श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1231–1240
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1231–1240
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परस्परममर्यादाः क्षुधार्ता जघ्निरे जनाः ॥ ४२ ॥
तत् क्षुधार्तैर्निरासहारैः शवभूतैस्तथा नरैः ।
अभवत् प्रेतराजस्य पुरं प्रेतैरिवावृतम् ॥ ४३ ॥
फिर तो उस नगर और राष्ट्रके लोग क्षुधासे पीड़ित हो सनातन मर्यादाको छोड़कर स्त्री, पुत्र एवं परिवार आदिका त्याग करके परस्पर एक- दूसरेको मारने और लूटने -खसोटने लगे । राजाका नगर ऐसे लोगोंसे भर गया, जो भूखसे आतुर हो उपवास करते - करते मुर्दोंके समान हो रहे थे । उन नर कंकालोंसे परिपूर्ण वह नगर प्रेतोंसे घिरे हुए यमराजके निवासस्थान- सा जान पड़ता था ॥ ४२-४३ ॥
ततस्तत् तादृशं दृष्ट्वा स एव भगवानृषिः ।
अभ्यवर्षत धर्मात्मा वसिष्ठो मुनिसत्तमः ॥ ४४ ॥
प्रजाकी ऐसी दुरवस्था देख धर्मात्मा मुनिश्रेष्ठ भगवान् वसिष्ठने ही ( अपने तपोबलसे ) उस राज्यमें वर्षा की ॥ ४४ ॥
तं च पार्थिवशार्दूलमानयामास तत् पुरम् ।
तपत्या सहितं राजन् व्युषितं शाश्वतीः समाः ।
ततः प्रवृष्टस्तत्रासीद् यथापूर्वं सुरारिहा ॥ ४५ ॥
साथ ही वे नृपश्रेष्ठ संवरणको, जो बहुत वर्षोंसे प्रवासी हो रहे थे, तपतीके साथ नगरमें ले आये । उनके आनेपर दैत्यहन्ता देवराज इन्द्र वहाँ पूर्ववत् वर्षा करने लगे ॥ ४५ ॥
तस्मिन् नृपतिशार्दूले प्रविष्टे नगरं पुनः ।
प्रववर्ष सहस्राक्षः सस्यानि जनयन् प्रभुः ॥ ४६ ॥
उन श्रेष्ठ राजाके नगरमें प्रवेश करनेपर भगवान् इन्द्रने वहाँ अन्नका उत्पादन बढ़ानेके लिये पुनः अच्छी वर्षा की ॥ ४६ ॥
ततः सराष्ट्रं मुमुदे तत् पुरं परया मुदा ।
तेन पार्थिवमुख्येन भावितं भावितात्मना ॥ ४७ ॥
तबसे शुद्ध अन्तःकरणवाले नृपश्रेष्ठ संवरणके द्वारा पालित सब लोग प्रसन्न रहने लगे । उस राज्य और नगरमें बड़ा आनन्द छा गया ॥ ४७ ॥
ततो द्वादश वर्षाणि पुनरीजे नराधिपः ।
तपत्या सहितः पत्न्या यथा शच्या मरुत्पतिः ॥ ४८ ॥
तदनन्तर तपतीके सहित महाराज संवरणने शचीके साथ इन्द्रके समान सुशोभित होते हुए बारह वर्षोंतक यज्ञ किया ॥ ४८ ॥
गन्धर्व उवाच
एवमासीन्महाभागा तपती नाम पौर्विकी ।
तव वैवस्वती पार्थ तापत्यस्त्वं यया मतः ॥ ४ ९ ॥
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गन्धर्व कहता है— कुन्तीनन्दन! इस प्रकार भगवान् सूर्यकी पुत्री महाभागा तपती आपके पूर्वपुरुष संवरणकी पत्नी हुई थी, जिससे मैंने आपको तपतीनन्दन माना है ॥ ४ ९ ॥
