्त्रीको चाहता है, उसके निकटतक पहुँचता है और उसकी थोड़ी - सी सेवा कर देता है, उसीको वे युवतियाँ चाहने लगती हैं ॥ १५ ॥
अनर्थित्वान्मनुष्याणां भयात् परिजनस्य च ।
मर्यादायाममर्यादाः स्त्रियस्तिष्ठन्ति भर्तृषु ॥ १६ ॥
स्त्रियोंमें स्वयं मर्यादाका कोई ध्यान नहीं रहता । जब उनको कोई चाहनेवाला पुरुष न मिले और परिजनोंका भय बना रहे तथा पति पास हों, तभी ये नारियाँ मर्यादाके भीतर रह पाती हैं ॥ १६ ॥
नासां कश्चिदगम्योऽस्ति नासां वयसि निश्चयः ।
विरूपं रूपवन्तं वा पुमानित्येव भुञ्जते ॥ १७ ॥
इनके लिये कोई भी पुरुष ऐसा नहीं है जो अगम्य हो । उनका किसी अवस्था - विशेषपर भी निश्चय नहीं रहता । कोई रूपवान् हो या कुरूप; पुरुष है – इतना ही समझकर स्त्रियाँ उसका उपभोग करती हैं ॥ १७ ॥
न भयान्नाप्यनुक्रोशान्नार्थहेतोः कथंचन ।
न ज्ञातिकुलसम्बन्धात् स्त्रियस्तिष्ठन्ति भर्तृषु ॥ १८ ॥
स्त्रियाँ न तो भयसे, न दयासे, न धनके लोभसे और न जाति या कुलके सम्बन्धसे ही पतियोंके पास टिकती हैं ॥ १८ ॥
यौवने वर्तमानानां मृष्टाभरणवाससाम् ।
नारीणां स्वैरवृत्तीनां स्मृहयन्ति कुलस्त्रियः ॥ १ ९ ॥
जो जवान हैं, सुन्दर गहने और अच्छे कपड़े पहनती हैं, ऐसी स्वेच्छाचारिणी स्त्रियोंके चरित्रको देखकर कितनी ही कुलवती स्त्रियाँ भी वैसी ही बननेकी इच्छा करने लगती हैं ॥ १ ९ ॥
याश्च शश्वद् बहुमता रक्ष्यन्ते दयिताः स्त्रियः ।
अपि ताः सम्प्रसज्जन्ते कुब्जान्धजडवामनैः ॥ २० ॥
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जो बहुत सम्मानित और पतिकी प्यारी स्त्रियाँ हैं, जिनकी सदा अच्छी तरह रखवाली की जाती है वे भी घरमें आने- जानेवाले कुबड़ों, अन्धों, गूंगों और बौनोंके साथ भी फँस जाती हैं ॥ २० ॥
पङ्गुष्वथ च देवर्षे ये चान्ये कुत्सिता नराः ।
स्त्रीणामगम्यो लोकेऽस्मिन् नास्ति कश्चिन्महामुने ॥ २१ ॥
महामुनि देवर्षे! जो पंगु हैं अथवा जो अत्यन्त घृणित मनुष्य हैं, उनमें भी स्त्रियोंकी आसक्ति हो जाती है । इस संसारमें कोई भी पुरुष स्त्रियोंके लिये अगम्य नहीं है ॥ २१ ॥
यदि पुंसां गतिर्ब्रह्मन् कथंचिन्नोपपद्यते ।
अप्यन्योन्यं प्रवर्तन्ते न हि तिष्ठिन्ति भर्तृषु ॥ २२ ॥
ब्रह्मन्! यदि स्त्रियोंको पुरुषकी प्राप्ति किसी प्रकार भी सम्भव न हो और पति भी दूर गये हों तो वे आपसमें ही कृत्रिम उपायोंसे ही मैथुनमें प्रवृत्त हो जाती हैं ॥ २२ ॥
अलाभात् पुरुषाणां हि भयात् परिजनस्य च ।
वधबन्धभयाच्चापि स्वयं गुप्ता भवन्ति ताः ॥ २३ ॥
पुरुषोंके न मिलनेसे, घरके दूसरे लोगोंके भयसे तथा वध और बन्धनके डरसे ही स्त्रियाँ सुरक्षित रहती हैं ॥ २३ ॥
चलस्वभावा दुःसेव्या दुर्ग्राह्या भावतस्तथा ।
प्राज्ञस्य पुरुषस्येह यथा वाचस्तथा स्त्रियः ॥ २४ ॥
स्त्रियोंका स्वभाव चंचल होता है । उनका सेवन बहुत ही कठिन काम है । इनका भाव जल्दी किसीके समझमें नहीं आता; ठीक उसी तरह, जैसे विद्वान् पुरुषकी वाणी दुर्बोध होती है ॥ २४ ॥
नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां नापगानां महोदधिः ।
