श्रीगणेशाय नमः।

वसिष्ठोपाख्यान : शापित राजा ने धर्मनिष्ठ गुरु के साथ ऐसा अधर्म क्यों किया?

शाप और काम का द्वन्द्व

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड १ · आदिपर्व → चैत्ररथपर्व · अध्याय 181 · पृष्ठ 1280–1284

614 शब्द · 4 मिनटका पाठ · 5 श्लोक

गन्धर्वराज ने अर्जुन से कहा

अर्जुन के संशयों का निवारण करने हेतु

अर्जुन ने गन्धर्वराज से पूछा— "गन्धर्वराज! किस कारण को सामने रखकर राजा कल्माषपाद ने ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ गुरु वसिष्ठजी के साथ अपनी पत्नी का नियोग कराया था? उत्तम धर्म के ज्ञाता महात्मा महर्षि वसिष्ठ ने यह परस्त्रीगमन का पाप कैसे किया? सखे! पूर्वकाल में महर्षि वसिष्ठ ने जो यह अधर्म कार्य किया, उसका क्या कारण है? यह मेरा संशय है, जिसे मैं पूछता हूँ। आप मेरे इन सारे संशयों का निवारण कीजिये।"

अर्जुन उवाच

राज्ञा कल्माषपादेन गुरौ ब्रह्मविदां वरे ।
कारणं किं पुरस्कृत्य भार्या वै संनियोजिता ॥

अर्जुनने पूछा- गन्धर्वराज! किस कारणको सामने रखकर राजा कल्माषपादने ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ गुरु वसिष्ठजीके साथ अपनी पत्नीका नियोग कराया था?

महाभारत · आदिपर्व · चैत्ररथपर्व · अध्याय 181 · श्लोक 1पृष्ठ 1281

गन्धर्वराज ने कहा— "दुर्धर्ष वीर धनञ्जय! आप महर्षि वसिष्ठ तथा राजा मित्रसह के विषय में जो कुछ मुझसे पूछ रहे हैं, उसका समाधान सुनिये। भरतश्रेष्ठ! वसिष्ठपुत्र महात्मा शक्ति से राजा कल्माषपाद को जिस प्रकार शाप प्राप्त हुआ, वह सब प्रसङ्ग मैं आपसे कह चुका हूँ।"

गन्धर्व उवाच

कथितं ते मया सर्वं यथा शप्तः स पार्थिवः ।
शक्तिना भरतश्रेष्ठ वासिष्ठेन महात्मना ॥

भरतश्रेष्ठ! वसिष्ठपुत्र महात्मा शक्तिसे राजा कल्माषपादको जिस प्रकार शाप प्राप्त हुआ, वह सब प्रसंग मैं आपसे कह चुका हूँ ।

महाभारत · आदिपर्व · चैत्ररथपर्व · अध्याय 181 · श्लोक 5पृष्ठ 1281

शाप के परवश होकर शत्रु को सन्ताप देने वाले राजा कल्माषपाद अपनी पत्नी के साथ नगर से बाहर निकल गए थे। उस समय उनकी आँखें क्रोध से व्याप्त थीं। वे अपनी स्त्री के साथ निर्जन वन में जाकर चारों ओर चक्कर लगाने लगे। वह महान् वन भाँति-भाँतिके मृगों से भरा हुआ था और अनेक प्रकार की लताओं, गुल्मों तथा विविध वृक्षों से आच्छादित था; वह भयङ्कर शब्दों से गूँजता रहता था। शापग्रस्त राजा उसी गहन वन में भ्रमण कर रहे थे। एक दिन भूख से व्याकुल होकर वे भोजन की तलाश में निकले। बहुत क्लेश उठाने के पश्चात उन्होंने देखा कि वन के किसी निर्जन प्रदेश में एक ब्राह्मण और ब्राह्मणी मैथुन के लिये एकत्र हुए हैं। वे दोनों अभी अपनी इच्छा पूर्ण नहीं कर पाये थे कि तभी उन राक्षसाविष्ट कल्माषपाद को देखकर अत्यन्त भयभीत होकर वहाँ से भाग चले।

