प्रचेतसोपाख्यान : गृहस्थी के मोह में फंसकर आध्यात्मिक लक्ष्य को कैसे पुनः प्राप्त करें?
आत्मज्ञान और भक्ति का पुनर्जागरण
श्रीमद्भागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 31 · पृष्ठ 918–935
1,427 शब्द · 8 मिनटका पाठ · 20 श्लोक
मैत्रेय ने विदुर से कहा
परमार्थ की प्राप्ति हेतु प्रचेताओं के आध्यात्मिक उत्थान की कथा सुनाने हेतु
विदुरजी ने पूछा—'हे ब्रह्मन्! आपने राजा प्राचीनबर्हि के जिन पुत्रों का वर्णन किया था, उन्होंने रुद्रगीत के द्वारा श्रीहरि की स्तुति करके क्या सिद्धि प्राप्त की? मोक्ष के अधिपति श्रीनारायण के अत्यन्त प्रिय भगवान शङ्कर का आकस्मिक सान्निध्य पाकर उन प्रचेताओं ने मुक्ति तो प्राप्त की ही होगी; किन्तु इससे पूर्व उन्होंने इस लोक में अथवा परलोक में क्या पाया—वह बतलाने की कृपा करें।'
अध्यात्मपारोक्ष्यमिदं मयाधिगतमद्भुतम् ।
एवं स्त्रियाऽऽश्रमः पुंसश्छिन्नोऽमुत्र च संशयः ॥
विदुरजी! गृहस्थाश्रमी पुरंजनके रूपकसे परोक्षरूपमें कहा हुआ यह अद्भुत आत्मज्ञान मैंने गुरुजीकी कृपासे प्राप्त किया था । इसका तात्पर्य समझ लेनेसे बुद्धियुक्त जीवका देहाभिमान निवृत्त हो जाता है तथा उसका ' परलोकमें जीव किस प्रकार कर्मोंका फल भोगता है ' यह संशय भी मिट जाता है ।
मैत्रेयजी बोले—विदुरजी! राजा प्राचीनबर्हि ने प्रजापालन का भार अपने पुत्रों को सौंपकर उन्हें कपिलाश्रम भेज दिया। उन वीरवर ने समस्त विषयों की आसक्ति त्याग दी थी। वे एकाग्र मन से भक्तिपूर्वक श्रीहरि के चरण कमलों का चिन्तन करते हुए तपस्या में लीन हो गए। दस हजार वर्ष बीत जाने पर, जब उनके तप ने भगवान को प्रसन्न कर लिया, तब पुराणपुरुष श्रीनारायण अपनी मनोहर कान्ति द्वारा उनके तपस्याजनित क्लेश को शान्त करने हेतु सौम्य विग्रह से उनके सामने प्रकट हुए।
किं बार्हस्पत्येह परत्र वाथ कैवल्यनाथप्रियपार्श्ववर्तिनः ।
आसाद्य देवं गिरिशं यदृच्छया प्रापुः परं नूनमथ प्रचेतसः ॥
विदुरजीने पूछा- ब्रह्मन्! आपने राजा प्राचीनबर्हिके जिन पुत्रोंका वर्णन किया था, उन्होंने रुद्रगीतके द्वारा श्रीहरिकी स्तुति करके क्या सिद्धि प्राप्त की? ॥१ ॥ बार्हस्पत्य! मोक्षाधिपति श्रीनारायणके अत्यन्त प्रिय भगवान् शंकरका अकस्मात् सान्निध्य प्राप्त करके प्रचेताओंने मुक्ति तो प्राप्त की ही होगी; इससे पहले इस लोकमें अथवा परलोकमें भी उन्होंने क्या पाया — वह बतलानेकी कृपा करें ।
प्रचेतसोऽन्तरुदधौ पितुरादेशकारिणः ।
जपयज्ञेन तपसा पुरंजनमतोषयन् ॥
दशवर्षसहस्रान्ते पुरुषस्तु सनातनः ।
