मनसोपाख्यान : धर्म रक्षा हेतु पति ने पत्नी का त्याग क्यों किया?
धर्म और कर्तव्य का द्वन्द्व
श्रीमद्देवीभागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · नवम स्कन्ध · अध्याय 48 · पृष्ठ 591–604
2,129 शब्द · 11 मिनटका पाठ · 14 श्लोक
श्रीनारायण ने नारद मुनि से कहा
देवी मनसा के उपाख्यान का वर्णन करते हुए
श्रीनारायण बोले— हे मुनिश्रेष्ठ! मैंने देवी मनसा के विषय में पूजा-विधानपूर्वक कह दिया है। अब आप उनके उपाख्यान का वर्णन ध्यानपूर्वक सुनिए, जिसे मैंने साक्षात् धर्मदेव के मुख से सुना है।
योगिनो विश्वपूज्यस्य जरत्कारुप्रिया ततः ।
जरत्कारुर्जगद्गौरी मनसा सिद्धयोगिनी ॥
वैष्णवी नागभगिनी शैवी नागेश्वरी तथा ।
जरत्कारुप्रियास्तीकमाता विषहरेति च ॥
महाज्ञानयुता चैव सा देवी विश्वपूजिता ।
द्वादशैतानि नामानि पूजाकाले तु यः पठेत् ॥
तस्य नागभयं नास्ति तस्य वंशोद्भवस्य च ।
नागभीते च शयने नागग्रस्ते च मन्दिरे ॥ ५४ ।
नागशोभे महादुर्गे नागवेष्टितविग्रहे ।
इदं स्तोत्रं पठित्वा तु मुच्यते नात्र संशयः ॥
नित्यं पठेद्यस्तं दृष्ट्वा नागवर्गः पलायते ।
दशलक्षजपेनैव स्तोत्रसिद्धिर्भवेन्नृणाम् ॥
जरत्कारु, जगद्गौरी, मनसा, सिद्धयोगिनी, वैष्णवी, नागभगिनी, शैवी, नागेश्वरी, जरत्कारुप्रिया, आस्तीकमाता, विषहरा और महाज्ञानयुता – इन नामोंसे वे भगवती विश्वमें पूजी जाती हैं । जो मनुष्य पूजाके समय देवीके इन बारह नामोंका पाठ करता है, उसे तथा उसके वंशजोंको नागोंका भय नहीं रहता ।
प्राचीन काल की बात है, जब सम्पूर्ण भूमण्डल के मानव नागों के भय से आक्रान्त हो गए थे। उस सङ्कट काल में वे सभी मुनिपुङ्गव कश्यप की शरण में पहुँचे। तब कश्यप जी ने ब्रह्माजी के साथ मिलकर वेद-बीज मन्त्रों की रचना की। उन्होंने अपने मन से उन मन्त्रों की अधिष्ठात्री देवी, भगवती मनसा का सृजन किया; इसी कारण तपस्या और मन से उत्पन्न होने के कारण वे 'मनसा' नाम से विख्यात हुईं।
भगवान् मृत्युंजय शिवसे त्रैलोक्यमंगल नामक कवच, पूजनक्रम, सर्वसम्मत तथा वेदोक्त पुरश्चरण- ॥
क्रम और मन्त्र प्राप्त करके वे मुनिकन्या साध्वी मनसा भगवान् शंकरकी आज्ञासे तपस्या करनेके लिये पुष्करक्षेत्रमें चली गयीं । वहाँ तीन युगोंतक परमेश्वर १ ९ श्रीकृष्णकी तपस्या करके वे देवी सिद्ध हो गयीं और उन्होंने अपने समक्ष साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन किये ।
