श्रीगणेशाय नमः।

गजेन्द्रोपाख्यान : असहनीय सङ्कट के समय जीवात्मा को मुक्ति कैसे प्राप्त होती है?

शरणागति और आत्म-मुक्ति

श्रीमद्भागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · अष्टम स्कन्ध · अध्याय 2–4 · पृष्ठ 1431–1452

1,569 शब्द · 8 मिनटका पाठ · 25 श्लोक

श्रीशुकदेव ने परीक्षित से कहा

परमार्थ की शिक्षा देने हेतु

श्रीशुकदेव जी ने कहा— हे परीक्षित! उस त्रिकूट पर्वत की शोभा तो देखो। उसके चाँदी, लोहे और सोने के तीन शिखरों की छटा से समुद्र, दिशाएँ और आकाश जगमगाते रहते थे। वहाँ अनगिनत शिखर रत्नों और धातुओं की रङ्ग-बिरङ्गी छटा बिखेरते हुए सब दिशाओं को प्रकाशित कर रहे थे। उस पर्वत पर विविध जातियों के वृक्ष, लताएँ और झाड़ियाँ थीं और झरनों की झर-झर ध्वनि से वह गुञ्जायमान रहता था। समुद्र की लहरें जब पर्वत के निचले भाग से टकरातीं, तो ऐसा जान पड़ता मानो वे पर्वतराज के पाँव पखार रही हों।

श्रीशुक उवाच

स चावनिज्यमानाङ्घ्रिः समन्तात् पयऊर्मिभिः ।
करोति श्यामलां भूमिं हरिन्मरकताश्मभिः ॥

इतनी ही थी । उसके चाँदी, लोहे और सोनेके तीन शिखरोंकी छटासे समुद्र, दिशाएँ और आकाश जगमगाते रहते थे ॥२ ॥ और भी उसके कितने ही शिखर ऐसे थे जो रत्नों और धातुओंकी रंग - बिरंगी छटा दिखाते हुए सब दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे । उनमें विविध जातिके वृक्ष, लताएँ और झाड़ियाँ थीं । झरनोंकी झर - झरसे वह गुंजायमान होता रहता था ॥३ ॥ सब ओरसे समुद्रकी लहरें आ - आकर उस पर्वतके निचले भागसे टकरातीं, उस समय ऐसा जान पड़ता मानो वे पर्वतराजके पाँव पखार रही हों । उस पर्वतके हरे पन्नेके पत्थरोंसे वहाँकी भूमि ऐसी साँवली हो गयी थी, जैसे उसपर हरी - भरी दूब लग रही हो ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · अष्टम स्कन्ध · अध्याय 2 · श्लोक 4पृष्ठ 1432

उस पर्वत की कन्दराओं में सिद्ध, चारण, गन्धर्व, विद्याधर, नाग, किन्नर और अप्सराएँ विहार करते थे। पर्वत की तलहटी में विविध जंहली जानवरों के झुण्ड और देवताओं के उद्यान में पक्षी मधुर कण्ठ से चहकते थे। उस उद्यान में एक बड़ा भारी सरोवर था, जिसमें सुनहले कमल खिल रहे थे और विविध प्रकार के कुमुद, उत्पल, कह्लार एवं शतदल कमलों की अनूठी छटा छिटक रही थी। मतवाले भौरे गूँज रहे थे और हंस, कारण्डव, चक्रवाक तथा सारस के दल भरे हुए थे। मछली और कछुओं के चलने से जब कमल के फूल हिलते, तो उनका पराग झड़कर जल को सुगन्धित बना देता था। वह सरोवर कदम्ब, बेंत और नरकुल के वृक्षों से घिरा हुआ था।

इत्थं गजेन्द्रः स यदाऽऽप संकटं प्राणस्य देही विवशो अपारयन्नात्मविमोक्षणे चिरं यदृच्छया दध्याविमां ' बुद्धिमथाभ्यपद्यत ॥

इस प्रकार देहाभिमानी गजेन्द्र अकस्मात् प्राणसंकटमें पड़ गया और अपनेको छुड़ानेमें सर्वथा असमर्थ हो गया । बहुत देरतक उसने अपने छुटकारेके उपायपर विचार किया, अन्तमें वह इस निश्चयपर पहुँचा ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · अष्टम स्कन्ध · अध्याय 2 · श्लोक 31पृष्ठ 1437