तस्यां संजनयामास कुरुं संवरणो नृपः ।
तपत्यां तपतां श्रेष्ठ तापत्यस्त्वं ततोऽर्जुन ॥ ५० ॥
तपस्वीजनोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! महाराज संवरणने तपतीके गर्भसे कुरुको उत्पन्न किया था; अतः उसी वंशमें जन्म लेनेके कारण आपलोग तापत्य हुए ॥ ५० ॥
( कुरूद्भवा यतो यूयं कौरवाः कुरवस्तथा ।
पौरवा आजमीढाश्च भारता भरतर्षभ ॥
तापत्यमखिलं प्रोक्तं वृत्तान्तं तव पूर्वकम् । पुरोहितमुखा यूयं भुङ्ग्ध्वं वै पृथिवीमिमाम् ॥ ) भरतश्रेष्ठ उन्हीं कुरुसे उत्पन्न होनेके कारण आप सब लोग ' कौरव ' तथा ‘ कुरुवंशी ’ कहलाते हैं । इसी प्रकार पुरुसे उत्पन्न होनेके कारण ' पौरव', अजमीढकुलमें जन्म लेनेसे ‘ आजमीढ ' तथा भरतकुलमें उत्पन्न होनेसे ' भारत' कहलाते हैं । इस प्रकार आपलोगोंकी वंशजननी तपतीका सारा पुरातन वृत्तान्त मैंने बता दिया । अब आपलोग पुरोहितको आगे रखकर इस पृथ्वीका पालन एवं उपभोग करें । इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि तपत्युपाख्यानसमाप्तौ द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें तपती-उपाख्यानकी समाप्तिसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७२ ॥
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त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः गन्धर्वका वसिष्ठजीकी महत्ता बताते हुए किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणको पुरोहित बनानेके लिये आग्रह करना वैशम्पायन उवाच
स गन्धर्ववचः श्रुत्वा तत् तदा भरतर्षभ ।
अर्जुनः परया भक्त्या पूर्णचन्द्र इवाबभौ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं- भरतश्रेष्ठ जनमेजय! गन्धर्वका यह कथन सुनकर अर्जुन अत्यन्त भक्तिभावके कारण पूर्ण चन्द्रमाके समान शोभा पाने लगे ॥ १ ॥
उवाच च महेष्वासो गन्धर्वं कुरुसत्तमः ।
जातकौतूहलोऽतीव वसिष्ठस्य तपोबलात् ॥ २ ॥
फिर महाधनुर्धर कुरुश्रेष्ठ अर्जुनने गन्धर्वसे कहा – ' सखे! वसिष्ठके तपोबलकी बात सुनकर मेरे हृदयमें बड़ी उत्कण्ठा पैदा हो गयी है ॥ २ ॥
वसिष्ठ इति तस्यैतदृषेर्नाम त्वयेरितम् ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं यथावत् तद् वदस्व मे ॥ ३ ॥
‘ तुमने उन महर्षिका नाम वसिष्ठ बताया था । उनका यह नाम क्यों पड़ा? इसे मैं सुनना चाहता हूँ । तुम यथार्थ रूपसे मुझे बताओ ॥ ३ ॥
य एष गन्धर्वपते पूर्वेषां नः पुरोहितः ।
आसीदेतन्ममाचक्ष्व क एष भगवानृषिः ॥ ४ ॥
‘ गन्धर्वराज! ये जो हमारे पूर्वजोंके पुरोहित थे, वे भगवान् वसिष्ठ मुनि कौन हैं? यह मुझसे कहो ' ॥ ४ ॥