कुमारी अवस्था में वे भगवान शिव के धाम कैलाश चली गईं। वहाँ उन्होंने एक हजार वर्षों तक अत्यन्त भक्तिपूर्वक विधिवत् शिवजी की उपासना की। महादेव ने उन्हें सामवेद पढ़ाया और श्रीकृष्ण का वह अष्टाक्षर मन्त्र प्रदान किया— "श्रीं ह्रीं क्लीं कृष्णाय नमः"। ज्ञान और मन्त्र प्राप्त कर मनसा देवी भगवान की आज्ञा से पुष्कर क्षेत्र में तपस्या करने चली गईं। वहाँ तीन युगों तक श्रीकृष्ण की कठिन तपस्या करके वे देवी सिद्ध हुईं और उन्होंने साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन किए। उस समय कृपानिधि श्रीकृष्ण ने उन कृश शरीर वाली बाला को देखकर स्वयं उनकी पूजा की और दूसरों से भी पूजा करवाई। प्रभु ने उन्हें वरदान दिया— "तुम जगत् में पूजित होओ।" इस प्रकार मनसा देवी सर्वप्रथम परमात्मा श्रीकृष्ण द्वारा पूजित हुईं, तत्पश्चात शिव, कश्यप, देवता, मुनि और मानव आदि द्वारा वे तीनों लोकों में पूजी गईं।
५८२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४८ आस्तीकस्य मुनीन्द्रस्य माता सापि तपस्विनी ॥
इसके पश्चात कश्यप जी ने उन देवी को मुनि जरत्कारु को सौंप दिया। कामनारहित होते हुए भी धर्म रक्षा हेतु जरत्कारु ने उन्हें पत्नीरूप में स्वीकार कर लिया। विवाह के उपरान्त, एक बार चिरकालीन तपस्या से थके हुए महायोगी जरत्कारु पुष्कर क्षेत्र में एक वटवृक्ष के नीचे लेट गए और निद्रेश्वर भगवान शिव का स्मरण करके सो गए। तभी मनसा देवी ने उन्हें जगा दिया।
आस्तीकमाता विज्ञाता जगत्यां सुप्रतिष्ठिता ।
प्रिया मुनेर्जरत्कारोर्मुनीन्द्रस्य महात्मनः ॥
मनसा देवी ने कहा— "हे महाभाग! ब्राह्मणों के लिये नित्य की सायङ्कालीन सन्ध्या न करके मेरे पतिदेव ब्रह्महत्या आदि पाप के भागी होंगे। जो मनुष्य प्रातः तथा सायङ्काल की सन्ध्या नहीं करता, वह सब प्रकार से सदा अपवित्र होकर ब्रह्महत्या के पाप का भागी होता है।"
अ ० ४८ ] नवम श्वेतचम्पकवर्णाभां रत्नभूषणभूषिताम् ।
वह्निशुद्धांशुकाधानां नागयज्ञोपवीतिनीम् ॥
यह सुनकर मुनि जरत्कारु अत्यन्त कुपित हो उठे। वे क्रोध में बोले— "हे साध्वि! तुमने सुखपूर्वक सोये हुए मेरी निद्रा क्यों भङ्ग कर दी? जो स्त्री अपने पति का अपकार करती है, उसके व्रत आदि निरर्थक हो जाते हैं। तुम्हारे तप, उपवास और दान सब निष्फल हो गए।"
महाज्ञानयुतां तां च प्रवरज्ञानिनां वराम् ।
सिद्धाधिष्ठातृदेवीं च सिद्धां सिद्धिप्रदां भजे ॥
मनसा देवी भय से काँप उठीं। वे अपने पति के क्रोध को देखकर विलाप करने लगीं और उनके चरणों में गिर पड़ीं। उन्होंने कहा— "हे महाभाग! आपकी सन्ध्या के लोप के भय से ही मैंने आपकी निद्रा भङ्ग की है। हे सुव्रत! मुझ दुष्टा का यह अपराध है, अब आप शान्त हो जाइये।"