तेषामाविरभूत्कृच्छ्रं शान्तेन शमयन् रुचा ॥
सुपर्णस्कन्धमारूढो मेरुशृंगमिवाम्बुदः ।
पीतवासा मणिग्रीवः कुर्वन् वितिमिरा दिशः ॥
काशिष्णुना कनकवर्णविभूषणेन भ्राजत्कपोलवदनो विलसत्किरीटः ।
अष्टायुधैरनुचरैर्मुनिभिः सुरेन्द्रै-रासेवितो गरुडकिन्नरगीतकीर्तिः ॥
पीनायताष्टभुजमण्डलमध्यलक्ष्म्या स्पर्धच्छ्रिया परिवृतो वनमालयाऽऽद्यः ।
बर्हिष्मतः पुरुष आह सुतान् प्रपन्नान् पर्जन्यनादरुतया सघृणावलोकः ॥
श्रीभगवानुवाच वरं वृणीध्वं भद्रं वो यूयं मे नृपनन्दनाः ।
सौहार्देनापृथग्धर्मास्तुष्टोऽहं सौहृदेन वः ॥
योऽनुस्मरति सन्ध्यायां युष्माननुदिनं नरः ।
तस्य भ्रातृष्वात्मसाम्यं तथा भूतेषु सौहृदम् ॥
ये तु मां रुद्रगीतेन सायं प्रातः समाहिताः ।
स्तुवन्त्यहं कामवरान्दास्ये प्रज्ञां च शोभनाम् ॥
द्यूयं पितुरादेशमग्रहीष्ट मुदान्विताः ।
अथो व उशती कीर्तिर्लोकाननु भविष्यति ॥
भविता विश्रुतः पुत्रोऽनवमो ब्रह्मणो गुणैः ।
य एतामात्मवीर्येण त्रिलोकीं पूरयिष्यति ॥
कण्डोः प्रम्लोचया लब्धा कन्या कमललोचना ।
तां चापविद्धां जगृहुर्भूरुहा नृपनन्दनाः ॥
क्षुत्क्षामाया मुखे राजा सोमः पीयूषवर्षिणीम् ।
देशिनीं रोदमानाया निदधे स दयान्वितः ॥
प्रजाविसर्ग आदिष्टाः पित्रा मामनुवर्तता ।
तत्र कन्यां वरारोहां तामुद्वहत माचिरम् ॥
तुम्हारे पिता आजकल मेरी सेवा ( भक्ति ) - में लगे हुए हैं; उन्होंने तुम्हें सन्तान उत्पन्न करनेकी आज्ञा दी है । अतः तुम शीघ्र ही उस देवोपम सुन्दरी कन्यासे विवाह कर लो ।
इस स्तुतिके श्लोक 2–42 में से आरम्भके 14 यहाँ दिये गये हैं। पूरी स्तुति मूल ग्रन्थमें पढ़ें →
भगवान गरुड़जी के कन्धे पर विराजमान थे; उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो सुमेरु के शिखर पर कोई श्याम घटा छायी हो। उनके श्रीअङ्ग में मनोहर पीताम्बर और कण्ठ में कौस्तुभमणि सुशोभित थी। उनकी दिव्य प्रभासा समस्त दिशाओं का अन्धकार दूर कर रही थी। सुवर्णमय आभूषणों से युक्त उनके कमनीय कपोल, मनोहर मुखमण्डल और मस्तक पर झिलमिलाता मुकुट उनकी अपूर्व शोभा बढ़ा रहा था। आठ भुजाओं वाले प्रभु के आयुध चमक रहे थे और देवता, मुनि एवं पार्षदगण सेवा में उपस्थित थे। गरुड़जी के पङ्खों की ध्वनि किन्नरों की भाँति कीर्तिगान कर रही थी। अपनी आठ लम्बी-लम्बी स्थूल भुजाओं के बीच लक्ष्मीजी से स्पर्धा करने वाली वनमाला धारण किए हुए आदिपुरुष श्रीनारायण ने अपने शरणागत प्रचेताओं की ओर दयादृष्टि से निहारा और मेघ के समान गम्भीर वाणी में कहा—'मुझसे वर माँगो!'
