सत्यवतीलाभोपाख्यान : पिता की इच्छा पूर्ण करने हेतु पुत्र ने क्या त्याग किया?
त्याग और कर्तव्य का आदर्श
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड १ · आदिपर्व → सम्भवपर्व · अध्याय 100 · पृष्ठ 735–756
2,229 शब्द · 12 मिनटका पाठ · 20 श्लोक
वैशम्पायन ने जनमेजय से कहा
राजा शान्तनु के पुत्र देवव्रत के महान त्याग की कथा सुनाने हेतु।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! राजा शान्तनु बड़े बुद्धिमान् थे; देवता तथा राजर्षि भी उनका सत्कार करते थे। वे धर्मात्मा नरेश सम्पूर्ण जगत्में सत्यवादी के रूप में विख्यात थे। उन महाबली नरश्रेष्ठ शान्तनु में इन्द्रियसंयम, दान, क्षमा, बुद्धि, लज्जा, धैर्य तथा उत्तम तेज आदि सद्गुण सदा विद्यमान थे। इस प्रकार उत्तम गुणों से सम्पन्न एवं धर्म और अर्थ के साधन में कुशल राजा शान्तनु भरतवंश का पालन तथा सम्पूर्ण प्रजा की रक्षा करते थे। उनकी ग्रीवा शङ्ख के समान शोभा पाती थी, कन्धे विशाल थे और वे मतवाले हाथी के समान पराक्रमी थे। उनमें सभी राजोचित शुभ लक्षण पूर्ण सार्थक होकर निवास करते थे। उनके यशस्वी महाराज के धर्मपूर्ण सदाचार को देखकर सब मनुष्य सदा इसी निश्चय पर पहुँचे थे कि काम और अर्थ से धर्म ही श्रेष्ठ है।
स राजा शान्तनुर्धीमान् देवराजर्षिसत्कृतः ।
धर्मात्मा सर्वलोकेषु सत्यवागिति विश्रुतः ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! राजा शान्तनु बड़े बुद्धिमान् थे; देवता तथा राजर्षि भी उनका सत्कार करते थे । वे धर्मात्मा नरेश सम्पूर्ण जगत्में सत्यवादीके रूपमें विख्यात थे ।
महान् शक्तिशाली पुरुषश्रेष्ठ शान्तनु में ये सभी सद्गुण विद्यमान थे। उनके समान धर्मपूर्वक शासन करने वाला दूसरा कोई राजा नहीं था। वे धर्म में सदा स्थिर रहने वाले और सम्पूर्ण धर्मात्माओं में श्रेष्ठ थे; अतः समस्त राजाओं ने मिलकर राजा शान्तनु को राजराजेश्वर के पद पर अभिषिक्त कर दिया। जनमेजय! जब सब राजाओं ने शान्तनु को अपना स्वामी तथा रक्षक बना लिया, तब किसी को शोक, भय और मानसिक सन्ताप नहीं रहा। सब लोग सुख से सोने और जागने लगे। इन्द्र के समान तेजस्वी और कीर्तिशाली शान्तनु के शासन में रहकर अन्य राजा लोग भी दान और यज्ञ कर्मों में स्वभावतः प्रवृत्त होने लगे। उस समय शान्तनु प्रधान राजाओं द्वारा सुरक्षित जगत् में सभी वर्णों के लोग नियमपूर्वक प्रत्येक बर्ताव में धर्म को ही प्रधानता देने लगे। क्षत्रिय लोग ब्राह्मणों की सेवा करते, वैश्य ब्राह्मण और क्षत्रियों में अनुरक्त रहते तथा शूद्र ब्राह्मण और क्षत्रियों में अनुराग रखते हुए वैश्यों की सेवा में तत्पर रहते थे।
ब्रह्म पर्यचरत् क्षत्रं विशः क्षत्रमनुव्रताः ।
ब्रह्मक्षत्रानुरक्ताश्च शूद्राः पर्यचरन् विशः ॥
