श्रीगणेशाय नमः।

विन्ध्योपाख्यान : अहङ्कारवश एक पर्वत ने सृष्टि के सन्तुलन को कैसे बिगाड़ दिया?

अहङ्कार और सृष्टि का सन्तुलन

श्रीमद्देवीभागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · दशम स्कन्ध · अध्याय 2–3 · पृष्ठ 618–623

790 शब्द · 4 मिनटका पाठ · 4 श्लोक

सूत जी ने मुनिश्रेष्ठ से कहा

सुमेरुगिरि के अभिमान और विन्ध्यपर्वत के अहङ्कार की कथा सुनाने हेतु

ऋषियों ने सूत जी से पूछा— "हे सूत जी! वह विन्ध्याचल कौन है जो आकाश को छूने के लिए ऊपर की ओर बढ़ा? उसने सूर्य के मार्ग का अवरोध क्यों किया और उस महान ऊँचे पर्वत को महर्षि अगस्त्य ने बढ़ने से क्यों रोक दिया? कृपया हमें यह सब विस्तार से बताइए।"

सूत जी बोले— "हे मुनियो! यह कथा उस विन्ध्याचल की है, जो अत्यन्त विशाल और शोभायमान था। वह नदियों और नदनों के जल से व्याप्त था और उसमें मृग, वराह, महिष, बाघ, सिंह, वानर, खरगोश, भालू और सियार जैसे शक्ति-शाली वन्य जन्तु हर्षित होकर विचरण करते थे। वह पर्वत मनोवाञ्छित फल देने वाले वृक्षों से शोभायमान था।

हे मुनिश्रेष्ठ! वरदायिनी तथा परमेश्वरी वे विष्णुभगिनी विन्ध्यवासिनी सभी लोगोंके लिये पूज्य हो गयीं ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · दशम स्कन्ध · अध्याय 2 · श्लोक 6पृष्ठ 618

एक समय देवर्षि नारद परम प्रसन्न होकर पृथ्वीलोक में विन्ध्यपर्वत पर पहुँचे। उन्हें देखते ही विन्ध्याचल वेगपूर्वक उठ खड़ा हुआ और उसने आदरपूर्वक उन्हें पाद्य-अर्घ्य देकर उत्तम आसन अर्पित किया। सुखपूर्वक विराजमान उन प्रसन्न देवर्षि से विन्ध्यपर्वत ने पूछा— 'हे देवर्षे! कहिये, आपका यह शुभागमन कहाँ से हुआ है? आपके आगमन से मेरा घर परम पावन हो गया है। जैसे सूर्य संसार के कल्याणार्थ भ्रमण करते हैं, वैसे ही आप भी देवताओं को अभय प्रदान करने हेतु घूमते रहते हैं। हे नारद जी! आपके मन में जो भी विशेष बात हो, उसे मुझे बताइये।'

नारद जी बोले— 'हे इन्द्रशत्रु! मेरा आगमन सुमेरुगिरि से हुआ है। वहाँ मैंने इन्द्र, अग्नि, यम तथा वरुण के लोकों को देखा है। हे विन्ध्यपर्वत! वहाँ मुझे समस्त लोकपालों के नानाविध भोग प्रदान करने वाले भवन चारों ओर दिखाई पड़े।' इतना कहकर ब्रह्माजी के पुत्र नारद ने एक दीर्घ श्वास लिया।

विन्ध्यपर्वत ने उन्हें देखकर पुनः पूछा— 'हे देवर्षे! इस उच्छ्वास का क्या कारण है?'

नारद जी बोले— 'हे वत्स! मेरे उच्छ्वास का कारण सुनो। पार्वती के पिता हिमालय शिवजी के श्वसुर हैं, इस नाते वे सभी पर्वतों के पूज्य हो गये। इसी प्रकार शिवजी का निवास स्थल कैलास भी सभी पर्वतों का पूज्य स्वामी बन गया। निषध, नील तथा गन्धमादन आदि पर्वत भी अपने स्थान पर स्थित होकर पूज्य हैं। किन्तु यह सुमेरुगिरि है, जिसकी परिक्रमा समस्त विश्व की आत्मा, स्वर्ग के राजा और हजारों किरणें धारण करने वाले सूर्य, अपने समस्त ग्रह-नक्षत्रों के समूह सहित करते हैं। वह स्वयं को पर्वतों में श्रेष्ठ मानता है और समझता है कि मेरे समान लोकों में कोई नहीं है। इस मान-अभिमान वाले पर्वत का स्मरण करके मैंने यह उच्छ्वास लिया है। हे पर्वत! जो भी हो, तपरूपी बलवाले हम सबको इससे कोई प्रयोजन नहीं है। मैं अब अपने घर के लिये प्रस्थान कर रहा हूँ।'

