श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1371–1380

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1371–1380

पृष्ठ 1371

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गमिष्यामो मानुषं देवलोकाद् दुराधरो विहितो यत्र मोक्षः ।

पृष्ठ 1372

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पाण्डव, द्रुपद और व्यासजीमें बातचीत GOOG व्यासजीद्वारा पाण्डवोंके पूर्वजन्मके वृत्तान्तका वर्णन

पृष्ठ 1373

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देवास्त्वस्मानादधीरञ्जनन्यां धर्मो वायुर्मघवानश्विनौ च । अस्त्रैर्दिव्यैर्मानुषान् योधयित्वा आगन्तारः पुनरेवेन्द्रलोकम् ॥ २७ ॥

पहलेके चारों इन्द्र बोले- भगवन्! हम आपकी आज्ञाके अनुसार देवलोकसे मनुष्यलोकमें जायँगे, जहाँ दुर्लभ मोक्षका साधन भी सुलभ होता है । परंतु वहाँ हमें धर्म, वायु, इन्द्र और दोनों अश्विनीकुमार- ये ही देवता माताके गर्भमें स्थापित करें । तदनन्तर हम दिव्यास्त्रोंद्वारा मानव - वीरोंसे युद्ध करके पुनः इन्द्रलोकमें चले आयेंगे ॥ २७ ॥

व्यासउवाच एतच्छ्रुत्वा वज्रपाणिर्वचस्तु देवश्रेष्ठं पुनरेवेदमाह । वीर्येणाहं पुरुषं कार्यहेतो- र्दद्यामेषां पञ्चमं मत्प्रसूतम् ॥ २८ ॥

विश्वभुग् भूतधामा च शिबिरिन्द्रः प्रतापवान् ।

शान्तिश्चतुर्थस्तेषां वै तेजस्वी पञ्चमः स्मृतः ॥ २ ९ ॥

व्यासजी कहते हैं — राजन्! पूर्ववर्ती इन्द्रोंका यह वचन सुनकर वज्रधारी इन्द्रने पुनः देवश्रेष्ठ महादेवजीसे इस प्रकार कहा-' भगवन्! मैं अपने वीर्यसे अपने ही अंशभूत पुरुषको देवताओंके कार्यके लिये समर्पित करूंगा, जो इन चारोंके साथ पाँचवाँ होगा । उसे मैं स्वयं ही उत्पन्न करूँगा। विश्वभुक्, भूतधामा, प्रतापी इन्द्र शिबि, चौथे शान्ति और पाँचवें तेजस्वी – ये ही उन पाँचोंके नाम हैं ॥ २८-२९ ॥ तेषां कामं भगवानुग्रधन्वा प्रादादिष्टं संनिसर्गाद् यथोक्तम् । तां चाप्येषां योषितं लोककान्तां श्रियं भार्यां व्यदधान्मानुषेषु ॥ ३० ॥

उग्र धनुष धारण करनेवाले भगवान् रुद्रने उन सबको उनकी अभीष्ट कामना पूर्ण होनेका वरदान दिया, जिसे वे अपने साधुस्वभावके कारण भगवान्‌के सामने प्रकट कर चुके थे । साथ ही उस लोककमनीया युवती स्त्रीको, जो स्वर्गलोककी लक्ष्मी थी, मनुष्यलोकमें उनकी पत्नी निश्चित की ॥ ३० ॥

तैरेव सार्धं तु ततः स देवो जगाम नारायणमप्रमेयम् । अनन्तमव्यक्तमजं पुराणं सनातनं विश्वमनन्तरूपम् ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 1374

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तदनन्तर उन्हींके साथ महादेवजी अनन्त, अप्रमेय, अव्यक्त, अजन्मा, पुराणपुरुष, सनातन, विश्वरूप एवं अनन्तमूर्ति भगवान् नारायणके पास गये ॥ ३१ ॥