गन्धर्वउवाच
ब्रह्मणो मानसः पुत्रो वसिष्ठोऽरुन्धतीपतिः ।
तपसा निर्जितौ शश्वदजेयावमरैरपि ॥ ५ ॥
कामक्रोधावुभौ यस्य चरणौ संववाहतुः ।
इन्द्रियाणां वशकरो वसिष्ठ इति चोच्यते ॥ ६ ॥
गन्धर्वने कहा — वसिष्ठजी ब्रह्माजीके मानस पुत्र हैं । उनकी पत्नीका नाम अरुन्धती है । जिन्हें देवता भी कभी जीत नहीं सके, वे काम और क्रोध नामक दोनों शत्रु वसिष्ठजीकी तपस्यासे सदाके लिये पराभूत होकर उनके चरण दबाते रहे हैं । इन्द्रियोंको वशमें करनेके कारण वे वसिष्ठ कहलाते हैं ॥ ५-६ ॥ यस्तु नोच्छेदनं चक्रे कुशिकानामुदारधीः ।
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विश्वामित्रापराधेन धारयन् मन्युमुत्तमम् ॥ ७ ॥
विश्वामित्रके अपराधसे मनमें पवित्र क्रोध धारण करते हुए भी उन उदारबुद्धि महर्षिने कुशिकवंशका समूलोच्छेद नहीं किया ॥ ७ ॥
पुत्रव्यसनसंतप्तः शक्तिमानप्यशक्तवत् ।
विश्वामित्रविनाशाय न चक्रे कर्म दारुणम् ॥ ८ ॥
विश्वामित्रके द्वारा अपने सौ पुत्रोंके मारे जानेसे वे संतप्त थे, उनमें बदला लेनेकी शक्ति भी थी, तो भी उन्होंने असमर्थकी भाँति सब कुछ सह लिया एवं विश्वामित्रका विनाश करनेके लिये कोई दारुण कर्म नहीं किया ॥ ८ ॥
मृतांश्च पुनराहर्तुं शक्तः पुत्रान् यमक्षयात् ।
कृतान्तं नातिचक्राम वेलामिव महोदधिः ॥ ९ ॥
वे अपने मरे हुए पुत्रोंको यमलोकसे वापस ला सकते थे; परंतु जैसे महासागर अपने तटका उल्लंघन नहीं करता, उसी प्रकार वे यमराजकी मर्यादाको लाँघनेके लिये उद्यत नहीं हुए ॥ ९ ॥
यं प्राप्य विजितात्मानं महात्मानं नराधिपाः ।
इक्ष्वाकवो महीपाला लेभिरे पृथिवीमिमाम् ॥ १० ॥
उन्हीं जितात्मा महात्मा वसिष्ठ मुनिको ( पुरोहितरूपमें ) पाकर इक्ष्वाकुवंशी भूपालोंने ( दीर्घ- कालतक ) इस ( समूची ) पृथ्वीपर अधिकार प्राप्त किया था ॥ १० ॥
पुरोहितमिमं प्राप्य वसिष्ठमृषिसत्तमम् ।
ईजिरे क्रतुभिश्चैव नृपास्ते कुरुनन्दन ॥ ११ ॥
कुरुनन्दन! इन्हीं मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठको पुरोहित रूपमें पाकर उन नरपतियोंने बहुत -से यज्ञ भी किये थे ॥ ११ ॥
स हि तान् याजयामास सर्वान् नृपतिसत्तमान् ।
ब्रह्मर्षिः पाण्डवश्रेष्ठ बृहस्पतिरिवामरान् ॥ १२ ॥
पाण्डवश्रेष्ठ! जैसे बृहस्पतिजी सम्पूर्ण देवताओंका यज्ञ कराते हैं, उसी प्रकार ब्रह्मर्षि वसिष्ठने उन सम्पूर्ण श्रेष्ठ राजाओंका यज्ञ कराया था ॥ १२ ॥
तस्माद् धर्मप्रधानात्मा वेदधर्मविदीप्सितः ।
ब्राह्मणो गुणवान् कश्चित् पुरोधाः प्रतिदृश्यताम् ॥ १३ ॥
