श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 741–750
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 741–750
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गृहाणेमं महाराज मया संवर्धितं सुतम् ।
आदाय पुरुषव्याघ्र नयस्वैनं गृहं विभो ॥ ३४ ॥
राजन! मैंने इसे पाल - पोसकर बड़ा कर दिया है । अब आप अपने इस पुत्रको ग्रहण कीजिये । नरश्रेष्ठ! स्वामिन्! इसे घर ले जाइये ॥ ३४ ॥
वेदानधिजगे साङ्गान् वसिष्ठादेष वीर्यवान् ।
कृतास्त्रः परमेष्वासो देवराजसमो युधि ॥ ३५ ॥
आपका यह बलवान् पुत्र महर्षि वसिष्ठसे छहों अंगोंसहित समस्त वेदोंका अध्ययन कर चुका है । यह अस्त्र- विद्याका भी पण्डित है, महान् धनुर्धर है और युद्धमें देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी है ॥ ३५ ॥
सुराणां सम्मतो नित्यमसुराणां च भारत ।
उशना वेद यच्छास्त्रमयं तद् वेद सर्वशः ॥ ३६ ॥
भारत! देवता और असुर भी इसका सदा सम्मान करते हैं । शुक्राचार्य जिस ( नीति) शास्त्रको जानते हैं, उसका यह भी पूर्णरूपसे जानकार है ॥ ३६ ॥
तथैवाङ्गिरसः पुत्रः सुरासुरनमस्कृतः ।
यद् वेद शास्त्रं तच्चापि कृत्स्नमस्मिन् प्रतिष्ठितम् ॥ ३७ ॥
तव पुत्रे महाबाही साङ्गोपाङ्गं महात्मनि ।
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ऋषिः परैरनाधृष्यो जामदग्न्यः प्रतापवान् ॥ ३८ ॥
यदस्त्रं वेद रामश्च तदेतस्मिन् प्रतिष्ठितम् ।
महेष्वासमिमं राजन् राजधर्मार्थकोविदम् ॥ ३ ९ ॥
मया दत्तं निजं पुत्रं वीरं वीर गृहं नय । इसी प्रकार अंगिराके पुत्र देव -दानव-- वन्दित बृहस्पति जिस शास्त्रको जानते हैं, वह भी आपके इस महाबाहु महात्मा पुत्रमें अंग और उपांगोंसहित पूर्णरूपसे प्रतिष्ठित है । जो दूसरोंसे परास्त नहीं होते, वे प्रतापी महर्षि जमदग्निनन्दन परशुराम जिस अस्त्रत्र--विद्याको1 जानते हैं, वह भी मेरे इस पुत्रमें प्रतिष्ठित है । वीरवर महाराज! यह कुमार राजधर्म तथा अर्थशास्त्रका महान् पण्डित है । मेरे दिये हुए इस महाधनुर्धर वीर पुत्रको आप घर ले जाइये ॥ ३७–३९ ॥ वैशम्पायन उवाच (इत्युक्त्वा सा महाभागा तत्रैवान्तरधीयत । ) तयैवं समनुज्ञातः पुत्रमादाय शान्तनुः ॥ ४० ॥
भ्राजमानं यथादित्यमाययौ स्वपुरं प्रति ।
पौरवस्तु पुरीं गत्वा पुरन्दरपुरोपमाम् ॥ ४१ ॥
सर्वकामसमृद्धार्थं मेने सोऽऽत्मानमात्मना ।
पौरवेषु ततः पुत्रं राज्यार्थमभयप्रदम् ॥ ४२ ॥
गुणवन्तं महात्मानं यौवराज्येऽभ्यषेचयत् ।
पौरवाञ्छान्तनोः पुत्रः पितरं च महायशाः ॥ ४३ ॥
राष्ट्रं च रञ्जयामास वृत्तेन भरतर्षभ ।
स तथा सह पुत्रेण रममाणो महीपतिः ॥ ४४ ॥
वर्तयामास वर्षाणि चत्वार्यमितविक्रमः ।