क्षत्रियलोग ब्राह्मणोंकी सेवा करते, वैश्य ब्राह्मण और क्षत्रियोंमें अनुरक्त रहते तथा शूद्र ब्राह्मण और क्षत्रियोंमें अनुराग रखते हुए वैश्योंकी सेवामें तत्पर रहते थे ।
महाराज शान्तनु कुरुवंश की रमणीय राजधानी हस्तिनापुर में निवास करते हुए समुद्रपर्यन्त पृथ्वी का शासन और पालन करते थे। वे देवराज इन्द्र के समान पराक्रमी, धर्मज्ञ, सत्यवादी तथा सरल थे। दान, धर्म और तपस्या तीनों के योग से उनमें दिव्य कान्तिकी वृद्धि हो रही थी। उनमें न राग था न द्वेष। चन्द्रमा की भाँति उनका दर्शन सबको प्यारा लगता था। वे तेज में सूर्य और वेग में वायु के समान जान पड़ते थे; क्रोध में यमराज और क्षमा में पृथ्वी की समानता करते थे। जनमेजय! महाराज शान्तनु के इस पृथ्वी का पालन करते समय पशुओं, वराहों, मृगों तथा पक्षियों का वध नहीं होता था। उनके राज्य में ब्रह्म और धर्म की प्रधानता थी। महाराज शान्तनु बड़े विनयशील तथा काम-राग आदि दोषों से दूर रहने वाले थे। वे सब प्राणियों का समानभाव से शासन करते थे। उन दिनों देवयज्ञ, ऋषियज्ञ तथा पितृयज्ञ के लिये कर्मों का आरम्भ होता था। अधर्म का भय होने के कारण किसी भी प्राणी का वध नहीं किया जाता था। दुःखी, अनाथ एवं पशु-पक्षी की योनि में पड़े हुए जीव— इन सब प्राणियों का वे राजा शान्तनु ही पिता के समान पालन करते थे। कुरुवंशी नरेशों में श्रेष्ठ राजराजेश्वर शान्तनु के शासन काल में सबकी वाणी सत्य के आश्रित थी— सभी सत्य बोलते थे और सबका मन दान एवं धर्म में लगता था।
तस्मिन् कुरुपतिश्रेष्ठे राजराजेश्वरे सति ।
श्रिता वागभवत् सत्यं दानधर्माश्रितं मनः ॥
कुरुवंशी नरेशोंमें श्रेष्ठ राजराजेश्वर शान्तनुके शासन कालमें सबकी वाणी सत्यके आश्रित थी — सभी सत्य बोलते थे और सबका मन दान एवं धर्ममें लगता था ।
राजा शान्तनु सोलह, आठ, चार और आठ कुल छत्तीस वर्षों तक स्त्रीविषयक अनुराग का अनुभव न करते हुए वन में रहे। वसु के अवतारभूत गाङ्गेय उनके पुत्र हुए, जिनका नाम देवव्रत था। वे पिता के समान ही रूप, आचार, व्यवहार तथा विद्या से सम्पन्न थे। लौकिक और अलौकिक सब प्रकार के अस्त्र-शस्त्र की कला में वे पारङ्गत थे। उनके बल, सत्त्व तथा वीर्य महान् थे। वे महारथी वीर थे। एक समय किसी हिंसक पशु को बाणों से बींधकर राजा शान्तनु उसका पीछा करते हुए भागीरथी गङ्गा के तट पर आये। उन्होंने देखा कि गङ्गाजी में बहुत थोड़ा जल रह गया है। उसे देखकर पुरुषों में श्रेष्ठ महाराज शान्तनु इस चिन्ता में पड़ गये कि यह सरिताओं में श्रेष्ठ देवनदी आज पहले की तरह क्यों नहीं बह रही है? तदनन्तर उन महामना नरेश ने इसके कारण का पता लगाते हुए जब आगे बढ़कर देखा, तब मालूम हुआ कि एक परम सुन्दर मनोहर रूप से सम्पन्न विशालकाय कुमार देवराज इन्द्र के समान दिव्यास्त्र का अभ्यास कर रहा है और अपने तीखे बाणों से समूची गङ्गा की धारा को रोककर खड़ा है।