इसलिये जिसके मनमें धर्मकी प्रधानता हो, जो वेदोक्त धर्मका ज्ञाता और मनके अनुकूल हो; ऐसे किसी गुणवान् ब्राह्मणको आपलोग भी पुरोहित बनानेका निश्चय करें ॥ १३ ॥
क्षत्रियेणाभिजातेन पृथिवीं जेतुमिच्छता ।
पूर्वं पुरोहितः कार्यः पार्थ राज्याभिवृद्धये ॥ १४ ॥
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पार्थ! पृथ्वीको जीतनेकी इच्छा रखनेवाले कुलीन क्षत्रियको अपने राज्यकी वृद्धिके लिये पहले ( किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणको ) पुरोहित नियुक्त कर लेना चाहिये ॥ १४ ॥
महीं जिगीषता राज्ञा ब्रह्मकार्यं पुरस्सरम् ।
तस्मात् पुरोहितः कश्चिद् गुणवान् विजितेन्द्रियः ।
विद्वान् भवतु वो विप्रो धर्मकामार्थतत्त्ववित् ॥ १५ ॥
पृथ्वीको जीतनेकी इच्छावाले राजाको उचित है कि वह ब्राह्मणको अपने आगे रखे; अतः कोई गुणवान्, जितेन्द्रिय, वेदाभ्यासी, विद्वान् तथा धर्म, काम और अर्थका तत्त्वज्ञ ब्राह्मण आपका पुरोहित हो ॥ १५ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि पुरोहितकरणकथने त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें पुरोहित बनानेके लिये कथनसम्बन्धी एक सौ तिहत्तरवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १७३ ॥
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चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः वसिष्ठजीके अद्भुत क्षमा- बलके आगे विश्वामित्रजीका पराभव अर्जुन उवाच
किंनिमित्तमभूद् वैरं विश्वामित्रवसिष्ठयोः ।
वसतोराश्रमे दिव्ये शंस नः सर्वमेव तत् ॥ १ ॥
अर्जुनने पूछा- गन्धर्वराज! विश्वामित्र और वसिष्ठ मुनि तो अपने- अपने दिव्य आश्रममें निवास करते हैं, फिर उनमें वैर किस कारण हुआ? ये सब बातें मुझसे कहो ॥ १ ॥
गन्धर्व उवाच
इदं वासिष्ठमाख्यानं पुराणं परिचक्षते ।
पार्थ सर्वेषु लोकेषु यथावत् तन्निबोध मे ॥ २ ॥
गन्धर्वने कहा— पार्थ! वसिष्ठजीके इस उपाख्यानको सब लोकोंमें बहुत पुराना बतलाते हैं । उसे यथार्थरूपसे कहता हूँ, सुनिये ॥ २ ॥
कान्यकुब्जे महानासीत् पार्थिवो भरतर्षभ ।
गाधीति विश्रुतो लोके कुशिकस्यात्मसम्भवः ॥ ३ ॥
भरतवंशशिरोमणे! कान्यकुब्ज देशमें एक बहुत बड़े राजा थे, जो इस लोकमें गाधिके नामसे विख्यात थे । वे कुशिकके औरस पुत्र बताये जाते हैं ॥ ३ ॥
तस्य धर्मात्मनः पुत्रः समृद्धबलवाहनः ।
विश्वामित्र इति ख्यातो बभूव रिपुमर्दनः ॥ ४ ॥
उन्हीं धर्मात्मा नरेशके पुत्र विश्वामित्रके नामसे प्रसिद्ध हैं, जो सेना और वाहनोंसे सम्पन्न होकर शत्रुओंका मानमर्दन किया करते थे ॥ ४ ॥