स कदाचिद् वनं यातो यमुनामभितो नदीम् ॥ ४५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - ऐसा कहकर महाभागा गंगादेवी वहीं अन्तर्धान हो गयीं । गंगाजीके इस प्रकार आज्ञा देनेपर महाराज शान्तनु सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले अपने पुत्रको लेकर राजधानीमें आये । उनका हस्तिनापुर इन्द्रनगरी अमरावतीके समान सुन्दर था । पूरुवंशी राजा शान्तनु पुत्रसहित उसमें जाकर अपने - आपको सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न एवं सफलमनोरथ मानने लगे । तदनन्तर उन्होंने सबको अभय देनेवाले महात्मा एवं गुणवान् पुत्रको राजकाजमें सहयोग करनेके लिये समस्त पौरवोंके बीचमें युवराज - पदपर अभिषिक्त कर दिया । जनमेजय! शान्तनुके उस महायशस्वी पुत्रने अपने आचार- व्यवहारसे पिताको, पौरवसमाजको तथा समूचे राष्ट्रको प्रसन्न कर लिया । अमितपराक्रमी राजा शान्तनुने वैसे
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गुणवान् पुत्रके साथ आनन्दपूर्वक रहते हुए चार वर्ष व्यतीत किये । एक दिन वे यमुना नदीके निकटवर्ती वनमें गये ॥ ४०–४५ ॥
महीपतिरनिर्देश्यमाजिघ्रद् गन्धमुत्तमम् ।
तस्य प्रभवमन्विच्छन् विचचार समन्ततः ॥ ४६ ॥
वहाँ राजाको अवर्णनीय एवं परम उत्तम सुगन्धका अनुभव हुआ । वे उसके उद्गमस्थानका पता लगाते हुए सब ओर विचरने लगे ॥ ४६ ॥
स ददर्श तदा कन्यां दाशानां देवरूपिणीम् ।
तामपृच्छत् स दृष्ट्वैव कन्यामसितलोचनाम् ॥ ४७ ॥
घूमते- घूमते उन्होंने मल्लाहोंकी एक कन्या देखी, जो देवांगनाओंके समान रूपवती थी । श्याम नेत्रोंवाली उस कन्याको देखते ही राजाने पूछा- ॥ ४७ ॥
कस्य त्वमसि का चासि किं च भीरु चिकीर्षसि I साब्रवीद् दाशकन्यास्मि धर्मार्थं वाहये तरिम् ॥ ४८ ॥
पितुर्नियोगाद् भद्रं ते दाशराज्ञो महात्मनः ।
रूपमाधुर्यगन्धैस्तां संयुक्तां देवरूपिणीम् ॥ ४ ९ ॥
समीक्ष्य राजा दाशेयीं कामयामास शान्तनुः ।
स गत्वा पितरं तस्या वरयामास तां तदा ॥ ५० ॥
‘ भीरु! तूतू कौन है, किसकी पुत्री है और क्या करना चाहती है? ' वह बोली– ' राजन्! आपका कल्याण हो । मैं निषादकन्या हूँ और अपने पिता महामना निषादराजकी आज्ञासे धर्मार्थ नाव चलाती हूँ। ' राजा शान्तनुने रूप, माधुर्य तथा सुगन्धसे युक्त देवांगनाके तुल्य उस निषादकन्याको देखकर उसे प्राप्त करनेकी इच्छा की । तदनन्तर उसके पिताके समीप जाकर उन्होंने उसका वरण किया ॥ ४८—५० ॥
पर्यपूच्छत् ततस्तस्याः पितरं सोऽऽत्मकारणात् ।
स च तं प्रत्युवाचेदं दाशराजो महीपतिम् ॥ ५१ ॥
उन्होंने उसके पितासे पूछा- ' मैं अपने लिये तुम्हारी कन्या चाहता हूँ। ' यह सुनकर निषादराजने राजा शान्तनुको यह उत्तर दिया- ॥ ५१ ॥
जातमात्रैव मे देया वराय वरवर्णिनी ।
हृदि कामस्तु मे कश्चित् तं निबोध जनेश्वर ॥ ५२ ॥