नान्तकः सर्वभूतानां न पुंसां वामलोचनाः ॥ २५ ॥
अग्नि कभी ईंधनसे तृप्त नहीं होती, समुद्र कभी नदियोंसे तृप्त नहीं होता, मृत्यु समस्त प्राणियोंको एक साथ पा जाय तो भी उनसे तृप्त नहीं होती; इसी प्रकार सुन्दर नेत्रोंवाली युवतियाँ पुरुषोंसे कभी तृप्त नहीं होतीं ॥ २५ ॥
इदमन्यच्च देवर्षे रहस्यं सर्वयोषिताम् ।
दृष्ट्वैव पुरुषं हृद्यं योनिः प्रक्लिद्यते स्त्रियाः ॥ २६ ॥
देवर्षे! सम्पूर्ण रमणियोंके सम्बन्धमें दूसरी भी रहस्यकी बात यह है कि किसी मनोरम पुरुषको देखते ही स्त्रीकी योनि गीली हो जाती है ॥ २६ ॥
कामानामपि दातारं कर्तारं मनसां प्रियम् ।
रक्षितारं न मृष्यन्ति स्वभर्तारमलं स्त्रियः ॥ २७ ॥
सम्पूर्ण कामनाओंके दाता तथा मनचाही करनेवाला पति भी यदि उनकी रक्षामें तत्पर रहनेवाला हो तो वे अपने पतिके शासनको भी सहन नहीं कर सकतीं ॥ २७ ॥
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न कामभोगान् विपुलान् नालंकारान् न संश्रयान् ।
तथैव बहु मन्यन्ते यथा रत्यामनुग्रहम् ॥ २८ ॥
वे न तो काम - भोगकी प्रचुर सामग्रीको, न अच्छे - अच्छे गहनोंको और न उत्तम घरोंको ही उतना अधिक महत्त्व देती हैं, जैसा कि रतिके लिये किये गये अनुग्रहको ॥ २८ ॥
अन्तकः पवनो मृत्युः पातालं वडवामुखम् ।
क्षुरधारा विषं सर्पो वह्निरित्येकतः स्त्रियः ॥ २ ९ ॥
यमराज, वायु, मृत्यु, पाताल, बड़वानल, धुरेकी धार, विष, सर्प और अग्नि— ये सब विनाशके हेतु एक तरफ और स्त्रियाँ अकेली एक तरफ बराबर हैं ॥ २ ९ ॥ यतश्च भूतानि महान्ति पञ्च
यतश्च लोका विहिता विधात्रा ।
यतः पुमांसः प्रमदाश्च निर्मिता- स्तदैव दोषाः प्रमदासु नारद ॥ ३० ॥
नारद! जहाँसे पाँचों महाभूत उत्पन्न हुए हैं, जहाँसे विधाताने सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि की है तथा जहाँसे पुरुषों और स्त्रियोंका निर्माण हुआ है, वहींसे स्त्रियोंमें ये दोष भी रचे गये हैं ( अर्थात् ये स्त्रियोंके स्वाभाविक दोष हैं ) ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पञ्चचूडानारदसंवादे अष्टत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पंचचूड़ा और नारदका संवादविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८ ॥
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एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः स्त्रियोंकी रक्षाके विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न युधिष्ठिरउवाच
इमे वै मानवा लोके स्त्रीषु सज्जन्त्यभीक्ष्णशः ।
मोहेन परमाविष्टा देवसृष्टेन पार्थिव ॥ १ ॥
युधिष्ठिर बोले – पृथ्वीनाथ! संसारके ये मनुष्य विधाताद्वारा उत्पन्न किये गये महान् मोहसे आविष्ट हो सदा ही स्त्रियोंमें आसक्त होते हैं ॥ १ ॥
स्त्रियश्च पुरुषेष्वेव प्रत्यक्षं लोकसाक्षिकम् ।
अत्र मे संशयस्तीव्रो हृदि सम्परिवर्तते ॥ २ ॥
इसी तरह स्त्रियाँ भी पुरुषोंमें ही आसक्त होती हैं । यह बात प्रत्यक्ष देखी जाती है और लोग इसके साक्षी हैं । इस बातको लेकर मेरे मनमें भारी संदेह खड़ा हो गया है ॥ २ ॥