स चापि तद् व्यदधात् सर्वमेव ततः सर्वे सम्बभूवुर्धरण्याम् । स चापि केशौ हरिरुद्वबर्ह शुक्लमेकमपरं चापि कृष्णम् ॥ ३२ ॥

उन्होंने भी उन्हीं सब बातोंके लिये आज्ञा दी । तत्पश्चात् वे सब लोग पृथ्वीपर प्रकट हुए । उस समय भगवान् नारायणने अपने मस्तकसे दो केश निकाले, जिनमें एक श्वेत था और दूसरा श्याम ॥ ३२ ॥

तौ चापि केशौ निविशेतां यदूनां कुले स्त्रियौ देवकीं रोहिणीं च । तयोरेको बलदेवो बभूव योऽसौ श्वेतस्तस्य देवस्य केशः । कृष्णो द्वितीयः केशवः सम्बभूव केशो योऽसौ वर्णतः कृष्ण उक्तः ॥ ३३ ॥

वे दोनों केश यदुवंशकी दो स्त्रियों - देवकी तथा रोहिणीके भीतर प्रविष्ट हुए । उनमेंसे रोहिणीके बलदेव प्रकट हुए, जो भगवान् नारायणका श्वेत केश थे; दूसरा केश, जिसे श्यामवर्णका बताया गया है, वही देवकीके गर्भसे भगवान् श्रीकृष्णके रूपमें प्रकट हुआ* ॥ ३३ ॥

ये ते पूर्वं शक्ररूपा निबद्धा- स्तस्यां दर्यां पर्वतस्योत्तरस्य । इहैव ते पाण्डवा वीर्यवन्तः शक्रस्यांशः पाण्डवः सव्यसाची ॥ ३४ ॥

उत्तरवर्ती हिमालयकी कन्दरामें पहले जो इन्द्रस्वरूप पुरुष बंदी बनाकर रखे गये थे, वे ही चारों पराक्रमी पाण्डव यहाँ विद्यमान हैं और साक्षात् इन्द्रका अंशभूत जो पाँचवाँ पुरुष प्रकट होनेवाला था, वही पाण्डुकुमार सव्यसाची अर्जुन है ॥ ३४ ॥

एवमेते पाण्डवाः सम्बभूवु- र्ये ते राजन् पूर्वमिन्द्रा बभूवुः । लक्ष्मीश्चैषां पूर्वमेवोपदिष्टा भार्या यैषा द्रौपदी दिव्यरूपा ॥ ३५ ॥

कथं हि स्त्री कर्मणा ते महीतलात् समुत्तिष्ठेदन्यतो दैवयोगात् । यस्या रूपं सोमसूर्यप्रकाशं

पृष्ठ 1375

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गन्धश्चास्याः क्रोशमात्रात् प्रवाति ॥ ३६ ॥

राजन्! इस प्रकार ये पाण्डव प्रकट हुए हैं, जो पहले इन्द्र रह चुके हैं । यह दिव्यरूपा द्रौपदी वही स्वर्गलोककी लक्ष्मी है, जो पहलेसे ही इनकी पत्नी नियत हो चुकी है । महाराज! यदि इस कार्यमें देवताओंका सहयोग न होता तो तुम्हारे इस यज्ञकर्मद्वारा यज्ञवेदीकी भूमिसे ऐसी दिव्य नारी कैसे प्रकट हो सकती थी, जिसका रूप सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाश बिखेर रहा है और जिसकी सुगन्ध एक कोसतक फैलती रहती है ॥ ३५-३६ ॥ इदं चान्यत् प्रीतिपूर्वं नरेन्द्र ददानि ते वरमत्यद्भुतं च । दिव्यं चक्षुः पश्य कुन्तीसुतांस्त्वं पुण्यैर्दिव्यैः पूर्वदेहैरुपेतान् ॥ ३७ ॥