उन भागते हुए दम्पति में से ब्राह्मण को राजा ने बलपूर्वक पकड़ लिया। अपने पति को राक्षस के हाथ में पड़ा देख ब्राह्मणी व्याकुल होकर बोली— "राजन्! मैं आपसे जो बात कहती हूँ, उसे सुनिये। उत्तम व्रत का पालन करने वाले नरेश! आपका जन्म सूर्यवंश में हुआ है। आप सम्पूर्ण जगत् में विख्यात हैं। आप सदा प्रमादशून्य होकर धर्म में स्थित रहने वाले हैं और गुरुजनों की सेवा में सदा संलग्न रहते हैं। दुर्धर्ष वीर! यद्यपि आप इस समय शाप से ग्रस्त हैं, तो भी आपको पापकर्म नहीं करना चाहिये। प्रसीद नृपतिश्रेष्ठ भर्तायं मे विसृज्यताम्! मेरा ऋतुकाल प्राप्त है, मैं पतिके कष्ट से दुःख पा रही हूँ। मैं सन्तान की इच्छा से पतिके समीप आयी थी और उनसे मिलकर अभी अपनी इच्छा पूर्ण नहीं कर पायी हूँ। नृपश्रेष्ठ! ऐसी दशा में आप मुझपर प्रसन्न होइये और मेरे इन पतिदेवता को छोड़ दीजिये।"

अप्रमत्तः स्थितो धर्मे गुरुशुश्रूषणे रतः ।
शापोपहत दुर्धर्ष न पापं कर्तुमर्हसि ॥

‘ आप सदा प्रमादशून्य होकर धर्ममें स्थित रहनेवाले हैं । गुरुजनोंकी सेवामें सदा संलग्न रहते हैं । दुर्धर्ष वीर! यद्यपि आप इस समय शापसे ग्रस्त हैं, तो भी आपको पापकर्म नहीं करना चाहिये ।

महाभारत · आदिपर्व · चैत्ररथपर्व · अध्याय 181 · श्लोक 13पृष्ठ 1282

किन्तु राजा ने उसकी प्रार्थना नहीं सुनी और उस ब्राह्मण को जलाकर भस्म कर दिया। तदनन्तर पतिके वियोग से व्यथित एवं शोकसन्तप्त ब्राह्मणी ने रोष में भरकर राजर्षि कल्माषपाद को शाप दिया— "ओ नीच! मेरी पतिविषयक कामना अभी पूर्ण नहीं हो पायी थी, तभी तूने अत्यन्त क्रूर की भाँति मेरे देखते-देखते आज मेरे महायशस्वी प्रियतम पतिको अपना ग्रास बना लिया है; अतः दुर्बुद्धे! तू भी मेरे शाप से पीड़ित हुआ। ऋतुकाल में पत्नी के साथ समागम करते ही तत्काल प्राण त्याग देगा। जिन महर्षि वसिष्ठ के पुत्रों का तुमने संहार किया है, उन्हीं से समागम करके तेरी पत्नी पुत्र पैदा करेगी। नृपाधम! वही पुत्र तेरा वंश चलानेवाला होगा।" इस प्रकार राजा को शाप देकर वह सती साध्वी आङ्गिरसी राजा कल्माषपाद के समीप ही प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश कर गयी।

एवं विक्रोशमानायास्तस्यास्तु स नृशंसवत् ॥

भर्तारं भक्षयामास व्याघ्रो मृगमिवेप्सितम् ।
तस्याः क्रोधाभिभूताया यान्यश्रूण्यपतन् भुवि ॥

सोऽग्निः समभवद् दीप्तस्तं च देशं व्यदीपयत् ।
ततः सा शोकसंतप्ता भर्तृव्यसनकर्शिता ॥

