श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ — पृष्ठ 931–940

श्रीमद्भागवत महापुराण - १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 931–940

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किं वा योगेन सांख्येन न्यासस्वाध्याययोरपि ।

किं वा श्रेयोभिरन्यैश्च न यत्रात्मप्रदो हरिः ॥ १२

श्रेयसामपि सर्वेषामात्मा ह्यवधिरर्थतः ।

सर्वेषामपि भूतानां हरिरात्माऽऽत्मदः ५ प्रियः ॥१३

यथा तरोर्मूलनिषेचनेन तृप्यन्ति तत्स्कन्धभुजोपशाखाः । प्राणोपहाराच्च यथेन्द्रियाणां तथैव सर्वार्हणमच्युतेज्या ॥ १४ यथैव सूर्यात्प्रभवन्ति वारः पुनश्च तस्मिन् प्रविशन्ति काले । भूतानि भूमौ स्थिरजंगमानि तथा हरावेव गुणप्रवाहः ॥१५ श्रीमैत्रेयजी कहते हैं— भगवन्मय श्रीनारदजीका चित्त सर्वदा भगवान् श्रीकृष्णमें ही लगा रहता है । वे प्रचेताओंके इस प्रकार पूछनेपर उनसे कहने लगे ॥८ ॥

श्रीनारदजीने कहा — राजाओ! इस लोकमें मनुष्यका वही जन्म, वही कर्म, वही आयु, वही मन और वही वाणी सफल है, जिसके द्वारा सर्वात्मा सर्वेश्वर श्रीहरिका सेवन किया जाता है ॥९ ॥ जिनके द्वारा अपने स्वरूपका साक्षात्कार करानेवाले श्रीहरिको प्राप्त न किया

जाय, उन माता - पिताकी पवित्रतासे, यज्ञोपवीत - संस्कारसे एवं यज्ञदीक्षासे प्राप्त होनेवाले उन तीन प्रकारके श्रेष्ठ जन्मोंसे, वेदोक्त कर्मोंसे, देवताओंके समान दीर्घ आयुसे, शास्त्रज्ञानसे, तपसे, वाणीकी चतुराईसे, अनेक प्रकारकी बातें याद रखनेकी शक्तिसे, तीव्र बुद्धिसे, बलसे, इन्द्रियोंकी पटुतासे, योगसे, सांख्य ( आत्मानात्मविवेक ) - से, संन्यास और वेदाध्ययनसे तथा व्रत - वैराग्यादि अन्य कल्याण - साधनोंसे भी पुरुषका क्या लाभ है? ॥१०-१२ ॥ वास्तवमें समस्त कल्याणोंकी अवधि आत्मा ही है और आत्मज्ञान प्रदान करनेवाले श्रीहरि ही सम्पूर्ण प्राणियोंकी प्रिय आत्मा हैं || १३ || जिस प्रकार वृक्षकी जड़ सींचनेसे उसके तना, शाखा, उपशाखा आदि सभीका पोषण हो जाता है और जैसे भोजनद्वारा प्राणोंको तृप्त करनेसे समस्त इन्द्रियाँ पुष्ट होती हैं, उसी प्रकार श्रीभगवान्की पूजा ही सबकी पूजा है ॥१४ ॥ जिस

प्रकार वर्षाकालमें जल सूर्यके तापसे उत्पन्न होता है और ग्रीष्म ऋतुमें उसीकी किरणोंमें पुनः प्रवेश कर जाता है तथा जैसे समस्त चराचर भूत पृथ्वीसे उत्पन्न होते हैं और फिर उसीमें मिल जाते हैं, उसी प्रकार चेतना - चेतनात्मक यह समस्त प्रपंच श्रीहरिसे ही उत्पन्न होता है और उन्हींमें लीन हो जाता है ॥१५ ॥

