शान्तनूपाख्यान : धर्म की मर्यादा और वासना के बीच सन्तुलन कैसे स्थापित करें?
धर्मनिष्ठता और आत्म-संयम
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड १ · आदिपर्व → सम्भवपर्व · अध्याय 97 · पृष्ठ 717–723
991 शब्द · 5 मिनटका पाठ · 9 श्लोक
वैशम्पायन ने जनमेजय से कहा
राजा जनमेजय के प्रश्न का उत्तर देने हेतु।
वैशम्पायनजी कहते हैं— हे जनमेजय! तदनन्तर इस पृथ्वी पर राजा प्रतीप राज्य करने लगे। वे सदा सम्पूर्ण प्राणियों के हित में संलग्न रहते थे। एक समय महाराज प्रतीप गङ्गाद्वार में गये और बहुत वर्षों तक जप करते हुए एक आसन पर बैठे रहे।
ततः प्रतीपो राजाऽऽसीत् सर्वभूतहितः सदा ।
निषसाद समा बह्वीर्गङ्गाद्वारगतो जपन् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - तदनन्तर इस पृथ्वीपर राजा प्रतीप राज्य करने लगे । वे सदा सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें संलग्न रहते थे । एक समय महाराज प्रतीप गंगाद्वार ( हरिद्वार ) -में गये और बहुत वर्षोंतक जप करते हुए एक आसनपर बैठे रहे ।
उस समय मनस्विनी गङ्गा, सुन्दर रूप और उत्तम गुणों से युक्त युवती स्त्री का रूप धारण करके जल से निकलीं और राजर्षि प्रतीप के शाल-जैसे विशाल दाहिने ऊरु (जाँघ) पर आकर बैठ गईं। उस समय उनकी आकृति बड़ी लुभावनी थी; रूप देवाङ्गनाओं के समान था और मुख अत्यन्त मनोहर था। अपनी जाँघ पर बैठी हुई उस यशस्विनी नारी से राजा प्रतीप ने पूछा— 'कल्याणि! मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? तुम्हारी क्या इच्छा है?'
स्त्री बोली— 'राजन्! मैं आपको ही चाहती हूँ। आपके प्रति मेरा अनुराग है, अतः आप मुझे स्वीकार करें; क्योंकि काम के अधीन होकर अपने पास आयी हुई स्त्रियों का परित्याग साधु पुरुषों ने निन्दित माना है।'
प्रतीप ने कहा— 'सुन्दरी! मैं कामवश परायी स्त्री के साथ समागम नहीं कर सकता। जो अपने वर्ण की न हो, उससे भी मैं सम्बन्ध नहीं रख सकता। कल्याणि! यह मेरा धर्मानुकूल व्रत है।'
त्वया निवृत्तमेतत् तु यन्मां चोदयसि प्रियम् ।
अन्यथा प्रतिपन्नं मां नाशयेद् धर्मविप्लवः ॥
प्रतीपने कहा – सुन्दरी! तुम जिस प्रिय मनोरथकी पूर्तिके लिये मुझे प्रेरित कर रही हो, उसका निराकरण भी तुम्हारे द्वारा ही हो गया । यदि मैं धर्मके विपरीत तुम्हारा यह प्रस्ताव स्वीकार कर लूँ तो धर्मका यह विनाश मेरा भी नाश कर डालेगा ।
स्त्री ने पुनः आग्रह किया— 'राजन्! मैं अशुभ या अमङ्गल करनेवाली नहीं हूँ, समागम के अयोग्य भी नहीं हूँ और ऐसी भी नहीं हूँ कि कभी कोई मुझपर कलङ्क लगावे। मैं आपके प्रति अनुरक्त होकर आयी हुई दिव्य कन्या एवं सुन्दरी स्त्री हूँ। अतः आप मुझे स्वीकार करें।'
