श्रीगणेशाय नमः।

लक्ष्म्युपाख्यान : इन्द्र के पास से महालक्ष्मी क्यों चली गईं?

अहङ्कार और कर्म का फल

श्रीमद्देवीभागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · नवम स्कन्ध · अध्याय 39–40 · पृष्ठ 540–551

1,325 शब्द · 7 मिनटका पाठ · 10 श्लोक

श्रीनारायण ने नारद से कहा

सावित्री और धर्मराज के संवाद के बाद महालक्ष्मी के स्वरूप की जिज्ञासा हेतु

नारद जी ने जब श्रीभगवान से सावित्री के श्रेष्ठ उपाख्यान और प्राणियों के कर्म-विपाक का वर्णन सुन लिया, तब उन्होंने जिज्ञासा प्रकट करते हुए कहा— "हे भगवन! मैं सावित्री तथा धर्मराज के संवाद में निराकार मूलप्रकृति भगवती गायत्री के निर्मल यश का श्रवण कर चुका हूँ। उनके गुणों का कीर्तन सत्यस्वरूप है और मङ्गलों का भी मङ्गल है। हे प्रभो! अब मैं महालक्ष्मी का उपाख्यान सुनना चाहता हूँ। हे वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ! सर्वप्रथम उन भगवती लक्ष्मी की पूजा किसने की, उनका स्वरूप क्या है तथा पूर्वकाल में किसने उनके गुणों का कीर्तन किया? यह सब मुझे बताइये।"

वृक्षशाखासु रम्यासु नवमेघेषु वस्तुषु ।
वैकुण्ठे पूजिता सादौ देवी नारायणेन च ॥

द्वितीये ब्रह्मणा भक्त्या तृतीये शङ्करेण च ।
विष्णुना पूजिता सा च क्षीरोदे भारते मुने ॥

स्वायम्भुवेन मनुना मानवेन्द्रैश्च सर्वतः ।
ऋषीन्द्रैश्च मुनीन्द्रैश्च सद्भिश्च गृहिभिर्भवे ॥ २६ ।
गन्धर्वैश्चैव नागाद्यैः पातालेषु च पूजिता ।
शुक्लाष्टम्यां भाद्रपदे कृता पूजा च ब्रह्मणा ॥

भक्त्या च पक्षपर्यन्तं त्रिषु लोकेषु नारद ।
चैत्रे पौषे च भाद्रे च पुण्ये मङ्गलवासरे ॥

विष्णुना पूजिता सा च त्रिषु लोकेषु भक्तितः ।
वर्षान्ते पौषसङ्क्रान्त्यां माध्यामावाह्य मङ्गले ॥

मनुस्तां पूजयामास सा भूता भुवनत्रये ।
पूजिता सा महेन्द्रेण मङ्गलेनैव मङ्गला ॥

केदारेणैव नीलेन सुबलेन नलेन च ।
ध्रुवेणोत्तानपादेन शक्रेण बलिना तथा ॥

और सूर्यमण्डल इन्हींसे सुशोभित है । भूषण, रत्न, फल, जल, राजा, रानी, दिव्य स्त्री, गृह, सभी प्रकारके धान्य, वस्त्र, पवित्र स्थान, देवप्रतिमा, मंगलकलश, माणिक्य, मुक्ता, माला, श्रेष्ठ मणि, हीरा, दुग्ध, चन्दन, वृक्षोंकी सुरम्य शाखा तथा नवीन मेघ - इन सभी वस्तुओंमें परम मनोहर महालक्ष्मीका ही अंश विद्यमान है ।

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 39 · श्लोक 19–233पृष्ठ 542

श्रीभगवान बोले— "हे नारद! वे श्रेष्ठ महालक्ष्मी भगवान नारायण की प्रिया होकर वैकुण्ठ में निवास करती हैं। वे सनातनी भगवती हैं। किन्तु पूर्व काल में जब दुर्वासा के शाप के कारण इन्द्र श्रीहीन हो गये थे और सम्पूर्ण देवसमुदाय मृत्युलोक में भटकने लगा था, तब क्या हुआ था? यह सब मैं तुम्हें बताता हूँ।"

वे ही भगवती परिपूर्णतम परम शुद्धस्वरूपा ॥ १६ ।
महालक्ष्मी नामसे प्रसिद्ध हो सम्पूर्ण सौभाग्योंसे सम्पन्न होकर वैकुण्ठलोकमें निवास करने लगीं ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 39 · श्लोक 16पृष्ठ 541

