श्रीगणेशाय नमः।

व्युषिताश्वोपाख्यान : पति की मृत्यु के बाद एक स्त्री का क्या कर्तव्य है?

शोक, मर्यादा और सङ्कल्प

महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

महाभारत — खण्ड १ · आदिपर्व → सम्भवपर्व · अध्याय 120 · पृष्ठ 860–866

646 शब्द · 4 मिनटका पाठ · 5 श्लोक

पाण्डु ने कुन्ती से कहा

कुन्ती द्वारा धर्मपत्नी के धर्म और मानसिक शक्ति की जिज्ञासा उत्पन्न करने पर

वैशम्पायनजी बोले— महाराज जनमेजय! जब कुन्ती अपने पति कुरुश्रेष्ठ वीरवर राजा पाण्डु से बोलीं, तब पाण्डु ने उन्हें एक पौराणिक कथा सुनाई।

कुन्ती ने कहा— ‘धर्मज्ञ! आप मुझसे किसी तरह ऐसी बात न कहें; मैं आपकी धर्मपत्नी हूँ और कमल के समान विशाल नेत्रों वाले आपमें ही अनुराग रखती हूँ। नरश्रेष्ठ! मैं आपके साथ ही स्वर्गलोक में चलूँगी। कुरुनन्दन! पुत्र की उत्पत्तिके लिये आप ही मेरे साथ समागम कीजिये। मैं आपके सिवा किसी दूसरे पुरुष से समागम करने की बात मन में भी नहीं ला सकती। फिर इस पृथ्वी पर आपसे श्रेष्ठ दूसरा मनुष्य है भी कौन? धर्मात्मन्! पहले आप मेरे मुँह से यह पौराणिक कथा सुन लीजिये। विशालाक्ष! यह जो कथा मैं कहने जा रही हूँ, सर्वत्र विख्यात है।'

वैशम्पायन उवाच

इमां च तावद् धर्मात्मन् पौराणीं शृणु मे कथाम् ।
परिश्रुतां विशालाक्ष कीर्तयिष्यामि यामहम् ॥

‘ धर्मात्मन्! पहले आप मेरे मुँहसे यह पौराणिक कथा सुन लीजिये । विशालाक्ष! यह जो कथा मैं कहने जा रही हूँ, सर्वत्र विख्यात है ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 120 · श्लोक 6पृष्ठ 862

कहते हैं, पूर्वकाल में एक परम धर्मात्मा राजा हो गये हैं, जिनका नाम था व्युषिताश्व। वे पूरुवंश की वृद्धि करने वाले थे। एक समय जब वे महाबाहु धर्मात्मा नरेश यज्ञ करने लगे, उस समय इन्द्र आदि देवता देवर्षियों के साथ उस यज्ञ में पधारे थे। उसमें देवराज इन्द्र सोमपान करके उन्मत्त हो उठे थे तथा ब्राह्मण लोग पर्याप्त दक्षिणा पाकर हर्ष से फूल उठे थे। राजर्षि व्युषिताश्व के यज्ञ में उस समय देवता और ब्रह्मर्षि स्वयं सब कार्य कर रहे थे। राजा व्युषिताश्व समस्त भूतों के प्रीतिपात्र थे। उन्होंने अश्वमेध नामक महान् यज्ञ में पूर्व, उत्तर, पश्चिम और दक्षिण— चारों दिशाओं के राजाओं को जीतकर अपने वश में कर लिया था। वे समुद्रपर्यन्त इस सारी पृथ्वी को जीतकर जैसे पिता अपने औरस पुत्रों का पालन करता है, उसी प्रकार सभी वर्ण के लोगों का पालन करते थे। उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञ किए, अनन्त रत्नों की भेंट दी और अनेक सोमयागों का आयोजन करके अग्निष्टोम आदि सात प्रकार की सोमयाग संस्थाओं का अनुष्ठान किया।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्ता महाराज कुन्ती पाण्डुमभाषत ।
कुरूणामृषभं वीरं तदा भूमिपतिं पतिम् ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - महाराज जनमेजय! इस प्रकार कहे जानेपर कुन्ती अपने पति कुरुश्रेष्ठ वीरवर राजा पाण्डुसे इस प्रकार बोली—

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 120 · श्लोक 1पृष्ठ 862

राजा कक्षीवान् की पुत्री भद्रा उनकी अत्यन्त प्यारी पत्नी थी। उन दिनों इस पृथ्वी पर उसके रूप की समानता करने वाली दूसरी कोई स्त्री न थी। वे दोनों पति-पत्नी एक-दूसरे को बहुत चाहते थे, किन्तु पत्नी के प्रति अत्यन्त कामासक्त होने के कारण राजा व्युषिताश्व राजयक्ष्मा के शिकार हो गये और थोड़े ही समय में सूर्य की भाँति अस्त हो गये। उन महाराज के परलोकवासी हो जाने पर उनकी पत्नी भद्रा अत्यन्त दुःख से आतुर होकर विलाप करने लगी, क्योंकि उनका कोई पुत्र नहीं था।

