भगवतीमाहात्म्य : असीमित शक्ति प्राप्त करने के बाद अहङ्कार का परिणाम क्या होता है?
अहङ्कार और विनाश का मार्ग
श्रीमद्देवीभागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 3 · पृष्ठ 550–554
896 शब्द · 5 मिनटका पाठ · 6 श्लोक
व्यास ने कहा
महिषासुर की दिग्विजय और स्वर्ग पर अधिकार की महत्वाकाङ्क्षा को समझाने हेतु
व्यासजी बोले— हे राजन्! इस प्रकार मैंने आपको उस महान् महिषासुर के जन्म, उससे सम्बन्धित वरदान-प्रदान और उसकी दिग्विजय की सम्पूर्ण कथा विस्तारपूर्वक सुना दी है। जब वह महाबली दानव महिषासुर वरदान प्राप्त करके अभिमान से भर गया, तब उसने अपने बाहुबल से समुद्रपर्यन्त समस्त पृथ्वी को जीतकर शत्रु-समुदाय से रहित कर दिया और एकच्छत्र राज्य करने लगा। उसके पास चिक्षुर जैसा महापराक्रमी सेनाध्यक्ष और दस हजार सैनिकों वाला ताम्र नामक कोषाध्यक्ष था। असिलोमा, उदर्क, बिडाला, बाष्कल, त्रिनेत्र और बलोन्मत्त जैसे दानवों ने अपनी विशाल सेनाओं के साथ उस समृद्ध पृथ्वी को घेर लिया। जो पुराने नरेश थे, वे महिषासुर को कर देने लगे; और जो स्वाभिमानी थे, उन्होंने क्षात्र-धर्मानुसार उसका सामना किया, तो उन्हें मार डाला गया। यहाँ तक कि सम्पूर्ण भूमण्डल पर ब्राह्मण भी उसके अधीन हो गए और उसे यज्ञभाग देने लगे। इस प्रकार एकच्छत्र राज्य स्थापित करके वह वरदान से गर्वित महिषासुर अब स्वर्ग पर विजय प्राप्त करने की अभिलाषा करने लगा।
एवं स महिषो नाम दानवो वरदर्पितः ।
प्राप्य राज्यं जगत्सर्वं वशे चक्रे महाबलः ॥
होनेका आदेश देना व्यासजी बोले- इस प्रकार वरदान पानेके कारण अभिमानयुक्त उस महाबली दानव महिषासुरने राज्य प्राप्त करके सम्पूर्ण जगत्को अपने अधीन कर लिया ।
उस दैत्यराज ने अपने दूत को बुलाया और आदेश दिया— "हे वीर! जाओ, हे महाबाहो! तुम मेरा दूतकार्य करो। जाकर स्वर्ग में देवताओं के पास इन्द्र से कहो कि हे सहस्राक्ष! तुम स्वर्ग छोड़ दो और जहाँ चाहो वहाँ शीघ्र चले जाओ। अथवा हे देवेश! यदि तुम महान् महिसासुर की शरणागति स्वीकार कर लो, तो वे तुम्हारी रक्षा अवश्य करेंगे। अतएव तुम महिषासुर की शरण में चले जाओ!"
मैं अपनी सींगों तथा खुरोंसे देवताओंको ॥
निश्चितरूपसे मार डालूँगा । वरदानके प्रभावसे मुझे । देवताओंसे भय नहीं है ।
परन्तु जब दूत इन्द्र के पास पहुँचा, तो देवराज का उत्तर अत्यन्त उग्र था। इन्द्र ने कहा— "हयारे! तुम्हारा बल ज्ञात है; तुम्हारे पास केवल सींग हैं और तुम जडाकृति हो। मैं तुम्हारे उन सींगों को तोड़कर तुम्हारा बल हर लूँगा। हे बलसूदन! युद्ध के लिए शीघ्र अपना वज्र उठा लो। हमारे पूर्वजों ने तुम्हें पराजित किया है, अतः हम तुम्हारा पुरुषार्थ जानते हैं। तुम अहल्या के साथ अनाचार करने वाले और देवसमुदाय के अधिपति इन्द्र हो, मैं तुम्हारे बल से भलीभाँति परिचित हूँ। तुम मेरे साथ युद्ध करो अथवा जहाँ मन करे वहाँ चले जाओ! तुम अभिमान के मद में चूर हो गए हो; मैं तुम्हारे इस अभिमानरूपी रोग की चिकित्सा करके उसे जड़ से नष्ट कर दूँगा। हे दूत! अब तुम जाओ और उस महिषासुर से मेरी कही बात कह दो। शिष्टजनों को चाहिए कि वे दूतों का वध न करें, इसलिए मैं तुम्हें छोड़ रहा हूँ।" इन्द्र ने आगे कहा— "हे महिषाधम! जिन सींगों के बल पर तुम गर्व करते हो, केवल उन्हीं से आघात करने में तुम कुशल हो, युद्ध करने में नहीं!"