ततो निमित्तमन्विच्छन् ददर्श स महामनाः ।
कुमारं रूपसम्पन्नं बृहन्तं चारुदर्शनम् ॥
दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणं यथा देवं पुरन्दरम् ।
कृत्स्नां गङ्गां समावृत्य शरैस्तीक्ष्णैरवस्थितम् ॥
तदनन्तर उन महामना नरेशने इसके कारणका पता लगाते हुए जब आगे बढ़कर देखा, तब मालूम हुआ कि एक परम सुन्दर मनोहर रूपसे सम्पन्न विशालकाय कुमार देवराज इन्द्रके समान दिव्यास्त्रका अभ्यास कर रहा है और अपने तीखे बाणोंसे समूची गंगाकी धाराको रोककर खड़ा है ।
राजन ने उसके निकटकी गङ्गा नदी को उसके बाणों से व्याप्त देखा। उस बालक का यह अलौकिक कर्म देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। शान्तनु ने अपने पुत्र को पहले पैदा होने के समय ही देखा था; अतः उन बुद्धिमान नरेश को उस समय उसकी याद नहीं आयी; इसलिये वे अपने ही पुत्र को पहचान न सके। बालक ने अपने पिता को देखकर उन्हें माया से मोहित कर दिया और शीघ्र वहीं अन्तर्धान हो गया। यह अद्भुत बात देखकर राजा शान्तनु को कुछ सन्देह हुआ और उन्होंने गङ्गा से अपने पुत्र को दिखाने को कहा। तब गङ्गाजी परम सुन्दर रूप धारण करके अपने पुत्र का दाहिना हाथ पकड़े सामने आयीं और दिव्य वस्त्राभूषणों से विभूषित कुमार देवव्रत को दिखाया। गङ्गा दिव्य आभूषणों से अलङ्कृत होकर स्वच्छ सुन्दर साड़ी पहने हुई थीं; इससे उनका अनुपम सौन्दर्य इतना बढ़ गया था कि पहले की देखी होने पर भी राजा शान्तनु उन्हें पहचान न सके।
अलंकृतामाभरणैर्विरजोऽम्बरसंवृताम् ।
दृष्टपूर्वामपि स तां नाभ्यजानात् स शान्तनुः ॥
गंगा दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत हो स्वच्छ सुन्दर साड़ी पहने हुई थीं । इससे उनका अनुपम सौन्दर्य इतना बढ़ गया था कि पहलेकी देखी होनेपर भी राजा शान्तनु उन्हें पहचान न सके ।
गङ्गाजी ने कहा— "महाराज! पूर्वकाल में आपने अपने जिस आठवें पुत्र को मेरे गर्भ से प्राप्त किया था, यह वही है। पुरुषसिंह! यह सम्पूर्ण अस्त्रवेत्ताओं में अत्यन्त उत्तम है। राजन! मैंने इसे पाल-पोसकर बड़ा कर दिया है। अब आप अपने इस पुत्र को ग्रहण कीजिये। नरश्रेष्ठ! स्वामिन्! इसे घर ले जाइये। आपका यह बलवान् पुत्र महर्षि वसिष्ठ से छहों अङ्गों सहित समस्त वेदों का अध्ययन कर चुका है। यह अस्त्र-विद्या का भी पण्डित है, महान् धनुर्धर है और युद्ध में देवराज इन्द्र के समान पराक्रमी है। भारत! देवता और असुर भी इसका सदा सम्मान करते हैं। शुक्राचार्य जिस नीति शास्त्र को जानते हैं, इसका यह भी पूर्णरूप से जानकार है। मया दत्तं निजं पुत्रं वीरं वीर गृहं