श्रीगणेशाय नमः।

देवीमाहात्म्य : सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी ने सङ्कट काल में किसकी शरण ली?

शक्ति और शरणागति का मार्ग

श्रीमद्देवीभागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · दशम स्कन्ध · अध्याय 11 · पृष्ठ 639–642

472 शब्द · 3 मिनटका पाठ · 18 श्लोक

राजा की जिज्ञासा शान्त करने हेतु महामात्म्य का वर्णन

मुनि बोले— "हे राजन्! वे जगन्मयी भगवती जिस प्रकार उत्पन्न हुईं, जिनसे उत्पन्न हुईं तथा उन देवी का जैसा स्वरूप है— इन सबका मैं आपसे वर्णन कर रहा हूँ; आप ध्यान से सुनिये।"

कल्प के अन्त में, जब योगराट् भगवान् नारायण इस विश्व का संहार करके समुद्र के भीतर शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में सोए हुए थे, तब उन देवदेव भगवान् जनार्दन के निद्रा के वशीभूत हो जाने पर उनके कानों के मैल से मधु तथा कैटभ नामक दो दानव उत्पन्न हुए। वे दोनों भयङ्कर आकृति वाले दानव थे और ब्रह्माजी को मारने के लिए उद्यत हो गए।

स्तुति

सावर्णि मनुके पूर्वजन्मकी कथाके भगवान् विष्णुद्वारा राजोवाच का सा देवी त्वया प्रोक्ता ब्रूहि कालविदां वर ।
का मोहयति सत्त्वानि कारणं किं भवेद् द्विज ॥

कस्मादुत्पद्यते देवी किंरूपा सा किमात्मिका ।
सर्वमाख्याहि भूदेव कृपया मम सर्वतः ॥

राजा बोले- हे कालज्ञान रखनेवालोंमें श्रेष्ठ! आपने जिन देवीका वर्णन किया है, वे कौन हैं, वे प्राणियोंको क्यों मोहित करती हैं और हे द्विज! इसमें क्या कारण है? वे देवी किसलिये आविर्भूत होती हैं, उनका स्वरूप क्या है तथा उनका स्वभाव कैसा है? हे भूदेव! इन सभी बातोंको कृपा करके सम्यक् प्रकारसे मुझे बताइये ।

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · दशम स्कन्ध · अध्याय 11 · श्लोक 1-2पृष्ठ 639

पद्मयोनि ब्रह्माजी ने जब उन मधु-कैटभ दानवों को तथा देवदेव नारायण को निद्रित देखा, तो वे घोर चिन्ता में पड़ गए। उनके मन में व्याकुलता थी— 'कहाँ जाऊँ तथा किस प्रकार शान्ति प्राप्त करूँ?' उसी समय ब्रह्माजी के मन में यह कार्य सिद्ध करने वाली बुद्धि उत्पन्न हुई कि ये निद्रित अवस्था वाले भगवान् विष्णुदेव इस समय जिनकी अधीनता को प्राप्त हैं, सबको उत्पन्न करने वाली उन्हीं निद्रा देवी की शरण में मैं भी चला जाऊँ।

ब्रह्माजी ने देवी को पुकारा— "हे देवि! हे जगत्‌ का पालन करने वाली देवि! हे भक्तों को अभीष्ट फल प्रदान करने वाली! हे जगन्माये! हे महामाये! हे समुद्र में शयन करने वाली! हे शिवे! आपकी आज्ञा के अधीन होकर ही सभी अपना-अपना कार्य सम्पादित करते हैं। आप ही कालरात्रि हैं, आप ही महारात्रि हैं तथा आप ही भयङ्कर मोहरात्रि हैं। आप सर्वव्यापिनी, भक्तों के वशीभूत, सम्माननीया तथा महान् आनन्द की एकमात्र सीमा हैं।"