‘ जनेश्वर! जबसे इस सुन्दरी कन्याका जन्म हुआ है, तभीसे मेरे मनमें यह चिन्ता है कि इसका किसी श्रेष्ठ वरके साथ विवाह करना चाहिये; किंतु मेरे हृदयमें एक अभिलाषा है, उसे सुन लीजिये ॥ ५२ ॥
यदीमां धर्मपत्नीं त्वं मत्तः प्रार्थयसेऽनघ ।
सत्यवागसि सत्येन समयं कुरु मे ततः ॥ ५३ ॥
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‘ पापरहित नरेश! यदि इस कन्याको अपनी धर्मपत्नी बनानेके लिये आप मुझसे माँग रहे हैं, तो सत्यको सामने रखकर मेरी इच्छा पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कीजिये; क्योंकि आप सत्यवादी हैं ॥ ५३ ॥
समयेन प्रदद्यां ते कन्यामहमिमां नृप ।
न हि मे त्वत्समः कश्चिद् वरो जातु भविष्यति ॥ ५४ ॥
‘ राजन्! मैं इस कन्याको एक शर्तके साथ आपकी सेवामें दूँगा । मुझे आपके समान दूसरा कोई श्रेष्ठ वर कभी नहीं मिलेगा' ॥ ५४ ॥
Brigendum शान्तनुरुवाच
श्रुत्वा तव वरं दाश व्यवस्येयमहं तव ।
दातव्यं चेत् प्रदास्यामि न त्वदेयं कथंचन ॥ ५५ ॥
- शान्तनुने कहा –निषाद! पहले तुम्हारे अभीष्ट वरको सुन लेनेपर मैं उसके विषयमें कुछ निश्चय कर सकता हूँ। यदि देनेयोग्य होगा, तो दूँगा और देनेयोग्य नहीं होगा, तो कदापि नहीं दे सकता ॥ ५५ ॥
दाशउवाच अस्यां जायेत यः पुत्रः स राजा पृथिवीपते ।
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त्वदूर्ध्वमभिषेक्तव्यो नान्यः कश्चन पार्थिव ॥ ५६ ॥
निषाद बोला – पृथ्वीपते! इसके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न हो, आपके बाद उसीका राजाके पदपर अभिषेक किया जाय, अन्य किसी राजकुमारका नहीं ॥ ५६ ॥
वैशम्पायन उवाच
नाकामयत तं दातुं वरं दाशाय शान्तनुः ।
शरीरजेन तीव्रेण दह्यमानोऽपि भारत ॥ ५७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! राजा शान्तनु प्रचण्ड कामाग्निसे जल रहे थे, तो भी उनके मनमें निषादको वह वर देनेकी इच्छा नहीं हुई ॥ ५७ ॥
स चिन्तयन्नेव तदा दाशकन्यां महीपतिः ।
प्रत्ययाद्धास्तिनपुरं कामोपहतचेतनः ॥ ५८ ॥
कामकी वेदनासे उनका चित्त चंचल था । वे उस निषादकन्याका ही चिन्तन करते हुए उस समय हस्तिनापुरको लौट गये ॥ ५८ ॥
ततः कदाचिच्छोचन्तं शान्तनुं ध्यानमास्थितम् ।
पुत्रो देवव्रतोऽभ्येत्य पितरं वाक्यमब्रवीत् ॥ ५ ९ ॥
तदनन्तर एक दिन राजा शान्तनु ध्यानस्थ होकर कुछ सोच रहे थे - चिन्तामें पड़े थे ।
इसी समय उनके पुत्र देवव्रत अपने पिताके पास आये और इस प्रकार बोले— ॥ ५ ९ ॥
सर्वतो भवतः क्षेमं विधेयाः सर्वपार्थिवाः ।
तत् किमर्थमिहाभीक्ष्णं परिशोचसि दुःखितः ॥ ६० ॥
‘ पिताजी! आपका तो सब ओरसे कुशल- मंगल है, भू-मण्डलके सभी नरेश आपकी आज्ञाके अधीन हैं; फिर किसलिये आप निरन्तर दुःखी होकर शोक और चिन्तामें डूबे रहते हैं ॥ ६० ॥