स चचार सहामात्यो मृगयां गहने वने ।
मृगान् विध्यन् वराहांश्च रम्येषु मरुधन्वसु ॥ ५ ॥
व्यायामकर्शितः सोऽथ मृगलिप्सुः पिपासितः ।
आजगाम नरश्रेष्ठ वसिष्ठस्याश्रमं प्रति ॥ ६ ॥
तमागतमभिप्रेक्ष्य वसिष्ठः श्रेष्ठभागृषिः ।
विश्वामित्रं नरश्रेष्ठं प्रतिजग्राह पूजया ॥ ७ ॥
एक दिन वे अपने मन्त्रियोंके साथ गहन वनमें आखेटके लिये गये । मरुप्रदेशके सुरम्य वनोंमें उन्होंने वराहों और अन्य हिंसक पशुओंको मारते हुए एक हिंसक पशुको पकड़नेके
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लिये उसका पीछा किया । अधिक परिश्रमके कारण उन्हें बड़ा कष्ट सहना पड़ा । नरश्रेष्ठ! वे प्याससे पीड़ित हो महर्षि वसिष्ठके आश्रममें आये । मनुष्योंमें श्रेष्ठ महाराज विश्वामित्रको आया देख पूजनीय पुरुषोंकी पूजा करनेवाले महर्षि वसिष्ठने उनका सत्कार करते हुए आतिथ्य ग्रहण करनेके लिये आमन्त्रित किया ॥ ५–७ ॥
पाद्यार्ध्याचमनीयैस्तं स्वागतेन च भारत ।
तथैव परिजग्राह वन्येन हविषा तदा ॥ ८ ॥
भारत! पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, स्वागत भाषण तथा वन्य हविष्य आदिसे उन्होंने विश्वामित्रजीका सत्कार किया ॥ ८ ॥
तस्याथ कामधुग् धेनुर्वसिष्ठस्य महात्मनः ।
उक्ता कामान् प्रयच्छेति सा कामान् दुह्यते सदा ॥ ९ ॥
महात्मा वसिष्ठजीके यहाँ एक कामधेनु थी, जो ' अमुक- अमुक मनोरथोंको पूर्ण करो ' यह कहने - पर सदा उन - उन कामनाओंको पूर्ण कर दिया करती थी ॥ ९ ॥
ग्राम्यारण्याश्चौषधीश्च दुदुहे पय एव च ।
षड्रसं चामृतनिभं रसायनमनुत्तमम् ॥ १० ॥
भोजनीयानि पेयानि भक्ष्याणि विविधानि च ।
लेह्यान्यमृतकल्पानि चोष्याणि च तथार्जुन ॥ ११ ॥
रत्नानि च महार्हाणि वासांसि विविधानि च ।
तैः कामैः सर्वसम्पूर्णैः पूजितश्च महीपतिः ॥ १२ ॥
ग्रामीण तथा जंगली अन्न, फल- मूल, दूध, षड्स भोजन, अमृतके समान मधुर परम उत्तम रसायन, खाने, पीने और चबानेयोग्य भाँति- भाँतिके पदार्थ, अमृतके समान स्वादिष्ठ चटनी आदि तथा चूसनेयोग्य ईख आदि वस्तुएँ तथा भाँति- भाँतिके बहुमूल्य रत्न एवं वस्त्र आदि सब सामग्रियोंको उस कामधेनुने प्रस्तुत कर दिया । सब प्रकारसे उन सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तुओंके द्वारा हे अर्जुन! राजा विश्वामित्र भलीभाँति पूजित हुए ॥ १०– १२ ॥
सामात्यः सबलश्चैव तुतोष स भृशं तदा ।
षडुन्नतां सुपार्श्वोरुं पृथुपञ्चसमावृताम् ॥ १३ ॥
