श्रीगणेशाय नमः।

प्रकृतिचरित्र : सृष्टि की रचना में प्रकृति देवी के विभिन्न रूप और उनकी उत्पत्ति कैसे हुई?

प्रकृति के विविध स्वरूप

श्रीमद्देवीभागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · नवम स्कन्ध · अध्याय None · पृष्ठ 297–310

1,617 शब्द · 9 मिनटका पाठ · 9 श्लोक

श्रीनारायण ने नारद से कहा

नारद द्वारा सृष्टि की प्रक्रिया और प्रकृति के कलांशों के चरित्र को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न करने पर।

श्रीनारायण बोले— "हे वत्स! देवी प्रकृतिके सम्पूर्ण लक्षण कौन बता सकता है? फिर भी धर्मराज के मुख से मैंने जो यत्किञ्चित् सुना है, उसे रूप से बताता हूँ।"

स्वतन्त्रभाववाले श्रीकृष्णकी इच्छासे वे १२ मूलप्रकृति भगवती सृष्टि करनेकी कामनासे सहसा प्रकट हो गयीं ।
उनकी आज्ञासे भिन्न - भिन्न कर्मोंकी अधिष्ठात्री होकर एवं भक्तोंके अनुरोधसे उनपर १३ अनुग्रह करनेहेतु विग्रह धारण करनेवाली वे पाँच रूपोंमें अवतरित हुईं ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · श्लोक 12-13पृष्ठ 299

सृष्टिविधान में मूलप्रकृति पाँच प्रकार की कही गयी है— गणेशजननी दुर्गा, राधा, लक्ष्मी, सरस्वती और सावित्री। 'प्र' शब्द प्रकृष्ट सत्त्वगुण का, 'कृ' रजोगुण का और 'ति' तमोगुण का प्रतीक है। जो इन तीनों गुणों से युक्त होकर सर्वशक्ति से सम्पन्न हैं, वे ही सृष्टिकार्य में संलग्न रहती हैं, अतः उन्हें प्रकृति या प्रधान कहा जाता है। सृष्टि के प्रारम्भ में जो देवी विद्यमान रहती हैं, उन्हें प्रकृति कहा गया है।

सृष्टि के लिये योगमाया का आश्रय लेकर परमात्मा दो रूपों में विभक्त हो गये, जिनका दक्षिणार्ध भाग पुरुष और वामार्ध भाग प्रकृति कहलाता है। वे ब्रह्मस्वरूपा, नित्या और सनातनी हैं; जैसे अग्नि में दाहिका शक्ति अभिन्न रूप से स्थित होती है, वैसे ही परमात्मा और प्रकृतिरूपा शक्ति भी अभिन्न हैं। इसीलिए योगीजन परमात्मा में स्त्री और पुरुष भाव से भेद नहीं मानते।

जो गणेशमाता दुर्गा हैं, वे शिवप्रिया और शिवरूपा हैं; वे ही विष्णुमाया नारायणी हैं। ब्रह्मादि देवता, मुनि तथा मनुगण उनकी पूजा-स्तुति करते हैं। वे सबकी अधिष्ठात्री देवी हैं और धर्म, सत्य, पुण्य तथा कीतिस्वरूपा हैं। वे यश, कल्याण, सुख, प्रसन्नता और मोक्ष देती हैं तथा शोक, दुःख और सङ्कटों का नाश करती हैं। वे अपनी शरण में आये हुए दीन और आर्तजनों की निरन्तर रक्षा करती हैं। उनका विग्रह परम तेजस्वी है और वे भगवान श्रीकृष्ण के तेज की अधिष्ठातृदेवता हैं।

अब दूसरे स्वरूप के विषय में सुनिये— जो शुद्ध सत्त्वरूपा महालक्ष्मी हैं, वही शक्ति हैं। वे सर्वसम्पत्स्वरूपिणी, शोभामयी और अति संयमी हैं। वे लोभ, मोह और अहङ्कारादि से रहित हैं। वे पुण्यवानों में कीर्तिरूप, राजपुरुषों में प्रभारूप, व्यापारियों में वाणिज्यरूप तथा पापियों में कलहरूप से विराजती हैं। वे दयारूपा हैं और वेदों में उनका निरूपण हुआ है। वे सर्वमान्य और सर्वपूज्य हैं।