उसी उद्यान में गजेन्द्र नामक एक विशाल हाथी अपने परिवार के साथ रहता था। एक दिन भीषण धूप के कारण गजेन्द्र और उसके साथी प्यास से व्याकुल हो उठे। तभी दूर से ही कमल के पराग से सुवासित वायु की सुगन्ध पाकर वह उसी सरोवर की ओर चल पड़ा। जैसे ही वह सरोवर के तट पर पहुँचा, उसने पहले अपनी सूँड़ से जी भरकर जल पिया और फिर उस निर्मल जल में स्नान करके अपनी थकान मिटाई। भगवान की माया से मोहित होकर गजेन्द्र गृहस्थ पुरुषों की भाँति उन्मत्त हो गया था; वह अपनी सूँड़ से जल की फुहारें छोड़-छोड़कर अपने साथियों को नहलाने लगा। उसे इस बात का बोध ही न था कि उसके सिर पर कितनी बड़ी विपत्ति मँडरा रही है।

देवस्त्रीमज्जनामोदसौरभाम्ब्वनिलैर्युतः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · अष्टम स्कन्ध · अध्याय 2 · श्लोक 8पृष्ठ 1433

तभी प्रारब्ध की प्रेरणा से एक बलवान ग्राह ने क्रोध में भरकर गजेन्द्र का पैर पकड़ लिया। गजेन्द्र ने अपनी पूरी शक्ति लगाकर खुद को छुड़ाने की चेष्टा की, परन्तु वह सफल न हो सका। दूसरे हाथी और हथिनियाँ अपने स्वामी को सङ्कट में देख घबराकर चिल्लाने लगे, पर वे सहायता करने में असमर्थ थे। गजेन्द्र और ग्राह के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया— कभी गजेन्द्र ग्राह को बाहर खींच लाता, तो कभी ग्राह उसे भीतर खींच ले जाता। इस तरह लड़ते-लड़ते एक हजार वर्ष बीत गए, पर दोनों ही जीवित रहे। यह देखकर देवता भी आश्चर्यचकित हो गए।

कुन्दैः कुरबकाशोकैः शिरीषैः कुटजेङ्गुदैः ३ ।
कुब्जकैः स्वर्णयूथीभिर्नागपुन्नागजातिभिः ॥

कुन्द, कुरबक ( कटसरैया ), अशोक, सिरस, वनमल्लिका, लिसौड़ा, हरसिंगार, सोनजूही, नाग, पुन्नाग, जाती, मल्लिका, शतपत्र, माधवी और मोगरा आदि सुन्दर - सुन्दर पुष्पवृक्ष एवं तटके दूसरे वृक्षोंसे भी - जो प्रत्येक ऋतुमें हरे - भरे रहते थे- वह सरोवर शोभायमान रहता था ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · अष्टम स्कन्ध · अध्याय 2 · श्लोक 18पृष्ठ 1434

अन्त में जब गजेन्द्र ने देखा कि वह स्वयं को छुड़ाने में सर्वथा असमर्थ है, तब उसने निश्चय किया— 'यह ग्राह विधाता की फाँसी ही है। जब मेरे बराबर के हाथी मुझे नहीं बचा सके, तो ये बेचारी हथिनियाँ क्या करेंगी? अब मैं सम्पूर्ण विश्व के एकमात्र आश्रय भगवान की ही शरण लेता हूँ। काल बड़ा बली है, जो साँप के समान सबको निगल जाता है; मैं उन्हीं की शरण ग्रहण करता हूँ।'

स्तुति श्रीमद्भागवत महापुराण · अष्टम स्कन्ध · अध्याय 3
श्रीशुक उवाच

एवं व्यवसितो बुद्धया समाधाय मनो हृदि ।
जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम् ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! अपनी बुद्धिसे ऐसा निश्चय करके गजेन्द्रने अपने मनको हृदयमें एकाग्र किया और फिर पूर्वजन्ममें सीखे हुए श्रेष्ठ स्तोत्रके जपद्वारा भगवान्की स्तुति करने लगा ।

श्लोक 1पृष्ठ 1439
गजेन्द्र उवाच

ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम् ।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥

गजेन्द्रने कहा — जो जगत्के मूल कारण हैं और सबके हृदयमें पुरुषके रूपमें विराजमान हैं एवं समस्त जगत्के एकमात्र स्वामी हैं, जिनके कारण इस संसारमें चेतनताका विस्तार होता है — उन भगवान्‌को मैं नमस्कार करता हूँ, प्रेमसे उनका ध्यान करता हूँ ।

