तपत्युपाख्यान : अर्जुन को 'तापत्य' क्यों कहा गया और इसका वास्तविक अर्थ क्या है?
वंश और कुल का गौरव
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड १ · आदिपर्व → चैत्ररथपर्व · अध्याय 170–172 · पृष्ठ 1211–1232
2,605 शब्द · 14 मिनटका पाठ · 23 श्लोक
गन्धर्व ने अर्जुन से कहा
अर्जुन के प्रश्न पर गन्धर्व द्वारा तपोनिष्ठ कथा सुनाना
अर्जुन ने गन्धर्व से पूछा— "गन्धर्व! तुमने 'तापत्य' कहकर जो बात यहाँ मुझसे कही है, उसके सम्बन्ध में मैं यह जानना चाहता हूँ कि तापत्य का निश्चित अर्थ क्या है? साधुस्वभाव गन्धर्वराज! यह तपती कौन है, जिसके कारण हमलोग तापत्य कहलाते हैं? हम तो अपने को कुन्ती का पुत्र समझते हैं। अतः 'तापत्य' का यथार्थ रहस्य क्या है, यह जानने की मुझे बड़ी इच्छा हो रही है।"
तापत्य इति यद् वाक्यमुक्तवानसि मामिह ।
तदहं ज्ञातुमिच्छामि तापत्यार्थं विनिश्चितम् ॥
अर्जुनने कहा — गन्धर्व! तुमने ' तपतीनन्दन ' कहकर जो बात यहाँ मुझसे कही है, उसके सम्बन्धमें मैं यह जानना चाहता हूँ कि तापत्यका निश्चित अर्थ क्या है?
वैशम्पायनजी कहते हैं कि जनमेजय के यों कहने पर गन्धर्व ने कुन्तीनन्दन धनञ्जय को वह कथा सुनानी प्रारम्भ की, जो तीनों लोकों में विख्यात है। गन्धर्व बोला— "समस्त बुद्धिमानों में श्रेष्ठ कुन्तीकुमार! इस विषय में एक बहुत मनोरम कथा है, जिसे मैं यथार्थ एवं पूर्णरूप से आपको सुनाऊँगा। मैंने जिस कारण अपने वक्तव्य में तुम्हें 'तापत्य' कहा है, वह बता रहा हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो।"
एवमुक्तः स गन्धर्वः कुन्तीपुत्रं धनंजयम् ।
विश्रुतां त्रिषु लोकेषु श्रावयामास वै कथाम् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उनके यों कहनेपर गन्धर्वने कुन्तीनन्दन धनंजयको वह कथा सुनानी प्रारम्भ की, जो तीनों लोकोंमें विख्यात है ।
"ये जो आकाश में उदित हो अपने तेजोमण्डल के द्वारा यहाँ से स्वर्गलोक तक व्याप्त हो रहे हैं, इन्हीं भगवान् सूर्यदेव की तपती नाम की एक पुत्री हुई, जो पिता के अनुरूप ही थी। प्रभो! वह सावित्री देवी की छोटी बहन थी। वह तपस्या में संलग्न रहने के कारण तीनों लोकों में तपती नाम से विख्यात हुई। उस समय देवता, असुर, यक्ष एवं राक्षस जातिकी स्त्री, कोई अप्सरा तथा गन्धर्वपत्नी भी उसके समान रूपवती न थी। उसके शरीर का एक-एक अवयव बहुत सुन्दर, सुविभक्त और निर्दोष था। उसकी आँखें बड़ी-बड़ी और कजरारी थीं। वह सुन्दरी सदाचार, साधु-स्वभाव और मनोहर वेश से सुशोभित थी। भगवान् सूर्य ने तीनों लोकों में किसी भी पुरुष को ऐसा नहीं पाया, जो रूप, शील, गुण और शास्त्रज्ञान की दृष्टि से उसका पति होने योग्य हो।"
तपती नाम का चैषा तापत्या यत्कृते वयम् ।
कौन्तेया हि वयं साधो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ॥
साधुस्वभाव गन्धर्वराज! यह तपती कौन है, जिसके कारण हमलोग तापत्य कहलाते हैं? हम तो अपनेको कुन्तीका पुत्र समझते हैं । अतः ' तापत्य ' का यथार्थ रहस्य क्या है, यह जाननेकी मुझे बड़ी इच्छा हो रही है ।