परन्तु मुनि के ओष्ठ क्रोध से प्रस्फुरित होने लगे। वे बोले— "जो स्त्री अपने पति के प्रतिकूल आचरण करती है और अप्रिय वचन बोलती है, वह कुम्भीपाक नरक में जाती है और वहाँ सूर्य तथा चन्द्रमा के स्थितिकाल तक निवास करती है। उसके पश्चात वह चाण्डाली होती है और पति तथा पुत्र से विहीन रहती है।"
जब मुनि जरत्कारु क्रोधित होकर सूर्य को शाप देने के लिए उद्यत हुए, तब स्वयं भगवान भास्कर अपनी देवी सन्ध्या को साथ लेकर वहाँ आए। वे भयभीत होकर अत्यन्त विनयपूर्वक मुनि से उचित बात कहने लगे।
सूर्य का वचन सुनकर मुनि जरत्कारु प्रसन्न हो गए। भगवान भास्कर भी विप्र जरत्कारु का आशीर्वाद लेकर अपने स्थान को चले गए। किन्तु, धर्म की रक्षा हेतु उस विप्र ने अपने विक्षुब्ध हृदय से, रुदन करती हुई तथा शोकसन्तप्त देवी मनसा का त्याग कर दिया।
विधिश्च कश्यपश्चैव मनसा परिचिन्तितः ।
दृष्ट्वा विप्रोऽभीष्टदेवं निर्गुणं प्रकृतेः परम् ॥
तुष्टाव परया भक्त्या प्रणनाम मुहुर्मुहुः ।
नमश्चकार शम्भुं च ब्रह्माणं कश्यपं तथा ॥
कथमागमनं देवा इति प्रश्नं चकार सः ।
ब्रह्मा तद्वचनं श्रुत्वा सहसा समयोचितम् ॥
प्रत्युवाच नमस्कृत्य हृषीकेशपदाम्बुजम् ।
यदि त्यक्ता धर्मपत्नी धर्मिष्ठा मनसा सती ॥
कुरुष्वास्यां सुतोत्पत्तिं स्वधर्मपालनाय वै ।
जायायां च सुतोत्पत्तिं कृत्वा पश्चात्त्यजेन्मुने ॥
अकृत्वा तु सुतोत्पत्तिं विरागी यस्त्यजेत्प्रियाम् ।
स्स्रवते तस्य पुण्यं च चालन्यां च यथा जलम् ॥
ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा जरत्कारुर्मुनीश्वरः ।
चकार नाभिसंस्पर्शं योगेन मन्त्रपूर्वकम् ॥
मनसाया मुनिश्रेष्ठ मुनिश्रेष्ठ उवाच ताम् । स्कन्ध ५८७ है, द्विज फिरसे जगत्की सृष्टि भी कर सकता है, द्विजसे बढ़कर तेजस्वी दूसरा कोई नहीं है । ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान, ब्रह्मज्योतिस्वरूप तथा ब्रह्मवंश ब्राह्मणको निरन्तर सनातन भगवान् श्रीकृष्णकी आराधना करनी चाहिये ।
उस विपत्ति में भय से व्याकुल देवी मनसा ने अपने गुरुदेव शिव, इष्टदेवता ब्रह्मा, भगवान श्रीहरि तथा जन्मदाता कश्यपजी का स्मरण किया। जैसे ही उन्होंने मन से इन देवों का ध्यान किया, गोपियों के ईश भगवान श्रीकृष्ण, शङ्कर, ब्रह्मा और कश्यपजी वहाँ प्रकट हो गए। प्रकृति से परे और निर्गुण अपने अभीष्ट देवों को देखकर मुनि जरत्कारु ने उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम किया और पूछा, "हे देवगण! यहाँ आप लोगों का आगमन किसलिए हुआ है?"