प्रतीप ने गम्भीर स्वर में कहा— 'सुन्दरी! तुम जिस प्रिय मनोरथ की पूर्तिके लिये मुझे प्रेरित कर रही हो, उसका निराकरण भी तुम्हारे द्वारा ही हो गया। यदि मैं धर्म के विपरीत तुम्हारा यह प्रस्ताव स्वीकार कर लूँ तो धर्म का यह विनाश मेरा भी नाश कर डालेगा। वराङ्गने! तुम मेरी दाहिनी जाँघ पर आकर बैठी हो। भीरु! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि यह पुत्र, पुत्री तथा पुत्रवधू का आसन है। पुरुष की बायीं जाँघ ही कामिनी के उपभोग के योग्य है; किन्तु तुमने उसका त्याग कर दिया है। अतः वराङ्गने! मैं तुम्हारे प्रति कामयुक्त आचरण नहीं करूँगा। सुश्रोणि! तुम मेरी पुत्रवधू हो जाओ। मैं अपने पुत्र के लिये तुम्हारा वरण करता हूँ; क्योंकि वामोरु! तुमने यहाँ आकर मेरी उसी जाँघ का आश्रय लिया है, जो पुत्रवधू के पक्ष की है।'
स्नुषा मे भव सुश्रोणि पुत्रार्थं त्वां वृणोम्यहम् ।
स्नुषापक्षं हि वामोरु त्वमागम्य समाश्रिता ॥
सुश्रोणि! तुम मेरी पुत्रवधू हो जाओ । मैं अपने पुत्रके लिये तुम्हारा वरण करता हूँ; क्योंकि वामोरु! तुमने यहाँ आकर मेरी उसी जाँघका आश्रय लिया है, जो पुत्रवधूके पक्षकी है ।
स्त्री बोली— 'धर्मज्ञ नरेश! आप जैसा कहते हैं, वैसा भी हो सकता है। मैं आपके पुत्र के साथ संयुक्त होऊँगी। आपके प्रति जो मेरी भक्ति है, उसके कारण मैं विख्यात भरतवंश का सेवन करूँगी। पृथ्वी पर जितने राजा हैं, उन सबके आपलोग उत्तम आश्रय हैं। सौ वर्षों में भी आपलोगों के गुणों का वर्णन मैं नहीं कर सकती। आपके कुल में जो विख्यात राजा हो गये हैं, उनकी साधुता सर्वोपरि है। धर्मज्ञ! मैं एक शर्त के साथ आपके पुत्र से विवाह करूँगी। प्रभो! मैं जो कुछ भी आचरण करूँ, वह सब आपके पुत्र को स्वीकार होना चाहिये। वे उसके विषय में कभी कुछ विचार न करें। इस शर्त पर रहती हुई मैं आपके पुत्र के प्रति अपना प्रेम बढ़ाऊँगी। मुझसे जो पुण्यात्मा एवं प्रिय पुत्र उत्पन्न होंगे, उनके द्वारा आपके पुत्र को स्वर्गलोक की प्राप्ति होगी।'
कुलस्य ये वः प्रथितास्तत्साधुत्वमथोत्तमम् ।
समयेनेह धर्मज्ञ आचरेयं च यद् विभो ॥
तत् सर्वमेव पुत्रस्ते न मीमांसेत कर्हिचित् ।
एवं वसन्ती पुत्रे ते वर्धयिष्याम्यहं रतिम् ॥
पुत्रैः पुण्यैः प्रियैश्चैव स्वर्गं प्राप्स्यति ते सुतः । आपके कुलमें जो विख्यात राजा हो गये हैं, उनकी साधुता सर्वोपरि है। धर्मज्ञ! मैं एक शर्तके साथ आपके पुत्रसे विवाह करूँगी । प्रभो! मैं जो कुछ भी आचरण करूँ, वह सब आपके पुत्रको स्वीकार होना चाहिये । वे उसके विषयमें कभी कुछ विचार न करें । इस शर्तपर रहती हुई मैं आपके पुत्रके प्रति अपना प्रेम बढ़ाऊँगी । मुझसे जो पुण्यात्मा एवं प्रिय पुत्र उत्पन्न होंगे, उनके द्वारा आपके पुत्रको स्वर्गलोककी प्राप्ति होगी ।