नय। इसी प्रकार अङ्गिरा के पुत्र देव-दानव वन्दित बृहस्पति जिस शास्त्र को जानते हैं, वह भी आपके इस महाबाहु महात्मा पुत्र में अङ्ग और उपाङ्गों सहित पूर्णरूप से प्रतिष्ठित है। जो दूसरों से परास्त नहीं होते, वे प्रतापी महर्षि जमदग्निनन्दन परशुराम जिस अस्त्र-विद्या को जानते हैं, वह भी मेरे इस पुत्र में प्रतिष्ठित है। वीरवर महाराज! यह कुमार राजधर्म तथा अर्थशास्त्र का महान् पण्डित है। मेरे दिये हुए इस महाधनुर्धर वीर पुत्र को आप घर ले जाइये।"
गृहाणेमं महाराज मया संवर्धितं सुतम् ।
आदाय पुरुषव्याघ्र नयस्वैनं गृहं विभो ॥
राजन! मैंने इसे पाल - पोसकर बड़ा कर दिया है । अब आप अपने इस पुत्रको ग्रहण कीजिये । नरश्रेष्ठ! स्वामिन्! इसे घर ले जाइये ।
पूरी कामनाओं से सम्पन्न और सफल मनोरथ मानने लगे। तदनन्तर उन्होंने सबको अभय देनेवाले महात्मा एवं गुणवान् पुत्र को राजकाज में सहयोग करने के लिये समस्त पौरवों के बीच में युवराज पद पर अभिषिक्त कर दिया। जनमेजय! शान्तनु के उस महायशस्वी पुत्र ने अपने आचार-व्यवहार से पिता को, पौरव समाज को तथा समूचे राष्ट्र को प्रसन्न कर लिया। अमितपराक्रमी राजा शान्तनु ने वैसे गुणवान् पुत्र के साथ आनन्दपूर्वक रहते हुए चार वर्ष व्यतीत किये। एक दिन वे यमुना नदी के निकटवर्ती वन में गये। वहाँ राजा को अवर्णनीय एवं परम उत्तम सुगन्ध का अनुभव हुआ। वे उसके उद्गम स्थान का पता लगाते हुए सब ओर विचरने लगे। घूमते-घूमते उन्होंने मल्लाहों की एक कन्या देखी, जो देवाङ्गनाओं के समान रूपवती थी। श्याम नेत्रों वाली उस कन्या को देखते ही राजा ने पूछा— "भीरु! तू कौन है, किसकी पुत्री है और क्या करना चाहती है?" वह बोली— "राजन्! आपका कल्याण हो। मैं निषादकन्या हूँ और अपने पिता महामना निषादराज की आज्ञा से धर्मार्थ नाव चलाती हूँ।"
तदद्भुतं ततो दृष्ट्वा तत्र राजा स शान्तनुः ।
शङ्कमानः सुतं गङ्गामब्रवीद् दर्शयेति ह ॥
यह अद्भुत बात देखकर राजा शान्तनुको कुछ संदेह हुआ और उन्होंने गंगासे अपने पुत्रको दिखानेको कहा ।
राजा शान्तनु ने रूप, माधुर्य तथा सुगन्ध से युक्त उस देवाङ्गना के तुल्य निषादकन्या को देखकर उसे प्राप्त करने की इच्छा की। तदनन्तर उसके पिता के समीप जाकर उन्होंने उसका वरण किया। उन्होंने उसके पिता से पूछा— "मैं अपने लिये तुम्हारी कन्या चाहता हूँ।" यह सुनकर निषादराज ने राजा शान्तनु को यह उत्तर दिया— "जनेश्वर! जबसे इस सुन्दरी कन्या का जन्म हुआ है, तभी से मेरे मन में यह चिन्ता है कि इसका किसी श्रेष्ठ वर के साथ विवाह करना चाहिये; किन्तु मेरे हृदय में एक अभिलाषा है, उसे सुन लीजिये। पापरहित नरेश! यदि इस कन्या को अपनी धर्मपत्नी बनाने के लिये आप मुझसे माँग रहे हैं, तो सत्य को सामने रखकर मेरी इच्छा पूर्ण करने की प्रतिज्ञा कीजिये; क्योंकि आप सत्यवादी हैं। राजन्! मैं इस कन्या को एक शर्त के साथ आपकी सेवा में दूँगा। मुझे आपके समान दूसरा कोई श्रेष्ठ वर कभी नहीं मिलेगा।"