एतत्पदं तज्जगदात्मनः परं

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सकृद्विभातं सवितुर्यथा प्रभा । यथासवो जाग्रति सुप्तशक्तयो द्रव्यक्रियाज्ञानभिदाभ्रमात्ययः ॥१६ यथा नभस्यभ्रतमःप्रकाशा भवन्ति` भूपा न भवन्त्यनुक्रमात् । एवं परे ब्रह्मणि शक्तयस्त्वमू रजस्तमःसत्त्वमिति प्रवाहः ॥१७ तेनैकमात्मानमशेषदेहिनां

कालं प्रधानं पुरुषं परेशम् ।

स्वतेजसा ध्वस्तगुणप्रवाह-मात्मैकभावेन भजध्वमद्धा ॥१८

दयया सर्वभूतेषु सन्तुष्ट्या येन केन वा ।

सर्वेन्द्रियोपशान्त्या च तुष्यत्याशु जनार्दनः ॥ १ ९

अपहतसकलैषणामलात्म-न्यविरतमेधितभावनोपहूतः ।

निजजनवशगत्वमात्मनोऽय-न्न सरति छिद्रवदक्षरः सतां हि ॥२०

वस्तुतः यह विश्वात्मा श्रीभगवान्‌का वह शास्त्रप्रसिद्ध सर्वोपाधिरहित स्वरूप ही है । जैसे सूर्यकी प्रभा उससे भिन्न नहीं होती, उसी प्रकार कभी - कभी गन्धर्व - नगरके समान स्फुरित होनेवाला यह जगत् भगवान् से भिन्न नहीं है; तथा जैसे जाग्रत् अवस्थामें इन्द्रियाँ क्रियाशील रहती हैं किन्तु सुषुप्तिमें उनकी शक्तियाँ लीन हो जाती हैं, उसी प्रकार यह जगत् सर्गकालमें भगवान्से प्रकट हो जाता है और कल्पान्त होनेपर उन्हींमें लीन हो जाता है । स्वरूपतः तो भगवान‌में द्रव्य, क्रिया और ज्ञानरूपी त्रिविध अहंकारके कार्योंकी तथा उनके निमित्तसे होनेवाले भेदभ्रमकी सत्ता है ही नहीं ॥ १६ ॥ नृपतिगण! जैसे बादल, अन्धकार

और प्रकाश — ये क्रमशः आकाशसे प्रकट होते हैं और उसीमें लीन हो जाते हैं; किन्तु आकाश इनसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार ये सत्त्व, रज और तमोमयी शक्तियाँ कभी परब्रह्मसे उत्पन्न होती हैं और कभी उसीमें लीन हो जाती हैं । इसी प्रकार इनका प्रवाह चलता रहता है; किन्तु इससे आकाशके समान असंग परमात्मामें कोई विकार नहीं होता ॥१७ ॥ अतः तुम

ब्रह्मादि समस्त लोकपालोंके भी अधीश्वर श्रीहरिको अपनेसे अभिन्न मानते हुए भजो; क्योंकि वे ही समस्त देहधारियोंके एकमात्र आत्मा हैं । वे ही जगत्‌के निमित्तकारण काल,

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उपादानकारण प्रधान और नियन्ता पुरुषोत्तम हैं तथा अपनी कालशक्तिसे वे ही इस गुणोंके प्रवाहरूप प्रपंचका संहार कर देते हैं ॥१८ ॥

वे भक्तवत्सल भगवान् समस्त जीवोंपर दया करनेसे, जो कुछ मिल जाय उसीमें सन्तुष्ट रहनेसे तथा समस्त इन्द्रियोंको विषयोंसे निवृत्त करके शान्त करनेसे शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं ॥१९ ॥ पुत्रैषणा आदि सब प्रकारकी वासनाओंके निकल जानेसे जिनका अन्तःकरण शुद्ध

हो गया है, उन संतोंके हृदयमें उनके निरन्तर बढ़ते हुए चिन्तनसे खिंचकर अविनाशी श्रीहरि आ जाते हैं और अपनी भक्ताधीनताको चरितार्थ करते हुए हृदयाकाशकी भाँति वहाँसे हटते नहीं ॥२० ॥

