श्रीगणेशाय नमः।

पञ्चेन्द्रोपाख्यान : पाण्डव और द्रौपदी का दिव्य स्वरूप क्या है?

देवत्व से मानवता का सङ्क्रमण

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड १ · आदिपर्व → वैवाहिकपर्व · अध्याय 196 · पृष्ठ 1364–1378

1,921 शब्द · 10 मिनटका पाठ · 17 श्लोक

व्यास ने द्रुपद से कहा

यज्ञ के उपरान्त पाण्डवों के दिव्य स्वरूपों की व्याख्या हेतु

व्यासजी ने कहा— "हे पाञ्चाल नरेश! पूर्व काल की बात है। नैमिषारण्य क्षेत्र में देवता लोग एक यज्ञ कर रहे थे और उस समय वहाँ सूर्यपुत्र यमराज स्वयं शामित्र (यज्ञ) के कार्य में लीन थे। राजन्! उस यज्ञ की दीक्षा लेने के कारण यमराज ने मानव प्रजा की मृत्यु का काम बन्द कर रखा था। इस प्रकार मृत्यु का नियत समय बीत जाने से सारी प्रजा अमर होकर दिनों-दिन बढ़ने लगी और धीरे-धीरे उनकी सङ्ख्या बहुत बढ़ गई।"

व्यास उवाच

पुरा वै नैमिषारण्ये देवाः सत्रमुपासते ।
तत्र वैवस्वतो राजञ्शामित्रमकरोत् तदा ॥

व्यासजीने कहा — पांचालनरेश! पूर्व कालकी बात है, नैमिषारण्य क्षेत्रमें देवता लोग एक यज्ञ कर रहे थे । उस समय वहाँ सूर्यपुत्र यम शामित्र ( यज्ञ) - कार्य करते थे ।

महाभारत · आदिपर्व · वैवाहिकपर्व · अध्याय 196 · श्लोक 1पृष्ठ 1365

"चन्द्रमा, इन्द्र, वरुण, कुबेर, साध्यगण, रुद्रगण, वसुगण, दोनों अश्विनीकुमार तथा अन्य सब देवता मिलकर वहाँ गये जहाँ सृष्टिकर्ता प्रजापति ब्रह्माजी रहते थे। वहाँ पहुँचकर उन सब देवताओं ने व्याकुल होकर कहा— 'भगवन्! मनुष्यों की सङ्ख्या बहुत बढ़ रही है। इससे हमें बड़ा भय लगता है। हम सब इस भय से व्याकुल हो उठे हैं और सुख पाने की इच्छा से आपकी शरण में आए हैं।' ब्रह्माजी ने पूछा— 'तुम्हें मनुष्यों से क्यों भय लगता है? जबकि तुम सभी लोग अमर हो, तब तुम्हें मरणधर्मा मनुष्यों से कभी भयभीत नहीं होना चाहिए।' देवता बोले— 'जो मरणशील थे, वे अमर हो गये। अब हममें और उनमें कोई अन्तर नहीं रह गया। यह अन्तर मिट जाने से ही हमें अधिक घबराहट हो रही है; हमारी विशेषता बनी रहे, इसीलिये हम यहाँ आए हैं।' तब भगवान ब्रह्माजी ने कहा— 'सूर्यपुत्र यमराज यज्ञ के कार्य में लगे हैं, इसीलिए ये मनुष्य मर नहीं रहे हैं। जब वे यज्ञ का सारा काम पूरा करके इधर ध्यान देंगे, तब इन मनुष्यों का अन्तकाल उपस्थित होगा। तुम लोगों के बल के प्रभाव से जब सूर्यनन्दन यमराज का शरीर यज्ञकार्य से अलग होकर अपने कार्य में प्रयुक्त होगा, तब वही अन्तकाल आने पर मनुष्यों की मृत्यु का कारण बनेगा। उस समय मनुष्यों में इतनी शक्ति नहीं होगी कि वे मृत्यु से अपने को बचा सकें।' ब्रह्माजी के वचन सुनकर देवता वहीं से वापस चले गये जहाँ वे यज्ञ कर रहे थे।"

श्रीभगवानुवाच वैवस्वतो व्यापृतः सत्रहेतो- स्तेन त्विमे न म्रियन्ते मनुष्याः ।
तस्मिन्नेकाग्रे कृतसर्वकार्ये तत एषां भवितैवान्तकालः ॥