समयेन प्रदद्यां ते कन्यामहमिमां नृप ।
न हि मे त्वत्समः कश्चिद् वरो जातु भविष्यति ॥
‘ राजन्! मैं इस कन्याको एक शर्तके साथ आपकी सेवामें दूँगा । मुझे आपके समान दूसरा कोई श्रेष्ठ वर कभी नहीं मिलेगा'
शान्तनु ने कहा— "निषाद! पहले तुम्हारे अभीष्ट वर को सुन लेने पर मैं उसके विषय में कुछ निश्चय कर सकता हूँ। यदि देने योग्य होगा, तो दूँगा और देने योग्य नहीं होगा, तो कदापि नहीं दे सकता।" निषाद बोला— "पृथ्वीपते! इसके गर्भ से जो पुत्र उत्पन्न हो, आपके बाद उसी का राजा के पद पर अभिषेक किया जाय, अन्य किसी राजकुमार का नहीं।" वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! राजा शान्तनु प्रचण्ड कामाग्नि से जल रहे थे, तो भी उनके मन में निषाद को वह वर देने की इच्छा नहीं हुई। काम की वेदना से उनका चित्त चञ्चल था। वे उस निषादकन्या का ही चिन्तन करते हुए उस समय हस्तिनापुर को लौट गये।
नाकामयत तं दातुं वरं दाशाय शान्तनुः ।
शरीरजेन तीव्रेण दह्यमानोऽपि भारत ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! राजा शान्तनु प्रचण्ड कामाग्निसे जल रहे थे, तो भी उनके मनमें निषादको वह वर देनेकी इच्छा नहीं हुई ।
तदनन्तर एक दिन राजा शान्तनु ध्यानस्थ होकर कुछ सोच रहे थे— चिन्ता में पड़े थे। इसी समय उनके पुत्र देवव्रत अपने पिता के पास आये और इस प्रकार बोले— "पिताजी! आपका तो सब ओर से कुशल-मङ्गल है, भू-मण्डल के सभी नरेश आपकी आज्ञा के अधीन हैं; फिर किस लिये आप निरन्तर दुःखी होकर शोक और चिन्ता में डूबे रहते हैं? राजन्! आप इस तरह मौन बैठे रहते हैं, मानो किसी का ध्यान कर रहे हों; मुझसे कोई बातचीत तक नहीं करते। घोड़े पर सवार होकर कहीं बाहर भी नहीं निकलते। आपकी कान्ति मलिन होती जा रही है। आप पीले और दुबले हो गये हैं। आपको कौन सा रोग लग गया है, यह मैं जानना चाहता हूँ, जिससे मैं उसका प्रतिकार कर सकूँ।" पुत्र के ऐसे कहने पर शान्तनु ने उत्तर दिया—
व्याधिमिच्छामि ते ज्ञातुं प्रतिकुर्यां हि तत्र वै ।
एवमुक्तः स पुत्रेण शान्तनुः प्रत्यभाषत ॥
‘ आपको कौन- सा रोग लग गया है, यह मैं जानना चाहता हूँ, जिससे मैं उसका प्रतीकार कर सकूँ । ' पुत्रके ऐसा कहनेपर शान्तनुने उत्तर दिया- ।
वैशम्पायन जी कहते हैं— हे जनमेजय! राजा शान्तनु के दुःख का वह सारा कारण जानकर परम बुद्धिमान् देवव्रत ने अपनी बुद्धि से भी उस पर विचार किया। वे तुरन्त अपने पिता के हितैषी वृद्ध मन्त्री के पास पहुँचे और उनसे पूछा कि महाराज के शोक का वास्तविक कारण क्या है?