न भजति कुमनीषिणां स इज्यां हरिरधनात्मधनप्रियो रसज्ञः । श्रुतधनकुलकर्मणां मदैर्ये विदधति पापमकिंचनेषु सत्सु ॥२१ श्रियमनुचरतीं ' तदर्थिनश्च द्विपदपतीन् विबुधांश्च यत्स्वपूर्णः २ । न भजति निजभृत्यवर्गतन्त्रः कथममुमुद्विसृजेत्पुमान् कृतज्ञः ॥२२ मैत्रेय उवाच

इति प्रचेतसो राजन्नन्याश्च भगवत्कथाः ।

श्रावयित्वा ब्रह्मलोकं ययौ स्वायम्भुवो मुनिः ॥२३

तेऽपि तन्मुखनिर्यातं यशो लोकमलापहम् ।

हरेर्निशम्य तत्पादं ध्यायन्तस्तद्गतिं ययुः ॥२४

एतत्तेऽभिहितं क्षत्तर्यन्मां त्वं परिपृष्टवान् ।

प्रचेतसां नारदस्य संवादं हरिकीर्तनम् ॥२५

श्रीशुक उवाच

य एष उत्तानपदो मानवस्यानुवर्णितः ।

वंशः प्रियव्रतस्यापि निबोध नृपसत्तम ॥२६

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यो नारदादात्मविद्यामधिगम्य पुनर्महीम् ।

भुक्त्वा विभज्य पुत्रेभ्य ऐश्वरं समगात्पदम् ॥२७

भगवान् तो अपनेको ( भगवान्‌को ) ही सर्वस्व माननेवाले निर्धन पुरुषोंपर ही प्रेम करते हैं; क्योंकि वे परम रसज्ञ है - उन अकिंचनोंकी अनन्याश्रया अहैतुकी भक्तिमें कितना माधुर्य होता है, इसे प्रभु अच्छी तरह जानते हैं । जो लोग अपने शास्त्रज्ञान, धन, कुल और कर्मोंके मदसे उन्मत्त होकर, ऐसे निष्किंचन साधुजनोंका तिरस्कार करते हैं, उन दुर्बुद्धियोंकी पूजा तो प्रभु स्वीकार ही नहीं करते ॥ २१ ॥ भगवान् स्वरूपानन्दसे ही परिपूर्ण हैं, उन्हें निरन्तर अपनी

सेवामें रहनेवाली लक्ष्मीजी तथा उनकी इच्छा करनेवाले नरपति और देवताओंकी भी कोई परवा नहीं है । इतनेपर भी वे अपने भक्तोंके तो अधीन ही रहते हैं । अहो! ऐसे करुणा - सागर श्रीहरिको कोई भी कृतज्ञ पुरुष थोड़ी देरके लिये भी कैसे छोड़ सकता है? ॥२२ ॥

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं — विदुरजी! भगवान् नारदने प्रचेताओंको इस उपदेशके साथ - साथ और भी बहुत - सी भगवत्सम्बन्धी बातें सुनायीं । इसके पश्चात् वे ब्रह्मलोकको चले गये ॥२३ ॥

प्रचेतागण भी उनके मुखसे सम्पूर्ण जगत्के पापरूपी मलको दूर करनेवाले भगवच्चरित्र सुनकर भगवान्‌के चरणकमलोंका ही चिन्तन करने लगे और अन्तमें भगवद्धामको प्राप्त हुए ॥२४ ॥ इस प्रकार आपने जो मुझसे श्रीनारदजी और प्रचेताओंके भगवत्कथासम्बन्धी

संवादके विषयमें पूछा था, वह मैंने आपको सुना दिया ॥२५ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं— राजन्! यहाँतक स्वायम्भुव मनुके पुत्र उत्तानपादके वंशका वर्णन हुआ, अब प्रियव्रतके वंशका विवरण भी सुनो || २६ || राजा प्रियव्रतने श्रीनारदजीसे आत्मज्ञानका उपदेश पाकर भी राज्यभोग किया था तथा अन्तमें इस सम्पूर्ण पृथ्वीको अपने पुत्रोंमें बाँटकर वे भगवान्के परमधामको प्राप्त हुए थे ॥२७ ॥