नरेन्द्र! मैं तुम्हें प्रसन्नतापूर्वक एक और अद्भुत वरके रूपमें यह दिव्य दृष्टि देता हूँ; इससे सम्पन्न होकर तुम कुन्तीके पुत्रोंको उनके पूर्वकालिक पुण्यमय दिव्य शरीरोंसे सम्पन्न देखो ॥ ३७ ॥

वैशम्पायन उवाच ततो व्यासः परमोदारकर्मा शुचिर्विप्रस्तपसा तस्य राज्ञः । चक्षुर्दिव्यं प्रददौ तांश्च सर्वान् राजापश्यत् पूर्वदेहैर्यथावत् ॥ ३८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर परम उदारकर्मवाले पवित्र ब्रह्मर्षि व्यासजीने अपनी तपस्याके प्रभावसे राजा द्रुपदको दिव्य दृष्टि प्रदान की, जिससे उन्होंने समस्त पाण्डवोंको पूर्वशरीरोंसे सम्पन्न वास्तविक रूपमें देखा ॥ ३८ ॥

ततो दिव्यान् हेमकिरीटमालिनः शक्रप्रख्यान् पावकादित्यवर्णान् । बद्धापीडांश्चारुरूपांश्च यूनो व्यूढोरस्कांस्तालमात्रान् ददर्श ॥ ३ ९ ॥ वे दिव्य शरीरसे सुशोभित थे । उनके मस्तकपर सुवर्णमय किरीट और गलेमें सुन्दर सोनेकी माला शोभा पा रही थी । उनकी छबि इन्द्रके ही समान थी । वे अग्नि और सूर्यके समान कान्तिमान् थे । उन्होंने अपने अंगोंमें सब तरहके दिव्य अलंकार धारण कर रखे थे । युवावस्था थी तथा रूप अत्यन्त मनोहर था । उन सबकी छातीउनकी चौड़ी थी और वेतालवृक्षके समान लंबे थे । इस रूपमें राजा द्रुपदने उनका दर्शन किया ॥ ३ ९ ॥ दिव्यैर्वस्त्रैररजोभिः सुगन्धै-

पृष्ठ 1376

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र्माल्यैश्चाग्रयैः शोभमानानतीव ।

साक्षात् त्र्यक्षान् वा वसूंश्चापि रुद्रा- नादित्यान् वा सर्वगुणोपपन्नान् ॥ ४० ॥

वे दिव्य निर्मल वस्त्रों, उत्तम गन्धों और सुन्दर मालाओंसे अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे तथा साक्षात् त्रिनेत्र महादेव, वसुगण, रुद्रगण अथवा आदित्यगणोंके समान तेजस्वी एवं सर्वगुणसम्पन्न दिखायी देते थे ॥ ४० ॥

तान् पूर्वेन्द्रानभिवीक्ष्याभिरूपान् शक्रात्मजं चेन्द्ररूपं निशम्य । प्रीतो राजा द्रुपदो विस्मितश्च दिव्यां मायां तामवेक्ष्याप्रमेयाम् ॥ ४१ ॥

चारों पाण्डवोंको परम सुन्दर पूर्वकालिक इन्द्रोंके रूपमें तथा इन्द्रपुत्र अर्जुनको भी इन्द्रके ही स्वरूपमें देखकर उस अप्रमेय दिव्य मायापर दृष्टिपात करके राजा द्रुपद अत्यन्त प्रसन्न एवं आश्चर्यचकित हो उठे ॥ ४१ ॥

तां चैवाग्रयां स्त्रियमतिरूपयुक्तां दिव्यां साक्षात् सोमवह्निप्रकाशाम् । योग्यां तेषां रूपतेजोयशोभिः पत्नीं मत्वा हृष्टवान् पार्थिवेन्द्रः ॥ ४२ ॥

उन राजराजेश्वरने अपनी पुत्रीको भी सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी, अत्यन्त रूपवती और साक्षात् चन्द्रमा तथा अग्निके समान प्रकाशित होनेवाली दिव्य नारीके रूपमें देखा । साथ ही यह मान लिया कि द्रौपदी रूप, तेज और यशकी दृष्टिसे अवश्य उन पाण्डवोंकी पत्नी होनेयोग्य है । इससे उन्हें महान् हर्ष हुआ ॥ ४२ ॥

स तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यरूपं जग्राह पादौ सत्यवत्याः सुतस्य । नैतच्चित्रं परमर्षे त्वयीति प्रसन्नचेताः स उवाच चैनम् ॥ ४३ ॥

यह महान् आश्चर्य देखकर द्रुपदने सत्यवतीनन्दन व्यासजीके चरण पकड़ लिये और प्रसन्नचित्त होकर उनसे कहा - ' महर्षे! आपमें ऐसी अद्भुत शक्तिका होना आश्चर्यकी बात नहीं है । ' तब व्यासजी प्रसन्नचित्त हो द्रुपदसे बोले ॥ ४३ ॥

व्यास उवाच

आसीत् तपोवने काचिदृषेः कन्या महात्मनः ।

नाध्यगच्छत् पतिं सा तु कन्या रूपवती सती ॥ ४४ ॥

पृष्ठ 1377

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1377 का मूल पृष्ठ
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व्यासजीने कहा — राजन्! ( अपनी पुत्रीके एक और जन्मका वृत्तान्त भी सुनो— ) एक तपोवनमें किसी महात्मा मुनिकी कोई कन्या रहती थी । सती- साध्वी एवं रूपवती होनेपर भी उसे योग्य पतिकी प्राप्ति नहीं हुई ॥ ४४ ॥

तोषयामास तपसा सा किलोग्रेण शंकरम् ।

तामुवाचेश्वरः प्रीतो वृणु काममिति स्वयम् ॥ ४५ ॥

उसने कठोर तपस्याद्वारा भगवान् शंकरको संतुष्ट किया; महादेवजी प्रसन्न हो साक्षात् प्रकट होकर उस मुनि- कन्यासे बोले – ' तुम मनोवांछित वर माँगो ' ॥ ४५ ॥

सैवमुक्ताब्रवीत् कन्या देवं वरदमीश्वरम् ।

पतिं सर्वगुणोपेतमिच्छामीति पुनः पुनः ॥ ४६ ॥

उनके यों कहनेपर उस मुनि- कन्याने वरदायक महेश्वरसे बार- बार कहा – ' मैं सर्वगुणसम्पन्न पति चाहती हूँ' ॥ ४६ ॥

ददौ तस्यै स देवेशस्तं वरं प्रीतमानसः ।

पञ्च ते पतयो भद्रे भविष्यन्तीति शंकरः ॥ ४७ ॥

देवेश्वर भगवान् शंकर प्रसन्नचित्त होकर उसे वर देते हुए बोले- ' भद्रे! तुम्हारे पाँच पति होंगे ' ॥ ४७ ॥

सा प्रसादयती देवमिदं भूयोऽभ्यभाषत ।

एकं पतिं गुणोपेतं त्वत्तोऽर्हामीति शंकर ॥ ४८ ॥

यह सुनकर उसने महादेवजीको प्रसन्न करते हुए पुनः यह बात कही — ' शंकरजी! मैं तो आपसे एक ही गुणवान् पति प्राप्त करना चाहती हूँ' ॥ ४८ ॥

तां देवदेवः प्रीतात्मा पुनः प्राह शुभं वचः ।

पञ्चकृत्वस्त्वयोक्तोऽहं पतिं देहीति वै पुनः ॥ ४ ९ ॥

तत् तथा भविता भद्रे वचस्तद् भद्रमस्तु ते ।

देहमन्यं गतायास्ते सर्वमेतद् भविष्यति ॥ ५० ॥

तब देवाधिदेव महादेवजीने मन-ही- मन अत्यन्त संतुष्ट होकर उससे यह शुभ वचन कहा — ' भद्रे! तुमने ‘ पति दीजिये ' इस वाक्यको पाँच बार दुहराया है; इसलिये मैंने जो पहले कहा है, वैसा ही होगा, तुम्हारा कल्याण हो । किंतु तुम्हें दूसरे शरीरमें प्रवेश करनेपर यह सब होगा ' ॥ ४ ९ -५० ॥