ततस्तत्कारणं राज्ञो ज्ञात्वा सर्वमशेषतः ।
देवव्रतो महाबुद्धिः प्रज्ञया चान्वचिन्तयत् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! राजाके दुःखका वह सारा कारण जानकर परम बुद्धिमान् देवव्रतने अपनी बुद्धिसे भी उसपर विचार किया ।
भरतश्रेष्ठ देवव्रत के पूछने पर वृद्ध मन्त्री ने अत्यन्त विनम्रतापूर्वक सारा वृत्तान्त सुनाया। उन्होंने कहा, "वीर! महाराज एक कन्या से विवाह करना चाहते हैं। उन्होंने धीवर (निषादराज) से उस कन्या को माँगा भी था, परन्तु उस समय उसने यह शर्त रखी कि उसके गर्भ से जो पुत्र हो, वही आपके बाद राजा बनेगा। आपके पिताजी के मन में धीवर को ऐसा वर देने की इच्छा नहीं हुई। इधर उसका भी पक्का निश्चय है कि यह शर्त स्वीकार किए बिना वह अपनी कन्या नहीं देगा।"
तस्मै स कुरुमुख्याय यथावत् परिपृच्छते ।
वरं शशंस कन्यां तामुद्दिश्य भरतर्षभ ॥
भरतश्रेष्ठ! कुरुवंशके श्रेष्ठ पुरुष देवव्रतके भलीभाँति पूछनेपर वृद्ध मन्त्रीने बताया कि महाराज एक कन्यासे विवाह करना चाहते हैं ।
यह सुनकर कुमार देवव्रत उसी समय वृद्ध क्षत्रियों के साथ निषादराज के पास पहुँचे ताकि अपने पिता के मनोरथ को पूर्ण कर सकें। वहाँ निषादराज ने उनका भव्य सत्कार किया और विधिपूर्वक पूजा के पश्चात उन्हें आसन पर बैठाकर क्षत्रियों की मण्डली के बीच कहा— "याचकों में श्रेष्ठ राजकुमार! इस कन्या को देने में मैंने राज्य को ही शुल्क रखा है। इसके गर्भ से जो पुत्र उत्पन्न हो, वही पिता के बाद राजा होगा।"
त्वं च शूरः सदामर्षी शस्त्रनित्यश्च भारत ।
नान्यत्र युद्धात् तस्मात् ते निधनं विद्यते क्वचित् ॥
‘ भारत! तुम शूरवीर हो। तुम कभी किसीकी बात सहन नहीं कर सकते और सदा अस्त्र- शस्त्रोंके अभ्यासमें ही लगे रहते हो; अतः युद्धके सिवा और किसी कारणसे कभी तुम्हारी मृत्यु होनेकी सम्भावना नहीं है ।
निसादराज ने आगे कहा, "भरतर्षभ! राजा शान्तनु के पुत्र अकेले आप ही सबकी रक्षा के लिए पर्याप्त हैं। आप शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ हैं; परन्तु फिर भी मैं अपनी बात आपके सामने रखूँगा। इस कन्या के पिता गुणों में आप लोगों के समान ही हैं। उन्होंने अनेक बार मुझसे आपके विषय में चर्चा की थी कि सत्यवती को ब्याहने योग्य केवल धर्मज्ञ राजा शान्तनु ही हैं। महान कीर्ति वाले राजर्षि शान्तनु उन्हें पहले भी माँग चुके हैं, किन्तु मैंने उनकी बात अस्वीकार कर दी थी। युवराज! इस विवाह में मुझे केवल एक दोष दिखाई देता है— बलवान के साथ शत्रुता। आप जिसके शत्रु होंगे, वह कभी चिरजीवी नहीं हो सकता।"