उस समय वे अपनी सेना और मन्त्रियोंके साथ बहुत संतुष्ट हुए । महर्षिकी धेनुका मस्तक, ग्रीवा, जाँघें, गलकम्बल, पूँछ और थन — ये छ: अंग बड़े एवं विस्तृत थे । उसके
पार्श्वभाग तथा ऊरु बड़े सुन्दर थे । वह पाँच पृथुल अंगोंसे सुशोभित थी± ॥ १३ ॥
मण्डूकनेत्रां स्वाकारां पीनोधसमनिन्दिताम् ।
सुवालधिं शङ्कुकर्णां चारुशृङ्गां मनोरमाम् ॥ १४ ॥
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उसकी आँखें मेढक- जैसी थीं । आकृति बड़ी सुन्दर थी । चारों थन मोटे और फैले हुए थे । वह सर्वथा प्रशंसाके योग्य थी । सुन्दर पूँछ, नुकीले कान और मनोहर सींगोंके कारण वह बड़ी मनोरम जान पड़ती थी ॥ १४ ॥
पुष्टायतशिरोग्रीवां विस्मितः सोऽभिवीक्ष्य ताम् ।
अभिनन्द्य स तां राजा नन्दिनीं गाधिनन्दनः ॥ १५ ॥
उसके सिर और गर्दन विस्तृत एवं पुष्ट थे । उसका नाम नन्दिनी था । उसे देखकर विस्मित हुए गाधिनन्दन विश्वामित्रने उसका अभिनन्दन किया ॥ १५ ॥
अब्रवीच्च भृशं तुष्टः स राजा तमृषिं तदा ।
अर्बुदेन गवां ब्रह्मन् मम राज्येन वा पुनः ॥ १६ ॥
नन्दिनीं सम्प्रयच्छस्व भुङ्क्ष्व राज्यं महामुने । और अत्यन्त संतुष्ट होकर राजा विश्वामित्रने उस समय उन महर्षिसे कहा— ‘ ब्रह्मन्! आप दस करोड़ गायें अथवा मेरा सारा राज्य लेकर इस नन्दिनी को मुझे दे दें । महामुने! इसे देकर आप राज्य भोग करें ' ॥ १६३ ॥
वसिष्ठ उवाच देवतातिथिपित्रर्थं याज्यार्थं च पयस्विनी ॥ १७ ॥
अदेया नन्दिनीयं वै राज्येनापि तवानघ । वसिष्ठजीने कहा – अनघ! देवता, अतिथि और पितरोंकी पूजा एवं यज्ञके हविष्य आदिके लिये यह दुधारू गाय नन्दिनी अपने यहाँ रहती है, इसे तुम्हारा राज्य लेकर भी नहीं दिया जा सकता ॥ १७३ ॥
विश्वामित्र उवाच क्षत्रियोऽहं भवान् विप्रस्तपस्स्वाध्यायसाधनः ॥ १८ ॥
विश्वामित्रजी बोले- मैं क्षत्रिय राजा हूँ और आप तपस्या तथा स्वाध्यायका साधन करनेवाले ब्राह्मण हैं ॥ १८ ॥
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ब्राह्मणेषु कुतो वीर्यं प्रशान्तेषु धृतात्मसु ।
अर्बुदेन गवां यस्त्वं न ददासि ममेप्सितम् ॥ १ ९ ॥
स्वधर्मं न प्रहास्यामि नेष्यामि च बलेन गाम् । ( क्षत्रियोऽस्मि न विप्रोऽहं बाहुवीर्योऽस्मि धर्मतः । तस्माद् भुजबलेनेमां हरिष्यामीह पश्यतः ॥ ) ब्राह्मण अत्यधिक शान्त और जितात्मा होते हैं । उनमें बल और पराक्रम कहाँसे आ सकता है; फिर क्या बात है जो आप मेरी अभीष्ट वस्तुको एक अर्बुद गाय लेकर भी नहीं दे रहे हैं । मैं अपना धर्म नहीं छोडूंगा, इस गायको बलपूर्वक ले जाऊँगा । मैं क्षत्रिय हूँ, ब्राह्मण नहीं हूँ । मुझे धर्मतः अपना बाहुबल प्रकट करनेका अधिकार है; अतः बाहुबलसे ही आपके देखते - देखते इस गायको हर ले जाऊँगा ॥ १ ९ ॥ वसिष्ठ उवाच बलस्थश्चासि राजा च बाहुवीर्यश्च क्षत्रियः ॥ २० ॥