"वह युवावस्था को प्राप्त हो गयी। अब उसका किसी के साथ विवाह कर देना आवश्यक था। उसे उस अवस्थामें देखकर भगवान् सूर्य इस चिन्ता में पड़े कि इसका विवाह किसके साथ किया जाय? कुन्तीनन्दन! उन्हीं दिनों महाराज ऋक्ष के पुत्र राजा संवरण कुरुकुल के श्रेष्ठ एवं बलवान् पुरुष थे। उन्होंने भगवान् सूर्य की आराधना प्रारम्भ की। वे मन और इन्द्रियों को संयम में रखकर पवित्र हो अर्घ्य, पुष्प, गन्ध एवं नैवेद्य आदि सामग्रियों से तथा भाँति-भाँति के नियम, व्रत एवं तपस्याओं द्वारा बड़े भक्तिभाव से उदय होते हुए सूर्य की पूजा करते थे। उनके हृदय में सेवा का भाव था। वे शुद्ध तथा अहङ्कारशून्य थे। रूप में इस पृथ्वी पर उनके समान दूसरा कोई पुरुष नहीं था। वे कृतज्ञ और धर्मज्ञ थे। अतः सूर्यदेव ने राजा संवरण को ही तपती के योग्य पति माना। उन्होंने नृपश्रेष्ठ संवरण को, जिनका उत्तम कुल सम्पूर्ण विश्व में विख्यात था, अपनी कन्या देने की इच्छा की। जैसे आकाश में उद्दीप्त किरणों वाले सूर्यदेव अपने तेज से प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार पृथ्वी पर राजा संवरण अपनी दिव्य कान्ति से प्रकाशित थे। वे अपनी कमनीय कान्ति से चन्द्रमा को और तेज से सूर्यदेव को भी तिरस्कृत करते थे। कुन्तिपुत्र! ऐसे उत्तम गुणों से विभूषित तथा श्रेष्ठ आचार-व्यवहार से युक्त राजा संवरण को भगवान् सूर्य ने स्वयं ही अपनी पुत्री तपती को देने का निश्चय कर लिया।"
ततः कृतज्ञं धर्मज्ञं रूपेणासदृशं भुवि ।
तपत्याः सदृशं मेने सूर्यः संवरणं पतिम् ॥
रूपमें इस पृथ्वीपर उनके समान दूसरा कोई पुरुष नहीं था । वे कृतज्ञ और धर्मज्ञ थे । अतः सूर्यदेवने राजा संवरणको ही तपतीके योग्य पति माना ।
"एक दिन अमितपराक्रमी श्रीमान् राजा संवरण पर्वत के समीपवर्ती उपवन में हिंसक पशुओं का शिकार कर रहे थे। शिकार खेलते समय ही राजा का अनुपम अश्व पर्वत पर भूख-प्यास से पीड़ित होकर मर गया। घोड़े की मृत्यु हो जाने से राजा संवरण पैदल ही उस पर्वत-शिखर पर विचरने लगे। घूमते-घूमते उन्होंने एक विशाल लोचना कन्या देखी, जिसकी समता करने वाली स्त्री कहीं नहीं थी। शत्रुओं की सेना का संहार करने वाले नृपश्रेष्ठ संवरण अकेले थे और वह कन्या भी अकेली ही थी। उसके पास पहुँचकर राजा एकटक नेत्रों से उसकी ओर देखते हुए खड़े रह गये। पहले तो उसका रूप देखकर नरेश ने अनुमान किया कि हो न हो ये साक्षात् लक्ष्मी हैं; फिर उनके ध्यान में यह बात आयी कि सम्भव है, भगवान् सूर्य की प्रभा ही सूर्यमण्डल से च्युत होकर इस कन्या के रूप में आकाश से पृथ्वी पर आ गयी हो।"
स एक एकामासाद्य कन्यां परबलार्दनः ।
तस्थौ नृपतिशार्दूलः पश्यन्नविचलेक्षणः ॥
शत्रुओंकी सेनाका संहार करनेवाले नृपश्रेष्ठ संवरण अकेले थे और वह कन्या भी अकेली ही थी । उसके पास पहुँचकर राजा एकटक नेत्रोंसे उसकी ओर देखते हुए खड़े रह गये ।