द्रुपदेषा हि सा जज्ञे सुता वै देवरूपिणी ।

पञ्चानां विहिता पत्नी कृष्णा पार्षत्यनिन्दिता ॥ ५१ ॥

द्रुपद! वही मुनिकन्या तुम्हारी इस दिव्यरूपिणी पुत्रीके रूपमें फिर उत्पन्न हुई है । अतः यह पृषत- वंशकी सती कन्या कृष्णा पहलेसे ही पाँच पतियोंकी पत्नी नियत की गयी है ॥ ५१ ॥

स्वर्गश्रीः पाण्डवार्थं तु समुत्पन्ना महामखे ।

पृष्ठ 1378

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सेह तप्त्वा तपो घोरं दुहितृत्वं तवागता ॥ ५२ ॥

यह स्वर्गलोककी लक्ष्मी है, जो पाण्डवोंके लिये तुम्हारे महायज्ञमें प्रकट हुई है । इसने अत्यन्त घोर तपस्या करके इस जन्ममें तुम्हारी पुत्री होनेका सौभाग्य प्राप्त किया है ॥ ५२ ॥

सैषा देवी रुचिरा देवजुष्टा पञ्चानामेका स्वकृतेनेह कर्मणा । सृष्टा स्वयं देवपत्नी स्वयम्भुवा श्रुत्वा राजन् द्रुपदेष्टं कुरुष्व ॥ ५३ ॥

महाराज द्रुपद! वही यह देवसेवित सुन्दरी देवी अपने ही कर्मसे पाँच पुरुषोंकी एक ही पत्नी नियत की गयी है । स्वयं ब्रह्माजीने इसे देवस्वरूप पाण्डवोंकी पत्नी होनेके लिये रचा है । यह सब सुनकर तुम्हें जो अच्छा लगे, वह करो ॥ ५३ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि वैवाहिकपर्वणि पञ्चेन्द्रोपाख्याने षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ६ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत वैवाहिकपर्वमें पाँच इन्द्रोंके उपाख्यानका वर्णन करनेवाला एक सौ छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९६ ॥ * भगवान् नारायण सच्चिदानन्दघन हैं; उनके नाम, रूप, लीला और धाम- सभी चिन्मय हैं । उन्होंने अपने श्याम और श्वेत केशोंको द्वारमात्र बनाकर स्वयं ही सम्पूर्णरूपसे अपनेको प्रकट किया था ।

पृष्ठ 1379

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1379 का मूल पृष्ठ
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सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्यायः द्रौपदीका पाँचों पाण्डवोंके साथ विवाह द्रुपदउवाच अश्रुत्वैवं वचनं ते महर्षे मया पूर्वं यतितं संविधातुम् । न वै शक्यं विहितस्यापयानं तदेवेदमुपपन्नं विधानम् ॥ १ ॥

द्रुपद बोले— ' ब्रह्मर्षे! आपके इस वचनको न सुननेके कारण ही पहले मैंने वैसा करने (कृष्णाको एक ही योग्य पतिसे ब्याहने ) - का प्रयत्न किया था; परंतु विधाताने जो रच रखा है, उसे टाल देना असम्भव है; अतः उसी पूर्वनिश्चित विधानका पालन करना उचित है ॥ १ ॥

दिष्टस्य ग्रन्थिरनिवर्तनीयः

स्वकर्मणा विहितं नेह किंचित् ।

कृतं निमित्तं हि वरैकहेतो- स्तदेवेदमुपपन्नं विधानम् ॥ २ ॥

भाग्यमें जो लिख दिया है, उसे कोई भी बदल नहीं सकता । अपने प्रयत्नसे यहाँ कुछ नहीं हो सकता । एक वरकी प्राप्तिके लिये जो साधन ( तप ) किया गया, वही पाँच पतियोंकी प्राप्तिका कारण बन गया; अतः दैवके द्वारा पूर्वनिश्चित विधानका ही पालन करना उचित है ॥ २ ॥