चौथी शक्ति सरस्वती के विषय में— वे चारों वर्णों, वेदाङ्गों एवं समस्त तन्त्रों की जननी हैं। वे द्विजातियों की जातिरूपा, तपस्विनी और ब्राह्मणों की तेजरूपा हैं। वे ब्रह्मप्रिया सावित्री और गायत्री के रूप में परम पवित्रता से विराजमान रहती हैं। उनके चरणरज से समस्त संसार पवित्र हो जाता है।

अब पाँचवीं शक्ति के विषय में सुनिये— जो पञ्च प्राणों की अधिष्ठात्री और सर्वगुणसम्पन्न हैं, वे श्रीकृष्ण की वामाङ्गार्ध रूपा हैं। वे रासमण्डल में निवास करने वाली देवी रासेश्वरी हैं और गोलोक में गोपी वेष धारण कर रहती हैं। वे परम आह्लाद, सन्तोष और हर्ष रूपा हैं। वे ईश्वरों और मुनिश्रेष्ठों के दृष्टिपथ में भी नहीं आतीं। वे कोटिचन्द्रप्रभा से युक्त और समस्त ऐश्वर्यों से समन्वित हैं।

जैसे आकाशमण्डल में नवीन मेघों के बीच विद्युत् ता सुशोभित होती है, वैसे ही वे सुशोभित हैं। पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने आत्मशुद्धि हेतु जिनके चरणकमल के नख के दर्शन के लिये साठ हजार वर्षों तक तपस्या की, किन्तु स्वप्न में भी उन्हें नखज्योतिका का दर्शन नहीं हुआ; साक्षात् दर्शन की तो बात ही क्या! उन्हीं ब्रह्माजी ने पृथ्वीतल के वृन्दावन में तपस्या द्वारा उनका दर्शन किया। वे ही राधा कही गयी हैं।

भगवती के पूर्णावतार रूप में जो पाँच विद्यादेवियाँ कही गयी हैं, उनके अंश से प्रकृति देवी उत्पन्न हुई हैं। पवित्र रूपा और तीर्थनां सरितां च परावरा— गङ्गा भगवान विष्णु के श्रीविग्रह से प्रकट हुई हैं। वे पापियों के लिये धधकती अग्नि के समान हैं, किन्तु भक्तों के लिये सुखस्पर्शिणी और मुक्तिप्रदायिनी हैं। उनका जल चन्द्रमा और श्वेत कमल के समान धवल है; वे निर्मल, निरहङ्कार और नारायणप्रिया हैं।

गंगा गोलोकादि दिव्य लोकोंमें जानेके लिये ॥

प्रधानांशस्वरूपा या मनसा कश्यपात्मजा शङ्करप्रियशिष्या च महाज्ञानविशारदा करती रहती हैं । उनका जल चन्द्रमा, दुग्ध और श्वेत । कमलके समान धवल है और वे शुद्ध सत्त्वरूपिणी ६४ हैं । वे निर्मल, निरहंकार, साध्वी और नारायणप्रिया हैं ।

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · श्लोक 62पृष्ठ 303

विष्णुवल्लभा तुलसी भी भगवती की प्रधानांश स्वरूपा हैं। वे सदा भगवान विष्णु के चरण पर विराजती हैं और उनकी आभूषण रूपा हैं। उनसे तप और पूजादिके सभी सत्कर्म सम्पन्न होते हैं। वे अपने दर्शन एवं स्पर्श से शीघ्र ही मोक्ष प्रदान करती हैं। वे कलिके पापरूप ईंधन को जलाने वाली अग्नि हैं, जिनके चरणकमल के स्पर्श से पृथ्वी शीघ्र पवित्र हो जाती है। वे मुमुक्षुजनों को मोक्ष देने वाली और सब प्रकार के भोग प्रदान करने वाली हैं।

