श्रीगणेशाय नमः।

युधिष्ठिरादिधृतराष्ट्रसमागम : अकेलेपन और शोक के क्षणों में परिजनों का मिलन कैसे होता है?

पारिवारिक एकता और पहचान

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड ६ · पर्व → आश्रमवासपर्व · अध्याय 24 · पृष्ठ 2350–2353

508 शब्द · 3 मिनटका पाठ · 4 श्लोक

वैशम्पायन ने जनमेजय से कहा

अतीत की घटनाओं के माध्यम से वर्तमान की समस्याओं का समाधान बताने हेतु

वैशम्पायनजी कहते हैं—हे जनमेजय! तदनन्तर वे समस्त पाण्डव दूरसे ही अपनी सवारियों से उतर पड़े और पैदल चलकर बड़ी विनय के साथ राजा धृतराष्ट्र के आश्रम पर आए। उनके साथ आए हुए समस्त सैनिक, राज्य के निवासी मनुष्य तथा कुरुवंश के प्रधान पुरुषों की स्त्रियाँ भी पैदल ही आश्रम तक पहुँचीं। धृतराष्ट्र का वह पवित्र आश्रम मनुष्यों से सूना था; वहाँ सब ओर मृगों के झुण्ड विचर रहे थे और केले का सुन्दर उद्यान उस आश्रम की शोभा बढ़ा रहा था। पाण्डव लोग ज्यों ही उस आश्रम में पहुँचे, त्यों ही वहाँ नियमपूर्वक व्रतों का पालन करने वाले बहुत-से तपस्वी कौतूहलवश उन पाण्डवों को देखने के लिये वहाँ एकत्र हो गए।

उस समय राजा युधिष्ठिर ने उन सबको प्रणाम किया और नेत्रों में आँसू भरकर पूछा—'मुनिवरो! कौरववंश का पालन करने वाले हमारे ज्येष्ठ पिता इस समय कहाँ गये हैं?' मुनियों ने उत्तर दिया—'प्रभो! वे यमुना में स्नान करने, फूल लाने और पानी का घड़ा भरने के लिये गये हुए हैं।' यह सुनकर पाण्डव उसी बताए हुए मार्ग से यमुनातट की ओर चल दिए। कुछ ही दूर जाने पर उन्होंने उन सबको वहाँ से आते देखा।

तैराख्यातेन मार्गेण ततस्ते जग्मुरञ्जसा ।
ददृशुश्चाविदूरे तान् सर्वानथ पदातयः ॥

यह सुनकर उन्हींके बताये हुए मार्गसे वे सब- के - सब पैदल ही यमुनातटकी ओर चल दिये । कुछ ही दूर जानेपर उन्होंने उन सब लोगोंको वहाँसे आते देखा ।

महाभारत · पर्व · आश्रमवासपर्व · अध्याय 24 · श्लोक 7पृष्ठ 2352

फिर समस्त पाण्डव अपने ताऊ के दर्शन की इच्छा से बड़ी उतावली के साथ आगे बढ़े। बुद्धिमान सहदेव तो बड़े वेग से दौड़े और जहाँ कुन्ती थीं, वहाँ पहुँचकर माता के दोनों चरण पकड़कर फूट-फूटकर रोने लगे। कुन्ती ने जब अपने प्यारे पुत्र सहदेव को देखा, तो उनके मुख पर आँसुओं की धारा बह चली। उन्होंने दोनों हाथों से पुत्र को उठाकर अपनी छाती से लगा लिया और गान्धारी से कहा—'दीदी! सहदेव आपकी सेवा में उपस्थित है।' तदनन्तर राजा युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन तथा नकुल को देखकर कुन्ती देवी बड़ी उतावली के साथ उनकी ओर चलीं। वे आगे-आगे चलती थीं और उन पुत्रहीन दम्पतिकों को अपने साथ खींच लाती थीं। उन्हें देखते ही पाण्डव उनके चरणों में पृथ्वी पर गिर पड़े।

सा च बाष्पाकुलमुखी ददर्श दयितं सुतम् ॥

बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य समुन्नाम्य च पुत्रकम् ।
गान्धार्याः कथयामास सहदेवमुपस्थितम् ॥