वैवस्वतस्यैव तनुर्विभक्ता वीर्येण युष्माकमुत प्रयुक्ता ।
सैषामन्तो भविता ह्यन्तकाले न तत्र वीर्यं भविता नरेषु ॥

भगवान् ब्रह्माजीने कहा - सूर्यपुत्र यमराज यज्ञके कार्यमें लगे हैं, इसीलिये ये मनुष्य मर नहीं रहे हैं । जब वे यज्ञका सारा काम पूरा करके इधर ध्यान देंगे, तब इन मनुष्योंका अन्तकाल उपस्थित होगा । तुमलोगोंके बलके प्रभावसे जब सूर्यनन्दन यमराजका शरीर यज्ञकार्यसे अलग होकर अपने कार्यमें प्रयुक्त होगा, तब वही अन्तकाल आनेपर मनुष्योंकी मृत्युका कारण बनेगा । उस समय मनुष्योंमें इतनी शक्ति नहीं होगी कि वे मृत्युसे अपनेको बचा सकें ।

महाभारत · आदिपर्व · वैवाहिकपर्व · अध्याय 196 · श्लोक 7-8पृष्ठ 1366

"राजन्! एक दिन वे सभी महाबली देवगण गङ्गाजी में स्नान करने के लिये गये और वहाँ तट पर बैठे। उसी समय उन्हें भागीरथी के जल में बहता हुआ एक कमल दिखाई दिया। उसे देखकर वे सब देवता चकित हो गये। उनमें सबसे प्रधान और शूरवीर इन्द्र उस कमल का पता लगाने के लिये गङ्गाजी के मूल स्थान की ओर गये। गङ्गोत्तरी के पास, जहाँ गङ्गादेवी का जल सदा अविच्छिन्न रूप से झरता रहता है, वहाँ पहुँचकर इन्द्र ने एक अग्निके समान तेजस्विनी युवती देखी। वह युवती वहाँ जल के लिये आयी थी और भगवती गङ्गा की धारामें प्रवेश करके रोती हुई खड़ी थी। उसके आँसुओं का एक-एक बिन्दु, जो जल में गिरता था, वहाँ सुवर्णमय कमल बन जाता था। इस अद्भुत दृश्य को देखकर वज्रधारी इन्द्र ने उस युवती के निकट जाकर पूछा— 'भद्रे! तुम कौन हो और किस लिये रोती हो? बताओ, मैं तुमसे सच्ची बात जानना चाहता हूँ।'

तदद्भुतं प्रेक्ष्य वज्री तदानी- मपृच्छत् तां योषितमन्तिकाद् वै ।
का त्वं भद्रे रोदिषि कस्य हेतो- र्वाक्यं तथ्यं कामयेऽहं ब्रवीहि ॥

यह अद्भुत दृश्य देखकर वज्रधारी इन्द्रने उस समय उस युवतीके निकट जाकर पूछा -' भद्रे! तुम कौन हो और किसलिये रोती हो? बताओ, मैं तुमसे सच्ची बात जानना चाहता हूँ'

महाभारत · आदिपर्व · वैवाहिकपर्व · अध्याय 196 · श्लोक 12पृष्ठ 1367

युवती बोली— 'देवराज इन्द्र! मैं एक भाग्यहीन अबला हूँ; कौन हूँ और किस लिये रो रही हूँ, यह सब तुम्हें ज्ञात हो जायेगा। तुम मेरे पीछे-पीछे आओ, मैं आगे-आगे चल रही हूँ। वहाँ चलकर स्वयं ही देख लोगे कि मैं किस लिये रोती हूँ।'

व्यास उवाच

ततो यमो दीक्षितस्तत्र राजन् नामारयत् कंचिदपि प्रजानाम् ।
ततः प्रजास्ता बहुला बभूवुः कालातिपातान्मरणप्रहीणाः ॥

राजन्! उस यज्ञकी दीक्षा लेनेके कारण यमराजने मानवप्रजाकी मृत्युका काम बंद कर रखा था । इस प्रकार मृत्युका नियत समय बीत जानेसे सारी प्रजा अमर होकर दिनों-दिन बढ़ने लगी । धीरे - धीरे उसकी संख्या बहुत बढ़ गयी ।