अर्थितश्चापि राजर्षिः प्रत्याख्यातः पुरा मया ।
स चाप्यासीत् सत्यवत्या भृशमर्थी महायशाः ॥
कन्यापितृत्वात् किंचित् तु वक्ष्यामि त्वां नराधिप ।
बलवत्सपत्नतामत्र दोषं पश्यामि केवलम् ॥
महान् कीर्तिवाले राजर्षि शान्तनु सत्यवतीको पहले भी बहुत आग्रहपूर्वक माँग चुके हैं; किंतु उनके माँगनेपर भी मैंने उनकी बात अस्वीकार कर दी थी । युवराज! मैं कन्याका पिता होनेके कारण कुछ आपसे भी कहूँगा ही । आपके यहाँ जो सम्बन्ध हो रहा है, उसमें मुझे केवल एक दोष दिखायी देता है, बलवान् के साथ शत्रुता ।
गङ्गानन्दन देवव्रत ने पिता के हित के लिए निसादराज को उत्तर दिया— "सत्यवानों में श्रेष्ठ निषादराज! मेरी यह सच्ची प्रतिज्ञा सुनो और ग्रहण करो। मैं वैसा ही करूँगा जैसा तुम चाहते हो; इस सत्यवती के गर्भ से जो पुत्र पैदा होगा, वही हमारा राजा बनेगा।"
एवमेतत् करिष्यामि यथा त्वमनुभाषसे ।
योऽस्यां जनिष्यते पुत्रः स नो राजा भविष्यति ॥
‘ लो, तुम जो कुछ चाहते या कहते हो, वैसा ही करूँगा । इस सत्यवतीके गर्भसे जो पुत्र पैदा होगा, वही हमारा राजा बनेगा '
परन्तु निसादराज का मन अभी भी संशय में था। उन्होंने पुनः कहा— "अमित तेजस्वी युवराज! आप सब कुछ करने में समर्थ हैं, परन्तु मुझे एक भारी संशय है। आपका जो पुत्र होगा, वह शायद इस प्रतिज्ञा पर दृढ़ न रहे।"
नान्यथा तन्महाबाहो संशयोऽत्र न कश्चन ।
तवापत्यं भवेद् यत् तु तत्र नः संशयो महान् ॥
' महाबाहो! वह टल नहीं सकती; उसके विषयमें मुझे कोई संदेह नहीं है, परंतु आपका जो पुत्र होगा, वह शायद इस प्रतिज्ञापर दृढ़ न रहे, यही हमारे मनमें बड़ा भारी संशय है '
निसादराज के इस अभिप्राय को समझकर, सत्यधर्म में तत्पर देवव्रत ने पिता का प्रिय करने के लिए वह कठोर प्रतिज्ञा की जिसे सुनकर सबके रोंगटे खड़े हो गए। उन्होंने गरजते हुए कहा— "नरश्रेष्ठ निसादराज! मेरी यह बात सुनो। जो-जो ऋषि, देवता एवं अन्तरिक्ष के प्राणी यहाँ हों, वे सब भी सुनें। मेरे समान वचन देने वाला दूसरा नहीं है। राजाओं! राज्य तो मैंने पहले ही छोड़ दिया है; अब सन्तान के लिए भी अटल निश्चय कर रहा हूँ। आज से मेरा आजीवन अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत चलता रहेगा!"