रुदतीं शोकसंयुक्तां हृदयेन विदूयता ।
सा सस्मार गुरुं शम्भुमिष्टदेवं विधिं हरिम् ॥
तब ब्रह्माजी ने कहा, "मुनिश्रेष्ठ! यदि आप इस स्त्री का त्याग करना चाहते हैं, तो पहले इससे पुत्र उत्पन्न कीजिए। अपनी भार्या से पुत्र प्राप्त करने के बाद ही आप इसका त्याग करें; क्योंकि जो विरागी पुरुष पुत्र उत्पन्न किए बिना ही अपनी प्रिय भार्या का त्याग करता है, उसका पुण्य चलनी से बहकर निकल जाने वाले जल की भाँति नष्ट हो जाता है।"
कश्यपं जन्मदातारं विपत्तौ भयकर्शिता ।
तत्राजगाम गोपीशो भगवाञ्छम्भुरेव च ॥
ब्रह्माजी के वचन सुनकर मुनि जरत्कारु ने मन्त्रोच्चारण करते हुए योगबल का आश्रय लिया और मनसा देवी की नाभि को स्पर्श किया। तत्पश्चात वे देवी से कहने लगे, "सुपुत्र की माता, कुलस्त्री तथा कुल का पालन करने वाली होती है। श्रीहरि की भक्ति प्रदान करने वाला ही सच्चा बन्धु होता है, न कि केवल अभीष्ट सुख देने वाला। भगवत्प्राप्ति का मार्ग दिखाने वाला बन्धु ही सच्चा पिता है। वही सच्ची माता है जो आवागमन से मुक्त कर दे और वही बहन दयास्वरूपिणी है, जो यम के त्रास से छुटकारा दिला दे।"
५८८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ ० ४८ जरत्कारुरुवाच गर्भेणानेन मनसे तव पुत्रो भविष्यति ॥
मुनि ने आगे ज्ञान देते हुए कहा, "लेकर ब्रह्मपर्यन्त चराचर सम्पूर्ण विश्व आविर्भूत होकर पुनः विनष्ट हो जाता है, तो फिर अन्य वस्तु से ज्ञान कैसे हो सकता है? वेद अथवा यज्ञ से जो भी सार तत्व निकलता है, वह भगवान श्रीहरि की सेवा ही है। यही हरिसेवा समस्त तत्त्वों का सार है; इसके अतिरिक्त अन्य सब विडम्बना मात्र है। हे देवी! इस प्रकार मैंने तुम्हें ज्ञानोपदेश कर दिया। ज्ञानदाता स्वामी वही है जो ज्ञान के द्वारा बन्धन से मुक्त कर दे, जो बन्धन में डाले वह शत्रु है। जो जननी के गर्भजनित कष्ट तथा यम की यातना से मुक्त न कर सके, उसे गुरु, तात तथा बान्धव कैसे कहा जाए? जो भगवान श्रीकृष्ण के परमानन्दस्वरूप सनातन मार्ग का दर्शन न कराए, वह मनुष्यों के लिए कैसा बान्धव है?"
अ ० ४८ ] नवम पुनः स्रष्टुं द्विजः शक्तो न तेजस्वी द्विजात्परः ।
ब्राह्मणो ब्रह्मणो वंशः प्रज्वलन्ब्रह्मतेजसा ॥
मुनि ने विदा लेते हुए कहा, "मैं पुष्कर क्षेत्र जा रहा हूँ। तुम भी यहाँ से सुखपूर्वक चली जाओ। भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमल में अनुराग ही नि:स्पृह प्राणियों का एकमात्र मनोरथ है।"
जितेन्द्रियाणां प्रवरो धार्मिको ब्राह्मणाग्रणीः ।
तेजस्वी च तपस्वी च यशस्वी च गुणान्वितः ॥