"उसका शरीर और तेज से वह आग की ज्वाला-सी जान पड़ती थी। उसकी प्रसन्नता और कमनीय कान्ति से ऐसा प्रतीत होता था, मानो वह निर्मल चन्द्रकला हो। सुन्दर कजरारे नेत्रों वाली वह दिव्य कन्या जिस पर्वत-शिखर पर खड़ी थी, वहाँ वह सोने की दमकती हुई प्रतिमा-सी सुशोभित हो रही थी। उसे देखकर राजा संवरण की समस्त लोकों की सुन्दरी युवतियों में अनादर-बुद्धि हो गयी। राजा यह मानने लगे कि आज मुझे अपने नेत्रों का फल मिल गया। उस कन्या ने अपने उत्तम गुणमय पाशों से राजा के मन और नेत्रों को बाँध लिया। वे अपने स्थान से हिल-डुल तक न सके। वे सोचने लगे कि निश्चय ही ब्रह्माने देवता, असुर और मनुष्यों सहित सम्पूर्ण लोकों के सौन्दर्य-सिन्धु को मथकर इस विशाल नेत्रों वाली किशोरी के इस मनोहर रूप का आविष्कार किया होगा। कल्याणमय कुल में उत्पन्न हुए वे नरेश उस कामिनी को देखते ही काम-बाण से पीड़ित हो गये। तीव्र कामाग्नि से जलते हुए राजा संवरण ने लज्जारहित होकर उस कन्या से पूछा—"रम्भोरु! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? और किस लिये यहाँ खड़ी हो? पवित्र मुसकान वाली! तुम इस निर्जन वन में अकेली कैसे विचर रही हो? तुम्हारे सभी अङ्ग परम सुन्दर एवं निर्दोष हैं। मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि तुम न तो देवाङ्गना हो न असुरकन्या, न यक्षकुल की स्त्री हो न राक्षसवंश की। सुमुखि! जबसे मैंने चन्द्रमा से भी बढ़कर कमनीय एवं कमलदल के समान विशाल नेत्रों से युक्त तुम्हारे मुख का दर्शन किया है, तभी से मन्मथ मुझे मथ-सा रहा है।"
तया बद्धमनश्चक्षुः पाशैर्गुणमयैस्तदा ।
न चचाल ततो देशाद् बुबुधे न च किंचन ॥
उस कन्याने उस समय अपने उत्तम गुणमय पाशोंसे राजाके मन और नेत्रोंको बाँध लिया । वे अपने स्थानसे हिल- डुलतक न सके । उन्हें किसी बातकी सुध- बुध ( भी ) न रही ।
"राजा संवरण उन्मत्त की भाँति प्रलाप करते रह गये; परन्तु वह दिव्य कन्या वहीं उनके सामने ही बादलों में बिजली की भाँति अन्तर्धान हो गयी। राजा उसे ढूँढ़ने के लिये वन में सब ओर भ्रमण करने लगे। जब कहीं भी उसे देख न सके, तब वे वहाँ बहुत विलाप करते-करते मूर्च्छित होकर दो घड़ी तक निश्चेष्ट पड़े रहे। जब तपती अदृश्य हो गयी, तब काममोहित राजा संवरण स्वयं ही बेहोश होकर धरती पर गिर पड़े। जब वे इस प्रकार मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े, तब स्थूल एवं विशाल श्रोणीप्रदेश वाली तपती मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए अपने को राजा संवरण के सामने प्रकट कर दिया।"
तामन्वेष्टुं स नृपतिः परिचक्राम सर्वतः ।
वनं वनजपत्राक्षीं भ्रमन्नुन्मत्तवत् तदा ॥
तब वे नरेश कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाली उस ( दिव्य) कन्याको ढूँढ़नेके लिये वनमें सब ओर उन्मत्तकी भाँति भ्रमण करने लगे ।
"आग जल रही थी। वे कजरारे नेत्रों वाली सुन्दरी से लड़खड़ाती वाणी में बोले—"श्यामलोचने! तुम आ गयीं, अच्छा हुआ। यौवन के मद से सुशोभित होने वाली सुन्दरी! मैं काम से पीड़ित तुम्हारा सेवक हूँ। तुम मुझे स्वीकार करो, अन्यथा मेरे प्राण मुझे छोड़कर चले जायेंगे। विशालाक्षि! तुम्हारे लिये कामदेव मुझे अपने तीखे बाणों द्वारा बार-बार घायल कर रहा है। भद्रे! ऐसे समय में जब मेरा कोई रक्षक नहीं है, मुझे कामरूपी महासर्प ने डस