अद्यप्रभृति मे दाश ब्रह्मचर्यं भविष्यति ।
अपुत्रस्यापि मे लोका भविष्यन्त्यक्षया दिवि ॥
निषादराज! आजसे मेरा आजीवन अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत चलता रहेगा । मेरे पुत्र न होनेपर भी स्वर्गमें मुझे अक्षय लोक प्राप्त होंगे ।
देवव्रत का यह भीषण वचन सुनकर धर्मात्मा निसादराज स्तब्ध रह गए। उन्होंने तुरन्त उत्तर दिया— "मैं यह कन्या आपके पिता के लिए अवश्य देता हूँ।" उसी क्षण अन्तरिक्ष में अप्सराओं, देवताओं और ऋषियों ने फूलों की वर्षा की और गूँज उठा— "ये भयङ्कर प्रतिज्ञा करने वाले राजकुमार भीष्म हैं!"
ततोऽन्तरिक्षेऽप्सरसो देवाः सर्षिगणास्तदा ।
अभ्यवर्षन्त कुसुमैर्भीष्मोऽयमिति चाब्रुवन् ॥
उस समय अन्तरिक्षमें अप्सरा, देवता तथा ऋषिगण फूलोंकी वर्षा करने लगे और बोल उठे — ‘ ये भयंकर प्रतिज्ञा करनेवाले राजकुमार भीष्म हैं ( अर्थात् भीष्मके नामसे इनकी ख्याति होगी ) '
तत्पश्चात् भीष्म ने उस यशस्विनी सत्यवती से कहा— "माताजी! इस रथ पर बैठिये। अब हम अपने घर चलें।" भीष्म ने उसे रथ पर बैठाया और हस्तिनापुर लाकर राजा शान्तनु को सौंप दिया। उनके इस दुष्कर कर्म की प्रशंसा करते हुए सभी राजा एक स्वर में कहने लगे— "यह राजकुमार वास्तव में भीष्म है!"
तस्य तद् दुष्करं कर्म प्रशशंसुर्नराधिपाः ।
समेताश्च पृथक् चैव भीष्मोऽयमिति चाब्रुवन् ॥
उनके इस दुष्कर कर्मकी सब राजालोग एकत्र होकर और अलग- अलग भी प्रशंसा करने लगे । सबने एक स्वरसे कहा, ' यह राजकुमार वास्तवमें भीष्म है '
जब राजा शान्तनु ने अपने पुत्र के इस महान त्याग को सुना, तो वे अत्यन्त द्रवित हुए। उन्होंने उन महात्मा भीष्म को स्वच्छन्द मृत्यु का वरदान दिया और बोले— "मेरे निष्पाप पुत्र! तुम जब तक यहाँ जीवित रहना चाहोगे, तब तक मृत्यु तुम्हारे ऊपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकती। तुमसे आज्ञा लेकर ही मृत्यु तुम पर अपना प्रभाव प्रकट कर सकती है।"
न ते मृत्युः प्रभविता यावज्जीवितुमिच्छसि ।
त्वत्तो ह्यनुज्ञां सम्प्राप्य मृत्युः प्रभवितानघ ॥
वे बोले – ' मेरे निष्पाप पुत्र! तुम जबतक यहाँ जीवित रहना चाहोगे, तबतक मृत्यु तुम्हारे ऊपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकती । तुमसे आज्ञा लेकर ही मृत्यु तुमपर अपना प्रभाव प्रकट कर सकती है '
In English
The King Shantanu and the Fisherman's Daughter
King Shantanu of Hastinapur meets a beautiful girl named the Nishada daughter while traveling by the river. Her father, the King of the Nishadas, agrees to give her to Shantanu only on the condition that her children will inherit the throne instead of Shantanu's existing son, Devavrata. Devavrata learns of this difficult situation from the king's minister.
This page answers
- Who was the son of shantanu and ganga?
- What did ganga tell shantanu about devavrata?
- What condition did the nishada king set for his daughter's marriage?
- How did devavrata find out about his father's sadness?
Also written: Satyavatilabhopakhyana, Satyavatilabha, Nishadaraja, Satyavati, Ganga, सत्यवतीलाभोपाख्यान