श्लोक 2पृष्ठ 1439
गजेन्द्र उवाच

यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम् ।
योऽस्मात् परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम् ॥

श्लोक 3पृष्ठ 1439
गजेन्द्र उवाच

यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं क्वचिद् विभातं क्व च तत् तिरोहितम् ।
अविद्धदृक् साक्ष्युभयं तदीक्षते स आत्ममूलोऽवतु मां परात्परः ॥

श्लोक 4पृष्ठ 1439
गजेन्द्र उवाच

कालेन पञ्चत्वमितेषु कृत्स्नशो लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु ।
तमस्तदाऽऽसीद् गहनं गभीरं यस्तस्य पारेऽभिविराजते विभुः ॥

श्लोक 5पृष्ठ 1439
गजेन्द्र उवाच

न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु-जन्तुः पुनः कोऽर्हति गन्तुमीरितुम् ।
यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥

श्लोक 6पृष्ठ 1439

दिदृक्षवो यस्य पदं सुमङ्गलं विमुक्तसङ्गा मुनयः सुसाधवः ।
चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने भूतात्मभूताः सुहृदः स मे गतिः ॥

श्लोक 7पृष्ठ 1440

न विद्यते यस्य च जन्म कर्म वा न नामरूपे गुणदोष एव वा ।
तथापि लोकाप्ययसंभवाय यः स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति ॥

न उनके जन्म - कर्म हैं और न नाम - रूप; फिर उनके सम्बन्धमें गुण और दोषकी तो कल्पना ही कैसे की जा सकती है? फिर भी विश्वकी सृष्टि और संहार करनेके लिये समय-समयपर वे उन्हें अपनी मायासे स्वीकार करते हैं ।

श्लोक 8पृष्ठ 1440

तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये ।
अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्यकर्मणे ॥

श्लोक 9पृष्ठ 1440

नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥

श्लोक 10पृष्ठ 1441

सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता ।
नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥

विवेकी पुरुष कर्म - संन्यास अथवा कर्म - समर्पणके द्वारा अपना अन्तःकरण शुद्ध करके जिन्हें प्राप्त करते हैं तथा जो स्वयं तो नित्यमुक्त, परमानन्द एवं ज्ञानस्वरूप हैं ही, दूसरोंको कैवल्य - मुक्ति देनेकी सामर्थ्य भी केवल उन्हींमें है— उन प्रभुको मैं नमस्कार करता हूँ ।

श्लोक 11पृष्ठ 1441

नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे ।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥

जो सत्त्व, रज, तम – इन तीन गुणोंका धर्म स्वीकार करके क्रमशः शान्त, घोर और मूढ़ अवस्था भी धारण करते हैं, उन भेदरहित समभावसे स्थित एवं ज्ञानघन प्रभुको मैं बार - बार नमस्कार करता हूँ ।

श्लोक 12पृष्ठ 1441

क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे ।
पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः ॥

आप सबके स्वामी, समस्त क्षेत्रोंके एकमात्र ज्ञाता एवं सर्वसाक्षी हैं, आपको मैं नमस्कार करता हूँ । आप स्वयं ही अपने कारण हैं । पुरुष और मूल प्रकृतिके रूपमें भी आप ही हैं । आपको मेरा बार - बार नमस्कार ।

श्लोक 13पृष्ठ 1441

सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे ।
असताच्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः ॥

आप समस्त इन्द्रिय और उनके विषयोंके द्रष्टा हैं, समस्त प्रतीतियोंके आधार हैं । अहंकार आदि छायारूप असत् वस्तुओंके द्वारा आपका ही अस्तित्व प्रकट होता है । समस्त वस्तुओंकी सत्ताके रूपमें भी केवल आप ही भास रहे हैं । मैं आपको नमस्कार करता हूँ ।

श्लोक 14पृष्ठ 1441

इस स्तुतिके श्लोक 1–33 में से आरम्भके 14 यहाँ दिये गये हैं। पूरी स्तुति मूल ग्रन्थमें पढ़ें →

अपनी बुद्धि को हृदय में एकाग्र करके गजेन्द्र ने पूर्वजन्म में सीखे हुए श्रेष्ठ स्तोत्र के द्वारा भगवान की स्तुति प्रारम्भ की:

न मामिमे ज्ञातय आतुरं गजाः कुतः करिण्यः प्रभवन्ति मोचितुम् ।
ग्राहेण पाशेन विधातुरावृतो-ऽप्यहं च तं यामि परं परायणम् ॥