ये त्वयाभिहिता ब्रह्मन् सुताः प्राचीनबर्हिषः ।
ते रुद्रगीतेन हरिं सिद्धिमापुः प्रतोष्य काम् ॥
प्रचेताओं ने हाथ जोड़कर, गद्गद वाणी से भगवान की स्तुति की। उन्होंने कहा—'हे विष्णु! हे महादेवरूप! हम आपको नमस्कार करते हैं। आप विशुद्ध सत्त्वस्वरूप हैं और आपका ज्ञान संसार-बन्धन को दूर कर देता है। आप ही समस्त भागवतों के प्रभु वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण हैं। आपकी नाभि से ब्रह्माण्ड रूपी कमल प्रकट हुआ है, आपके कण्ठ में कमलकुसुमों की माला सुशोभित है और आपके चरण अत्यन्त कोमल हैं। आप कमलकुसुम की केसर के समान स्वच्छ पीताम्बर धारण किए हुए हैं और समस्त भूतों के आश्रयस्थान एवं साक्षी हैं। हम आपको नमस्कार करते हैं!'
प्रचेताओं ने आगे कहा—'हे नाथ! आप प्रकृति आदि से परे हैं और आपकी विभूतियों का कोई अन्त नहीं है, इसलिए आप अनन्त कहे जाते हैं। आपके भक्तों के क्षणभर के सङ्ग के सामने स्वर्ग और मोक्ष भी कुछ नहीं हैं। भगवद्भक्तों के समाज में सदा भगवान की मधुर-मधुर कथाएँ होती रहती हैं, जिनके श्रवण मात्र से भोग-तृष्णा शान्त हो जाती है। वहाँ प्राणियों में किसी प्रकार का वैर या उद्वेग नहीं रहता। आपके वे भक्त जो तीर्थों को पवित्र करने हेतु पृथ्वी पर पैदल विचरते हैं, उनका समागम संसार से भयभीत हुए पुरुषों को कितना रुचिकर होगा! हे जगदीश्वर! आप मोक्ष का मार्ग दिखाने वाले और स्वयं पुरुषार्थ स्वरूप हैं। आप हम पर प्रसन्न हैं, इससे बढ़कर हमें और क्या चाहिए? बस, हमारा अभीष्ट वर तो आपकी प्रसन्नता ही है। तथापि, नाथ! हम एक वर आपसे अवश्य माँगते हैं।"'
भगवान ने प्रचेताओं की निस्वार्थ भावना देखकर कहा—'जो पुरुष सायङ्काल के समय प्रतिदिन तुम्हारा स्मरण करेगा, उसका अपने भाइयों में अपने ही समान प्रेम होगा और समस्त जीवों के प्रति मित्रता का भाव होगा। जो लोग सायङ्काल और प्रातःकाल एकाग्रचित्त से रुद्रगीत द्वारा मेरी स्तुति करेंगे, उनको मैं अभीष्ट वर और शुद्ध बुद्धि प्रदान करूँगा। तुम लोगों ने बड़ी प्रसन्नता से अपने पिता की आज्ञा शिरोधार्य की है, इससे तुम्हारी कमनीय कीर्ति समस्त लोकों में फैल जाएगी। तुम्हारे एक अत्यन्त विख्यात पुत्र होगा, जो गुणों में ब्रह्माजी से कम नहीं होगा और अपनी सन्तान से तीनों लोकों को पूर्ण कर देगा।'
भगवान ने आगे बताया—'राजकुमारों! कण्डु ऋषि के तपोनाश के लिए इन्द्र द्वारा भेजी गई प्रम्लोचा अप्सरा से एक कमलनयनी कन्या उत्पन्न हुई थी, जिसे छोड़कर वह स्वर्गलोक चली गई। तब वृक्षों ने उस कन्या को पाला-पोसा। जब वह भूख से व्याकुल होकर रोने लगी, तब औषधियों के राजा चन्द्र ने दयावश उसे अपनी अमृतवर्षिणी तर्जनी अँगुली दे दी। तुम्हारे पिता आजकल मेरी भक्ति में लगे हुए हैं और उन्होंने तुम्हें सन्तान उत्पन्न करने की आज्ञा दी है; अतः तुम शीघ्र ही उस देवोपम सुन्दरी कन्या से विवाह कर लो। अविचल भक्ति से हृदय का समस्त वासनारूप मल दग्ध हो जाने पर तुम इस लोक तथा परलोक के नरक तुल्य भोगों से उपरत होकर मेरे परमधाम को जाओगे।'