श्रीनारायण बोले— "हे नारद! जैसे आत्मा नित्य है, आकाश नित्य है, काल और दिशाएँ नित्य हैं; जैसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड-गोल, गोलोक और उससे थोड़ा नीचे स्थित वैकुण्ठ नित्य है; ठीक उसी प्रकार ब्रह्म की सनातनी लीला-शक्ति 'प्रकृति' भी नित्य है।"

अ ० १ ] नवम नागेश्वरस्यानन्तस्य भगिनी नागपूजिता ।
नागेश्वरी नागमाता सुन्दरी नागवाहिनी ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · श्लोक 72पृष्ठ 304

श्रीनारायण ने प्रकृति के विविध स्वरूपों का वर्णन करना आरम्भ किया। उन्होंने बताया कि वे देवी भगवान् विष्णु की परम भक्त हैं और सदा विष्णुपूजा में लीन रहती हैं; वे स्वयं विष्णुरूपा हैं। दिव्य तीन लाख वर्षों तक भगवान् श्रीहरि की कठोर तपस्या करने के कारण वे भारतवर्ष के समस्त तपस्वियों में पूजनीय हुईं। वे मनसा देवी, जो ब्रह्मतेज से देदीप्यमान रहती हैं और सदा ब्रह्मध्यान में लीन रहती हैं, वे स्वयं परमा ब्रह्मस्वरूपा हैं। वे श्रीकृष्ण के अंश से प्रकट हुई महामुनि जरत्कारुक की पत्नी और श्रेष्ठ आस्तीक मुनि की माता हैं। हे नारद! भगवती की प्रधान अंश-स्वरूपा देवसेना, जो मातृकाओं में पूजनीय हैं, उन्हें 'षष्ठी' कहा जाता है। वे पुत्र-पौत्र प्रदान करने वाली, तीनों लोकों की जननी और पतिव्रता हैं; मूल प्रकृति के छठे अंश से प्रकट होने के कारण ही वे षष्ठी कहलाती हैं। शिशुओं के जन्म के समय ये योगिनी परम वृद्धारूप में विराजमान रहती हैं। समस्त जगत् में बारह महीने इनकी पूजा होती है; सूतिकागृह में बालक के जन्म के छठे और इक्कीसवें दिन इनकी कल्याणकारी पूजा की जाती है।

नागेन्द्रगणसंयुक्ता नागभूषणभूषिता ।
नागेन्द्रवन्दिता सिद्धा योगिनी नगशायिनी ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · श्लोक 73पृष्ठ 304

ये षष्ठीमाता मुनियों द्वारा वन्दित, नित्य कामना पूर्ण करने वाली, दयारूपा और रक्षा करने वाली पराशक्ति हैं। ये जल, थल, आकाश और गृह में बालकों के कल्याण हेतु सदा तत्पर रहती हैं। विद्वानों ने इन्हें 'मङ्गलचण्डी' कहा है क्योंकि ये कोपरूपिणी हैं; प्रत्येक मङ्गलवार को सर्वत्र इनकी पूजा होती है। ये पुत्र, पौत्र, धन, ऐश्वर्य और यश प्रदान करती हैं। प्रसन्न होकर ये समस्त नारियों की कामनाएँ पूर्ण करती हैं। वहीं महेश्वरी रुष्ट होने पर क्षणमात्र में सृष्टि का संहार करने में सक्षम हैं। पराशक्ति के प्रधान अंश से ही कमललोचना भगवती कालीका का प्राकट्य हुआ है। जब शुम्भ-निशुम्भ के साथ युद्ध चल रहा था, तब जगदम्बा दुर्गा देवी के ललाट से प्रकट हुईं और दुर्गा के अर्धांश से वे कृष्णवर्णा काली कहलाईं। अपने एक निःश्वास मात्र से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का संहार करने में वे समर्थ हैं, किन्तु लोक-शिक्षण हेतु उन्होंने लीलापूर्वक दैत्यों से युद्ध किया। जो उनकी पूजा करते हैं, वे उन्हें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—सब कुछ प्रदान करती हैं। ब्रह्मा आदि देवता, मुनि, मनु और समस्त मनुष्य उनकी उपासना करते हैं।