नारद मुनि स्वतन्त्र भाव से ब्रह्मलोक चले गये। किन्तु विन्ध्यगिरि के मन में एक विचार कौंधा— 'मैं कौन सा कार्य करूँ और किस प्रकार सुमेरुगिरि को जीत लूँ? मुझे न शान्ति मिल रही है, न मन स्थिर है। मेरे उत्साह, सम्मान और कुल को धिक्कार है!' उसके मन में कर्तव्य के निर्णय में दोष उत्पन्न हो गया। उसने सोचा— 'सूर्य सभी ग्रह-नक्षत्रों के साथ सुमेरु-पर्वत की सदा परिक्रमा करते हैं, जिससे वह अभिमान में चूर रहता है। मैं अपने शिखरों से उस सूर्य का मार्ग रोक दूँगा, तब सुमेरुगिरि का अभिमान खण्डित हो जाएगा।'

ऐसा निश्चय करके विन्ध्यगिरि अपने शिखरों से आकाश को छूता हुआ ऊपर की ओर बढ़ने लगा। उसने प्राची तथा आग्नेयी दिशाओं को आश्वासन दिया और बड़ी तेजी से दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान किया। जब सूर्य आगे नहीं बढ़ सके, तब उनके सारथि अनूरु ने कहा— 'हे सूर्य! अत्यधिक अभिमानी विन्ध्यगिरि आपका मार्ग रोककर आकाश में स्थित हो गया है। वह सुमेरुगिरि से स्पर्धा करता है और आपकी परिक्रमा प्राप्त करने की अभिलाषा रखता है।'

सूर्य सोचने लगे— 'अहो! आकाश का मार्ग भी अवरुद्ध हो गया? दैव बड़ा बलवान है। आज मेरे घोड़ों का मार्ग रोक दिया गया है। जो राहु की भुजाओं में जकड़े जाने पर भी नहीं रुकता था, वह आज चिरकाल के लिए अवरुद्ध हो गया है। विधाता अब क्या करेगा?'

सूर्य का मार्ग अवरुद्ध होने से समस्त लोक और लोकेश्वर व्याकुल हो गये। चित्रगुप्त आदि लोग, जो सूर्य से समय का ज्ञान करते थे, वे भी इस अवरोध के कारण अक्षम हो गये। जब स्पर्धा के कारण विन्ध्य ने सूर्य को रोका, तब स्वाहा-स्वधाकार नष्ट हो गये और सम्पूर्ण जगत् विनाश की ओर बढ़ने लगा। उत्तर के प्राणी सूर्य की प्रचण्ड गर्मी से दग्ध होने लगे और प्रजा का विनाश होने लगा। चारों ओर हाहाकार मच गया; संसार श्राद्ध-तर्पण से रहित होकर नष्टप्राय हो गया।

सूत उवाच

परमात्मा, वृषांक, अमरेश, कैलासवासी, अहिर्बुध्न्य, मान्य, मनु, मान प्रदान करनेवाले, अज, अनेक रूपोंवाले, अपनी आत्मामें रमण करनेवाले, शम्भु, ५ गणोंके नाथ, गिरिपर शयन करनेवाले, महान् ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले तथा महाविष्णुके द्वारा स्तुत किये ६ जानेवाले आप महादेवको नमस्कार है ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · दशम स्कन्ध · अध्याय 3 · श्लोक 4–6पृष्ठ 623

इन्द्र सहित सभी देवता व्याकुल होकर आपस में कहने लगे— 'अब हम क्या करें?' वे ब्रह्माजी को आगे करके भगवान शिव की शरण में पहुँचे। पर्वत पर शयन करने वाले और चन्द्रमा से सुशोभित मस्तक वाले देवदेव शिव के सम्मुख खड़े होकर वे सुन्दर स्तोत्रों से उनका स्तवन करने लगे:

सूत उवाच

विष्णुके हृदयकमलमें निवास करनेवाले, महायोगमें रत रहनेवाले, योगसे प्राप्त होनेवाले, योगस्वरूप तथा ७ योगियोंके अधीश्वरको नमस्कार है ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · दशम स्कन्ध · अध्याय 3 · श्लोक 7पृष्ठ 623

'हे योगीश! योगों के फलदाता, दीनों को दान देने में तत्पर तथा दयासागर की साक्षात् मूर्ति आपको नमस्कार है!'

सूत उवाच

देवता बोले- हे देव! हे गणाध्यक्ष! हे पार्वतीद्वारा पूजित चरणकमलवाले! हे भक्तजनको ३ आठों सिद्धियोंकी विभूतियाँ प्रदान करनेवाले आपकी जय हो ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · दशम स्कन्ध · अध्याय 3 · श्लोक 3पृष्ठ 623

तभी महर्षि अगस्त्य ने उस बढ़ते हुए विन्ध्यपर्वत को रोक दिया।"

In English

The Growth of the Vindhya Mountains

After Narada tells him that Mount Sumeru is superior because the sun orbits it, the Vindhya mountains grow upward to block the sun's path. This causes chaos and heat on earth until Sage Agastya intervenes to stop the mountain's growth.

This page answers

  • Why did the vindhya mountains grow upwards?
  • How did the vindhya mountains block the sun?
  • Who stopped the growth of the vindhya mountains?
  • What happened when the sun could not pass the vindhyas?

Also written: Vindhyopakhyana, Vindhya, Vindhyaparvata, Shiva, Indra, Anuru, विन्ध्योपाख्यान