‘ यह ग्राह विधाताकी फाँसी ही है । इसमें फँसकर मैं आतुर हो रहा हूँ । जब मुझे मेरे बराबरके हाथी भी इस विपत्तिसे न उबार सके तब ये बेचारी हथिनियाँ तो छुड़ा ही कैसे सकती हैं । इसलिये अब मैं सम्पूर्ण विश्वके एकमात्र आश्रय भगवान्की ही शरण लेता हूँ ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · अष्टम स्कन्ध · अध्याय 2 · श्लोक 32पृष्ठ 1437

"जो जगत् के मूल कारण हैं, सबके हृदय में पुरुष रूप में विराजमान हैं और समस्त जगत् के एकमात्र स्वामी हैं— उन भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ। वे नट की भाँति अनेकों वेष धारण करते हैं, जिनका वास्तविक स्वरूप न देवता जानते हैं न ऋषि; वे प्रभु मेरी रक्षा करें। महात्मागण जिनके मङ्गलमय दर्शन के लिए संसार की आसक्तियों का त्याग कर वन में अलौकिक व्रतों का पालन करते हैं— वे ही मेरे सहायक और मेरी गति हैं। वे अरूप होकर भी बहुरूप हैं, उनके कर्म आश्चर्यमय हैं; मैं उनके चरणों में नमस्कार करता हूँ। जो मन, वाणी और चित्त से अत्यन्त दूर हैं, उन स्वयम्प्रकाश परमात्मा को मैं नमस्कार करता हूँ। जो विवेकी पुरुष कर्म-सन्न्यास द्वारा अपने अन्तःकरण को शुद्ध करके उन्हें प्राप्त करते हैं— वे ही कैवल्य और मुक्ति देने की सामर्थ्य रखते हैं। आप सबके स्वामी, समस्त क्षेत्रों के ज्ञाता और सर्वसाक्षी हैं; आपको मेरा बार-बार नमस्कार है।"

"प्रभो! आपकी तीन शक्तियों—सत्त्व, रज और तम के रागादि वेग असह्य हैं। समस्त इन्द्रियों और मन के विषयों के रूप में भी आप ही प्रतीत हो रहे हैं। इसलिये जिनकी इन्द्रियाँ वश में नहीं हैं, वे तो आपकी प्राप्ति का मार्ग भी नहीं पा सकते। आपकी शक्ति अनन्त है। आप शरणागतवत्सल हैं। आपको मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ।"

गजेन्द्र की यह व्याकुल पुकार थी। वह जानता था कि उसकी यह हाथी की योनि बाहर और भीतर—सब ओर से अज्ञान रूपी आवरण से ढकी हुई है। इस आवरण को रखकर करना ही क्या है? वह तो केवल उस अज्ञान से छूटना चाहता था जो कालक्रम से अपने आप नहीं छूट सकता, जिसे केवल भगवत् कृपा अथवा तत्त्वज्ञान से ही नष्ट किया जा सकता है। "मैं उन परब्रह्म परमात्मा की शरण में हूँ जो विश्वरहित होने पर भी विश्व के रचयिता और विश्व स्वरूप हैं; जो विश्व की अन्तरात्मा के रूप में विश्व रूप सामग्री से क्रीड़ा करते रहते हैं। उन अजन्मा परमपद स्वरूप ब्रह्म को मैं नमस्कार करता हूँ।"

"हे योगेश्वर! जो योगी कर्म, कर्म वासना और कर्म फल को भस्म करके अपने योग शुद्ध हृदय में आपका साक्षात्कार करते हैं, उन प्रभु को मैं नमस्कार करता हूँ।" गजेन्द्र की स्तुति निर्विशेष थी। वह जानता था कि यज्ञ के काष्ठ में अग्नि कैसे गुप्त रहती है, वैसे ही भगवान ने अपने ज्ञान को गुणों की माया से ढक रखा है। "जो लोग कर्म-सन्न्यास अथवा कर्म-समर्पण द्वारा आत्म तत्व की भावना करके वेद-शास्त्रों से ऊपर उठ जाते हैं, वे आपके आत्मा के रूप में स्वयं ही प्रकाशित हो जाते हैं। गुरुजन, गृह, सम्पत्ति और स्वजनों में आसक्त लोगों के लिए आपकी प्राप्ति अत्यन्त कठिन है, क्योंकि आप गुणों की आसक्ति से रहित हैं।"

