देवीमाहात्म्य : अतिशयोक्तिपूर्ण प्रतिज्ञा और आत्म-मर्यादा का सन्तुलन कैसे स्थापित करें?
आत्मबोध और विवेक की प्रधानता
श्रीमद्देवीभागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
देवी भागवत पूर्वार्द्ध · पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 24 · पृष्ठ 666–672
804 शब्द · 5 मिनटका पाठ · 17 श्लोक
व्यास ने कहा
धर्म की रक्षा हेतु देवी की शक्ति समझाने के लिए
व्यासजी बोले— हे राजन्! उस समय जब देवी ने अपने सखियों के समक्ष विनोदवश वह भीषण प्रतिज्ञा कर ली थी, तब उन्होंने दूत के माध्यम से शुम्भ को चुनौती दी। देवी ने कहा— 'इसने शीघ्रतापूर्वक यह कैसी भीषण तथा अद्भुत प्रतिज्ञा कर ली! अतएव हे सुन्दर! आप अथवा आपका छोटा भाई समराङ्गण में आकर युद्ध के द्वारा मुझे जीतकर मेरे साथ विवाह कर लें।'
इत्युक्त्वा विररामासौ वचनं धूम्रलोचनः ।
प्रत्युवाच तदा काली प्रहस्य ललितं वचः ॥
विदूषकोऽसि जाल्म त्वं शैलूष इव भाषसे ।
वृथा मनोरथांश्चित्ते करोषि मधुरं वदन् ॥
युद्धहेतु प्रस्थानका आदेश देना व्यासजी बोले – [ हे महाराज! ] यह बात कहकर धूम्रलोचन चुप हो गया । तब भगवती काली हँसकर सुन्दर वचन बोलीं- धूर्त! तुम तो पूरे विदूषक हो और नटों जैसी बात करते हो । मधुर बोलते हुए तुम व्यर्थ ही मनमें अनेकविध कामनाएँ कर रहे हो ।
देवी के इन वचनों को सुनकर वह दूत विस्मित रह गया। वह देवी के पास पहुँचा और उनके कटाक्ष सुनकर बोला— 'हे सुन्दर कटाक्ष वाली! तुम स्त्री-स्वभाव के कारण साहसपूर्वक यह क्या बोल रही हो? भज शुम्भ और निशुम्भ को, जिन्होंने इन्द्र आदि देवताओं तथा अन्य दैत्यों को पराजित कर दिया है। उन्हें तुम सङ्ग्राम में जीतने की अभिलाषा कैसे रखती हो? त्रिलोकी में वैसा कोई नहीं है जो शुम्भ को सङ्ग्राम में जीत सके; तब हे कमल सदृश नेत्रों वाली! तुम कौन-सी सामर्थ्यशालिनी हो जो इस समय युद्ध में उनके सामने टिक सको? बिना सोचे-समझे कोई बात नहीं बोलनी चाहिए, अपितु अपने तथा शत्रु के बल को जानकर ही बोलना चाहिए। तीनों लोकों के अधिपति महाराज शुम्भ तुम्हारे रूप पर मोहित होकर तुमसे प्रार्थना कर रहे हैं, अतः उनका मनोरथ पूर्ण करो। मूर्खतापूर्ण स्वभाव त्यागकर मेरी बात मानो और शुम्भ अथवा निशुम्भ में से किसी को स्वीकार कर लो; तुम्हारे लिए यही हितकर है। हे बाले! यदि तुम मेरे साथ नहीं चलोगी तो राजा शुम्भ अत्यन्त कुपित होकर अन्य सेवकों को भेजकर तुम्हें बलपूर्वक पकड़वा लेंगे। वे बलाभिमानी दानव तुम्हारे केश-पाश पकड़कर तुम्हें निश्चय ही शुम्भ के पास ले जाएंगे। अतः अपनी लज्जा की रक्षा करो और इस दुस्साहस को छोड़ दो। कहाँ तीक्ष्ण बाणों से होने वाला युद्ध और कहाँ रतिक्रीड़ा से उत्पन्न होने वाला सुख! सार-असार बात पर सही विचार करके मेरा हितकर वचन मान लो।'
स्वलज्जां रक्ष तन्वङ्गि साहसं सर्वथा त्यज ।
मानिता गच्छ तत्पार्श्वे मानपात्रं यतोऽसि वै ॥
नीतिपूर्ण और ओजस्वी वचन सुनकर वह दूत आश्चर्यचकित होकर वहाँ से लौट गया। वह दैत्यपति शुम्भ के पास पहुँचा और विनम्र भाव से अपने राजा को प्रणाम कर कहने लगा— 'हे नृपश्रेष्ठ! मेरी वह प्रतिज्ञा मिथ्या नहीं की जानी चाहिए। उस स्त्री ने कहा है कि जो युद्ध में मुझे जीतकर मेरे अभिमान को चूर्ण कर देगा, मैं उसे ही पति रूप में वरण करूँगी। हे महाराज! अब आप जैसा उचित समझें, वैसा करें। वह आयुधों से सुसज्जित और सिंह पर सवार होकर युद्ध के लिए दृढ़ सङ्कल्प किए हुए है। वह अपनी बात पर अडिग है, अतः जो उचित हो, उसे आप करें।'
क्व युद्धं निशितैर्बाणैः क्व सुखं रतिसङ्गजम् ।
सारासारं परिच्छेद्य कुरु मे वचनं पटु ॥