प्राचीन काल की बात है— तीनों लोकों के अधिपति इन्द्र मधुपान करके और कामदेव से मोहित होकर रम्भा के साथ एकान्त में विहार कर रहे थे। उसी समय इन्द्र ने वैकुण्ठधाम से कैलास पर्वत की ओर आते हुए महर्षि दुर्वासा को देखा। मुनि का शरीर ब्रह्मतेज से देदीप्यमान था; वे ऐश्वर्य-सम्पन्न और ग्रीष्म ऋतु के मध्याह्न के हजारों सूर्यों के समान तेजस्वी थे। उन्होंने श्वेत वर्ण का यज्ञोपवीत धारण किया हुआ था और हाथों में दण्ड तथा कमण्डलु लिया था। उनके ललाट पर चन्द्रमा के समान उज्ज्वल तिलक सुशोभित था और उनके साथ लाखों शिष्य विद्यमान थे।

अ ० ३ ९ ] नवम गवां प्रसूतिः सुरभिर्दक्षिणा यज्ञकामिनी ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 39 · श्लोक 19पृष्ठ 542

इन्द्र ने उन्हें देखकर सिर झुकाकर प्रणाम किया और प्रसन्नता से उनकी स्तुति की। तब शिष्यों सहित मुनि दुर्वासा ने इन्द्र को शुभाशीर्वाद दिया और भगवान विष्णु द्वारा प्रदत्त एक अत्यन्त मनोहर पारिजात पुष्प उन्हें समर्पित किया। बुढ़ापा, रोग, मृत्यु और शोक का नाश करने वाला वह पुष्प पाकर, राज्य-सम्पदा से मदोन्मत्त इन्द्र ने उसे अपने ऐरावत हाथी के मस्तक पर फेंक दिया। उस पुष्प के स्पर्श मात्र से वह गजराज भगवान विष्णु के तुल्य शक्तिशाली हो गया और इन्द्र को छोड़कर घोर वन में चला गया।

क्षीरोदसिन्धुकन्या सा श्रीरूपा पद्मिनीषु च ।
शोभास्वरूपा चन्द्रे च सूर्यमण्डलमण्डिता ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 39 · श्लोक 20पृष्ठ 542

इन्द्र द्वारा इस दिव्य पुष्प का तिरस्कार किए जाने पर मुनि दुर्वासा अत्यन्त कुपित होकर क्रोधित उठे और शाप देते हुए बोले— "अरे! राज्यश्री के अभिमान से प्रमत्त होकर तुम मेरा अपमान क्यों कर रहे हो? मेरे द्वारा दिये गये पुष्प को तुमने गर्वित होकर हाथी के मस्तक पर फेंक दिया? सुनो, जो मनुष्य श्रीविष्णु को समर्पित किए हुए नैवेद्य, फल अथवा जल प्राप्त होने पर उसका त्याग करता है, वह ब्रह्महत्या के पाप का भागी होता है। जो सौभाग्य से प्राप्त हुए भगवान विष्णु के पावन नैवेद्य का त्याग करता है, वह श्री, बुद्धि तथा राज्य—इन सब से वञ्चित हो जाता है!"

विभूषणेषु रत्नेषु फलेषु च जलेषु च ।
नृपेषु नृपपत्नीषु दिव्यस्त्रीषु गृहेषु च ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 39 · श्लोक 21पृष्ठ 542

मुनि के क्रोधित वचनों ने इन्द्र के ऐश्वर्य को हिला दिया। दुर्वासा मुनि ने आगे कहा— "जो भक्त श्रीविष्णु के लिये अर्पित किए गये नैवेद्य को पाते ही ग्रहण कर लेता है, वह अपने सौ पूर्वजों का उद्धार करके स्वयं जीवन्मुक्त हो जाता है; परन्तु तुमने उसका तिरस्कार किया है।"

सर्वसस्येषु वस्त्रेषु स्थानेषु संस्कृतेषु च ।
प्रतिमासु च देवानां मङ्गलेषु घटेषु च ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 39 · श्लोक 22पृष्ठ 542

इस शाप के प्रभाव से इन्द्र की समस्त सम्पत्ति छिन गई और महालक्ष्मी ने क्रोधित होकर स्वर्ग का परित्याग कर दिया। महालक्ष्मी अत्यन्त दुःखित होकर वैकुण्ठ लोक पहुँचीं और वहाँ स्वयं को महालक्ष्मी में विलीन कर दिया। इस विपत्ति के समय समस्त देवता अत्यन्त दीनतायुक्त हो गये; उनके कण्ठ, ओष्ठ और तालु सूख गये थे। तब देवताओं ने मिलकर समुद्र-मन्थन किया, जिससे महालक्ष्मी की प्राप्ति हुई। भगवान विष्णु ने उन महालक्ष्मी को प्रेमपूर्वक देखा और प्रसन्नतायुक्त मुख वाली महालक्ष्मी ने देवताओं को वरदान देकर क्षीरसागर में शयन करने वाले श्रीविष्णु को वनमाला अर्पित कर दी।