महाभारत · आदिपर्व · वैवाहिकपर्व · अध्याय 196 · श्लोक 2पृष्ठ 1365

व्यासजी कहते हैं— 'राजन्! यों कहकर वह स्त्री आगे-आगे चली और इन्द्र उसके पीछे-पीछे गये। हिमालय के शिखर पर पहुँचकर उन्होंने देखा कि एक परम सुन्दर तरुण पुरुष सिद्धासन से बैठे हैं और उनके साथ एक युवती भी है। इन्द्र ने उस युवती के साथ उन्हें क्रीड़ा-विनोद करते देखा। वे अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियों से क्रीड़ा में अत्यन्त तन्मय हो रहे थे, अतः उनका ध्यान इधर-उधर नहीं था। उन्हें इस प्रकार असावधान देख देवराज इन्द्र कुपित होकर बोले— 'महानुभाव! यह सारा जगत् मेरे अधिकार में है, मेरी आज्ञा के अधीन है; मैं इस जगत् का ईश्वर हूँ!'

व्यास उवाच

तमब्रवीद् देवराजो ममेदं त्वं विद्धि विद्वन् भुवनं वशे स्थितम् ।
ईशोऽहमस्मीति समन्युरब्रवीद् दृष्ट्वा तमक्षैः सुभृशं प्रमत्तम् ॥

वे अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे क्रीड़ामें अत्यन्त तन्मय हो रहे थे, अतः इधर - उधर उनका ध्यान नहीं जाता था । उन्हें इस प्रकार असावधान देख देवराज इन्द्रने कुपित होकर कहा – ' महानुभाव! यह सारा जगत् मेरे अधिकारमें है, मेरी आज्ञाके अधीन है; मैं इस जगत्का ईश्वर हूँ'

महाभारत · आदिपर्व · वैवाहिकपर्व · अध्याय 196 · श्लोक 15पृष्ठ 1368

इन्द्र को क्रोध में भरा देख वे देवपुरुष हँस पड़े। उन्होंने धीरे से आँख उठाकर उनकी ओर देखा और उनकी दृष्टि पड़ते ही देवराज इन्द्र का शरीर स्तम्भित हो गया; वे ठूंठे काठ की भाँति निश्चेष्ट हो गये। जब उनकी वह क्रीड़ा समाप्त हुई, तब वे उस रोती हुई देवी से बोले— 'इस इन्द्र को जहाँ मैं हूँ, यहीं मेरे समीप ले आओ, जिससे फिर इसके भीतर अभिमान का प्रवेश न हो।' तदनन्तर उस स्त्री ने ज्यों ही इन्द्र का स्पर्श किया, उनके सारे अङ्ग शिथिल हो गये और वे धरती पर गिर पड़े।

ततः शक्रः स्पृष्टमात्रस्तया तु स्रस्तैरङ्गैः पतितोऽभूद् धरण्याम् ।
तमब्रवीद् भगवानुग्रतेजा मैवं पुनः शक्र कृथाः कथंचित् ॥

तदनन्तर उस स्त्रीने ज्यों ही इन्द्रका स्पर्श किया, उनके सारे अंग शिथिल हो गये और वे धरतीपर गिर पड़े । तब उग्र तेजस्वी भगवान् रुद्रने उनसे कहा—' इन्द्र! फिर किसी प्रकार भी ऐसा घमंड न करना ।

महाभारत · आदिपर्व · वैवाहिकपर्व · अध्याय 196 · श्लोक 18पृष्ठ 1369

तब उग्र तेजस्वी भगवान रुद्र ने उनसे कहा— 'इन्द्र! फिर किसी प्रकार भी ऐसा घमण्ड न करना। तुममें अनन्त बल और पराक्रम है, अतः इस गुफा के दरवाजे पर लगे हुए इस महान पर्वतराज को हटा दो और इसी गुफा के भीतर घुस जाओ, जहाँ सूर्य के समान तेजस्वी तुम्हारे जैसे और भी इन्द्र रहते हैं।'

दृष्ट्वा च तद् विस्मितास्ते बभूवु- स्तेषामिन्द्रस्तत्र शूरो जगाम ।
सोऽपश्यद् योषामथ पावकप्रभां यत्र देवी गङ्गा सततं प्रसूता ॥

उसे देखकर वे सब देवता चकित हो गये । उनमें सबसे प्रधान और शूरवीर इन्द्र उस कमलका पता लगानेके लिये गंगाजीके मूल स्थानकी ओर गये । गंगोत्तरीके पास, जहाँ गंगादेवीका जल सदा अविच्छिन्नरूपसे झरता रहता है, पहुँचकर इन्द्रने एक अग्निके समान तेजस्विनी युवती देखी ।

