मङ्गलचण्डीमनसयोरुपाख्यान : नागों के भय से मुक्ति और वंश की रक्षा कैसे सम्भव है?
भय से मुक्ति का मार्ग
श्रीमद्देवीभागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
देवी भागवत उत्तरार्द्ध · नवम स्कन्ध · अध्याय 47 · पृष्ठ 586–591
581 शब्द · 3 मिनटका पाठ · 5 श्लोक
श्रीनारायण ने ब्रह्मपुत्र से कहा
आगमशास्त्र के अनुसार मङ्गलचण्डी और मनसा देवी की महिमा बताने हेतु
श्रीनारायण बोले— हे ब्रह्मपुत्र! आगमशास्त्र के अनुसार मैंने देवी षष्ठी का आख्यान कह दिया है। अब आप भगवती मङ्गलचण्डीका आख्यान और उनका पूजा-विधान सुनिए, जिसे मैंने धर्मदेव के मुख से सुना था। यह उपाख्यान श्रुतिसम्मत है तथा सभी विद्वानों को अभीष्ट कल्याण करने में सिद्ध है।
कथितं षष्ठ्युपाख्यानं ब्रह्मपुत्र यथागमम् ।
देवी मङ्गलचण्डी च तदाख्यानं निशामय ॥
कल्याणकारी और प्रचण्ड मङ्गलों के मध्य जो प्रचण्ड मङ्गला हैं, वे देवी 'मङ्गलचण्डिका' नाम से विख्यात हैं। मनुवंश में उत्पन्न मङ्गल नामक एक राजा सात द्वीपों वाली सम्पूर्ण पृथ्वी के स्वामी थे; ये भगवती उनकी पूज्य अभीष्ट देवी थीं, इसीलिए वे 'मङ्गलचण्डिका' नाम से प्रसिद्ध हुईं। वे ही मूर्तिभेद से मूलप्रकृति भगवती दुर्गा हैं, जो कृपारूपिणी होकर साक्षात् प्रकट होने वाली हैं।
मङ्गलो मनुवंश्यश्च सप्तद्वीपधरापतिः ।
तस्य पूज्याभीष्टदेवी तेन मङ्गलचण्डिका ॥
एक समय की बात है, जब भगवान् शिव सङ्कट में थे। उन्होंने त्रिपुरदैत्य के वध हेतु भगवती दुर्गा की स्तुति की। उस क्षण देवी दुर्गा रूप बदलकर प्रकट हुईं और भगवान् शिव को ढाढस बन्धाते हुए बोलीं— "हे प्रभो! अब आपको कोई भय नहीं है। सर्वेश्वर भगवान् श्रीहरि वृषरूप में आपका वाहन बनेंगे और मैं युद्ध में शक्तिस्वरूपा होकर आपकी सहायता करूँगी, इसमें सन्देह नहीं है।" हे वृषध्वज! तब मायास्वरूप भगवान् श्रीहरि की सहायता से आप देवताओं को पदच्युत कर देने वाले अपने शत्रु त्रिपुरदैत्य का वध कर डालेंगे। तत्पश्चात् उमापति शङ्कर ने विष्णुजी द्वारा दिए गए शस्त्र से उस दैत्य को मार डाला। जैसे ही वह दैत्य धराशायी हुआ, सभी देवता तथा महर्षिगण भक्तिपूर्वक अपना सिर झुकाकर भगवान् शिव की स्तुति करने लगे। उसी क्षण भगवान् शिव के सिर पर पुष्पों की वर्षा होने लगी और ब्रह्मा तथा विष्णु ने परम प्रसन्न होकर उन्हें शुभाशीर्वाद दिया।
युद्धशक्तिस्वरूपाहं भविष्यामि न संशयः ।
मायात्मना च हरिणा सहायेन वृषध्वज ॥
भगवान् शिव ने इस प्रकार देवी मङ्गलचण्डिका की स्तुति की और प्रत्येक मङ्गलवार को उनकी पूजा करके अपने लोक चले गए। जो व्यक्ति एकाग्रचित्त होकर इस मङ्गलमय स्तोत्र का श्रवण करता है, उसका सदा मङ्गल होता है और उसका अमङ्गल कभी नहीं होता; उसके पुत्र-पौत्रों सहित मङ्गल की दिन-प्रतिदिन वृद्धि होती रहती है।
तस्याः पूजादिकं सर्वं धर्मवक्त्रेण यच्छ्रुतम् ।
श्रुतिसम्मतमेवेष्टं सर्वेषां विदुषामपि ॥