कथमासां नराः सङ्गं कुर्वते कुरुनन्दन ।
स्त्रियो वा केषु रज्यन्ते विरज्यन्ते च ताः पुनः ॥ ३ ॥
कुरुनन्दन! पुरुष क्यों इन स्त्रियोंका संग करते हैं? अथवा स्त्रियाँ भी किस निमित्तसे पुरुषोंमें अनुरक्त एवं विरक्त होती हैं ॥ ३ ॥
इति ताः पुरुषव्याघ्र कथं शक्यास्तु रक्षितुम् ।
प्रमदाः पुरुषेणेह तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ४ ॥
बता पुरुषसिंहकृपा! करेंपुरुष। यौवनसे उन्मत्त स्त्रियोंकी रक्षा कैसे कर सकता है? यह विस्तारपूर्वक
एता हि रममाणास्तु वञ्चयन्तीह मानवान् ।
न चासां मुच्यते कश्चित् पुरुषो हस्तमागतः ॥ ५ ॥
ये रमण करती हुई भी यहाँ पुरुषोंको ठगती रहती हैं । इनके हाथमें आया हुआ कोई भी पुरुष इनसे बचकर नहीं जा सकता ॥ ५ ॥
गावो नवतृणानीव गृह्णन्त्येता नवं नवम् ।
शम्बरस्य च या माया माया या नमुचेरपि ॥ ६ ॥
बलेः कुम्भीनसेश्चैव सर्वास्ता योषितो विदुः । जैसे गौएँ नयी - नयी घास चरती हैं, उसी प्रकार ये नारियाँ नये - नये पुरुषको अपनाती रहती हैं । शम्बरासुरकी जो माया है तथा नमुचि, बलि और कुम्भीनसीकी जो मायाएँ हैं, उन सबको ये युवतियाँ जानती हैं ॥ ६३ ॥
हसन्तं प्रहसन्त्येता रुदन्तं प्ररुदन्ति च ॥ ७ ॥
अप्रियं प्रियवाक्यैश्च गृह्णते कालयोगतः ।
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पुरुषको हँसते देख ये स्त्रियाँ जोर- जोरसे हँसती हैं । उसे रोते देख स्वयं भी फूट-फूटकर रोने लगती हैं और अवसर आनेपर अप्रिय पुरुषको प्रिय वचनोंद्वारा अपना लेती हैं ॥ ७३ ॥
उशना वेद यच्छास्त्रं यच्च वेद बृहस्पतिः ॥ ८ ॥
स्त्रीबुद्ध्या न विशिष्येत तास्तु रक्ष्याः कथं नरैः । जिस नीतिशास्त्रको शुक्राचार्य जानते हैं, जिसे बृहस्पति जानते हैं, वह भी स्त्रीकी
बुद्धिसे बढ़कर नहीं है । ऐसी स्त्रियोंकी रक्षा पुरुष कैसे कर सकते हैं ॥ ८३ ॥
अनृतं सत्यमित्याहुः सत्यं चापि तथानृतम् ॥ ९ ॥
इति यास्ताः कथं वीर संरक्ष्याः पुरुषैरिह । वीर! जिनके झूठको भी सच और सचको भी झूठ बताया गया है, ऐसी स्त्रियोंकी रक्षा पुरुष यहाँ कैसे कर सकते हैं? ॥ ९ ३ ॥ स्त्रीणां बुद्ध्यर्थनिष्कर्षादर्थशास्त्राणि शत्रुहन् ॥ १० ॥
बृहस्पतिप्रभृतिभिर्मन्ये सद्भिः कृतानि वै । शत्रुघाती नरेश! मुझे तो ऐसा लगता है कि स्त्रियोंकी बुद्धिमें जो अर्थ भरा है, उसीका निष्कर्ष ( सारांश ) लेकर बृहस्पति आदि सत्पुरुषोंने नीतिशास्त्रोंकी रचना की है ॥ १०३ ॥
सम्पूज्यमानाः पुरुषैर्विकुर्वन्ति मनो नृषु ॥ ११ ॥
अपास्ताश्च तथा राजन् विकुर्वन्ति मनः स्त्रियः । नरेश्वर! पुरुषोंद्वारा सम्मानित होनेपर भी ये रमणियाँ उनका मन विकृत कर देती हैं और उनके द्वारा तिरस्कृत होनेपर भी उनके मनमें विकार उत्पन्न कर देती हैं ॥ ११३ ॥
इमाः प्रजा महाबाहो धार्मिक्य इति नः श्रुतम् ॥ १२ ॥
सत्कृतासत्कृताश्चापि विकुर्वन्ति मनः सदा ।
कस्ताः शक्तो रक्षितुं स्यादिति मे संशयो महान् ॥ १३ ॥