अनन्तरं च राजानं भीमसेनमथार्जुनम् ।
नकुलं च पृथा दृष्ट्वा त्वरमाणोपचक्रमे ॥

कुन्तीने भी जब अपने प्यारे पुत्र सहदेवको देखा तो उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली । उन्होंने दोनों हाथोंसे पुत्रको उठाकर छातीसे लगा लिया और गान्धारीसे कहा —‘दीदी! सहदेव आपकी सेवामें उपस्थित है ' । तदनन्तर राजा युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन तथा नकुलको देखकर कुन्तीदेवी बड़ी उतावलीके साथ उनकी ओर चलीं ।

महाभारत · पर्व · आश्रमवासपर्व · अध्याय 24 · श्लोक 9–11पृष्ठ 2352

महामना बुद्धिमान राजा धृतराष्ट्र ने बोलने के स्वर से और स्पर्श से पाण्डवों को पहचान लिया और उन सबको आश्वासन दिया। तत्पश्चात् अपने नेत्रों के आँसू पोंछकर महात्मा पाण्डवों ने गान्धारी सहित राजा धृतराष्ट्र तथा माता कुन्ती को विधिपूर्वक प्रणाम किया। इसके बाद माता से बार-बार सान्त्वना पाकर, जब पाण्डव कुछ स्वस्थ एवं सचेत हुए, तब उन्होंने उन सबके हाथ से जल के भरे हुए कलश स्वयं ले लिये।

राजा तान् स्वरयोगेन स्पर्शन च महामनाः ।
प्रत्यभिज्ञाय मेधावी समाश्वासयत प्रभुः ॥

महामना बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रने बोलनेके स्वरसे और स्पर्शसे पाण्डवोंको पहचानकर उन सबको आश्वासन दिया ।

महाभारत · पर्व · आश्रमवासपर्व · अध्याय 24 · श्लोक 13पृष्ठ 2352

तदनन्तर उन पुरुषसिंहों की स्त्रियों तथा अन्तःपुर की दूसरी स्त्रियों ने और नगर एवं जनपद के लोगों ने भी क्रमशः राजा धृतराष्ट्र का दर्शन किया। उस समय स्वयं राजा युधिष्ठिर ने एक-एक व्यक्ति का नाम और गोत्र बताकर परिचय दिया। परिचय पाकर धृतराष्ट्र ने उन सबका वाणी द्वारा सत्कार किया। उन सबसे घिरे हुए राजा धृतराष्ट्र अपने नेत्रों से हर्ष के आँसू बहाने लगे; उन्हें ऐसा जान पड़ा मानो वे पहले की ही भाँति हस्तिनापुर के राजमहल में बैठे हों। इसके बाद द्रौपदी आदि बहुओं ने गान्धारी और कुन्ती सहित बुद्धिमान राजा धृतराष्ट्र को प्रणाम किया और उन्होंने भी उन सबको आशीर्वाद देकर प्रसन्न किया। इसके बाद वे सबके साथ सिद्ध और चारणों से सेवित अपने आश्रम पर आये; उस समय उनका आश्रम दर्शकों से तारों द्वारा व्याप्त आकाश की भाँति भरा हुआ था।

ततश्चाश्रममागच्छत् सिद्धचारणसेवितम् ।
दिदृक्षुभिः समाकीर्णं नभस्तारागणैरिव ॥

इसके बाद वे सबके साथ सिद्ध और चारणोंसे सेवित अपने आश्रमपर आये । उस समय उनका आश्रम तारोंसे व्याप्त हुए आकाशकी भाँति दर्शकोंसे भरा था ।

महाभारत · पर्व · आश्रमवासपर्व · अध्याय 24 · श्लोक 20पृष्ठ 2353

In English

The Pandavas visit Dhritarashtra's ashram

The Pandava brothers and their followers arrive at the ashram of King Dhritarashtra. After finding Kunti and Gandhari, the Pandavas reunite with them and help carry water vessels. The group then gathers around Dhritarashtra, who welcomes everyone as they visit his remote dwelling.

This page answers

  • Where did dhritarashtra go to get water?
  • How did sahadeva react when he saw kunti?
  • Who were the women that visited the ashram?
  • What did yudhishthira do to introduce the visitors?

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