महाभारत · आदिपर्व · वैवाहिकपर्व · अध्याय 196 · श्लोक 10पृष्ठ 1367

इन्द्र ने जब उस गुफा के द्वार खोले, तो वहाँ अपने ही समान तेजस्वी अन्य चार इन्द्रों को देखा। उन्हें देखकर वे बहुत दुखी हुए और सोचने लगे— 'कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि मैं भी इन्हींके समान दुर्दर्शामें पड़ जाऊँ?' तब पर्वत पर शयन करने वाले महादेवजी ने आँखें तरेरकर कुपित होकर वज्रधारी इन्द्र से कहा— 'शतक्रतो! तुमने मूर्खतावश पहले मेरा अपमान किया है, इसलिये अब इस कन्दरा में प्रवेश करो।'

ततो देवो गिरिशो वज्रपाणिं विवृत्य नेत्रे कुपितोऽभ्युवाच ।
दरीमेतां प्रविश त्वं शतक्रतो यन्मां बाल्यादवमंस्थाः पुरस्तात् ॥

तब पर्वतपर शयन करनेवाले महादेवजीने आँखें तरेरकर कुपित हो वज्रधारी इन्द्रसे कहा— ‘ शतक्रतो! तुमने मूर्खतावश पहले मेरा अपमान किया है, इसलिये अब इस कन्दरामें प्रवेश करो '

महाभारत · आदिपर्व · वैवाहिकपर्व · अध्याय 196 · श्लोक 21पृष्ठ 1369

भगवान रुद्र के इन वचनों को सुनकर इन्द्र पराभव की आशङ्का से अत्यन्त दुःखी हो गये; उनके सारे अङ्ग शिथिल पड़ गये और वे हवा से हिलने वाले पीपल के पत्ते की तरह थर-थर काँपने लगे। वृषभवाहन भगवान शङ्कर के द्वारा इस प्रकार सहसा गुहा प्रवेश की आज्ञा मिलने पर, काँपते हुए इन्द्र ने हाथ जोड़कर उन अनेक रूपधारी उग्रस्वरूप रुद्रदेव से कहा— 'जगद्योने! आप ही समस्त जगत् की उत्पत्ति करने वाले आदिपुरुष हैं।'

स प्राञ्जलिर्वै वृषवाहनेन प्रवेपमानः सहसैवमुक्तः ।
उवाच देवं बहुरूपमुग्र- स्रष्टाशेषस्य भुवनस्य त्वं भवाद्यः ॥

वृषभवाहन भगवान् शंकरके द्वारा इस प्रकार सहसा गुहाप्रवेशकी आज्ञा मिलनेपर काँपते हुए इन्द्रने हाथ जोड़कर उन अनेक रूपधारी उग्रस्वरूप रुद्रदेवसे कहा — ‘ जगद्योने! आप ही समस्त जगत्की उत्पत्ति करनेवाले आदिपुरुष हैं '

महाभारत · आदिपर्व · वैवाहिकपर्व · अध्याय 196 · श्लोक 23पृष्ठ 1370

तब भयङ्कर तेज वाले रुद्र ने हँसकर कहा— 'तुम्हारे जैसे शील-स्वभाववाले लोगों को यहाँ प्रसाद की प्राप्ति नहीं होती। ये लोग भी पहले तुम्हारे ही जैसे थे, अतः तुम भी इस कन्दरा में घुसकर शयन करो। वहाँ भविष्य में निश्चय ही तुम लोगों को मनुष्य योनि में प्रवेश करना पड़ेगा। उस जन्म में तुम अनेक दुःसह कर्म करके बहुतों को मौत के घाट उतारोगे और पुनः अपने शुभ कर्मों द्वारा पूर्व से उपार्जित पुण्यात्माओं के निवासयोग्य इन्द्रलोक में आओगे। मैंने जो कुछ कहा है, वह सब तुम्हें करना होगा।'"

तत्र ह्येवं भवितारो न संशयो योनिं सर्वे मानुषीमाविशध्वम् ।
तत्र यूयं कर्म कृत्वाविषह्यं बहूनन्यान् निधनं प्रापयित्वा ॥

आगन्तारः पुनरेवेन्द्रलोकं स्वकर्मणा पूर्वजितं महार्हम् ।
सर्वं मया भाषितमेतदेवं कर्तव्यमन्यद् विविधार्थयुक्तम् ॥