ध्यायन्निव च मां राजन्नाभिभाषसि किंचन ।
न चाश्वेन विनिर्यासि विवर्णो हरिणः कृशः ॥ ६१ ॥
‘ राजन्! आप इस तरह मौन बैठे रहते हैं, मानो किसीका ध्यान कर रहे हों; मुझसे कोई बातचीततक नहीं करते । घोड़ेपर सवार हो कहीं बाहर भी नहीं निकलते । आपकी कान्ति
मलिन होती जा रही है । आप पीले और दुबले हो गये हैं ॥ ६१ ॥
व्याधिमिच्छामि ते ज्ञातुं प्रतिकुर्यां हि तत्र वै ।
एवमुक्तः स पुत्रेण शान्तनुः प्रत्यभाषत ॥ ६२ ॥
‘ आपको कौन- सा रोग लग गया है, यह मैं जानना चाहता हूँ, जिससे मैं उसका प्रतीकार कर सकूँ । ' पुत्रके ऐसा कहनेपर शान्तनुने उत्तर दिया- ॥ ६२ ॥
असंशयं ध्यानपरो यथा वत्स तथा शृणु ।
अपत्यं नस्त्वमेवैकः कुले महति भारत ॥ ६३ ॥
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‘ बेटा! इसमें संदेह नहीं कि मैं चिन्तामें डूबा रहता हूँ । वह चिन्ता कैसी है, सो बताता हूँ, सुनो । भारत! तुम इस विशाल वंशमें मेरे एक ही पुत्र हो ॥ ६३ ॥
शस्त्रनित्यश्च सततं पौरुषे पर्यवस्थितः ।
अनित्यतां च लोकानामनुशोचामि पुत्रक ॥ ६४ ॥
' तुम भी सदा अस्त्र - शस्त्रोंके अभ्यासमें लगे रहते हो और पुरुषार्थके लिये सदैव उद्यत रहते हो । बेटा! मैं इस जगत्की अनित्यताको लेकर निरन्तर शोकग्रस्त एवं चिन्तित रहता हूँ ॥ ६४ ॥
कथंचित् तव गाङ्गेय विपत्तौ नास्ति नः कुलम् ।
असंशयं त्वमेवैकः शतादपि वरः सुतः ॥ ६५ ॥
‘ गंगानन्दन! यदि किसी प्रकार तुमपर कोई विपत्ति आयी, तो उसी दिन हमारा यह वंश समाप्त हो जायगा । इसमें संदेह नहीं कि तुम अकेले ही मेरे लिये सौ पुत्रोंसे भी बढ़कर हो ॥ ६५ ॥
न चाप्यहं वृथा भूयो दारान् कर्तुमिहोत्सहे ।
संतानस्याविनाशाय कामये भद्रमस्तु ते ॥ ६६ ॥
‘ मैं पुनः व्यर्थ विवाह नहीं करना चाहता; किंतु हमारी वंशपरम्पराका लोप न हो,
इसीके लिये मुझे पुनः पत्नीकी कामना हुई है । तुम्हारा कल्याण हो ॥ ६६ ॥
अनपत्यतैकपुत्रत्वमित्याहुर्धर्मवादिनः । ( चक्षुरेकं च पुत्रश्च अस्ति नास्ति च भारत । चक्षुर्नाशे तनोर्नाशः पुत्रनाशे कुलक्षयः ॥ ) अग्निहोत्रं त्रयीविद्यासंतानमपि चाक्षयम् ॥ ६७ ॥
सर्वाण्येतान्यपत्यस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् । ' धर्मवादी विद्वान् कहते हैं कि एक पुत्रका होना संतानहीनताके ही तुल्य है । भारत! एक आँख अथवा एक पुत्र यदि है, तो वह भी नहींके बराबर है । नेत्रका नाश होनेपर मानो शरीरका ही नाश हो जाता है, इसी प्रकार पुत्रके नष्ट होनेपर कुलपरम्परा ही नष्ट हो जाती है । अग्निहोत्र, तीनों वेद तथा शिष्य- प्रशिष्यके क्रमसे चलनेवाले विद्याजनित वंशकी अक्षय परम्परा — ये सब मिलकर भी जन्मसे होनेवाली संतानकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं है ॥ ६७ ॥