इमां तु कौषारविणोपवर्णितां

क्षत्ता निशम्याजितवादसत्कथाम् ।

प्रवृद्धभावोऽश्रुकलाकुलो ३ मुने-र्दधार मूर्ध्ना चरणं हृदा हरेः ॥२८

विदुर उवाच

सोऽयमद्य महायोगिन् भवता करुणात्मना ।

दर्शितस्तमसः पारो यत्राकिञ्चनगो हरिः ॥२९

श्रीशुक उवाच इत्यानम्य तमामन्त्र्य विदुरो गजसाह्वयम् ।

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स्वानां दिदृक्षुः प्रययौ ज्ञातीनां निर्वृताशयः ॥ ३०

एतद्यः शृणुयाद्राजन् राज्ञां हर्यर्पितात्मनाम् ।

आयुर्धनं यशः स्वस्ति गतिमैश्वर्यमाप्नुयात् ॥ ३१

राजन्! इधर श्रीमैत्रेयजीके मुखसे यह भगवद् - गुणानुवादयुक्त पवित्र कथा सुनकर विदुरजी प्रेममग्न हो गये, भक्तिभावका उद्रेक होनेसे उनके नेत्रोंसे पवित्र आँसुओंकी धारा बहने लगी तथा उन्होंने हृदयमें भगवच्चरणोंका स्मरण करते हुए अपना मस्तक मुनिवर मैत्रेयजीके चरणोंपर रख दिया ॥ २८ ॥

विदुरजी कहने लगे - महायोगिन्! आप बड़े ही करुणामय हैं । आज आपने मुझे अज्ञानान्धकारके उस पार पहुँचा दिया है, जहाँ अकिंचनोंके सर्वस्व श्रीहरि विराजते हैं ॥२९ ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - मैत्रेयजीको उपर्युक्त कृतज्ञता सूचक वचन कहकर तथा प्रणाम कर विदुरजीने उनसे आज्ञा ली और फिर शान्तचित्त होकर अपने बन्धुजनोंसे मिलनेके लिये वे हस्तिनापुर चले गये || ३० || राजन्! जो पुरुष भगवान्‌के शरणागत परमभागवत राजाओंका यह पवित्र चरित्र सुनेगा, उसे दीर्घ आयु, धन, सुयश, क्षेम, सद्गति और ऐश्वर्यकी प्राप्ति होगी ॥३१ ॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयासिक्यामष्टादशसाहस्रयां पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे प्रचेतसोपाख्यानं नामैकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥

१. प्रा ० पा ० - भिवाद्य च । २. प्रा ० पा ० - प्रायो नः । ३. प्रा ० पा ० - ध्यात्मं ज्ञानं । १. प्रा ० पा ० – येन हि । २. प्रा ० पा ० – भिस्त्रिभिर्वेदैः । ३. प्रा ० पा ० - शुक्लसा ० । ४. प्रा ० पा ० — रोधसा । ५. प्रा ० पा ० — रात्मपदः प्रि ० । -१. प्रा ० पा ० — मनुसरतस्तदर्थि ० । २. प्रा ० पा ० – यत्सुपूर्णः । ३. प्रा ० पा ० — नृप

सम्मतम् ।

१. प्रा ० पा ० — भावाश्रु ० ॥। इति चतुर्थः स्कन्धः समाप्तः ॥

॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥

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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय श्रीमद्भागवतमहापुराणम् पञ्चमः स्कन्धः अथ प्रथमोऽध्यायः प्रियव्रत चरित्र राजोवाच

प्रियव्रतो भागवत आत्मारामः कथं मुने ।

गृहेऽरमत यन्मूलः कर्मबन्धः पराभवः ॥१

न नूनं मुक्तसङ्गानां तादृशानां द्विजर्षभ ।

गृहेष्वभिनिवेशोऽयं पुंसां भवितुमर्हति ॥ २

महतां खलु विप्रर्षे उत्तमश्लोकपादयोः ।

छायानिर्वृतचित्तानां न कुटुम्बे स्पृहामतिः ॥३

संशयोऽयं महान् ब्रह्मन्दारागारसुतादिषु ।

सक्तस्य यत्सिद्धिरभूत्कृष्णे च मतिरच्युता ॥४

श्रीशुक उवाच बाढमुक्तं भगवत उत्तम श्लोकस्य श्रीमच्चरणारविन्दमकरन्दरस आवेशितचेतसो भागवतपरमहंसदयितकथां किञ्चिदन्तरायविहतां स्वां शिवतमां पदवीं न प्रायेण हिन्वन्ति ॥५ ॥