माणिक्येषु च मुक्तासु माल्येषु च मनोहरा ।
मणीन्द्रेषु च हीरेषु क्षीरेषु चन्दनेषु च ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 39 · श्लोक 23पृष्ठ 542

मुनि दुर्वासा ने इन्द्र की ओर देखते हुए कहा, "हे इन्द्र! तुमने जो अभिमानवश इस पारिजात पुष्प को हाथी के मस्तक पर फेंक दिया है, इस अपराध के कारण लक्ष्मीजी तुम लोगों का परित्याग करके भगवान श्रीहरि के लोक में चली जाएँगी। मैं नारायण का भक्त हूँ; मैं देवता, ब्रह्मा, काल, मृत्यु तथा जरा से भी भयभीत नहीं होता, तो फिर अन्य किन लोगों की गिनती करूँ? हे इन्द्र! तुम्हारे पिता प्रजापति कश्यप और गुरु बृहस्पति मुझ निःशङ्क का क्या कर लेंगे? यह पारिजात पुष्प जिसके सिर पर रहता है, उसी की पूजा श्रेष्ठ मानी जाती है।"

५३४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४० यमेन वह्निना चैव वरुणेनैव पूजिता ।
तथा समग्र सम्पदाओंकी विग्रहस्वरूपिणी वे भगवती एवं सर्वत्र सर्वेषु पूजिता वन्दिता सदा ।
महालक्ष्मी सर्वत्र सब लोगोंद्वारा सदा पूजित तथा सर्वैश्वर्याधिदेवी सा सर्वसम्पत्स्वरूपिणी ॥ ३३ ।
वन्दित हुईं ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 39 · श्लोक 29–33पृष्ठ 543

यह सुनकर देवराज इन्द्र मुनि दुर्वासा के चरण पकड़कर, शोकसन्तप्त तथा भय से व्याकुल होकर उच्च स्वर से रोने लगे। उन्होंने अत्यन्त विनीत भाव से कहा— "मुनि! आपने उचित शाप दिया है; क्योंकि यह माया का नाश कर देने वाला है। मैं अपनी अपहृत सम्पत्ति की याचना नहीं कर रहा हूँ, आप मुझे कुछ ज्ञानोपदेश दीजिये।"

श्रीनारायण उवाच

श्रीनारायण बोले - हे ब्रह्मन्! प्राचीन समयमें सृष्टिके आरम्भमें रासमण्डलके मध्य परमात्मा श्रीकृष्णके वाम भागसे भगवती राधा प्रकट हुईं ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 39 · श्लोक 4पृष्ठ 540

मुनि ने गम्भीर वाणी में उपदेश देते हुए कहा, "यह ऐश्वर्य जन्म, मृत्यु, जरा, शोक और रोग के बीज का महान् अङ्कुर है। जो मूर्ख सम्पत्ति से उन्मत्त है, उसको वास्तव में मदिरापान से भी प्रमत्त समझना चाहिए। सम्पत्ति के मद में उन्मत्त वह व्यक्ति विषयान्ध, विह्वल, महाकामी और राजसिक होकर सात्त्विक मार्ग का अवलोकन नहीं कर पाता। हे सुरश्रेष्ठ! शास्त्र भी दो प्रकार के मार्ग दिखलाता है— एक संसृतिका हेतु है तथा दूसरा निवृत्तिका कारण। पहले प्रवृत्ति बीजी दुःखमय मार्ग पर सभी प्राणी स्वच्छन्द तथा प्रसन्न होकर निर्विरोध भाव से निरन्तर चलते रहते हैं। जैसे मधु के लोभ से भौंरा अत्यन्त सुख मानकर क्लेश के साथ पुष्पों पर आता है, वैसे ही मनुष्य परिणाम में विनाश के बीजस्वरूप तथा जन्म-मृत्यु-जरा के आश्रयस्वरूप इस प्रवृत्तिमार्ग पर अग्रसर होता है। अनेक जन्मों तक अपने किये कर्म के परिणामस्वरूप नाना प्रकार की योनियों में भ्रमण करने के पश्चात्, भगवान की कृपा से ही कोई बिरला ही संसार सागर से पार करने वाले सत्सङ्ग को प्राप्त कर पाता है, जो उसे मुक्ति मार्ग दिखा देता है।"

सविताकी अधिष्ठात्री देवी होने अथवा सूर्यके ब्रह्मप्रतिपादक गायत्री मन्त्रकी अधिदेवता होने तथा ९ ५ सम्पूर्ण वेदोंकी जननी होनेसे ये जगत्में सावित्री नामसे प्रसिद्ध हैं ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 39 · श्लोक 95पृष्ठ 540