एवमेतन्मनुष्येषु तच्च सर्वप्रजास्विति ॥ ६८ ॥
‘ इस प्रकार संतानका महत्त्व जैसा मनुष्योंमें मान्य है, उसी प्रकार अन्य सब प्राणियोंमें भी है ॥ ६८ ॥
यदपत्यं महाप्राज्ञ तत्र मे नास्ति संशयः ।
एषा त्रयीपुराणानां देवतानां च शाश्वती ॥ ६ ९ ॥
( अपत्यं कर्म विद्या च त्रीणि ज्योतींषि भारत ।
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यदिदं कारणं तात सर्वमाख्यातमञ्जसा ॥ ) ‘ भारत! महाप्राज्ञ! इस बातमें मुझे तनिक भी संदेह नहीं है कि संतान, कर्म और विद्या —ये तीन ज्योतियाँ हैं; इनमें भी जो संतान है, उसका महत्त्व सबसे अधिक है । यही वेदत्रयी पुराण तथा देवताओंका भी सनातन मत है । तात! मेरी चिन्ताका जो कारण है, वह सब तुम्हें स्पष्ट बता दिया ॥ ६ ९ ॥
त्वं च शूरः सदामर्षी शस्त्रनित्यश्च भारत ।
नान्यत्र युद्धात् तस्मात् ते निधनं विद्यते क्वचित् ॥ ७० ॥
‘ भारत! तुम शूरवीर हो। तुम कभी किसीकी बात सहन नहीं कर सकते और सदा अस्त्र- शस्त्रोंके अभ्यासमें ही लगे रहते हो; अतः युद्धके सिवा और किसी कारणसे कभी तुम्हारी मृत्यु होनेकी सम्भावना नहीं है ॥ ७० ॥
सोऽस्मि संशयमापन्नस्त्वयि शान्ते कथं भवेत् ।
इति ते कारणं तात दुःखस्योक्तमशेषतः ॥ ७१ ॥
‘ इसीलिये मैं इस संदेहमें पड़ा हूँ कि तुम्हारे शान्त हो जानेपर इस वंशपरम्पराका निर्वाह कैसे होगा? तात! यही मेरे दुःखका कारण है; वह सब का सब तुम्हें बता दिया' ॥ ७१ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततस्तत्कारणं राज्ञो ज्ञात्वा सर्वमशेषतः ।
देवव्रतो महाबुद्धिः प्रज्ञया चान्वचिन्तयत् ॥ ७२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! राजाके दुःखका वह सारा कारण जानकर परम बुद्धिमान् देवव्रतने अपनी बुद्धिसे भी उसपर विचार किया ॥ ७२ ॥
अभ्यगच्छत् तदैवाशु वृद्धामात्यं पितुर्हितम् ।
तमपृच्छत् तदाभ्येत्य पितुस्तच्छोककारणम् ॥ ७३ ॥
तदनन्तर वे उसी समय तुरंत अपने पिताके हितैषी बूढ़े मन्त्रीके पास गये और पिताके शोकका वास्तविक कारण क्या है, इसके विषयमें उनसे पूछताछ की ॥ ७३ ॥
तस्मै स कुरुमुख्याय यथावत् परिपृच्छते ।
वरं शशंस कन्यां तामुद्दिश्य भरतर्षभ ॥ ७४ ॥
भरतश्रेष्ठ! कुरुवंशके श्रेष्ठ पुरुष देवव्रतके भलीभाँति पूछनेपर वृद्ध मन्त्रीने बताया कि महाराज एक कन्यासे विवाह करना चाहते हैं ॥ ७४ ॥
( सूतं भूयोऽपि संतप्त आह्वयामास वै पितुः ॥
सूतस्तु कुरुमुख्यस्य उपयातस्तदाज्ञया ।
तमुवाच महाप्राज्ञो भीष्मो वै सारथिं पितुः ॥
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उसके बाद भी दुःखसे दुःखी देवव्रतने पिताके सारथिको बुलाया । राजकुमारकी आज्ञा पाकर कुरुराज शान्तनुका सारथि उनके पास आया । तब महाप्राज्ञ भीष्मने पिताके सारथिसे पूछा । भीष्म उवाच