राजा परीक्षित्ने पूछा- मुने! महाराज प्रियव्रत तो बड़े भगवद्भक्त और आत्माराम थे । उनकी गृहस्थाश्रममें कैसे रुचि हुई, जिसमें फँसनेके कारण मनुष्यको अपने स्वरूपकी विस्मृति होती है और वह कर्मबन्धनमें बँध जाता है? ॥१ ॥

विप्रवर! निश्चय ही ऐसे निःसंग महापुरुषोंका इस प्रकार गृहस्थाश्रममें अभिनिवेश होना

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उचित नहीं है ॥२ ॥

इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं कि जिनका चित्त पुण्यकीर्ति श्रीहरिके चरणोंकी शीतल छायाका आश्रय लेकर शान्त हो गया है, उन महापुरुषोंकी कुटुम्बादिमें कभी आसक्ति नहीं हो सकती ॥३ ॥

ब्रह्मन्! मुझे इस बातका बड़ा सन्देह है कि महाराज प्रियव्रतने स्त्री, घर और पुत्रादिमें आसक्त रहकर भी किस प्रकार सिद्धि प्राप्त कर ली और क्योंकर उनकी भगवान् श्रीकृष्णमें अविचल भक्ति हुई ॥४ ॥

श्रीशुकदेवजीने कहा- राजन्! तुम्हारा कथन बहुत ठीक है । जिनका चित्त पवित्रकीर्ति श्रीहरिके परम मधुर चरणकमल - मकरन्दके रसमें सराबोर हो गया है, वे किसी विघ्न - बाधाके कारण रुकावट आ जानेपर भी भगवद्भक्त परमहंसोंके प्रिय श्रीवासुदेव भगवान्‌के कथाश्रवणरूपी परम कल्याणमय मार्गको प्रायः छोड़ते नहीं ॥५ ॥

यर्हि वाव ह राजन् स राजपुत्रः प्रियव्रतः परमभागवतो नारदस्य चरणोपसेवयाञ्जसा - वगतपरमार्थसतत्त्वो १ ब्रह्मसत्रेण दीक्षिष्यमाणो-ऽवनितलपरिपालनायाम्नातप्रवरगुणगणैकान्तरे - भाजनतया स्वपित्रोपामन्त्रितो भगवति वासुदेव एवाव्यवधानसमाधियोगेन समावेशितसकल - कारकक्रियाकलापो तदप्रत्याम्नातव्यं नैवाभ्यनन्दद्यद्यपि ३ पराभवमन्वीक्षमाणः ॥६ ॥

तदधिकरण आत्मनोऽन्यस्मा - दसतोऽपि अथ ह भगवानादिदेव एतस्य गुण- विसर्गस्य परिबृंहणानुध्यानव्यवसितसकल-जगदभिप्राय आत्मयोनिरखिलनिगमनिजगण ' - परिवेष्टितः स्वभवनादवततार ॥७ ॥

स तत्र तत्र गगनतल उडुपतिरिव विमानावलिभिरनुपथ - ममरपरिवृढैरभिपूज्यमानः ७ पथि पथि च वरूथशः सिद्धगन्धर्वसाध्यचारणमुनिगणैरुपगीयमानो गन्धमादनद्रोणीमवभासयन्नुपससर्प ॥८ ॥ तत्र ह वा एनं देवर्षिर्हंसयानेन पितरं

भगवन्तं हिरण्यगर्भमुपलभमानः सहसैवोत्थायार्हणेन सह पितापुत्राभ्यामवहिताञ्जलिरुपतस्थे ॥ ९ ॥