हे दैत्यो! देवलोकको जीतकर मैं नन्दनवनमें ॥
विहार करूँगा । मन्दारपुष्पकी मालाएँ धारण करके । आपलोग देवांगनाओंके साथ रहेंगे, कामधेनुके दुग्धका सेवन करेंगे, प्रसन्नतापूर्वक अमृत पान करेंगे और ॥ ४८ देवताओं तथा गन्धर्वोंके गीतों तथा मनमोहक हाव-। भाव - युक्त नृत्योंका आनन्द लेंगे ।
देवराज इन्द्र के ऐसे क्रोधपूर्ण वचनों को सुनकर वह दूत तत्काल वापस आया और महिषासुर के पास पहुँचकर प्रणाम किया। उसने कहा— "हे राजन्! वह देवराज इन्द्र आपको कुछ भी नहीं समझ रहा है। अपनी देवसेना के कारण वह स्वयं को पूर्ण बलवान मानता है।" सेवक ने आगे कहा— "हे महाराज! उस मूर्ख ने जो कुछ कहा है, उसके अतिरिक्त मैं क्या कहूँ? सेवक को अपने स्वामी के समक्ष सत्य और प्रिय वाणी बोलनी चाहिए, यही नीति संसार में कल्याणप्रद रही है; किन्तु यदि मैं केवल प्रिय लगने वाली बात कहूँ, तो आपका कार्य सिद्ध नहीं होगा। शत्रु के मुख से विषतुल्य बातें निकलती हैं, अतः एक सेवक अपने स्वामी से कठोर बात कैसे कह सकता है? हे पृथ्वीपते! इन्द्र ने जिस प्रकार के वाक्य बोले हैं, उन्हें कहने में मेरी जिह्वा समर्थ नहीं है।"
पृथिवीं पालयामास सागरान्तां भुजार्जिताम् ।
एकच्छत्रां निरातङ्कां वैरिवर्गविवर्जिताम् ॥
दूत के इन रहस्यपूर्ण वचनों को सुनकर घास खाने वाले महिषासुर का मन क्रोध से व्याकुल हो गया। वह क्रोध के मारे लाल आँखों वाला महिषासुर अपनी पूँछ पीठ पर रखकर और मूत्र त्याग करते हुए अपने दानव वीरों को पुकारने लगा— "हे दैत्यों! वह इन्द्र निश्चय ही युद्ध करना चाहता है। तुम लोग सेना सङ्गठित करो, हमें उस देवाधम को जीतना है!" उसने गर्जना करते हुए कहा— "मेरे सम्मुख भला कौन पराक्रमी बन सकता है? यदि इन्द्र के समान करोड़ों लोग भी आ जाएँ, तो मैं नहीं डरूँगा; मैं उस अकेले इन्द्र को निश्चित रूप से मार डालूँगा। वह इन्द्र केवल तपस्वियों पर बल प्रयोग करता है और मायावी एवं व्यभिचारी है। वह अप्सराओं के बलबूते दूसरों की तपस्या में विघ्न डालता है और शत्रुक के अवसर देखकर प्रहार करता है। वह घोर विश्वासघाती है; उसने नमुचि से छल करके सन्धि की और फिर उसे मार डाला। वह विष्णु की तरह कपटका, मायावी और पाखण्डी है जिसने सूकर रूप धारण कर हिरण्याक्ष और नृसिंह रूप धारण कर हिरण्यकशिपु का संहार किया। मैं उसका वशवर्ती कभी नहीं होऊँगा!" \महिषासुर ने आगे घोषणा की— "विष्णु तथा इन्द्र मेरा क्या कर लेंगे? यहाँ तक कि रुद्र भी युद्ध भूमि में मेरा प्रतिकार नहीं कर सकते। मैं इन्द्र, वरुण, यम, कुबेर, अग्नि, चन्द्रमा तथा सूर्य को जीतकर स्वर्ग पर अधिकार कर लूँगा!"
सेनानीश्चिक्षुरस्तस्य महावीर्यो मदोत्कटः ।
धनाध्यक्षस्तथा ताम्रः सेनायुतसमावृतः ॥
उसने अपने दानव वीरों को आदेश दिया— "हे दनु के वंशजों! पाताल और पर्वतों पर रहने वाले बड़े-बड़े दानव वीरों को तत्काल बुलाओ और उन्हें मेरी सेना का अध्यक्ष बना दो। मैं अकेला ही देवताओं को जीतने में समर्थ हूँ, फिर भी शोभा बढ़ाने के लिए आप सबको बुलाकर युद्ध में ले चलूँगा। वरदान के प्रभाव से मुझे देवताओं से भय नहीं है। आप लोग देवलोक में जाकर मन्दारपुष्प की मालाएँ धारण करेंगे, कामधेनु के दुग्ध का सेवन करेंगे और गन्धर्वों के नृत्यों का आनन्द लेंगे। यदि आपको उचित लगे, तो उत्तम मङ्गलाचार करके आज ही प्रस्थान करने के लिए तैयार हो जाइए! समस्त दानवों की रक्षा के लिए मुनिश्रेष्ठ शुक्राचार्य को बुलाकर उनका पूजन करें और उन्हें यज्ञ-कार्य में नियुक्त करें।"
असिलोमा तथोदर्को बिडालाख्यश्च बाष्कलः ।
त्रिनेत्रोऽथ तथा कालबन्धको बलदर्पितः ॥
इस प्रकार दानव वीरों को आदेश देकर वह पापबुद्धि महिषासुर प्रसन्नता के साथ अपने भवन की ओर चला गया।
In English
The Ambition of Mahishasura
After conquering the earth, Mahishasura sends a messenger to Indra demanding that he surrender or leave heaven. Indra rejects the messenger with insults and threats, leading a furious Mahishasura to prepare his demon army to invade heaven.
This page answers
- What did indra say to mahishasura's messenger?
- How did mahishasura react to indra's response?
- Which gods did mahishasura want to conquer?
- Who were the leaders of mahishasura's army?
Also written: Bhagavatimahatmya, Bhagavati, Mahishasura, Indra, Chikshura, Tamra, Asiloma, Udarka, Bidala, Bashkala, Trinetra, भगवतीमाहात्म्य