यथैव कृष्णोक्तवती पुरस्ता- न्नैकं पतिं मे भगवान् ददातु । स चाप्येवं वरमित्यब्रवीत् तां देवो हि वेत्ता परमं यदत्र ॥ ३ ॥

पूर्वजन्ममें कृष्णाने अनेक बार भगवान् शंकरसे कहा- 'प्रभो! मुझे पति दें । ' जैसा उसने कहा, वैसा ही वर उन्होंने भी उसे दे दिया । अतः इसमें कौन- सा उत्तम रहस्य छिपा है, उसे वे भगवान् ही जानते हैं ॥ ३ ॥

यदि चैवं विहितः शंकरेण धर्मोऽधर्मो वा नात्र ममापराधः । गृह्णन्त्विमे विधिवत् पाणिमस्या यथोपजोषं विहितैषां हि कृष्णा ॥ ४ ॥

पृष्ठ 1380

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यदि साक्षात् शंकरने ऐसा विधान किया है तो यह धर्म हो या अधर्म, इसमें मेरा कोई अपराध नहीं है । ये पाण्डवलोग विधिपूर्वक प्रसन्नतासे इसका पाणिग्रहण करें; विधाताने ही कृष्णाको इन पाण्डवोंकी पत्नी बनाया है ॥ ४ ॥

वैशम्पायन उवाच ततोऽब्रवीद् भगवान् धर्मराज- मद्यैव पुण्याहमुत वः पाण्डवेय । अद्य पौष्यं योगमुपैति चन्द्रमाः पाणिं कृष्णायास्त्वं गृहाणाद्य पूर्वम् ॥ ५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर भगवान् व्यासने धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा — ‘ पाण्डुनन्दन! आज ही तुम लोगोंके लिये पुण्य-दिवस है । आज चन्द्रमा भरण-पोषणकारक पुष्य नक्षत्रपर जा रहे हैं; इसलिये आज पहले तुम्हीं कृष्णाका पाणिग्रहण करो ' ॥ ५ ॥

ततो राजा यज्ञसेनः सपुत्रो

जन्यार्थमुक्तं बहु तत् तदग्र्यम् ।

समानयामास सुतां च कृष्णा- माप्लाव्य रत्नैर्बहुभिर्विभूष्य ॥ ६ ॥

व्यासजीका यह आदेश सुनकर पुत्रोंसहित राजा द्रुपदने वर-वधूके लिये कथित समस्त उत्तम वस्तुओंको मँगवाया और अपनी पुत्री कृष्णाको स्नान कराकर बहुत - से रत्नमय आभूषणोंद्वारा विभूषित किया ॥ ६ ॥

ततस्तु सर्वे सुहृदो नृपस्य समाजग्मुः सहिता मन्त्रिणश्च । द्रष्टुं विवाहं परमप्रतीता द्विजाश्च पौराश्च यथा प्रधानाः ॥ ७ ॥

तत्पश्चात् राजाके सभी सुहृद् - सम्बन्धी, मन्त्री, ब्राह्मण और पुरवासी अत्यन्त प्रसन्न हो विवाह देखनेके लिये आये और बड़ोंको आगे करके बैठे ॥ ७ ॥

ततोऽस्य वेश्माग्र्यजनोपशोभितं विस्तीर्णपद्मोत्पलभूषिताजिरम् । बलौघरत्नौघविचित्रमाबभौ नभो यथा निर्मलतारकान्वितम् ॥ ८ ॥

तदनन्तर राजा द्रुपदका वह भवन श्रेष्ठ पुरुषोंसे सुशोभित होने लगा । उसके आँगनको विस्तृत कमल और उत्पल आदिसे सजाया गया था । वहाँ एक ओर सेनाएँ खड़ी थीं और