लिया है। स्थूल एवं विशाल नितम्बों वाली वरानने! मेरे समीप आओ। किन्नरों की-सी मीठी बोली बोलने वाली! मेरे प्राण तुम्हारे ही अधीन हैं। भीरु! तुम्हारा मुख कमल और चन्द्रमा के समान सुशोभित होता है। मैं तुम्हारे बिना जीवित नहीं रह सकूँगा। कमलदल के समान सुन्दर नेत्रों वाली सुन्दरि! तुम मुझ पर दया करो। कजरारे नेत्रों वाली भामिनि! मैं तुम्हारा भक्त हूँ। तुम मेरा परित्याग न करो। तुम्हें तो प्रेमपूर्वक मेरी रक्षा करनी चाहिये। मेरा मन तुम्हारे दर्शन के साथ ही तुमसे अनुरक्त हो गया है। कल्याणि! तुम्हें देख लेने के बाद फिर दूसरी स्त्री की ओर देखने की रुचि मुझे नहीं रह गयी है। मैं सर्वथा तुम्हारे अधीन हूँ, मुझ पर प्रसन्न हो जाओ। महानुभावे! मुझ भक्त को अङ्गीकार करो। वराङ्गने! गान्धर्व विवाह द्वारा तुम मुझे प्राप्त हो जाओ। सब विवाहों में गान्धर्व विवाह ही श्रेष्ठ बतलाया जाता है।"
गान्धर्वेण विवाहेन मामुपेहि वराङ्गने ।
विवाहानां हि रम्भोरु गान्धर्वः श्रेष्ठ उच्यते ॥
‘वरांगने! गान्धर्व विवाहद्वारा तुम मुझे प्राप्त होओ । सब विवाहोंमें गान्धर्व विवाह ही श्रेष्ठ बतलाया जाता है '
"तपती ने कहा— "राजन्! मैं ऐसी कन्या हूँ, जिसके पिता विद्यमान हैं; अतः इस शरीर पर मेरा कोई अधिकार नहीं है। यदि आपका मुझ पर प्रेम है तो मेरे पिताजी से मुझे माँग लीजिये। नरेश्वर! जैसे आपके प्राण मेरे अधीन हैं, उसी प्रकार आपने भी दर्शन मात्र से ही मेरे प्राणों को हर लिया है।"
"ऐसी दशा में आप यथासमय नमस्कार, तपस्या और नियम के द्वारा मेरे पिता भगवान् सूर्य को प्रसन्न करके उनसे मुझे माँग लीजिये, शत्रुसूदन नरेश! यदि वे मुझे आपकी सेवा में देना चाहेंगे तो मैं आज से सदा आपकी आज्ञा के अधीन रहूँगी। क्षत्रिय शिरोमणे! मैं इन्हीं अखिल भुवन भास्कर भगवान् सविता की पुत्री और सावित्री की छोटी बहन हूँ। मेरा नाम तपती है।"
अहं हि तपती नाम सावित्र्यवरजा सुता ।
अस्य लोकप्रदीपस्य सवितुः क्षत्रियर्षभ ॥
क्षत्रियशिरोमणे! मैं इन्हीं अखिलभुवनभास्कर भगवान् सविताकी पुत्री और सावित्रीकी छोटी बहिन हूँ । मेरा नाम तपती है ।
इतना कहकर वह अनिन्द्य सुन्दरी तपती तत्काल आकाश में ऊपर चली गई और वे राजा संवरण वहीं मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। इधर उनके मन्त्री, सेना और अनुचरों को साथ लिये उन श्रेष्ठ नरेश को खोजते हुए आ रहे थे। उस महान वन में पहुँचकर मन्त्री ने राजा को देखा; वे समय पाकर गिरे हुए ऊँचे इन्द्रध्वज की भाँति पृथ्वी पर पड़े थे। तपती से विमुक्त उन महान धनुर्धर महाराज को इस प्रकार पृथ्वी पर पड़ा देख राजमन्त्री ऐसे व्याकुल हो उठे मानो उनके शरीर में आग लग गई हो। वे तुरन्त उनके पास जा पहुँचे; स्नेहवश उनके हृदय में घबराहट पैदा हो गई थी। राजमन्त्री अवस्था में तो बड़े-बूढ़े थे ही, बुद्धि, कीर्ति और नीति में भी बढ़े-चढ़े थे। उन्होंने जैसे पिता अपने गिरे हुए पुत्र को धरती से उठा ले, उसी प्रकार कामवेदना से मूर्च्छित हुए भूमिपालों के भी स्वामी महाराज संवरण को शीघ्रतापूर्वक पृथ्वी से उठा लिया। राजा को उठाकर और उन्हें जीवित पाकर उनकी चिन्ता दूर हो गई।