त्वं सारथे पितुर्मह्यं सखासि रथयुग् यतः ।
अपि जानासि यदि वै कस्यां भावो नृपस्य तु ॥
यथा वक्ष्यसि मे पृष्टः करिष्ये न तदन्यथा । भीष्म बोले- सारथे! तुम मेरे पिताके सखा हो, क्योंकि उनका रथ जोतनेवाले हो । क्या तुम जानते हो कि महाराजका अनुराग किस स्त्रीमें है? मेरे पूछनेपर तुम जैसा कहोगे, वैसा ही करूँगा, उसके विपरीत नहीं करूँगा । सूतउवाच
दाशकन्या नरश्रेष्ठ तत्र भावः पितुर्गतः ।
वृतः स नरदेवेन तदा वचनमब्रवीत् ॥
योऽस्यां पुमान् भवेद् गर्भः स राजा त्वदनन्तरम् ।
नाकामयत तं दातुं पिता तव वरं तदा ॥
स चापि निश्चयस्तस्य न च दद्यामतोऽन्यथा । एवं ते कथितं वीर कुरुष्व यदनन्तरम् ॥ ) सूत बोला- नरश्रेष्ठ! एक धीवरकी कन्या है, उसीके प्रति आपके पिताका अनुराग हो गया है । महाराजने धीवरसे उस कन्याको माँगा भी था, परंतु उस समय उसने यह शर्त रखी कि ' इसके गर्भसे जो पुत्र हो, वही आपके बाद राजा होना चाहिये । ' आपके पिताजीके मनमें धीवरको ऐसा वर देनेकी इच्छा नहीं हुई। इधर उसका भी पक्का निश्चय है कि यह शर्त स्वीकार किये बिना मैं अपनी कन्या नहीं दूँगा । वीर! यही वृत्तान्त है, जो मैंने आपसे निवेदन कर दिया । इसके बाद आप जैसा उचित समझें, वैसा करें ।
ततो देवव्रतो वृद्धैः क्षत्रियैः सहितस्तदा ।
अभिगम्य दाशराजं कन्यां वव्रे पितुः स्वयम् ॥ ७५ ॥
यह सुनकर कुमार देवव्रतने उस समय बूढ़े क्षत्रियोंके साथ निषादराजके पास जाकर स्वयं अपने पिताके लिये उसकी कन्या माँगी ॥ ७५ ॥
तं दाशः प्रतिजग्राह विधिवत् प्रतिपूज्य च ।
अब्रवीच्चैनमासीनं राजसंसदि भारत ॥ ७६ ॥
भारत! उस समय निषादने उनका बड़ा सत्कार किया और विधिपूर्वक पूजा करके आसनपर बैठनेके पश्चात् साथ आये हुए क्षत्रियोंकी मण्डलीमें दाशराजने उनसे कहा ॥ ७६ ॥
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दाशउवाच ( राज्यशुल्का प्रदातव्या कन्येयं याचतां वर । अपत्यं यद् भवेत् तस्याः स राजास्तु पितुः परम् ॥ ) दाशराज बोला — याचकोंमें श्रेष्ठ राजकुमार! इस कन्याको देनेमें मैंने राज्यको ही शुल्क रखा है । इसके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न हो, वही पिताके बाद राजा हो ।
त्वमेव नाथः पर्याप्तः शान्तनोर्भरतर्षभ ।
पुत्रः शस्त्रभृतां श्रेष्ठः किं तु वक्ष्यामि ते वचः ॥ ७७ ॥
भरतर्षभ! राजा शान्तनुके पुत्र अकेले आप ही सबकी रक्षाके लिये पर्याप्त हैं । शस्त्रधारियोंमें आप सबसे श्रेष्ठ समझे जाते हैं; परंतु तो भी मैं अपनी बात आपके सामने रखूँगा ॥ ७७ ॥
को हि सम्बन्धकं श्लाघ्यमीप्सितं यौनमीदृशम् ।
अतिक्रामन्न तप्येत साक्षादपि शतक्रतुः ॥ ७८ ॥
ऐसे मनोऽनुकूल और स्पृहणीय उत्तम विवाह - सम्बन्धको ठुकराकर कौन ऐसा मनुष्य होगा जिसके मनमें संताप न हो? भले ही वह साक्षात् इन्द्र ही क्यों न हो ॥ ७८ ॥