विष्णुरूपा विष्णुभक्ता विष्णुपूजापरायणा ।
तपःस्वरूपा तपसां फलदात्री तपस्विनी ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · श्लोक 74पृष्ठ 304

वसुन्धरा देवी भी प्रकट हुई हैं, जो समस्त प्राणियों और पदार्थों की आधार हैं; वे रत्नों की निधि 'रत्नगर्भा' और समस्त समुद्रों की आश्रय हैं। राजा और प्रजा सभी उन्हें वन्दित करते हैं क्योंकि उनके बिना चराचर जगत् निराधार है। पितृ-देवताओं की पत्नी स्वधा देवी हैं; मुनियों और मनुओं द्वारा उनकी पूजा किए बिना कोई भी पितृकर्म निष्फल रहता है। वायुदेव की पत्नी स्वस्तिदेवी हैं, जिनकी प्रत्येक लोक में पूजा होती है; उनके बिना आदान-प्रदान का कार्य निष्फल है। भगवान् अनन्त की पत्नी तुष्टि हैं, जिनके बिना संसार में लोग सन्तुष्ट नहीं रहते। ईशानदेव की पत्नी सम्पत्तिदेवी हैं, जिनकी पूजा से दरिद्रता दूर होती है। प्रतिष्ठादेवी पुण्यदेव की पत्नी हैं; उनके अभाव में प्राणी जीवित रहकर भी मृततुल्य हो जाते हैं। कीर्तिदेवी सुकर्मदेव की पत्नी हैं, जिनके बिना संसार यशहीन और नष्ट हो जाता है। सत्ययुग में ये मिथ्या देवी तिरोहित रहती थीं, त्रेता में सूक्ष्म रूप में, द्वापर में आधे शरीर वाली होकर, किन्तु कलियुग में ये महाप्रगल्भ होकर बलपूर्वक सर्वत्र व्याप्त हैं और अपने भाई कपट के साथ घर-घर घूमती हैं।

धर्म की पत्नी 'मूर्ति' अत्यन्त मनोहर कान्तिवाली हैं; उनके बिना परमात्मा और विश्व समूह निराधार रहते हैं। वे सर्वत्र शोभारूपा, लक्ष्मीरूपिणी और अतिपूज्या हैं। सन्ध्या, रात्रि और दिवा—इनके बिना विधाता भी काल की गणना नहीं कर सकते। लोभ की दो पत्नियाँ क्षुधा और पिपासा हैं, जिनसे व्याप्त यह जगत् नित्य चिन्ताग्रस्त रहता है। तेज की दो पत्नियाँ प्रभा और दाहिका हैं; इनके बिना ब्रह्मा सृष्टि रचने में समर्थ नहीं होते, जिससे संसार नष्ट होने लगता है। निद्रा की दो पुत्रियाँ तन्द्रा और प्रीति हैं, तथा सुख की दो पत्नियाँ भी हैं। हे नारद! इन सब से यह सारा जगत् व्याप्त है। वैराग्य की दो पत्नियाँ श्रद्धा और भक्ति हैं, जिनसे यह जगत् जीवन्मुक्त के समान हो जाता है।

अ ० १ ] नवम स्कन्ध २ ९९ अदितिर्देवमाता च सुरभी च गवां प्रसूः ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · श्लोक 124पृष्ठ 308