क्षितौ निपतितं काले शक्रध्वजमिवोच्छ्रितम् ।
तं हि दृष्ट्वा महेष्वासं निरस्तं पतितं भुवि ॥
बभूव सोऽस्य सचिवः सम्प्रदीप्त इवाग्निना ।
त्वरया चोपसंगम्य स्नेहादागतसम्भ्रमः ॥
वे समय पाकर गिरे हुए ऊँचे इन्द्रध्वजकी भाँति पृथ्वीपर पड़े थे । तपतीसे विमुक्त उन महान् धनुर्धर महाराजको इस प्रकार पृथ्वीपर पड़ा देख राजमन्त्री ऐसे व्याकुल हो उठे मानो उनके शरीरमें आग लग गयी हो । वे तुरंत उनके पास जा पहुँचे । स्नेहवश उनके हृदयमें घबराहट पैदा हो गयी थी ।
वे उठकर बैठे हुए महाराज से कल्याणमयी मधुर वाणी में बोले— 'नरश्रेष्ठ! आप डरें नहीं। अनघ! आपका कल्याण हो।' युद्ध में शत्रु दल को पृथ्वी पर गिरा देने वाले नरेश को भूमि पर गिरा देख मन्त्री ने यह अनुमान लगाया कि ये भूख-प्यास से पीड़ित एवं थके-मान्दे हैं। गिरने पर राजा का मुकुट छिन्न-भिन्न नहीं हुआ था, जिससे मन्त्री ने समझा कि राजा युद्ध में घायल नहीं हुए हैं। मन्त्री ने राजा के मस्तक को कमल की सुगन्ध से युक्त ठण्डे जल से सींचा, जिससे राजा को चेत आ गया। बलवान नरेश ने एकमात्र अपने मन्त्री के सिवा सारी सेना को लौटा दिया। महाराज की आज्ञा से वह विशाल सेना तुरन्त राजधानी की ओर चल दी; परन्तु वे राजा संवरण फिर उसी पर्वत-शिखर पर जा बैठे।
तं समुत्थापयामास नृपतिं काममोहितम् ।
भूतलाद् भूमिपालेशं पितेव पतितं सुतम् ॥
प्रज्ञया वयसा चैव वृद्धः कीर्त्या नयेन च ।
अमात्यस्तं समुत्थाप्य बभूव विगतज्वरः ॥
राजमन्त्री अवस्थामें तो बड़े - बूढ़े थे ही, बुद्धि, कीर्ति और नीतिमें भी बढ़े - चढ़े थे । उन्होंने जैसे पिता अपने गिरे हुए पुत्रको धरतीसे उठा ले, उसी प्रकार कामवेदनासे मूर्च्छित हुए भूमिपालोंके भी स्वामी महाराज संवरणको शीघ्रतापूर्वक पृथ्वीपरसे उठा लिया । राजाको उठाकर और उन्हें जीवित पाकर उनकी चिन्ता दूर हो गयी ।
तदनन्तर उस श्रेष्ठ पर्वत पर स्नानादि से पवित्र होकर भगवान् सूर्य की आराधना करने के लिये हाथ जोड़, ऊपर की ओर मुँह किए वे भूमि पर खड़े हो गए। उस समय शत्रुओं का नाश करने वाले राजा संराण ने अपने पुरोहित मुनिवर वसिष्ठ का मन ही मन स्मरण किया। वे रात-दिन एक ही जगह खड़े होकर तपस्या में लगे रहे। बारहवें दिन महर्षि वसिष्ठ का वहाँ शुभागमन हुआ। विशुद्ध अन्तःकरण वाले महर्षि वसिष्ठ दिव्य ज्ञान से पहले ही जान गए कि सूर्यकन्या तपतीने राजा का चित्त चुरा लिया है। इस प्रकार मन और इन्द्रियों को संयम में रखकर तपस्या में लगे हुए उक्त नरेश से धर्मात्मा मुनिवर वसिष्ठ ने उनकी कार्य सिद्धि के लिये कुछ बातचीत की।
तथा तु नियतात्मानं तं नृपं मुनिसत्तमः ।
आबभाषे स धर्मात्मा तस्यैवार्थचिकीर्षया ॥
इस प्रकार मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर तपस्यामें लगे हुए उक्त नरेशसे धर्मात्मा मुनिवर वसिष्ठने उन्हींकी कार्यसिद्धिके लिये कुछ बातचीत की ।