वैशम्पायन उवाच

न मामर्हसि धर्मज्ञ वक्तुमेवं कथंचन ।
धर्मपत्नीमभिरतां त्वयि राजीवलोचने ॥

‘ धर्मज्ञ! आप मुझसे किसी तरह ऐसी बात न कहें; मैं आपकी धर्मपत्नी हूँ और कमलके समान विशाल नेत्रोंवाले आपमें ही अनुराग रखती हूँ ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 120 · श्लोक 2पृष्ठ 862

भद्रा करुण स्वर में बोली— ‘परमधर्मज्ञ महाराज! जो कोई भी विधवा स्त्री पति के बिना जीवन धारण करती है, वह वास्तव में जीती नहीं, अपितु मृततुल्या है। क्षत्रियशिरोमणे! पति के न रहने पर नारी की मृत्यु हो जाय, इसी में उसका कल्याण है। अतः मैं भी आपके ही मार्ग पर चलना चाहती हूँ, प्रसन्न होइये और मुझे अपने साथ ले चलिये। आपके बिना एक क्षण भी जीवित रहने का मुझमें उत्साह नहीं है। महाराज! जो स्त्री पति से बिछड़ जाने पर दो घड़ी भी जीवन धारण करती है, वह पापिनी नरक में पड़ी हुई-सी दुःखमय जीवन बिताती है। पूर्वजन्मों के उन पापकर्मों द्वारा मेरे पूर्व शरीरों में जो बीज रूप से सञ्चित हो रहा था, वही यह आपके वियोग का दुःख आज मुझे प्राप्त हुआ है। महाराज! मैं दुःख में डूबी हुई हूँ, अतः आज से आपके दर्शन की इच्छा रखकर मैं कुश के बिछौने पर सोऊँगी। करुण विलाप करती हुई मुझ दीन-दुःखिया अबला को आज अपना दर्शन और कर्तव्य का आदेश दीजिये।’

दर्शयस्व नरव्याघ्र शाधि मामसुखान्विताम् ।
कृपणां चाथ करुणं विलपन्तीं नरेश्वर ॥

नरश्रेष्ठ नरेश्वर! करुण विलाप करती हुई मुझ दीन- दुःखिया अबलाको आज अपना दर्शन और कर्तव्यका आदेश दीजिये ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 120 · श्लोक 31पृष्ठ 866

कुन्ती ने कहा— जब वह राजा के शव का आलिङ्गन करके बार-बार अनेक प्रकार से विलाप करने लगी, तब अचानक आकाशवाणी हुई: ‘भद्रे! उठो और जाओ, इस समय मैं तुम्हें वर देता हूँ। चारुहासिनि! मैं तुम्हारे गर्भ से कई पुत्रों को जन्म दूँगा। तुम ऋतुस्नाता होने पर चतुर्दशी या अष्टमी की रात में अपनी शय्या पर मेरे इस शव के साथ सो जाना।’

भरतश्रेष्ठ! रानी भद्रा ने उस आज्ञा का पालन किया और उस शव के द्वारा सात पुत्र उत्पन्न किये, जिनमें तीन शाल्वदेश के और चार मद्रदेश के शासक हुए। भरतवंशशिरोमणे! इसी प्रकार आप भी मेरे गर्भ से मानसिक सङ्कल्प द्वारा अनेक पुत्र उत्पन्न कर सकते हैं; क्योंकि आप तपस्या और योगबल से सम्पन्न हैं।

सा तेन सुषुवे देवी शवेन भरतर्षभ ।
त्रीन् शाल्वांश्चतुरो मद्रान् सुतान् भरतसत्तम ॥

भरतश्रेष्ठ! रानी भद्राने उस शवके द्वारा सात पुत्र उत्पन्न किये, जिनमें तीन शाल्वदेशके और चार मद्रदेशके शासक हुए ।

महाभारत · आदिपर्व · सम्भवपर्व · अध्याय 120 · श्लोक 36पृष्ठ 866

In English

The Story of King Vyushitashva and Queen Bhadra

King Vyushitashva dies after performing many sacrifices, leaving his wife Bhadra without children. After Bhadra laments her loss, a voice from the sky instructs her to sleep beside her husband's body to conceive children. Following these instructions, Bhadra gives birth to seven sons.

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Also written: Vyushitashvopakhyana, Vyushitashva, Pandu, Kunti, Bhadra, Indra, Devarshi, Akashavani, व्युषिताश्वोपाख्यान