राजा शुम्भ ने अपने पास बैठे महाबली भाई निशुम्भ से पूछा— 'हे महामते! सच-सच बताओ, एक स्त्री युद्ध की अभिलाषा रखती है और हमें बुला रही है। मैं स्वयं युद्धस्थल में जाऊँ या तुम सेना लेकर जाओगे?' निशुम्भ ने उत्तर दिया— 'हे वीर! अभी रणक्षेत्र में न मुझे जाना चाहिए और न आपको। आप शीघ्र ही धूम्रलोचन को भेज दीजिए; वह उस सुन्दर नेत्रों वाली स्त्री को जीतकर यहाँ ले आएगा। तत्पश्चात् आप उसके साथ सम्यक् विवाह कर लीजिएगा।' अपने भाई की बात सुनकर शुम्भ ने क्रोधपूर्वक धूम्रलोचन को आदेश दिया— 'जाओ और इस कार्य को सम्पन्न करके शीघ्र आओ! उस सुकोमल शरीर वाली साध्वी स्त्री की तुम प्रयत्नपूर्वक रक्षा करना। रण में जो भी उसके सहायक हों, उन्हें मार डालना, किन्तु उसे मत मारना।'
६५८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० २४ इन्द्राद्या निर्जिता येन देवा दैत्यास्तथापरे ।
तं कथं समरे देवि जेतुमिच्छसि भामिनि ॥
राजा का आदेश पाकर धूम्रलोचन साठ हजार राक्षसों की सेना लेकर युद्धभूमि की ओर चल पड़ा। वहाँ एक मनोहर उपवन में विराजमान भगवती जगदम्बा को देखकर वह विनम्रतापूर्वक बोला— 'हे महाभाग्यवती देवी! सुनो, शुम्भ आपके विरह से अत्यन्त व्याकुल हैं। वे नीतिनिपुण महाराज हैं और रसभङ्ग के भय से उद्विग्न होकर अपने दूत को आपके पास भेज रहे हैं। हे कान्ते! मैं आपके मन की बात जानता हूँ; आपके मन में रतिजन्य सङ्ग्राम का भाव है। महाराज शुम्भ आपको काम-युद्ध के द्वारा जीतकर शिथिल कर देंगे। वे अपने नखों के आघात से आपके शरीर को रक्तरञ्जित कर देंगे, दाँतों से आपके ओठों को खण्डित कर देंगे और आपको पसीने से तर कर देंगे; तब आपका रति-सङ्ग्राम सम्बन्धी मनोरथ पूर्ण हो जाएगा। तुम शस्त्र-युद्ध के योग्य नहीं हो। जैसे अशोक वृक्ष को पादाघात से विकसित किया जाता है, वैसे ही तुम शुम्भ को प्रसन्न कर लेना।'
त्रैलोक्ये तादृशो नास्ति यः शुम्भं समरे जयेत् ।
का त्वं कमलपत्राक्षि तस्याग्रे युधि साम्प्रतम् ॥
यह कहकर धूम्रलोचन चुप हो गया। तब भगवती काली हँसकर अत्यन्त सुन्दर वचन बोलीं— 'धूर्त! तुम तो पूरे विदूषक हो और नटों जैसी बातें करते हो। मधुर बोलते हुए तुम व्यर्थ ही अनेक कामनाएँ कर रहे हो। हे मूढमते! दुष्टात्मा शुम्भ ने तुझे सेना सहित भेजा है, अतः अब युद्ध करो और व्यर्थ की बातें छोड़ दो। ये देवी कुपित होकर शुम्भ, निशुम्भ तथा तुम्हारे अन्य बलवान दैत्यों का संहार करके अपने धाम चली जाएँगी। कहाँ वह मन्दमति शुम्भ और कहाँ यह विश्व-मोहिनी जगदम्बा! इन दोनों का विवाह इस संसार में सर्वथा अनुपयुक्त है। क्या सिंहिनी सियार को, हथिनी गर्दभ को अथवा सुरभि सामान्य वृषभ को अपना पति बना सकती है? अब तुम शुम्भ-निशुम्भ के पास चले जाओ और उनसे मेरी यह सच्ची बात कह दो— "मेरे साथ युद्ध करो; अन्यथा इसी समय पाताल लोक चले जाओ!"'
In English
The Challenge of the Goddess to Shumbha
A goddess issues a challenge to Shumbha and Nishumbha, stating she will marry whoever defeats her in battle. Shumbha sends Dhumralochana with an army of sixty thousand demons to capture her. Dhumralochana attempts to intimidate the goddess with words, but she responds by challenging him to fight or face death.
This page answers
- What was the goddess's challenge to shumbha?
- Who did shumbha send to capture the goddess?
- How many demons were in dhumralochana's army?
- What did the goddess say to dhumralochana?
Also written: Devimahatmya, Devi, Dhumralochana, Shumbha, Nishumbha, Sugriva, देवीमाहात्म्य