उक्त महाराज के देखते-देखते, सूर्य के समान तेजस्वी भगवान् वसिष्ठ मुनि सूर्यदेव से मिलने के लिये ऊपर को गये। ब्रह्मर्षि वसिष्ठ दोनों हाथ जोड़कर सहस्रों किरणों से सुशोभित भगवान् सूर्यदेव के समीप गये और 'मैं वसिष्ठ हूँ' यों कहकर उन्होंने बड़ी प्रसन्नता से अपना समाचार निवेदित किया— 'अन्तरात्मा, जगत् को प्रकाशित करने वाले, संसार के हितैषी, स्वयम्भू तथा सहस्रों उद्दीप्त नेत्रों से सुशोभित उन अमित तेजस्वी सुरश्रेष्ठ भगवन सूर्य को नमस्कार है। जो जगत् के एकमात्र नेत्र हैं, संसार की सृष्टि, पालन और संहार के हेतु हैं, तीनों वेद जिनके स्वरूप हैं, जो त्रिगुणात्मक स्वरूप धारण करके ब्रह्मा, विष्णु और शिव नाम से प्रसिद्ध हैं, उन भगवान् सविता को नमस्कार है।'
सहस्रांशुं ततो विप्रः कृताञ्जलिरुपस्थितः ।
वसिष्ठोऽहमिति प्रीत्या स चात्मानं न्यवेदयत् ॥
ब्रह्मर्षि वसिष्ठ दोनों हाथ जोड़कर सहस्रों किरणोंसे सुशोभित भगवान् सूर्यदेवके समीप गये और ‘ मैं वसिष्ठ हूँ ' यों कहकर उन्होंने बड़ी प्रसन्नतासे अपना समाचार निवेदित किया ।
तमुवाच महातेजा विवस्वान् मुनिसत्तमम्। महर्षे स्वागतं तेऽस्तु कथयस्व यथेप्सितम्॥
यदिच्छसि महाभाग मत्तः प्रवदतां वर ।
तत् ते दद्यामभिप्रेतं यद्यपि स्यात् सुदुष्करम् ॥
‘ वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाभाग! तुम मुझसे जो कुछ चाहते हो, तुम्हारी वह अभीष्ट वस्तु कितनी ही दुर्लभ क्यों न हो, तुम्हें अवश्य दूँगा ।
तब महातेजस्वी भगवान् सूर्य ने मुनिवर वसिष्ठ से कहा— 'महर्षे! तुम्हारा स्वागत है! तुम्हारी जो अभिलाषा हो, उसे कहो।'
'वक्ताओं में श्रेष्ठ महाभाग! तुम मुझसे जो कुछ चाहते हो, तुम्हारी वह अभीष्ट वस्तु कितनी ही दुर्लभ क्यों न हो, तुम्हें अवश्य दूँगा।' उत्तम व्रत का पालन करने वाले महर्षे! तुमने जो मेरा स्तवन किया है, इसके लिये मैं तुम्हें वर देने को उद्यत हूँ, कोई वर माँगो। तुम्हारे द्वारा कही गई वह स्तुति भक्तों के लिये निरन्तर जप योग्य है। मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ।
यैषा ते तपती नाम सावित्र्यवरजा सुता ।
तां त्वां संवरणस्यार्थे वरयामि विभावसो ॥
वसिष्ठजीने कहा —विभावसो! यह जो आपकी तपती नामकी पुत्री एवं सावित्रीकी छोटी बहिन है, इसे मैं आपसे राजा संवरणके लिये माँगता हूँ ।
एवमुक्तः स तेनर्षिर्वसिष्ठः प्रत्यभाषत। प्रणिपत्य विवस्वन्तं भनुमन्तं महातपाः॥
प्रत्यभाषत तं विप्रं प्रतिनन्द्य दिवाकरः ॥
वसिष्ठजीके यों कहनेपर अपनी कन्या देनेका निश्चय करके भगवान् सूर्यने ब्रह्मर्षिका अभिनन्दन किया और इस प्रकार कहा—
उनके यों कहने पर महातपस्वी मुनिवर वसिष्ठ ने मरीचि-माली भगवान् भास्कर को प्रणाम करके इस प्रकार कहा— 'विभावसो! यह जो आपकी तपती नाम की पुत्री एवं सावित्री की छोटी बहन है, इसे मैं आपसे राजा संवरण के लिये माँगता हूँ। उस राजा की कीर्ति बहुत दूर तक फैली हुई है। वे धर्म और अर्थ के ज्ञाता तथा उदार बुद्धि वाले हैं; अतः आकाशचारी सूर्यदेव! महाराज संवरण आपकी पुत्री के लिये सुयोग्य पति होंगे।'
स हि राजा बृहत्कीर्तिर्धर्मार्थविदुदारधीः ।
युक्तः संवरणो भर्ता दुहितुस्ते विहंगम ॥
उस राजाकी कीर्ति बहुत दूरतक फैली हुई है । वे धर्म और अर्थके ज्ञाता तथा उदार बुद्धिवाले हैं; अतः आकाशचारी सूर्यदेव! महाराज संवरण आपकी पुत्रीके लिये सुयोग्य पति होंगे ।