राजा प्रतीप ने 'तथास्तु' कहकर उसकी शर्त स्वीकार कर ली और तत्पश्चात् वह वहीं अन्तर्धान हो गयी। तपस्या करते हुए राजा प्रतीप ने पुत्र के जन्म की प्रतीक्षा की। इन्हीं दिनों क्षत्रियों में श्रेष्ठ प्रतीप अपनी पत्नी को साथ लेकर पुत्र के लिये तपस्या करने लगे।
प्रतीप की पत्नी की कुक्षि में एक तेजस्वी गर्भ का आविर्भाव हुआ, जो शरद्-ऋतु के शुक्ल पक्ष में परम कान्तिमान चन्द्रमा की भाँति प्रतिदिन बढ़ने लगा। तदनन्तर दसवाँ मास प्राप्त होने पर प्रतीप की महारानी ने एक देवोपम पुत्र को जन्म दिया, जो सूर्य के समान प्रकाशमान था। उन बूढ़े राजदम्पतिके यहाँ महाभिष नामक पुत्र उत्पन्न हुए।
बड़े होने पर राजकुमार शान्तनु लोकरक्षा का कार्य करने लगे। वे धर्मज्ञों में श्रेष्ठ थे। उन्होंने धनुर्वेद में उत्तम योग्यता प्राप्त करके वेदाध्ययनों में भी ऊँची स्थिति प्राप्त की। धीरे-धीरे युवावस्था में पहुँचते हुए, अपने सत्कर्मों द्वारा उपार्जित अक्षय पुण्यलोकों का स्मरण करके कुरुश्रेष्ठ शान्तनु सदा पुण्यकर्मों के अनुष्ठान में ही लगे रहते थे।
युवावस्थ में पहुँचे हुए राजकुमार शान्तनु को राजा प्रतीप ने आदेश दिया— 'शान्तनो! पूर्वकाल में मेरे समीप एक दिव्य नारी आयी थी। उसका आगमन तुम्हारे कल्याण के लिये ही हुआ था। बेटा! यदि वह सुन्दरी कभी एकान्त में तुम्हारे पास आवे, तुम्हारे प्रति कामभाव से युक्त हो और तुमसे पुत्र पाने की इच्छा रखती हो, तो तुम उत्तम रूप से सुशोभित उस दिव्य नारी से— अङ्गने! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो?— इत्यादि प्रश्न न करना। अनघ! वह जो कार्य करे, उसके विषय में भी तुम्हें कुछ पूछताछ नहीं करनी चाहिये। यदि वह तुम्हें चाहे, तो मेरी आज्ञा से उसे अपनी पत्नी बना लेना।'
यच्च कुर्यान्न तत् कर्म सा प्रष्टव्या त्वयानघ ।
मन्नियोगाद् भजन्तीं तां भजेथा इत्युवाच तम् ॥
‘ अनघ! वह जो कार्य करे, उसके विषयमें भी तुम्हें कुछ पूछताछ नहीं करनी चाहिये । यदि वह तुम्हें चाहे, तो मेरी आज्ञासे उसे अपनी पत्नी बना लेना । ' ये बातें राजा प्रतीपने अपने पुत्रसे कहीं ।
अपने पुत्र शान्तनु को ऐसा आदेश देकर राजा प्रतीप ने उसी समय उन्हें अपने राज्य पर अभिषिक्त कर दिया और स्वयं वन में प्रवेश किया।
एवं संदिश्य तनयं प्रतीपः शान्तनुं तदा ।
स्वे च राज्येऽभिषिच्यैनं वनं राजा विवेश ह ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - अपने पुत्र शान्तनुको ऐसा आदेश देकर राजा प्रतीपने उसी समय उन्हें अपने राज्यपर अभिषिक्त कर दिया और स्वयं वनमें प्रवेश किया ।