स्तुति

१३ आप लज्जा, पुष्टि, क्षमा, कीर्ति, कान्ति, करुणाकी प्रतिमूर्ति, कमनीया, विश्ववन्द्या तथा जाग्रत् - स्वप्न-सुषुप्तिके स्वरूपवाली हैं ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · दशम स्कन्ध · अध्याय 11 · श्लोक 14पृष्ठ 640

ब्रह्माजी ने अपनी प्रार्थना जारी रखते हुए कहा— "हे देवेशि! आप निर्गुणे! तमोगुण से युक्त होकर प्रकट होने वाली हैं। इस समय लक्ष्मीकान्त भगवान् विष्णु को आपने निद्रा के वशवर्ती कर रखा है और ये दोनों मधु-कैटभ दानव अत्यन्त पराक्रमी तथा दुर्जेय हैं; अतएव आप इन दोनों का संहार करने के लिये देवेश्वर विष्णु को जगाइये।"

ब्रह्माजी की इस स्तुति के पश्चात, भगवान्‌ को प्रिय तमोगुणमयी भगवती ने देवदेव विष्णु के शरीर को छोड़कर उन दोनों दानवों को मोहित कर दिया। उसी क्षण जगन्नाथ, परमात्मा, परमेश्वर भगवान् विष्णु जाग गये और उन्होंने मधु तथा कैटभ को देखा। उन दोनों भयङ्कर दानवों ने मधुसूदन विष्णु को देखकर युद्ध का निश्चय किया और वे भगवान् के पास पहुँच गये। भगवान् विष्णु उन दोनों के साथ पाँच हजार वर्षों तक बाहुयुद्ध करते रहे।

स्तुति

तस्यां सर्वं जगज्जातं तस्यां विश्वं प्रतिष्ठितम् ॥ लयमेष्यति तस्यां च तस्मात्सैव परात्परा ।
तस्या देव्याः प्रसादश्च यस्योपरि भवेन्नृप ।
स एव मोहमत्येति नान्यथा धरणीपते ॥ मुनि बोले - हे राजन्! आप अत्यन्त विस्मयकारी, अनुपम तथा सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले श्रेष्ठ २० देवी - माहात्म्यका श्रवण कीजिये ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · दशम स्कन्ध · अध्याय 11 · श्लोक 20पृष्ठ 639

अन्ततः, जगन्माया द्वारा विमोहित किये गये वे अत्यधिक बल से उन्मत्त दानव परमेश्वर विष्णु से कहने लगे— "आप हमसे वरदान माँग लीजिये!"

यह सुनकर आदिपुरुष भगवान् विष्णु ने कहा— "तुम दोनों मेरे द्वारा आज ही मारे जाओ।"

स्तुति

मुनिरुवाच राजन् देव्याः स्वरूपं ते वर्णयामि निशामय ।
यथा चोत्पतिता देवी येन वा सा जगन्मयी ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · दशम स्कन्ध · अध्याय 11 · श्लोक 3पृष्ठ 639

परन्तु उन अत्यन्त बलशाली दानवों ने पुनः शर्त रखी— "जिस स्थान पर पृथ्वी जल में डूबी हुई न हो, वहीं पर आप हमारा वध कीजिये।"

भगवान् श्रीहरि ने कहा— "वैसा ही होगा!" और फिर उन्होंने अपनी गदा तथा शङ्ख धारण करने वाले हाथों से उन दोनों के मस्तकों को अपनी जाँघ पर रखकर चक्र से काट दिया।

In English

The Birth of Madhu and Kaitabha

While Lord Vishnu slept, two demons named Madhu and Kaitabha were born from the dirt in his ears. Brahma prayed to the Goddess Jagannmaya to wake Vishnu so he could kill the demons. After a long battle, Vishnu killed the two demons by decapitating them on his thigh where the earth was not submerged in water.

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  • How were madhu and kaitabha born?
  • Who did brahma pray to for help?
  • How did vishnu kill madhu and kaitabha?
  • What condition did the demons set for their death?

Also written: Devimahatmya, Devi, Brahma, Mahesha, Madhu, Kaitabha, देवीमाहात्म्य