ते च ब्रह्मण आदेशान्मारिषामुपयेमिरे ।
यस्यां महदवज्ञानादजन्यजनयोनिजः ॥
श्रीमद्भागवत महापुराण के इस प्रसङ्ग में श्रीमैत्रेय जी विदुर जी को बताते हैं कि ब्रह्माजी की आज्ञा से प्रचेताओं ने मारिषा से विवाह किया। उस दिव्य कन्या के गर्भ से 'दक्ष' का जन्म हुआ; वह बालक इतना तेजस्वी था कि उसने जन्म लेते ही अपनी कान्ति से समस्त तेजस्वियों का तेज छीन लिया। अपने कार्यों में अत्यन्त कुशल होने के कारण ही उसका नाम 'दक्ष' पड़ा और ब्रह्माजी ने उसे प्रजापतियों के नायक के पद पर अभिषिक्त कर सृष्टि की रक्षा हेतु नियुक्त किया।
यो जायमानः सर्वेषां तेजस्तेजस्विनां रुचा ।
स्वयोपादत्त दाक्ष्याच्च कर्मणां दक्षमब्रुवन् ॥
दस लाख वर्ष बीत जाने पर, जब प्रचेताओं को विवेक हुआ, तब उन्हें भगवान् के उन वाक्यों की स्मृति हुई जो उन्होंने पूर्व में कहे थे। गृहस्थी के मोह में आसक्त होने के कारण वे उस उपदेश को भूल चुके थे। अतः वे अपनी भार्या मारिषा को पुत्र के पास छोड़कर तुरन्त घर से निकल पड़े। उन्होंने अपने प्राण, मन, वाणी और दृष्टि को वश में किया; शरीर को निश्चेष्ट, स्थिर और सीधा रखते हुए आसन को जीतकर अपना चित्त विशुद्ध परब्रह्म में लीन कर दिया।
तं प्रजासर्गरक्षायामनादिरभिषिच्य च ।
युयोज युयुजेऽन्यांश्च स वै सर्वप्रजापतीन् ॥
ऐसी तपस्वी अवस्था में उन्हें देवर्षि नारदजी ने देखा। नारद जी को आते देख प्रचेतागण तुरन्त खड़े हो गए और श्रद्धापूर्वक उनका आदर-सत्कार करते हुए देश-कालानुसार विधिवत् पूजा की। जब नारद जी सुखपूर्वक बैठ गए, तब प्रचेताओं ने विनम्रता से कहा— "देवर्षे! आपका स्वागत है, आज बड़े भाग्य से हमें आपका दर्शन हुआ। हे ब्रह्मन्! सूर्य के समान आपका यह घूमना-फिरना समस्त जीवों को ज्ञानालोक के माध्यम से अभय प्रदान करने के लिए ही होता है। प्रभो! भगवान् शङ्कर और श्रीविष्णु ने हमें जो उपदेश दिया था, उसे गृहस्थी में आसक्त रहने के कारण हम भूल गए हैं। अतः आप हमारे हृदयों में उस परमार्थ-तत्त्व का साक्षात्कार कराने वाले अध्यात्मज्ञान को फिर से प्रकाशित कर दीजिए, जिससे हम इस दुस्तर संसार-सागर से सुगमता से पार उतर सकें।"
भगवान्मय श्रीनारदजी, जिनका चित्त सदैव भगवान् श्रीकृष्ण में ही लगा रहता है, प्रचेताओं के इन वचनों को सुनकर उन्हें ज्ञान का मार्ग बताते हुए कहने लगे— "प्राणियों की प्रिय आत्मा श्रीभगवान् ही हैं। जिस प्रकार वृक्ष की जड़ को सींचने से उसके तना और शाखाओं का पोषण होता है, या भोजन से इन्द्रियाँ पुष्ट होती हैं, उसी प्रकार श्रीभगवान् की पूजा ही सबकी वास्तविक पूजा है। जिस प्रकार वर्षाकाल में जल सूर्य के ताप से उत्पन्न होकर ग्रीष्म ऋतु में पुनः उसी में मिल जाता है, और समस्त चराचर भूत पृथ्वी से उत्पन्न होकर अन्ततः उसी में मिल जाते हैं; ठीक वैसे ही यह समस्त चेतना-प्रपञ्च श्रीहरि से ही उत्पन्न होता है और उन्हीं में लीन हो जाता है। इस प्रवाह के बीच आकाश के समान परमात्मा में कोई विकार नहीं होता।"