वसिष्ठजी के यों कहने पर अपनी कन्या देने का निश्चय करके भगवान् सूर्य ने ब्रह्मर्षि का अभिनन्दन किया और कहा— 'मुने! संवरण राजाओं में श्रेष्ठ हैं, आप महर्षियों में उत्तम हैं और तपती युवतियों में सर्वश्रेष्ठ है; अतः उसके दान से श्रेष्ठ और क्या हो सकता है!' तदनन्तर साक्षात् भगवान् सूर्य ने अनिन्द्य सुन्दरी तपती को राजा संवरण की पत्नी होने के लिये महात्मा वसिष्ठ को अर्पित कर दिया।
ततः सर्वानवद्याङ्गीं तपतीं तपनः स्वयम् ।
ददौ संवरणस्यार्थे वसिष्ठाय महात्मने ॥
तदनन्तर साक्षात् भगवान् सूर्यने अनिन्द्यसुन्दरी तपतीको राजा संवरणकी पत्नी होनेके लिये महात्मा वसिष्ठको अर्पित कर दिया ।
ब्रह्मर्षि वसिष्ठ ने उस कन्या को ग्रहण किया और वहाँ से विदा होकर वे तपती के साथ पुनः उस स्थान पर आये, जहाँ विख्यात कीर्ति, कुरुवंशियों में श्रेष्ठ राजा संवरण काम के वशीभूत होकर मन ही मन तपती का चिन्तन करते हुए बैठे थे। मनोहर मुस्कान वाली देवकन्या तपती को वसिष्ठजी के साथ आते देख राजा संवरण अत्यन्त हर्षोल्लास से युक्त होकर अधिक शोभा पाने लगे। सुन्दर भौंहों वाली तपती आकाश से पृथ्वी पर आते समय गिरी हुई बिजली के समान सम्पूर्ण दिशाओं को अपनी प्रभा से प्रकाशित करती हुई अधिक सुशोभित हो रही थी।
राजन ने क्लेश सहन करते हुए बारह रात तक एकाग्र चित्त होकर ध्यान लगाया था। तब विशुद्ध अन्तःकरण वाले भगवान् वसिष्ठ मुनि राजा के पास आये थे। सब देवों के अधीश्वर वरदायक देवशिरोमणि भगवान् सूर्य को तपस्या द्वारा प्रसन्न करके महाराज संवरण ने वसिष्ठजी के ही तेज से तपती को पत्नी रूप में प्राप्त किया। तदनन्तर उन नरश्रेष्ठ ने देवताओं और गन्धर्वों से सेवित उस उत्तम पर्वत पर विधिपूर्वक तपती का पाणिग्रहण किया।
तपसाऽऽराध्य वरदं देवं गोपतिमीश्वरम् ।
लेभे संवरणो भार्यां वसिष्ठस्यैव तेजसा ॥
सबके अधीश्वर वरदायक देवशिरोमणि भगवान् सूर्यको तपस्याद्वारा प्रसन्न करके महाराज संवरणने वसिष्ठजीके ही तेजसे तपतीको पत्नीरूपमें प्राप्त किया ।
उसके बाद वसिष्ठजी की आज्ञा लेकर राजर्षि संवरण ने उसी पर्वत पर अपनी पत्नी के साथ विहार करने की इच्छा की। उन दिनों भूपाल ने नगर, राष्ट्र, वन तथा उपवनों की देखभाल एवं रक्षा के लिये मन्त्री को ही आदेश देकर विदा किया। वसिष्ठजी भी राजा से विदा ले अपने स्थान को चले गये। तदनन्तर राजा संवरण उस पर्वत पर देवता की भाँति विहार करने लगे। वे उसी पर्वत के वनों और काननों में अपनी पत्नी के साथ उसी प्रकार बारह वर्षों तक रमण करते रहे।
ततो द्वादश वर्षाणि काननेषु वनेषु च ।
रेमे तस्मिन् गिरौ राजा तथैव सह भार्यया ॥
वे उसी पर्वतके वनों और काननोंमें अपनी पत्नीके साथ उसी प्रकार बारह वर्षोंतक रमण करते रहे ।