अपने पति के इन वचनों को सुनकर शोक से व्याकुल और अश्रुपूर्ण नेत्रों वाली मनसा देवी अपने प्राणप्रिय पतिदेव से अत्यन्त विनम्रतापूर्वक बोलीं, "हे प्रभो! निद्रा भङ्ग कर देने के कारण जो आप मेरा त्याग कर रहे हैं, इसमें मेरा दोष नहीं है। मेरी बस यही प्रार्थना है कि मैं जहाँ भी आपका स्मरण करूँ, वहीं आप मुझे सदा दर्शन दीजिएगा। अपने बन्धुओं का वियोग कष्टदायक है और पुत्र का वियोग उससे भी अधिक, किन्तु प्राणेश्वर पतिदेव का वियोग तो प्राण-विच्छेद के तुल्य है। पतिव्रता स्त्रियों के लिए पति सौ पुत्रों से भी अधिक प्रिय होता है।" ऐसा कहकर मनसा देवी अपने स्वामी के चरणों में गिर पड़ीं।
वरो वेदविदां चैव ज्ञानिनां योगिनां तथा ।
स च पुत्रो विष्णुभक्तो धार्मिकः कुलमुद्धरेत् ॥
कृपानिधि मुनि जरत्कारु ने क्षण भर के लिए उन्हें अपनी गोद में लिया और अश्रुओं से उन्हें सान्त्वना दी। व्याकुल मनसा देवी ने भी अपने आँसुओं से उन मुनि की गोद को सींच डाला। इसके बाद चरणकमल का ध्यान करते हुए मुनि तपस्या के लिए चले गए और देवी मनसा अपने गुरु भगवान शिव के धाम कैलाश चली गईं।
वहाँ पार्वतीजी ने शोकसन्तप्त मनसा को बहुत समझाया और कल्याण-निधान भगवान शिव ने उन्हें अत्यन्त मङ्गलकारी ज्ञान प्रदान किया। वह बालक, जो गर्भ में रहते हुए ही शिव के मुख से महाज्ञान सुनकर योगीश्वर हो गया था, उसके जातकर्म के लिए भगवान शिव ने स्वयं संस्कार कराए और स्वस्तिवाचन व वेदपाठ किया। शिवजी ने उसे बहुमूल्य मणि, रत्न और मुकुट दान किए, जबकि पार्वतीजी ने उसे लाखों गौएँ और रत्न प्रदान किए। भगवान शिव ने उसे चारों वेद, वेदाङ्ग और श्रेष्ठ मृत्युञ्जय-ज्ञान का उपदेश दिया। अपने पति, अभीष्ट देवता और गुरु में अत्यधिक भक्ति होने के कारण उस बालक का नाम 'आस्तीक' हुआ।
पुष्कर क्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण का महामन्त्र प्राप्त करने के पश्चात, तपोधन महायोगी जरत्कारु ने तीन लाख वर्षों तक कठिन तपस्या की। तप पूर्ण कर वे भगवान शिव को नमस्कार करने आए। वहीं पर उनका पुत्र आस्तीक भी था। तत्पश्चात देवी मनसा अपने पुत्र सहित पिता कश्यप के आश्रम में वापस आ गईं। पुत्र-पुत्री को देखकर प्रजापति कश्यप अत्यन्त हर्षित हुए। उस समय देवी मनसा अपने पुत्र के साथ दीर्घकाल तक अपने पिता के आश्रम में ही रहीं।
अब कथा का अगला भाग सुनिए—एक समय की बात है, अभिमन्युपुत्र राजा परीक्षित दैव की प्रेरणा और अपने सदोष कर्मों के कारण ब्रह्मशाप से ग्रस्त हो गए थे। श्रृङ्गी ऋषि ने कौशिकी नदी का जल लेकर उन्हें शाप दिया था कि एक सप्ताह बीतते ही तक्षक नाग तुम्हें डँस लेगा। उस शाप को सुनकर राजा परीक्षित ऐसे सुरक्षित स्थान पर चले गए जहाँ वायु भी प्रवेश नहीं कर सकती थी। वे अपने देह की रक्षा में तत्पर होकर एक सप्ताह तक वहीं रहे। जब सप्ताह बीतने वाला था, तब धन्वन्तरि जाते हुए राजा को डँसने के लिए जा रहे तक्षक को मार्ग में देखा।
राजा जनमेजय ने सर्पसत्र नामक यज्ञ आरम्भ कर दिया था। उस यज्ञ की अग्नि और ब्रह्मतेज का प्रभाव इतना तीव्र था कि देखते ही देखते अनेक सर्प अपने प्राण त्यागने लगे। इस भयानक दृश्य को देखकर तक्षक भयभीत हो गया और भागकर इन्द्र की शरण में चला गया। दूसरी ओर, विप्रसमुदाय और इन्द्र भी उन सर्पों के विनाश से चिन्तित होकर देवी मनसा की शरण में पहुँचे।