राजाओं में श्रेष्ठ शान्तनु हिंसक पशुओं और जङ्गली भैंसों को मारते हुए, सिद्ध एवं चारणों से सेवित गङ्गाजी के तट पर अकेले ही विचरण करते थे। एक दिन उन्होंने एक परम सुन्दरी नारी देखी, जो अपने तेजस्वी शरीर से ऐसी प्रकाशित हो रही थी, मानो साक्षात् लक्ष्मी ही दूसरा शरीर धारण करके आ गयी हो। उसके सारे अङ्ग परम सुन्दर और निर्दोष थे। दाँत तो और भी सुन्दर थे। वह दिव्य आभूषणों से विभूषित थी। उसके शरीर पर महीन साड़ी शोभा पा रही थी और कमल के भीतरी भाग के समान उसकी कान्ति थी। वह अकेली थी।
स कदाचिन्महाराज ददर्श परमां स्त्रियम् ।
जाज्वल्यमानां वपुषा साक्षाच्छ्रियमिवापराम् ॥
महाराज जनमेजय! एक दिन उन्होंने एक परम सुन्दरी नारी देखी, जो अपने तेजस्वी शरीरसे ऐसी प्रकाशित हो रही थी, मानो साक्षात् लक्ष्मी ही दूसरा शरीर धारण करके आ गयी हो ।
उसे देखते ही राजा शान्तनु के शरीर में रोमाञ्च हो आया; वे उसकी रूप-सम्पत्ति से आश्चर्यचकित हो उठे और दोनों नेत्रों द्वारा उसकी सौन्दर्य-सुधा का पान करते हुए तृप्त नहीं होते थे। वह भी वहाँ विचरते हुए महातेजस्वी राजा शान्तनु को देखते ही मुग्ध हो गयी। स्नेहवश उसके हृदय में सौहार्द का उदय हो आया। वह विलासिनी राजा को देखते-देखते तृप्त नहीं होती थी।
तां दृष्ट्वा हृष्टरोमाभूद् विस्मितो रूपसम्पदा ।
पिबन्निव च नेत्राभ्यां नातृप्यत नराधिपः ॥
उसे देखते ही राजा शान्तनुके शरीरमें रोमांच हो आया, वे उसकी रूप - सम्पत्तिसे आश्चर्यचकित हो उठे और दोनों नेत्रोंद्वारा उसकी सौन्दर्य-सुधाका पान करते हुए - से तृप्त नहीं होते थे ।
तब राजा शान्तनु उसे सान्त्वना देते हुए मधुर वाणी में बोले— 'सुमध्यमे! तुम देवी, दानवी, गन्धर्वी, अप्सरा, यक्षी, नागकन्या अथवा मानवी, कुछ भी क्यों न होओ; देवकन्या के समान सुशोभित होने वाली सुन्दरी! मैं तुमसे याचना करता हूँ कि मेरी पत्नी हो जाओ।'
तामुवाच ततो राजा सान्त्वयञ्शलक्ष्णया गिरा ।
देवी वा दानवी वा त्वं गन्धर्वी चाथ वाप्सराः ॥
यक्षी वा पन्नगी वापि मानुषी वा सुमध्यमे ।
याचे त्वां सुरगर्भाभे भार्या मे भव शोभने ॥
तब राजा शान्तनु उसे सान्त्वना देते हुए मधुर वाणीमें बोले – ' सुमध्यमे! तुम देवी, दानवी, गन्धर्वी, अप्सरा, यक्षी, नागकन्या अथवा मानवी, कुछ भी क्यों न होओ; देवकन्याके समान सुशोभित होनेवाली सुन्दरी! मैं तुमसे याचना करता हूँ कि मेरी पत्नी हो जाओ'
In English
The Story of King Pratipa and Shantanu
While performing penance, King Pratipa meets a divine woman who takes the form of a beautiful lady and agrees to marry his son. Years later, Pratipa's son Shantanu encounters a radiant woman by the river Ganges and asks her to be his wife.
This page answers
- Why did the woman sit on pratipa's thigh?
- How was shantanu born?
- What instruction did pratipa give to shantanu?
- Who did shantanu meet by the river?
Also written: Shantanupakhyana, Shantana, Ganga, शान्तनूपाख्यान