राजन्! राजकुमार प्रियव्रत बड़े भगवद्भक्त थे, श्रीनारदजीके चरणोंकी सेवा करनेसे उन्हें सहजमें ही परमार्थतत्त्वका बोध हो गया था । वे ब्रह्मसत्रकी दीक्षा -निरन्तर ब्रह्माभ्यासमें जीवन बितानेका नियम लेनेवाले ही थे कि उसी समय उनके पिता स्वायम्भुव मनुने उन्हें पृथ्वीपालनके लिये शास्त्रमें बताये हुए सभी श्रेष्ठ गुणोंसे पूर्णतया सम्पन्न देख राज्यशासनके लिये आज्ञा दी । किन्तु प्रियव्रत अखण्ड समाधियोगके द्वारा अपनी सारी इन्द्रियों और क्रियाओंको भगवान् वासुदेवके चरणोंमें ही समर्पण कर चुके थे । अतः पिताकी आज्ञा किसी प्रकार उल्लंघन करनेयोग्य न होनेपर भी, यह सोचकर कि राज्याधिकार पाकर मेरा आत्मस्वरूप स्त्री - पुत्रादि असत् प्रपंचसे आच्छादित हो जायगा – राज्य और कुटुम्बकी चिन्तामें फँसकर मैं परमार्थतत्त्वको प्रायः भूल जाऊँगा, उन्होंने उसे स्वीकार न किया ॥६ ॥

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आदिदेव स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माजीको निरन्तर इस गुणमय प्रपंचकी वृद्धिका ही विचार रहता है । वे सारे संसारके जीवोंका अभिप्राय जानते रहते हैं । जब उन्होंने प्रियव्रतकी ऐसी प्रवृत्ति देखी, तब वे मूर्तिमान् चारों वेद और मरीचि आदि पार्षदोंको साथ लिये अपने लोकसे उतरे ॥७ ॥ आकाशमें जहाँ - तहाँ विमानोंपर चढ़े हुए इन्द्रादि प्रधान- प्रधान देवताओंने उनका

पूजन किया तथा मार्गमें टोलियाँ बाँधकर आये हुए सिद्ध, गन्धर्व, साध्य, चारण और मुनिजनने स्तवन किया । इस प्रकार जगह - जगह आदर - सम्मान पाते वे साक्षात् नक्षत्रनाथ चन्द्रमाके समान गन्धमादनकी घाटीको प्रकाशित करते हुए प्रियव्रतके पास पहुँचे ॥८ ॥

प्रियव्रतको आत्मविद्याका उपदेश देनेके लिये वहाँ नारदजी भी आये हुए थे । ब्रह्माजीके वहाँ पहुँचनेपर उनके वाहन हंसको देखकर देवर्षि नारद जान गये कि हमारे पिता भगवान् ब्रह्माजी पधारे हैं; अतः वे स्वायम्भुव मनु और प्रियव्रतके सहित तुरंत खड़े हो गये और सबने उनको हाथ जोड़कर प्रणाम किया ॥ ९ ॥

भगवानपि भारत तदुपनीतार्हणः सूक्तवाकेनातितरामुदितगुणगणावतारसुजयः प्रियव्रतमादिपुरुषस्तं सदयहासावलोक इति होवाच ॥१० ॥

श्रीभगवानुवाच निबोध तातेदमृतं ब्रवीमि

मासूयितुं देवमर्हस्यप्रमेयम् ।

वयं भवस्ते तत एष महर्षि-र्वहाम सर्वे विवशा यस्य दिष्टम् ॥११

न तस्य कश्चित्तपसा विद्यया वा न योगवीर्येण मनीषया वा । नैवार्थधर्मैःः परतः स्वतो वा कृतं विहन्तुं तनुभृद्विभूयात् ॥ १२ भवाय नाशाय च कर्म कर्तुं