यथेच्छसि तथा क्षिप्रं कुरु मा त्वं विचारय । वसिष्ठजीने कहा – तुम सेनाके साथ हो, राजा हो और अपने बाहुबलका भरोसा रखनेवाले क्षत्रिय हो । जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा शीघ्र कर डालो, विचार न करो ॥ २०३ || गन्धर्व उवाच
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एवमुक्तस्तथा पार्थ विश्वामित्रो बलादिव ॥ २१ ॥
हंसचन्द्रप्रतीकाशां नन्दिनीं तां जहार गाम् ।
कशादण्डप्रणुदितां काल्यमानामितस्ततः ॥ २२ ॥
गन्धर्व कहता है - अर्जुन! वसिष्ठजीके यों कहनेपर विश्वामित्रने मानो बलपूर्वक ही हंस और चन्द्रमाके समान श्वेत रंगवाली उस नन्दिनी गायका अपहरण कर लिया । उसे कोड़ों और डंडोंसे मार- मारकर इधर - उधर हाँका जा रहा था ॥ २१-२२ ॥
हम्भायमाना कल्याणी वसिष्ठस्याथ नन्दिनी ।
आगम्याभिमुखी पार्थ तस्थौ भगवदुन्मुखी ॥ २३ ॥
भृशं च ताड्यमाना वै न जगामाश्रमात् ततः । अर्जुन! उस समय कल्याणमयी नन्दिनी डकराती हुई महर्षि वसिष्ठके सामने आकर खड़ी हो गयी और उन्हींकी ओर मुँह करके देखने लगी । उसके ऊपर जोर- जोरसे मार पड़ रही थी, तो भी वह आश्रमसे अन्यत्र नहीं गयी ॥ २३ ॥
वसिष्ठ उवाच शृणोमि ते रवं भद्रे विनदन्त्याः पुनः पुनः ॥ २४ ॥
ह्रियसे त्वं बलाद् भद्रे विश्वामित्रेण नन्दिनि ।
किं कर्तव्यं मया तत्र क्षमावान् ब्राह्मणो ह्यहम् ॥ २५ ॥
वसिष्ठजी बोले — भद्रे! तुम बार- बार क्रन्दन कर रही हो । मैं तुम्हारा आर्तनाद सुनता हूँ, परंतु क्या करूँ? कल्याणमयी नन्दिनि! विश्वामित्र तुम्हें बलपूर्वक हर ले जा रहे हैं । इसमें
मैं क्या कर सकता हूँ । मैं एक क्षमाशील ब्राह्मण हूँ ॥ २४-२५ ॥
गन्धर्व उवाच
सा भयान्नन्दिनी तेषां बलानां भरतर्षभ ।
विश्वामित्रभयोद्विग्ना वसिष्ठं समुपागमत् ॥ २६ ॥
गन्धर्व कहता है — भरतवंशशिरोमणे! नन्दिनी विश्वामित्रके भयसे उद्विग्न हो उठी थी ।
वह उनके सैनिकोंके भयसे मुनिवर वसिष्ठकी शरणमें गयी ॥ २६ ॥
गौरुवाच
कशाग्रदण्डाभिहतां क्रोशन्तीं मामनाथवत् ।
विश्वामित्रबलैर्घोरैर्भगवन् किमुपेक्षसे ॥ २७ ॥
गौने कहा- भगवन्! विश्वामित्रके निर्दय सैनिक मुझे कोड़ों और डंडोंसे पीट रहे हैं । मैं
अनाथकी भाँति क्रन्दन कर रही हूँ । आप क्यों मेरी उपेक्षा कर रहे हैं? ॥ २७ ॥
गन्धर्व उवाच नन्दिन्यामेवं क्रन्दन्त्यां धर्षितायां महामुनिः ।