अर्जुन! उन दिनों महाराज संवरण के राज्य और नगर में इन्द्र ने बारह वर्षों तक वर्षा नहीं की। उन भयङ्कर समय में पृथ्वी पर ओस की एक बूँद तक नहीं गिरी। परिणाम यह हुआ कि खेती उगती ही नहीं थी। सभी लोगों का चित्त व्याकुल हो उठा। मनुष्य भूख के भय से पीड़ित होकर घरों को छोड़कर दिशा-विदिशाओं में मारे-मारे फिरने लगे। लोग सनातन मर्यादा को छोड़कर स्त्री, पुत्र एवं परिवार का त्याग कर एक-दूसरे को लूटने-खसोटने लगे। राजा का नगर ऐसे लोगों से भर गया जो भूख से आतुर होकर मुर्दों के समान हो रहे थे। वह नगर प्रेतों से घिरे हुए यमराज के निवास स्थान जैसा जान पड़ता था।
परस्परममर्यादाः क्षुधार्ता जघ्निरे जनाः ॥
तत् क्षुधार्तैर्निरासहारैः शवभूतैस्तथा नरैः ।
अभवत् प्रेतराजस्य पुरं प्रेतैरिवावृतम् ॥
फिर तो उस नगर और राष्ट्रके लोग क्षुधासे पीड़ित हो सनातन मर्यादाको छोड़कर स्त्री, पुत्र एवं परिवार आदिका त्याग करके परस्पर एक- दूसरेको मारने और लूटने -खसोटने लगे । राजाका नगर ऐसे लोगोंसे भर गया, जो भूखसे आतुर हो उपवास करते - करते मुर्दोंके समान हो रहे थे । उन नर कंकालोंसे परिपूर्ण वह नगर प्रेतोंसे घिरे हुए यमराजके निवासस्थान- सा जान पड़ता था ।
प्रजा की ऐसी दुरवस्था देख धर्मात्मा मुनिश्रेष्ठ भगवान् वसिष्ठ ने ही अपने तपोबल से उस राज्य में वर्षा की। साथ ही वे नृपश्रेष्ठ संवरण को, जो बहुत वर्षों से प्रवासी हो रहे थे, तपती के साथ नगर में ले आये। उनके आने पर देवराज इन्द्र वहाँ पूर्ववत् वर्षा करने लगे। उन श्रेष्ठ राजा के नगर में प्रवेश करने पर भगवान् इन्द्र ने अन्न का उत्पादन बढ़ाने के लिये पुनः अच्छी वर्षा की। तबसे शुद्ध अन्तःकरण वाले नृपश्रेष्ठ संवरण के द्वारा पाले गए सब लोग प्रसन्न रहने लगे और उस राज्य में बड़ा आनन्द छा गया। तदनन्तर तपती के सहित महाराज संवरण ने शची के साथ इन्द्र के समान सुशोभित होते हुए बारह वर्षों तक यज्ञ किया।
ततो द्वादश वर्षाणि पुनरीजे नराधिपः ।
तपत्या सहितः पत्न्या यथा शच्या मरुत्पतिः ॥
तदनन्तर तपतीके सहित महाराज संवरणने शचीके साथ इन्द्रके समान सुशोभित होते हुए बारह वर्षोंतक यज्ञ किया ।
गन्धर्व कहता है— कुन्तीनन्दन! इस प्रकार भगवान् सूर्य की पुत्री महाभागा तपती आपके पूर्वपुरुष संवरण की पत्नी हुई थी, जिससे मैंने आपको 'तपतीनन्दन' माना है। तपस्वीजनों में श्रेष्ठ अर्जुन! महाराज संवरण ने तपती के गर्भ से कुरु को उत्पन्न किया था; अतः उसी वंश में जन्म लेने के कारण आप लोग 'तापत्य' हुए।
तस्यां संजनयामास कुरुं संवरणो नृपः ।
तपत्यां तपतां श्रेष्ठ तापत्यस्त्वं ततोऽर्जुन ॥
तपस्वीजनोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! महाराज संवरणने तपतीके गर्भसे कुरुको उत्पन्न किया था; अतः उसी वंशमें जन्म लेनेके कारण आपलोग तापत्य हुए ।
In English
The Story of Tapati and King Sanvarana
The Gandharva explains to Arjuna why he is called 'Tapatya' by telling the story of the sun goddess Tapati. King Sanvarana falls in love with her after seeing her on a mountain, and she instructs him to win her hand by performing penance for her father, Surya.
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Also written: Tapatyupakhyana, Tapatya, Arjuna, Vaishampayana, Tapati, Amatya, तपत्युपाख्यान