उसी समय मुनिवर आस्तीक, जो माता की आज्ञा लेकर आए थे, वे यज्ञशाला में उपस्थित हुए। उन्होंने श्रेष्ठ राजा जनमेजय से इन्द्र और तक्षक के प्राणों की याचना की। इस करुणापूर्ण आग्रह को सुनकर महाराज जनमेजय ने उन्हें कृपापूर्वक प्राणदान का वर दे दिया। इसके पश्चात, ब्राह्मणों की आज्ञा पाकर उन्होंने यज्ञ का समापन किया और विप्रों को प्रसन्नतापूर्वक दक्षिणा देकर देवी मनसा को श्रद्धापूर्वक नमस्कार करते हुए उन्हें षोडशोपचार तथा प्रिय पदार्थ अर्पित किए। इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और शिव की आज्ञा पाकर, देवी मनसा की पूजा करके वे सभी अपने-अपने स्थान को चले गए।
जब देवराज इन्द्र ने देखा कि देवी मनसा की पूजा का विधान अत्यन्त विशिष्ट है, तब उन्होंने स्वयं उस विधि को समझना चाहा। इन्द्र ने मनसा देवी को मनोहर वस्त्र पहनाए, उनके सम्पूर्ण अङ्गों में चन्दन लगाया और भक्तिपूर्वक पाद्य तथा अर्घ्य अर्पित किया। इसके उपरान्त गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव तथा पार्वती—इन छह देवताओं की विधिवत् पूजा करने के बाद इन्द्र ने साध्वी मनसा का पूजन प्रारम्भ किया। उन्होंने 'ॐ ह्रीं श्रीं मनसादेव्यै स्वाहा'—इस दशाक्षर मूल मन्त्र द्वारा यथोचित पूजन सामग्री अर्पित की। भगवान विष्णु की प्रेरणा पाकर देवराज इन्द्र ने सोलह प्रकार के दुर्लभ पूजनोपचारों से देवी की पूजा की। उस समय इन्द्र ने नाना प्रकार के वाद्य बजवाए और देवताओं की आज्ञा तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव के आदेश से आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी।
पुष्पवृष्टि और दिव्य वातावरण देख इन्द्र का शरीर पुलकित हो उठा। उनकी आँखों में आँसू भर आए और वे अत्यन्त भावुक होकर देवी की स्तुति करने लगे। इन्द्र ने कहा—"हे देवि! आप पतिव्रता स्त्रियों में अति श्रेष्ठ, परात्पर और परमा हैं। मैं आपकी स्तुति करना चाहता हूँ, किन्तु इस समय मेरी सामर्थ्य नहीं है। हे प्रकृते! मैं वेदों में वर्णित आपके स्तोत्रों के लक्षण और आपके चरित्र का वर्णन करने में सक्षम नहीं हूँ। मैं आपके गुणों की गणना भी नहीं कर सकता।"
इन्द्र ने आगे कहा—"हे देवी! आप शुद्ध सत्त्वस्वरूपा हैं और क्रोध तथा हिंसा से रहित हैं। मुनि जरत्कारु भी आपका त्याग करने में समर्थ नहीं थे, इसलिए उन्होंने आपसे क्षमायाचना की थी। आप मेरी माता अदिति के समान पूजनीया हैं; दया के रूप में मेरी भगिनी और क्षमा के रूप में मेरी जननी हैं। जो मनुष्य आपकी पूजा करेंगे, उनके पुत्र-पौत्र यशस्वी, कीर्तिमान् और विद्यासम्पन्न होंगे। किन्तु जो अज्ञानवश आपकी निन्दा करेंगे, वे सदैव लक्ष्मीविहीन रहेंगे और उन्हें नागों का भय सताएगा।"