गजेन्द्र ने आगे कहा—"हे परम दयालु प्रभु! मेरा उद्धार करें। आपके अनन्य प्रेमी भक्त तो आपकी शरण में रहकर मोक्ष की भी अभिलाषा नहीं करते, वे केवल आपकी दिव्य मङ्गलमयी लीलाओं का गान करते हुए आनन्द के समुद्र में निमग्न रहते हैं।" वह उस अविनाशी, सर्वशक्तिमान और सूक्ष्म परमात्मा की स्तुति कर रहा था जो इन्द्रियातीत है। "आपकी किरणें बार-बार निकलती और लीन होती रहती हैं, वैसे ही जिनसे बुद्धि, मन, इन्द्रिय और शरीर प्रकट होते हैं; वे न देवता हैं, न असुर, न मनुष्य, न पशु-पक्षी, न स्त्री, न पुरुष और न नपुंसक। सबका निषेध हो जाने पर जो बचता है, वही आपका स्वरूप है। वे ही परमात्मा मेरे उद्धार के लिये प्रकट हों।"

उस समय गजेन्द्र की यह स्तुति सुनकर ब्रह्मा आदि देवता उसकी रक्षा के लिए नहीं आए, क्योंकि उसने भिन्न-भिन्न नाम और रूप को अपना स्वरूप मान लिया था। पर जब वह सर्वात्मा होने के कारण स्वयं भगवान श्रीहरि प्रकट हुए। विश्व के एकमात्र आधार भगवान ने देखा कि गजेन्द्र अत्यन्त पीड़ित हो रहा है। वेदमय गरुड़ पर सवार होकर, हाथ में चक्र लिए भगवान बड़ी शीघ्रता से वहाँ के लिए चल पड़े जहाँ गजेन्द्र सङ्कट में था।

आकाश में गरुड़ पर सवार होकर आते भगवान को देखकर, गजेन्द्र ने अपनी सूँड़ में कमल का एक सुन्दर पुष्प लेकर ऊपर उठाया और बड़े कष्ट से बोला—"नारायण! जगद्गुरु! भगवन! आपको नमस्कार है!" भगवान ने देखा कि गजेन्द्र अत्यन्त पीड़ित है, तो वे गरुड़ को छोड़कर कूद पड़े और बड़ी शीघ्रता से गजेन्द्र के साथ ग्राह को भी सरोवर से बाहर ले आए। सब देवताओं के सामने ही भगवान श्रीहरि ने अपने चक्र से ग्राह का मुँह फाड़ दिया और गजेन्द्र को मुक्त कर दिया।

स्तुति श्रीशुक उवाच

नेदुर्दुन्दुभयो दिव्या गन्धर्वा ननृतुर्जगुः ।
ऋषयश्चारणाः सिद्धास्तुष्टुवुः पुरुषोत्तमम् ॥

स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं, गन्धर्व नाचने - गाने लगे, ऋषि, चारण और सिद्धगण भगवान् पुरुषोत्तमकी स्तुति करने लगे ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · अष्टम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 2पृष्ठ 1448

उस समय ब्रह्मा, शङ्कर आदि देवता, ऋषि और गन्धर्व भगवान की इस लीला की प्रशंसा करने लगे और उन पर फूलों की वर्षा की। स्वर्ग में दुन्दुभियाँ बजने लगीं, गन्धर्व नाचने-गाने लगे और ऋषि, चारण तथा सिद्धगण भगवान पुरुषोत्तम की स्तुति करने लगे। उधर वह ग्राह तुरन्त ही एक दिव्य शरीर से सम्पन्न हो गया। वह 'हूहू' नामक एक श्रेष्ठ गन्धर्व था, जो देवल के शाप से हाथी बना था, पर अब भगवान की कृपा से मुक्त हो गया। उसने भगवान के चरणों में सिर रखकर प्रणाम किया और उनके सुयश का गान करने लगा।

श्रीशुक उवाच

तदा देवर्षिगन्धर्वा ब्रह्मेशानपुरोगमाः ।
मुमुचुः कुसुमासारं शंसन्तः कर्म तद्धरेः ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! उस समय ब्रह्मा, शंकर आदि देवता, ऋषि और गन्धर्व श्रीहरि भगवान्के इस कर्मकी प्रशंसा करने लगे तथा उनके ऊपर फूलोंकी वर्षा करने लगे ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · अष्टम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 1पृष्ठ 1448