‘ वहाँ भविष्यमें निश्चय ही तुमलोग ऐसे ही होनेवाले हो- तुम सबको मनुष्ययोनिमें प्रवेश करना पड़ेगा । उस जन्ममें तुम अनेक दुःसह कर्म करके बहुतोंको मौतके घाट उतारकर पुनः अपने शुभ कर्मोंद्वारा पहलेसे ही उपार्जित पुण्यात्माओंके निवासयोग्य इन्द्रलोकमें आ जाओगे । मैंने जो कुछ कहा है, वह सब कुछ तुम्हें करना होगा । इसके सिवा और भी नाना प्रकारके प्रयोजनोंसे युक्त कार्य तुम्हारे द्वारा सम्पन्न होंगे '

महाभारत · आदिपर्व · वैवाहिकपर्व · अध्याय 196 · श्लोक 25-26पृष्ठ 1370

उन चारों इन्द्रों ने हाथ जोड़कर कहा, “भगवन्! हम आपकी आज्ञा के अनुसार देवलोक से मनुष्यलोक में जाएँगे, जहाँ दुर्लभ मोक्ष का साधन भी सुलभ होता है। परन्तु वहाँ हमें धर्म, वायु, इन्द्र और दोनों अश्विनीकुमार—ये ही देवता माता के गर्भ में स्थापित करें। तदनन्तर हम दिव्यास्त्रों द्वारा मानव-वीरों से युद्ध करके पुनः इन्द्रलोक में चले आएँगे।”

देवास्त्वस्मानादधीरञ्जनन्यां धर्मो वायुर्मघवानश्विनौ च ।
अस्त्रैर्दिव्यैर्मानुषान् योधयित्वा आगन्तारः पुनरेवेन्द्रलोकम् ॥

पहलेके चारों इन्द्र बोले- भगवन्! हम आपकी आज्ञाके अनुसार देवलोकसे मनुष्यलोकमें जायँगे, जहाँ दुर्लभ मोक्षका साधन भी सुलभ होता है । परंतु वहाँ हमें धर्म, वायु, इन्द्र और दोनों अश्विनीकुमार- ये ही देवता माताके गर्भमें स्थापित करें । तदनन्तर हम दिव्यास्त्रोंद्वारा मानव - वीरोंसे युद्ध करके पुनः इन्द्रलोकमें चले आयेंगे ।

महाभारत · आदिपर्व · वैवाहिकपर्व · अध्याय 196 · श्लोक 27पृष्ठ 1373

व्यासजी कहते हैं—राजन्! पूर्ववर्ती इन्द्रों का यह वचन सुनकर वज्रधारी इन्द्र ने पुनः देवश्रेष्ठ महादेवजी से कहा, “भगवन्! मैं अपने वीर्य से अपने ही अंशभूत पुरुष को देवताओं के कार्य के लिये समर्पित करूँगा, जो इन चारों के साथ पाँचवाँ होगा। उसे मैं स्वयं ही उत्पन्न करूँगा। विश्वभुक्, भूतधामा, प्रतापी इन्द्र शिबि, चौथे शान्ति और पाँचवें तेजस्वी—ये ही उन पाँचों के नाम हैं।” उग्र धनुष धारण करने वाले भगवान रुद्र ने उन सबको उनकी अभीष्ट कामना पूर्ण होने का वरदान दिया, जिसे वे अपने साधुस्वभाव के कारण भगवान के सामने प्रकट कर चुके थे। साथ ही उस लोककमनीया युवती स्त्री को, जो स्वर्गलोक की लक्ष्मी थी, मनुष्यलोक में उनकी पत्नी निश्चित की। तदनन्तर उन्हीं के साथ महादेवजी अनन्त, अप्रमेय, अव्यक्त, अजन्मा, पुराणपुरुष, सनातन, विश्वरूप एवं अनन्तमूर्ति भगवान नारायण के पास गये। उन्होंने भी उन्हीं सब बातों के लिये आज्ञा दी।

व्यास उवाच

एतच्छ्रुत्वा वज्रपाणिर्वचस्तु देवश्रेष्ठं पुनरेवेदमाह ।
वीर्येणाहं पुरुषं कार्यहेतो- र्दद्यामेषां पञ्चमं मत्प्रसूतम् ॥

विश्वभुग् भूतधामा च शिबिरिन्द्रः प्रतापवान् ।
शान्तिश्चतुर्थस्तेषां वै तेजस्वी पञ्चमः स्मृतः ॥