कल्माषपादं राजर्षिमशपद् ब्राह्मणी रुषा ।
यस्मान्ममाकृतार्थायास्त्वया क्षुद्र नृशंसवत् ॥

प्रेक्षन्त्या भक्षितो मेऽद्य प्रियो भर्ता महायशाः ।
तस्मात् त्वमपि दुर्बुद्धे मच्छापपरिविक्षतः ॥

पत्नीमृतावनुप्राप्य सद्यस्त्यक्ष्यसि जीवितम् ।
यस्य चर्षेर्वसिष्ठस्य त्वया पुत्रा विनाशिताः ॥

तेन संगम्य ते भार्या तनयं जनयिष्यति ।
स ते वंशकरः पुत्रो भविष्यति नृपाधम ॥

जलाकर भस्म कर दिया । तदनन्तर पतिके वियोगसे व्यथित एवं शोकसंतप्त ब्राह्मणीने रोषमें भरकर राजर्षि कल्माषपादको शाप दिया -' ओ नीच! मेरी पतिविषयक कामना अभी पूर्ण नहीं हो पायी थी, तभी तूने अत्यन्त क्रूरकी भाँति मेरे देखते -देखते आज मेरे महायशस्वी प्रियतम पतिको अपना ग्रास बना लिया है; अतः दुर्बुद्धे! तू भी मेरे शापसे पीड़ित हुआ ऋतुकालमें पत्नीके साथ समागम करते ही तत्काल प्राण त्याग देगा । जिन महर्षि वसिष्ठके पुत्रोंका तुमने संहार किया है, उन्हींसे समागम करके तेरी पत्नी पुत्र पैदा करेगी । नृपाधम! वही पुत्र तेरा वंश चलानेवाला होगा '

महाभारत · आदिपर्व · चैत्ररथपर्व · अध्याय 181 · श्लोक 15–21पृष्ठ 1283

दीर्घकाल के पश्चात् जब वे राजर्षि शाप से मुक्त हुए, तब ऋतुकाल में अपनी पत्नी के पास गये। परन्तु उनकी रानी मदयन्ती ने उन्हें शाप की याद दिलाकर रोक दिया। राजा कल्माषपाद काम से मोहित हो रहे थे, इसलिए उन्हें शाप का स्मरण नहीं रहा था। महारानी मदयन्ती की बात सुनकर वे नृपश्रेष्ठ बड़े सम्भ्रम में पड़ गये। उस शाप को बार-बार याद करके उन्हें बड़ा सन्ताप हुआ। इसी कारण शापदोष से युक्त राजा कल्माषपाद ने महर्षि वसिष्ठ का अपनी पत्नी के साथ नियोग कराया।

न हि सस्मार स नृपस्तं शापं काममोहितः ।
देव्याः सोऽथ वचः श्रुत्वा सम्भ्रान्तो नृपसत्तमः ॥

राजा कल्माषपाद कामसे मोहित हो रहे थे । इसलिये उन्हें शापका स्मरण नहीं रहा । महारानी मदयन्तीकी बात सुनकर वे नृपश्रेष्ठ बड़े सम्भ्रम ( घबराहट) में पड़ गये ।

महाभारत · आदिपर्व · चैत्ररथपर्व · अध्याय 181 · श्लोक 25पृष्ठ 1284

In English

The Curse of Angirasi and the Actions of King Kalmashapada

King Kalmashapada killed a Brahmin in a forest while the man was with his wife. The grieving wife, Angirasi, cursed the king to die during sexual intercourse and decreed that his successor would be born from his wife through the sage Vasishtha. To avoid this curse, the king later had his wife engage in a ritual union with Vasishtha.

This page answers

  • Why did king kalmashapada kill a brahmin?
  • What was the curse given by angirasi to kalmashapada?
  • Why did kalmashapada ask vasishtha to sleep with his wife?
  • How did kalmashapada's successor come to be born?

Also written: Vasishthopakhyana, Vasishtha, Arjuna, Brahmani, वसिष्ठोपाख्यान