शोकाय मोहाय सदा भयाय ।

सुखाय दुःखाय च देहयोग-मव्यक्तदिष्टं जनताङ्ग धत्ते ॥१३

यद्वाचि तन्त्यां गुणकर्मदामभिः सुदुस्तरैर्वत्स वयं सुयोजिताः । सर्वे वहामो बलिमीश्वराय प्रोता नसीव द्विपदे चतुष्पदः ॥१४ ईशाभिसृष्टं ह्यवरुन्ध्महेऽङ्ग दुःखं सुखं वा गुणकर्मसङ्गात् ।

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आस्थाय तत्तद्यदयुङ्क्त नाथ-श्चक्षुष्मतान्धा इव नीयमानाः ॥ १५ मुक्तोऽपि तावद्विभृयात्स्वदेह-मारब्धमश्नन्नभिमानशून्यः । यथानुभूतं प्रतियातनिद्रः किं त्वन्यदेहाय गुणान्न वृङ्क्ते ॥१६ परीक्षित्! नारदजीने उनकी अनेक प्रकारसे पूजा की और सुमधुर वचनोंमें उनके गुण और अवतारकी उत्कृष्टताका वर्णन किया । तब आदिपुरुष भगवान् ब्रह्माजीने प्रियव्रतकी ओर मन्द मुसकानयुक्त दयादृष्टिसे देखते हुए इस प्रकार कहा ॥१० ॥

-श्रीब्रह्माजीने कहा – बेटा! मैं तुमसे सत्य सिद्धान्तकी बात कहता हूँ, ध्यान देकर सुनो । तुम्हें अप्रमेय श्रीहरिके प्रति किसी प्रकारकी दोषदृष्टि नहीं रखनी चाहिये । तुम्हीं क्या – हम, महादेवजी, तुम्हारे पिता स्वायम्भुव मनु और तुम्हारे गुरु ये महर्षि नारद भी विवश होकर उन्हींकी आज्ञाका पालन करते हैं ॥ ११ ॥ उनके विधानको कोई भी देहधारी न तो तप, विद्या,

योगबल या बुद्धिबलसे, न अर्थ या धर्मकी शक्तिसे और न स्वयं या किसी दूसरेकी सहायतासे ही टाल सकता है ॥१२ ॥ प्रियवर! उसी अव्यक्त ईश्वरके दिये हुए शरीरको सब जीव जन्म,

मरण, शोक, मोह, भय और सुख - दुःखका भोग करने तथा कर्म करनेके लिये सदा धारण करते हैं ॥१३ ॥

वत्स! जिस प्रकार रस्सीसे नथा हुआ पशु मनुष्योंका बोझ ढोता है, उसी प्रकार परमात्माकी वेदवाणीरूप बड़ी रस्सीमें सत्त्वादि गुण, सात्त्विक आदि कर्म और उनके ब्राह्मणादि वाक्योंकी मजबूत डोरीसे जकड़े हुए हम सब लोग उन्हींके इच्छानुसार कर्ममें लगे रहते हैं और उसके द्वारा उनकी पूजा करते रहते हैं || १४ || हमारे गुण और कर्मोंके अनुसार प्रभुने हमें जिस योनिमें डाल दिया है उसीको स्वीकार करके, वे जैसी व्यवस्था करते हैं उसीके अनुसार हम सुख या दुःख भोगते रहते हैं । हमें उनकी इच्छाका उसी प्रकार अनुसरण करना पड़ता है, जैसे किसी अंधेको आँखवाले पुरुषका ॥१५ ॥

मुक्त पुरुष भी प्रारब्धका भोग करता हुआ भगवान्की इच्छाके अनुसार अपने शरीरको धारण करता ही है; ठीक वैसे ही जैसे मनुष्यकी निद्रा टूट जानेपर भी स्वप्नमें अनुभव किये हुए पदार्थोंका स्मरण होता है । इस अवस्थामें भी उसको अभिमान नहीं होता और विषयवासनाके जिन संस्कारोंके कारण दूसरा जन्म होता है, उन्हें वह स्वीकार नहीं करता ॥१६ ॥

भयं प्रमत्तस्य वनेष्वपि स्याद् यतः स आस्ते सहषट्सपत्नः । जितेन्द्रियस्यात्मरतेर्बुधस्य गृहाश्रमः किं नु करोत्यवद्यम् ॥१७