व्यासजी कहते हैं — राजन्! पूर्ववर्ती इन्द्रोंका यह वचन सुनकर वज्रधारी इन्द्रने पुनः देवश्रेष्ठ महादेवजीसे इस प्रकार कहा-' भगवन्! मैं अपने वीर्यसे अपने ही अंशभूत पुरुषको देवताओंके कार्यके लिये समर्पित करूंगा, जो इन चारोंके साथ पाँचवाँ होगा । उसे मैं स्वयं ही उत्पन्न करूँगा। विश्वभुक्, भूतधामा, प्रतापी इन्द्र शिबि, चौथे शान्ति और पाँचवें तेजस्वी – ये ही उन पाँचोंके नाम हैं ।

महाभारत · आदिपर्व · वैवाहिकपर्व · अध्याय 196 · श्लोक 28-29पृष्ठ 1373

तत्पश्चात् वे सब लोग पृथ्वी पर प्रकट हुए। उस समय भगवान नारायण ने अपने मस्तक से दो केश निकाले, जिनमें एक श्वेत था और दूसरा श्याम। वे दोनों केश यदुवंश की दो स्त्रियों—देवकी तथा रोहिणी के भीतर प्रविष्ट हुए। उनमें से रोहिणी के बलदेव प्रकट हुए, जो भगवान नारायण का श्वेत केश थे; दूसरा केश, जिसे श्यामवर्ण का बताया गया है, वही देवकी के गर्भ से श्रीकृष्ण के रूप में प्रकट हुआ। उत्तरवर्ती हिमालय की कन्दरा में पहले जो इन्द्रस्वरूप पुरुष बन्दी बनाकर रखे गये थे, वे ही चारों पराक्रमी पाण्डव यहाँ विद्यमान हैं और साक्षात् इन्द्र का अंशभूत जो पाँचवाँ पुरुष प्रकट होने वाला था, वही पाण्डुकुमार सव्यसाची अर्जुन है।

राजन्! इस प्रकार ये पाण्डव प्रकट हुए हैं, जो पहले इन्द्र रह चुके हैं। यह दिव्यरूपा द्रौपदी वही स्वर्गलोक की लक्ष्मी है, जो पहले से ही इनकी पत्नी नियत हो चुकी है। महाराज! यदि इस कार्य में देवताओं का सहयोग न होता तो तुम्हारे इस यज्ञकर्म द्वारा यज्ञवेदी की भूमि से ऐसी दिव्य नारी कैसे प्रकट हो सकती थी, जिसका रूप सूर्य और चन्द्रमा के समान प्रकाश बिखेर रहा है और जिसकी सुगन्ध एक कोसतक फैलती रहती है। नरेन्द्र! मैं तुम्हें प्रसन्नतापूर्वक एक और अद्भुत वर के रूप में यह दिव्य दृष्टि देता हूँ; इससे सम्पन्न होकर तुम कुन्ती के पुत्रों को उनके पूर्वकालिक पुण्यमय दिव्य शरीरों से सम्पन्न देखो।

इदं चान्यत् प्रीतिपूर्वं नरेन्द्र ददानि ते वरमत्यद्भुतं च ।
दिव्यं चक्षुः पश्य कुन्तीसुतांस्त्वं पुण्यैर्दिव्यैः पूर्वदेहैरुपेतान् ॥

नरेन्द्र! मैं तुम्हें प्रसन्नतापूर्वक एक और अद्भुत वरके रूपमें यह दिव्य दृष्टि देता हूँ; इससे सम्पन्न होकर तुम कुन्तीके पुत्रोंको उनके पूर्वकालिक पुण्यमय दिव्य शरीरोंसे सम्पन्न देखो ।

महाभारत · आदिपर्व · वैवाहिकपर्व · अध्याय 196 · श्लोक 37पृष्ठ 1375

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर परम उदारकर्मवाले पवित्र ब्रह्मर्षि व्यासजी ने अपनी तपस्या के प्रभाव से राजा द्रुपद को दिव्य दृष्टि प्रदान की, जिससे उन्होंने समस्त पाण्डवों को पूर्व-शरीरों से सम्पन्न वास्तविक रूप में देखा। वे दिव्य शरीर से सुशोभित थे। उनके मस्तक पर सुवर्णमय किरीट और गले में सुन्दर सोने की माला शोभा पा रही थी। उनकी छबि इन्द्र के ही समान थी। वे अग्नि और सूर्य के समान कान्तिमान् थे। उन्होंने अपने अङ्गों में सब तरह के दिव्य अलङ्कार धारण कर रखे थे। युवावस्था थी तथा रूप अत्यन्त मनोहर था। उन सबकी छाती चौड़ी थी और वे तालवृक्ष के समान लम्बे थे। इस रूप में राजा द्रुपद ने उनका दर्शन किया।