नारद जी ने आगे विस्तार से समझाया— "अतः तुम ब्रह्मा आदि समस्त लोकपालों के भी अधीश्वर श्रीहरि को अपने से अभिन्न मानते हुए भजो; क्योंकि वे ही समस्त देहधारियों के एकमात्र आत्मा हैं। वे ही जगत के निमित्त, उपादान और नियन्त्रता पुरुषोत्तम हैं तथा अपनी कालशक्ति से इस प्रपञ्च का संहार कर देते हैं। जो भक्त दयालु होकर भगवान् की शरण में रहते हैं, जो जो मिल जाए उसमें सन्तुष्ट रहते हैं और अपनी इन्द्रियों को विषयों से निवृत्त करके शान्त कर लेते हैं, वे शीघ्र ही प्रभु को प्रसन्न कर लेते हैं। ऐसे सन्तों के शुद्ध हृदय में, जिनके भीतर से पुत्र आदि की वासनाएँ निकल चुकी हैं, भगवान् स्वयं खिञ्चकर चले आते हैं। वे परम रसज्ञ हैं और अपने भक्तों की भक्ताधीनता का माधुर्य उन्हें भली-भाँति ज्ञात है। जो लोग धन, कुल या कर्म के मद में डूबे हुए ऐसे निष्किञ्चन साधुओं का तिरस्कार करते हैं, उनकी पूजा प्रभु कदापि स्वीकार नहीं करते।"
इति प्रचेतोभिरभिष्टुतो हरिः प्रीतस्तथेत्याह शरण्यवत्सलः ।
अनिच्छतां यानमतृप्तचक्षुषां ययौ स्वधामानपवर्गवीर्यः ॥
नारद जी ने आगे कहा— "भगवान् स्वरूपानन्द से परिपूर्ण हैं; उन्हें लक्ष्मीजी की सेवा या देवताओं की भी परवाह नहीं है, फिर भी वे अपने भक्तों के वश में रहते हैं। ऐसे करुणा-सागर श्रीहरि को कोई कृतज्ञ पुरुष क्षण भर के लिए भी कैसे छोड़ सकता है?"
नारद जी ने प्रचेताओं को भगवत्-सम्बन्धी अनेक बातें सुनाईं और उसके पश्चात वे ब्रह्मलोक को चले गए। प्रचेतागण भी उनके मुख से सम्पूर्ण जगत के पाप रूपी मल को दूर करने वाले इस पवित्र चरित्र को सुनकर भगवान् के चरणकमलों का चिन्तन करने लगे और अन्ततः परम पद यानी भगवद्धाम को प्राप्त हुए।
श्रीमैत्रेय जी कहते हैं— "विदुर जी! इस प्रकार मैंने आपसे प्रचेताओं के भगवत्-कथा सम्बन्धी संवाद सुना दिया है।"
In English
The Story of the Prachetas and Narada
The sons of King Prachinabarhi perform intense penance to please Lord Vishnu. After receiving a boon and fathering a son named Daksha, they temporarily forget their spiritual goals due to worldly life. Later, after being visited by Narada, they return to their meditation and eventually reach the supreme abode of Vishnu.
This page answers
- How did lord vishnu appear to the prachetas?
- Who was the son born to the prachetas?
- What did narada tell the prachetas about worshiping vishnu?
- Why did the prachetas leave their family and return to penance?
Also written: Prachetasopakhyana, Prachetasa, Pracheta, Brahma, Daksha, Marisha, प्रचेतसोपाख्यान