भगवान के कृपापूर्ण स्पर्श से गजेन्द्र के सारे पाप-ताप नष्ट हो गए। उसने भगवान की परिक्रमा करके चरणों में प्रणाम किया और देखते ही देखते अपने लोक की यात्रा कर ली। गजेन्द्र को भी भगवान का स्पर्श मिलते ही अज्ञान के बन्धन से मुक्ति मिल गई; उसे भगवान का ही रूप प्राप्त हुआ—वह पीताम्बरधारी और चतुर्भुज बन गया।

श्रीशुक उवाच

योऽसौ ग्राहः स वै सद्यः परमाश्चर्यरूपधृक् ।
मुक्तो देवलशापेन हूहूर्गन्धर्वसत्तमः ॥

इधर वह ग्राह तुरंत ही परम आश्चर्यमय दिव्य शरीरसे सम्पन्न हो गया । यह ग्राह इसके पहले ' हूहू ' नामका एक श्रेष्ठ गन्धर्व था । देवलके शापसे उसे यह गति प्राप्त हुई थी । अब भगवान्‌की कृपासे वह मुक्त हो गया ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · अष्टम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 3पृष्ठ 1448

गजेन्द्र पूर्व जन्म में द्रविड देश का पाण्ड्यवंशी राजा था, जिसका नाम इन्द्रद्युम्न था। वह भगवान का श्रेष्ठ उपासक था। उसी समय दैवयोग से अगस्त्य मुनि अपनी शिष्य मण्डली के साथ वहाँ पहुँचे। उन्होंने देखा कि राजा इन्द्रद्युम्न परोपकार त्याग कर एकान्त में तपस्या कर रहा है। वे क्रोधित होकर बोले—"इस राजा ने गुरुजनों से शिक्षा नहीं ली है, यह अभिमानवश मनमानी कर रहा है और ब्राह्मणों का अपमान करने वाला हाथी के समान जड़ बुद्धि है; इसलिये इसे वही घोर अज्ञानमयी हाथी की योनि प्राप्त हो!"

प्राप्तो भगवतो रूपं पीतवासाश्चतुर्भुजः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · अष्टम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 6पृष्ठ 1449

शाप देकर अगस्त्य ऋषि चले गए। इन्द्रद्युम्न ने सन्तोष किया कि यह उनका प्रारब्ध था। इसी कारण उन्हें हाथी की योनि मिली, पर भगवान की आराधना का ऐसा प्रभाव था कि हाथी होने पर भी उन्हें भगवान की स्मृति बनी रही।

एवं विमोक्ष्य गजयूथपमब्जनाभ-स्तेनापि पार्षदगतिं गमितेन युक्तः ।
गन्धर्वसिद्धविबुधैरुपगीयमान-कर्माद्भुतं स्वभवनं गरुडासनोऽगात् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · अष्टम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 13पृष्ठ 1450

भगवान ने गजेन्द्र को सम्बोधित करते हुए कहा—"प्यारे गजेन्द्र! जो लोग ब्राह्ममुहूर्त में जगकर तुम्हारी की हुई स्तुति से मेरा स्तवन करेंगे, मृत्यु के समय उन्हें मैं निर्मल बुद्धि का दान करूँगा।" भगवान ने यह कहकर देवताओं को आनन्दित किया, अपना श्रेष्ठ शङ्ख बजाया और गरुड़ पर सवार होकर अपने अलौकिक धाम चले गए।

स्तुति

मां स्तुवन्त्यनेनाङ्ग प्रतिबुध्य निशात्यये ।
तेषां प्राणात्यये चाहं ददामि विमलां मतिम् ॥

प्यारे गजेन्द्र! जो लोग ब्राह्ममुहूर्तमें जगकर तुम्हारी की हुई स्तुतिसे मेरा स्तवन करेंगे, मृत्युके समय उन्हें मैं निर्मल बुद्धिका दान करूँगा ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · अष्टम स्कन्ध · अध्याय 4 · श्लोक 25पृष्ठ 1452

In English

The Story of Gajendra the Elephant

Gajendra, a large elephant, gets caught in a struggle with a powerful crocodile in a lake. After fighting for a thousand years, Gajendra prays to Lord Vishnu for help. Lord Vishnu arrives on Garuda, kills the crocodile, and rescues the elephant.

This page answers

  • How did gajendra become an elephant?
  • Why did lord vishnu save gajendra?
  • Who was the crocodile in the lake?
  • What happened to the king indradyumna?

Also written: Gajendropakhyana, Gajendra, Graha, Garuda, Parikshita, Huhu, गजेन्द्रोपाख्यान