वैशम्पायन उवाच

ततो व्यासः परमोदारकर्मा शुचिर्विप्रस्तपसा तस्य राज्ञः ।
चक्षुर्दिव्यं प्रददौ तांश्च सर्वान् राजापश्यत् पूर्वदेहैर्यथावत् ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर परम उदारकर्मवाले पवित्र ब्रह्मर्षि व्यासजीने अपनी तपस्याके प्रभावसे राजा द्रुपदको दिव्य दृष्टि प्रदान की, जिससे उन्होंने समस्त पाण्डवोंको पूर्वशरीरोंसे सम्पन्न वास्तविक रूपमें देखा ।

महाभारत · आदिपर्व · वैवाहिकपर्व · अध्याय 196 · श्लोक 38पृष्ठ 1375

वे दिव्य निर्मल वस्त्रों, उत्तम गन्धों और सुन्दर मालाओं से अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे तथा साक्षात् त्रिनेत्र महादेव, वसुगण, रुद्रगण अथवा आदित्यगणों के समान तेजस्वी एवं सर्वगुणसम्पन्न दिखायी देते थे। चारों पाण्डवों को परम सुन्दर पूर्वकालिक इन्द्रों के रूप में तथा इन्द्रपुत्र अर्जुन को भी इन्द्र के ही स्वरूप में देखकर उस अप्रमेय दिव्य माया पर दृष्टिपात करके राजा द्रुपद अत्यन्त प्रसन्न एवं आश्चर्यचकित हो उठे। उन राजराजेश्वर ने अपनी पुत्री को भी सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी, अत्यन्त रूपवती और साक्षात् चन्द्रमा तथा अग्निके समान प्रकाशित होने वाली दिव्य नारी के रूप में देखा। साथ ही यह मान लिया कि द्रौपदी रूप, तेज और यश की दृष्टि से अवश्य उन पाण्डवों की पत्नी होने योग्य है। इससे उन्हें महान् हर्ष हुआ।

तां चैवाग्रयां स्त्रियमतिरूपयुक्तां दिव्यां साक्षात् सोमवह्निप्रकाशाम् ।
योग्यां तेषां रूपतेजोयशोभिः पत्नीं मत्वा हृष्टवान् पार्थिवेन्द्रः ॥

उन राजराजेश्वरने अपनी पुत्रीको भी सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी, अत्यन्त रूपवती और साक्षात् चन्द्रमा तथा अग्निके समान प्रकाशित होनेवाली दिव्य नारीके रूपमें देखा । साथ ही यह मान लिया कि द्रौपदी रूप, तेज और यशकी दृष्टिसे अवश्य उन पाण्डवोंकी पत्नी होनेयोग्य है । इससे उन्हें महान् हर्ष हुआ ।

महाभारत · आदिपर्व · वैवाहिकपर्व · अध्याय 196 · श्लोक 42पृष्ठ 1376

यह महान् आश्चर्य देखकर द्रुपद ने सत्यवतीनन्दन व्यासजी के चरण पकड़ लिये और प्रसन्नचित्त होकर उनसे कहा, “महर्षे! आप में ऐसी अद्भुत शक्ति का होना आश्चर्य की बात नहीं है।” तब व्यासजी प्रसन्नचित्त होकर द्रुपद से बोले, “राजन्! अपनी पुत्री का एक और जन्म का वृत्तान्त भी सुनो। एक तपोवन में किसी महात्मा मुनिकी कोई कन्या रहती थी। सती, साध्वी एवं रूपवती होने पर भी उसे योग्य पति की प्राप्ति नहीं हुई। उसने कठोर तपस्या द्वारा भगवान शङ्कर को सन्तुष्ट किया; महादेवजी प्रसन्न होकर साक्षात् प्रकट हुए और उस मुनि-कन्या से बोले—'तुम मनोवाञ्छित वर माँगो।'