मुनि ने आगे कहा, "जब मानव का पुण्योदय होता है, तब वह परम सुखप्रद मुक्ति मार्ग को प्राप्त कर पाता है। हे इन्द्र! तुम जो बात पूछ रहे हो, उसे मैंने गुरु के मुख से सुना है।" यह सुनकर देवराज इन्द्र रागरहित हो गये और उनके हृदय में दिनोंदिन वैराग्य की भावना बढ़ने लगी।

इन्द्र ने जब अपनी नगरी की दुर्दशा देखी, तो पाया कि वहाँ चारों ओर हलचल मची हुई है; कहीं किसी के पुत्र और बन्धु-बान्धव नहीं थे, कहीं माता-पिता और स्त्री आदि ने उसका साथ छोड़ दिया था और सम्पूर्ण नगरी शत्रुओं से आक्रान्त थी। इस स्थिति को देखकर इन्द्र देवगुरु बृहस्पति के पास गए। वहाँ गुरु बृहस्पति परब्रह्म परमात्मा का ध्यान कर रहे थे; उनके नेत्र पुलकित थे और प्रसन्नतायुक्त नेत्रों से अश्रु गिर रहे थे। इन्द्र ने उन्हें प्रणाम किया और उनके चरण कमलों में मस्तक झुकाकर उच्च स्वर से विलाप करते हुए दुर्वासा के शाप, प्राप्त हुई वर की उपलब्धि और अपनी नगरी की विपत्ति का सारा वृत्तान्त सुनाया।

अपने शिष्य की बात सुनकर क्रोध से लाल नेत्रों वाले परम बुद्धिमान बृहस्पति कहने लगे— "ऐसा कहा गया है कि सम्पूर्ण भारत में अपने द्वारा किये गये कर्म का फल भोगना ही पड़ता है। शुभ अथवा अशुभ, जो कुछ भी मनुष्य करता है, वह उसे भोगता ही है; सैकड़ों करोड़ों कल्प बीत जाने के बाद भी बिना भोगे हुए कर्मों का क्षय नहीं होता। प्राणी कर्म से ही ब्रह्मशाप, शुभाशीर्वाद, महालक्ष्मी और दरिद्रता प्राप्त करता है। करोड़ों जन्मों के सञ्चित कर्म प्राणी के पीछे उसकी छाया की भाँति लगे रहते हैं। जिस प्रकार कुम्भकार मिट्टी से कुम्भ का निर्माण करता है, उसी प्रकार विधाता कर्मसूत्र से प्राणियों को फल प्रदान करते हैं। अतः हे देवराज! जिनकी आज्ञा से इस जगत् की सृष्टि हुई है, उन भगवान नारायण की आप आराधना कीजिये। वे त्रिलोकी में विधाता के भी विधाता, पालन करने वाले के भी पालक और काल के भी काल हैं। जो मनुष्य घोर विपत्ति के समय भगवान मधुसूदन का स्मरण करता है, उसके लिये उस विपत्ति में भी सम्पत्ति उत्पन्न हो जाती है— ऐसा भगवान शङ्कर ने कहा है।"

यह कहकर तत्त्वज्ञानी बृहस्पति ने इन्द्र को हृदय से लगाकर उन्हें शुभ आशीर्वाद दिया। इसके उपरान्त इन्द्र भगवान श्रीहरि का ध्यान करके, गुरु बृहस्पति को आगे करके समस्त देवताओं के साथ ब्रह्माजी की सभा में गये। इन्द्र सहित सभी देवताओं ने शीघ्र ही ब्रह्मलोक पहुँचकर पद्मयोनि ब्रह्माजी का दर्शन किया और उन्हें प्रणाम किया। तत्पश्चात् देवगुरु बृहस्पति ने ब्रह्माजी को सारा वृत्तान्त सुनाया। उसे सुनकर ब्रह्माजी हँसकर देवराज इन्द्र से कहने लगे—

In English

The Curse of Durvasa and the Loss of Lakshmi

Indra rejects a divine Parijata flower given to him by the sage Durvasa, throwing it onto his elephant instead of accepting it. Because of this disrespect, Durvasa curses Indra, causing Mahalakshmi to leave heaven and leaving the gods in distress. To regain their prosperity, the gods perform the churning of the ocean to bring Lakshmi back.

This page answers

  • Why did durvasa curse indra?
  • What happened to mahalakshmi after indras mistake?
  • How did the gods get mahalakshmi back?
  • Why did indra throw the parijata flower on his elephant?

Also written: Lakshmyupakhyana, Lakshmya, Mahalakshmi, Narayana, Indra, Durvasa, Brahma, Shrinarayana, Lakshmi, Brihaspati, लक्ष्म्युपाख्यान