हे मुने! अब आप भगवती मनसा का आख्यान सुनिए, जिसे मैंने धर्मदेव के मुख से सुना है। वे भगवती कश्यप की मानसी कन्या हैं और मनसे ध्यान करने पर प्रकाशित होती हैं, इसीलिए वे 'मनसा' देवी नाम से विख्यात हुईं। उस वैष्णवी देवी ने तीन युगों तक कठिन तपस्या की और परमात्मा श्रीकृष्ण का दर्शन प्राप्त किया। उस समय गोपीपति भगवान् श्रीकृष्ण ने उनके जीर्ण वस्त्र और शरीर को देखकर उनका नाम 'जरत्कारु' रख दिया। कृपानिधि श्रीकृष्ण ने उन्हें कृपापूर्वक वाञ्छित वर प्रदान किए और स्वयं उनकी पूजा की।
वे देवी भगवान् शिव की शिष्या हैं, इसलिए 'शैवी' कहलाती हैं; वे सदा भगवान् विष्णु की परम भक्ति में संलग्न रहती हैं, इसलिए 'वैष्णवी' हैं। वे विष का हरण करने में समर्थ हैं, अतः 'विषहरी' कही जाती हैं। उन्होंने शिवजी से सिद्धयोग प्राप्त किया था, इसलिए वे 'सिद्धयोगिनी' हैं। विद्वान उन्हें 'महाज्ञानयुता' कहते हैं क्योंकि उन्होंने शिवजी से महाज्ञान और मृतसञ्जीवनी विद्या प्राप्त की थी।
वे देवी जरत्कारु, जगद्गौरी, मनसा, सिद्धयोगिनी, वैष्णवी, नागभिनी, शैवी, नागेश्वरी, जरत्कारुप्रिया, आस्तीकमाता, विषहरा और महाज्ञानयुता—इन बारह नामों से विश्व में पूजी जाती हैं। जो मनुष्य पूजा के समय देवी के इन बारह नामों का पाठ करता है, उसे तथा उसके वंशजों को नागों का भय नहीं रहता। जिस शयनागार या भवन में नागों का भय हो, वहाँ इस स्तोत्र का पाठ करने से मनुष्य सर्पभय से मुक्त हो जाता है। वह व्यक्ति नागों को भूषण बनाकर उन पर सवारी करने में सक्षम हो जाता है और अन्त में भगवान् विष्णु के साथ दिन-रात क्रीडा करता है।
योगिनो विश्वपूज्यस्य जरत्कारुप्रिया ततः ।
जरत्कारुर्जगद्गौरी मनसा सिद्धयोगिनी ॥
वैष्णवी नागभगिनी शैवी नागेश्वरी तथा ।
जरत्कारुप्रियास्तीकमाता विषहरेति च ॥
महाज्ञानयुता चैव सा देवी विश्वपूजिता ।
द्वादशैतानि नामानि पूजाकाले तु यः पठेत् ॥
तस्य नागभयं नास्ति तस्य वंशोद्भवस्य च ।
नागभीते च शयने नागग्रस्ते च मन्दिरे ॥ ५४ ।
नागशोभे महादुर्गे नागवेष्टितविग्रहे ।
इदं स्तोत्रं पठित्वा तु मुच्यते नात्र संशयः ॥
नित्यं पठेद्यस्तं दृष्ट्वा नागवर्गः पलायते ।
दशलक्षजपेनैव स्तोत्रसिद्धिर्भवेन्नृणाम् ॥
जरत्कारु, जगद्गौरी, मनसा, सिद्धयोगिनी, वैष्णवी, नागभगिनी, शैवी, नागेश्वरी, जरत्कारुप्रिया, आस्तीकमाता, विषहरा और महाज्ञानयुता – इन नामोंसे वे भगवती विश्वमें पूजी जाती हैं । जो मनुष्य पूजाके समय देवीके इन बारह नामोंका पाठ करता है, उसे तथा उसके वंशजोंको नागोंका भय नहीं रहता ।
हे मुनिश्रेष्ठ! मैंने मनसा देवी के विषय में विधानपूर्वक कह दिया है। अब आप उनके सामवेदोक्त ध्यान और पूजा-विधान के विषय में सुनिए।
In English
The Stories of Mangalchandika and Manasa
Shiva prays to Durga in the form of Mangalchandika to help him defeat the demon Tripurasura with Vishnu's assistance. The text also describes the goddess Manasa, who performed penance to see Krishna and received many names and powers from him and Shiva.
This page answers
- How did durga help shiva kill tripurasura?
- Why is the goddess called mangalchandika?
- What are the twelve names of the goddess manasa?
- How can one protect themselves from the fear of snakes?
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