उनके यों कहने पर उस मुनि-कन्या ने वरदायक महेश्वर से बार-बार कहा—'मैं सर्वगुणसम्पन्न पति चाहती हूँ।' यह सुनकर उसने महादेवजी को प्रसन्न करते हुए पुनः यह बात कही—'शङ्करजी! मैं तो आपसे एक ही गुणवान् पति प्राप्त करना चाहती हूँ।' तब देवाधिदेव महादेवजी ने मन-ही-मन अत्यन्त सन्तुष्ट होकर उससे यह शुभ वचन कहा—'भद्रे! तुमने ‘पति दीजिये’ इस वाक्य को पाँच बार दुहराया है; इसलिये मैंने जो पहले कहा है, वैसा ही होगा, तुम्हारा कल्याण हो। किन्तु तुम्हें दूसरे शरीर में प्रवेश करने पर यह सब होगा।'

तां देवदेवः प्रीतात्मा पुनः प्राह शुभं वचः ।
पञ्चकृत्वस्त्वयोक्तोऽहं पतिं देहीति वै पुनः ॥

तत् तथा भविता भद्रे वचस्तद् भद्रमस्तु ते ।
देहमन्यं गतायास्ते सर्वमेतद् भविष्यति ॥

तब देवाधिदेव महादेवजीने मन-ही- मन अत्यन्त संतुष्ट होकर उससे यह शुभ वचन कहा — ' भद्रे! तुमने ‘ पति दीजिये ' इस वाक्यको पाँच बार दुहराया है; इसलिये मैंने जो पहले कहा है, वैसा ही होगा, तुम्हारा कल्याण हो । किंतु तुम्हें दूसरे शरीरमें प्रवेश करनेपर यह सब होगा '

महाभारत · आदिपर्व · वैवाहिकपर्व · अध्याय 196 · श्लोक 49-50पृष्ठ 1377

द्रुपद! वही मुनि-कन्या तुम्हारी इस दिव्यरूपिणी पुत्री के रूप में फिर उत्पन्न हुई है। अतः यह पृषत-वंश की सती कन्या कृष्णा पहले से ही पाँच पतियों की पत्नी नियत की गयी है। यह स्वर्गलोक की लक्ष्मी है, जो पाण्डवों के लिये तुम्हारे महायज्ञ में प्रकट हुई है। इसने अत्यन्त घोर तपस्या करके इस जन्म में तुम्हारी पुत्री होने का सौभाग्य प्राप्त किया है। महाराज द्रुपद! वही यह देवसेवित सुन्दरी देवी अपने ही कर्म से पाँच पुरुषों की एक ही पत्नी नियत की गयी है। स्वयं ब्रह्माजी ने इसे देवस्वरूप पाण्डवों की पत्नी होने के लिये रचा है। यह सब सुनकर तुम्हें जो अच्छा लगे, वह करो।”

सैषा देवी रुचिरा देवजुष्टा पञ्चानामेका स्वकृतेनेह कर्मणा ।
सृष्टा स्वयं देवपत्नी स्वयम्भुवा श्रुत्वा राजन् द्रुपदेष्टं कुरुष्व ॥

महाराज द्रुपद! वही यह देवसेवित सुन्दरी देवी अपने ही कर्मसे पाँच पुरुषोंकी एक ही पत्नी नियत की गयी है । स्वयं ब्रह्माजीने इसे देवस्वरूप पाण्डवोंकी पत्नी होनेके लिये रचा है । यह सब सुनकर तुम्हें जो अच्छा लगे, वह करो ।

महाभारत · आदिपर्व · वैवाहिकपर्व · अध्याय 196 · श्लोक 53पृष्ठ 1378

In English

The Divine Origins of the Pandavas and Draupadi

Because Yama stopped overseeing death during a sacrifice, humans became immortal and numerous, causing fear among the gods. To restore order, Indra is humbled by Shiva and sent to earth as a mortal to undergo cycles of rebirth. This cycle results in the birth of the Pandavas and their connection to Krishna and Draupadi.

This page answers

  • Why did humans stop dying during yama's sacrifice?
  • How did indra become a mortal?
  • What is the connection between indra and the pandavas?
  • How were krishna and baldev born from narayana?
  • Who was the woman that indra followed to the himalayas?

Also written: Panchendropakhyana, Panchendra, Brahma, Yamaraja, Indra, Rudra, Pandava, Arjuna, Draupadi, Satyavati, Munika, पञ्चेन्द्रोपाख्यान