महाबाहो! हमने सुन रखा है कि ये स्त्रीरूपिणी प्रजाएँ बड़ी धार्मिक होती हैं ( जैसा कि सावित्री आदिके जीवनसे प्रत्यक्ष हो चुका है ); फिर भी ये स्त्रियाँ सम्मानित हों या असम्मानित, सदा ही पुरुषोंके मनमें विकार उत्पन्न करती रहती हैं । उनकी रक्षा कौन कर सकता है? यही मेरे मनमें महान् संशय है ॥ १२-१३ ॥
तथा ब्रूहि महाभाग कुरूणां वंशवर्धन ।
यदि शक्या कुरुश्रेष्ठ रक्षा तासां कदाचन ॥
कर्तुं वा कृतपूर्वं वा तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १४ ॥
महाभाग! कुरुकुलवर्धन! कुरुश्रेष्ठ! यदि किसी प्रकार कभी भी उनकी रक्षा की जा सके तो वह बताइये । यदि किसीने पहले कभी किसी स्त्रीकी रक्षा की हो तो वह कथा भी मुझे विस्तारके साथ बताइये ॥ १४ ॥
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इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि स्त्रीस्वभावकथने एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें स्त्रियोंके स्वभावका वर्णनविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ९ ॥
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चत्वारिंशोऽध्यायः भृगुवंशी विपुलके द्वारा योगबलसे गुरुपत्नीके शरीरमें प्रवेश करके उसकी रक्षा करना भीष्म उवाच
एवमेव महाबाहो नात्र मिथ्यास्ति किंचन ।
यथा ब्रवीषि कौरव्य नारीं प्रति जनाधिप ॥ १ ॥
भीष्मजीने कहा – महाबाहो! कुरुनन्दन! ऐसी ही बात है । नरेश्वर! नारियोंके सम्बन्धमें तुम जो कुछ कह रहे हो, उसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है ॥ १ ॥
अत्र ते वर्तयिष्यामि इतिहासं पुरातनम् ।
यथा रक्षा कृता पूर्वं विपुलेन महात्मना ॥ २ ॥
इस विषयमें मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास बताऊँगा कि पूर्वकालमें महात्मा विपुलने किस प्रकार एक स्त्री (गुरुपत्नी ) - की रक्षा की थी ॥ २ ॥
प्रमदाश्च यथा सृष्टा ब्रह्मणा भरतर्षभ ।
यदर्थं तच्च ते तात प्रवक्ष्यामि नराधिप ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! तात! नरेश्वर! ब्रह्माजीने जिस प्रकार और जिस उद्देश्यसे युवतियोंकी सृष्टि की है, वह सब मैं तुम्हें बताऊँगा ॥ ३ ॥
न हि स्त्रीभ्यः परं पुत्र पापीयः किंचिदस्ति वै ।
अग्निर्हि प्रमदा दीप्तो मायाश्च मयजा विभो ॥ ४ ॥
बेटा! स्त्रियोंसे बढ़कर पापिष्ठ दूसरा कोई नहीं है । यौवन- मदसे उन्मत्त रहनेवाली स्त्रियाँ वास्तवमें प्रज्वलित अग्निके समान हैं। प्रभो! वे मयदानवकी रची हुई माया हैं ॥ ४ ॥
क्षुरधारा विषं सर्पो वह्निरित्येकतः स्त्रियः ।
प्रजा इमा महाबाहो धार्मिक्य इति नः श्रुतम् ॥ ५ ॥
स्वयं गच्छन्ति देवत्वं ततो देवानियाद् भयम् । छुरेकी धार, विष, सर्प और आग– ये सब विनाशके हेतु एक ओर और तरुणी स्त्रियाँ एक ओर । महाबाहो! पहले यह सारी प्रजा धार्मिक थी । यह हमने सुन रखा है । वे प्रजाएँ
स्वयं देवत्वको प्राप्त हो जाती थीं । इससे देवताओंको बड़ा भय हुआ ॥ ५३ ॥
अथाभ्यगच्छन् देवास्ते पितामहमरिंदम ॥ ६ ॥
निवेद्य मानसं चापि तूष्णीमासन्नधोमुखाः ।