अपत्यं चैतदार्यस्य यो युष्माकं समो गुणैः ।
यस्य शुक्रात् सत्यवती सम्भूता वरवर्णिनी ॥ ७९ ॥
यह कन्या एक आर्य पुरुषकी संतान है, जो गुणोंमें आपलोगोंके ही समान हैं और जिनके वीर्यसे इस सुन्दरी सत्यवतीका जन्म हुआ है ॥ ७ ९ ॥
तेन मे बहुशस्तात पिता ते परिकीर्तितः ।
अर्हः सत्यवतीं बोढुं धर्मज्ञः स नराधिपः ॥ ८० ॥
तात! उन्होंने अनेक बार मुझसे आपके पिताके विषयमें चर्चा की थी । वे कहते थे, सत्यवतीको ब्याहनेयोग्य तो केवल धर्मज्ञ राजा शान्तनु ही हैं ॥ ८० ॥
अर्थितश्चापि राजर्षिः प्रत्याख्यातः पुरा मया ।
स चाप्यासीत् सत्यवत्या भृशमर्थी महायशाः ॥ ८१ ॥
कन्यापितृत्वात् किंचित् तु वक्ष्यामि त्वां नराधिप ।
बलवत्सपत्नतामत्र दोषं पश्यामि केवलम् ॥ ८२ ॥
महान् कीर्तिवाले राजर्षि शान्तनु सत्यवतीको पहले भी बहुत आग्रहपूर्वक माँग चुके हैं; किंतु उनके माँगनेपर भी मैंने उनकी बात अस्वीकार कर दी थी । युवराज! मैं कन्याका पिता होनेके कारण कुछ आपसे भी कहूँगा ही । आपके यहाँ जो सम्बन्ध हो रहा है, उसमें मुझे केवल एक दोष दिखायी देता है, बलवान् के साथ शत्रुता ॥ ८१-८२ ॥
यस्य हि त्वं सपत्नः स्या गन्धर्वस्यासुरस्य वा ।
न स जातु चिरं जीवेत् त्वयि क्रुद्धे परंतप ॥ ८३ ॥
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परंतप! आप जिसके शत्रु होंगे, वह गन्धर्व हो या असुर, आपके कुपित होनेपर कभी चिरजीवी नहीं हो सकता ॥ ८३ ॥
एतावानत्र दोषो हि नान्यः कश्चन् पार्थिव ।
एतज्जानीहि भद्रं ते दानादाने परंतप ॥ ८४ ॥
पृथ्वीनाथ! बस, इस विवाहमें इतना ही दोष है, दूसरा कोई नहीं । परंतप! आपका कल्याण हो, कन्याको देने या न देनेमें केवल यही दोष विचारणीय है; इस बातको आप अच्छी तरह समझ लें ॥ ८४ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु गाङ्गेयस्तद्युक्तं प्रत्यभाषत ।
शृण्वतां भूमिपालानां पितुरर्थाय भारत ॥ ८५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! निषादके ऐसा कहनेपर गंगानन्दन देवव्रतने पिताके मनोरथको पूर्ण करनेके लिये सब राजाओंके सुनते- सुनते यह उचित उत्तर दिया — ॥ ८५ ॥
इदं मे व्रतमादत्स्व सत्यं सत्यवतां वर ।
नैव जातो न वाजात ईदृशं वक्तुमुत्सहेत् ॥ ८६ ॥
‘ सत्यवानोंमें श्रेष्ठ निषादराज! मेरी यह सच्ची प्रतिज्ञा सुनो और ग्रहण करो । ऐसी बात कह सकनेवाला कोई मनुष्य न अबतक पैदा हुआ है और न आगे पैदा होगा ॥ ८६ ॥
एवमेतत् करिष्यामि यथा त्वमनुभाषसे ।
योऽस्यां जनिष्यते पुत्रः स नो राजा भविष्यति ॥ ८७ ॥
‘ लो, तुम जो कुछ चाहते या कहते हो, वैसा ही करूँगा । इस सत्यवतीके गर्भसे जो पुत्र पैदा होगा, वही हमारा राजा बनेगा ' ॥ ८७ ॥