प्रकृति देवी की अनेक कलाएँ हैं। देवताओं की माता अदिति हैं और गायों की उत्पत्ति सुरभि से हुई है। दैत्यों की माता दिति, कद्रू, विनता और दनु हैं। चन्द्रमा की पत्नी रोहिणी, सूर्य की पत्नी सञ्ज्ञा, मनु की पत्नी शतरूपा, इन्द्र की पत्नी शची, वसिष्ठ की पत्नी अरुन्धती, गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या, अत्रिका की भार्या अनसूया, कर्दम की पत्नी देवहूति और दक्ष की भार्या प्रसूति—ये सब प्रकृति की कलाएँ हैं। रुक्मिणी (जो साक्षात् लक्ष्मी हैं), सीता, काली, महासती योजनगन्धा, बाणपुत्री उषा, उसकी सखी चित्रलेखा, प्रभावती, भानुमती, साध्वी मायावती, परशुराम की माता रेणुका, बलराम की माता रोहिणी और श्रीकृष्ण की बहन दुर्गारूपी नन्दा—ये सब प्रकृति की विख्यात शक्तियाँ हैं। जो व्यक्ति वस्त्र, अलङ्कार और चन्दन से एक साध्वी ब्राह्मणी का पूजन करता है, उसने स्वयं प्रकृति देवी का पूजन कर लिया। उत्तम, मध्यम अथवा अधम—सभी स्त्रियाँ प्रकृति से ही उत्पन्न होती हैं। वे कलहप्रिय, कटुभाषिणी, धूर्त और कुल का नाश करने वाली भी हो सकती हैं; पृथ्वी पर जो कुलटाएँ हैं और स्वर्ग में जो अप्सराएँ हैं, वे प्रकृति के तामसांश से प्रकट हुई हैं।

दितिश्च दैत्यजननी कद्रूश्च विनता दनुः ।
उपयुक्ताः सृष्टिविधावेतास्तु कीर्तिताः कलाः ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · श्लोक 125पृष्ठ 308

इतिहास साक्षी है कि दक्षकन्या सती ने पति-निन्दा के कारण देहत्याग किया था, किन्तु पुनः पुनर्जन्म लेकर वे हिमवान की भार्या के रूप में उत्पन्न हुईं और उन्होंने भगवान् शङ्कर को पतिरूप में प्राप्त किया। उनके दो पुत्र हुए—श्रीकृष्ण रूप गणेश और विष्णु की कला से युक्त स्कन्द। हे नारद! इस प्रकार प्रकृति की विविध कलाओं का वर्णन हुआ।

कला अन्याः सन्ति बह्व्यस्तासु काश्चिन्निबोध मे ।
रोहिणी चन्द्रपत्नी च संज्ञा सूर्यस्य कामिनी ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · श्लोक 126पृष्ठ 308

नारद जी ने जब देवियों का चरित्र सुन लिया, तब उन्होंने पूछा— "हे प्रभो! सृष्टि प्रक्रिया में सृष्टिकी आद्यादेवी का प्राकट्य कैसे हुआ? वे प्रकृति पुनः पाँच रूपों में कैसे आविर्भूत हुईं? हे वेदज्ञों में श्रेष्ठ! मैं उन त्रिगुणात्मिका प्रकृतिक के कलांशों से उत्पन्न देवियों का चरित्र विस्तार से सुनना चाहता हूँ। उनके जन्म की कथा, पूजा-ध्यान की विधि, स्तोत्र, कवच और उनके ऐश्वर्य का वर्णन कीजिये।"

प्रकृतिचरित्रवर्णनं नाम प्रथमोध्यायः ॥

समासेन श्रुतं सर्वं देवीनां चरितं प्रभो ।
विबोधनाय बोधस्य व्यासेन वक्तुमर्हसि ॥

चिन्मय देवताओं एवं देवियोंका वर्णन नारदजी बोले - हे प्रभो! देवियोंका सम्पूर्ण चरित्र मैंने संक्षेपमें सुन लिया, अब सम्यक् प्रकारसे बोध प्राप्त करनेके लिये विस्तार से वर्णन कीजिये ।

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · श्लोक 1पृष्ठ 310

In English

The Five Forms of Nature and Her Divine Manifestations

Shri Narayana explains the various forms of Prakriti (Nature) to Narada. He describes how she manifests as Durga, Lakshmi, Saraswati, Radha, and others, detailing their specific roles and powers in the universe.

This page answers

  • What are the five types of prakriti?
  • Who is the goddess radha?
  • How did kalika emerge from durga?
  • What are the different forms of nature's powers?
  • Who is the mother of satya and kirti?

Also written: Prakriticharitra, Shrinarayana, Shrikrishna, Mahadevi, Ganga, Tulasi, Manasa, Devasena, Mangalachandika, Kali, Prakriti, Durga, Sati, Radha, Krishna, Mangalachandi, प्रकृतिचरित्र