इन्द्र ने देवी के रहस्य को समझाते हुए कहा—"हे देवी! आप स्वयं सर्वलक्ष्मी हैं और वैकुण्ठ में कमलालया हैं। मुनीश्वर जरत्कारु तो नारायण के ही अंश हैं। आपके पिता ने हम सबकी रक्षा के उद्देश्य से तपस्या और तेज के प्रभाव से आपका मन द्वारा सृजन किया है, इसीलिए आप 'मनसा' नाम से विख्यात हैं। हे देवी! आप सत्यस्वरूपिणी हैं। जो मनुष्य तत्पर होकर आपका ध्यान करता है, वह आपको प्राप्त कर लेता है।" इस प्रकार स्तुति करके और देवी से वर प्राप्त कर इन्द्र अपने दिव्य भूषणों से अलङ्कृत भवन को लौट गए।
ससृजे सुरभिं देवीं लीलया वामपार्श्वतः ।
वत्सयुक्तां दुग्धवतीं वत्सो नाम मनोरथः ॥ दृष्ट्वा सवत्सां श्रीदामा नवभाण्डे दुदोह च ।
क्षीरं सुधातिरिक्तं च जन्ममृत्युजराहरम् ॥ नारदजी बोले – हे ब्रह्मन्! गोलोकसे जो सुरभिदेवी आयी थीं, वे कौन थीं? मैं ध्यानपूर्वक १ उनका जन्मचरित्र सुनना चाहता हूँ ॥
देवी मनसा अपने पुत्र के साथ पिता कश्यप के आश्रम में दीर्घकाल तक निवास करने लगीं। वहाँ वे अपने भाइयों द्वारा सदा पूजित, सम्मानित और वन्दित हुईं। तदुपरान्त सुरभि गौ, जो गोलोक में निवास करती हैं, वहाँ आईं। उन्होंने इन्द्र द्वारा सुपूजित मनसा देवी की पूजा की और उन्हें अपने दुग्ध से स्नान कराकर आदरपूर्वक पूजन किया। उस समय उन देवी ने सुरभि को अत्यन्त दुर्लभ तथा गोपनीय ज्ञान का उपदेश दिया। इसके पश्चात, देवताओं द्वारा पूजित वे देवी मनसा पुनः स्वर्गलोक को चली गईं।
श्रीकृष्ण ने बताया कि सुरभि गौ स्वयं गोलोक की अधिष्ठात्री देवी और समस्त गौओं की जननी हैं। पूर्वकाल में, जब श्रीकृष्ण राधा के साथ वृन्दावन में विहार कर रहे थे, तब उन्होंने एकान्त में लीलापूर्वक अपने वाम भाग से बछड़े सहित सुरभि गौ को प्रकट किया। उस दिव्य बछड़े का नाम मनोरथ था, जिसने अमृत तुल्य दुग्ध प्रदान किया।
In English
The Legend of Goddess Manasa and Sage Jaratkaru
After being created by Kashyapa, Manasa performs intense penance to worship Krishna and later marries the sage Jaratkaru. Following a dispute over ritual duties, Jaratkaru abandons her, leading to the birth of their son Astika. Years later, Astika intervenes in King Janamejaya's serpent sacrifice to save Indra and the snake Takshaka.
This page answers
- How was goddess manasa created?
- Why did jaratkaru abandon manasa?
- Who is the son of manasa and jaratkaru?
- How did astika save the snakes during janamejaya's sacrifice?
- What is the worship ritual for manasa devi?
Also written: Manasopakhyana, Manasa, Kashyapa, Shiva, Shrikrishna, Jaratkaru, Takshaka, Parikshita, Dhanvantari, Indra, Astika, Janamejaya, Vishnu, Brahma, Radha, मनसोपाख्यान