श्रीगणेशाय नमः।

इलोपाख्यान : परम ज्ञानी ऋषियों के सङ्कल्पों का विपरीत फल क्यों प्राप्त हुआ?

सङ्कल्प और दैवीय विधान

श्रीमद्भागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · नवम स्कन्ध · अध्याय 1 · पृष्ठ 1–15

601 शब्द · 3 मिनटका पाठ · 4 श्लोक

श्रीशुकदेवजी ने राजा परीक्षित से कहा

मनुवंश के चरित्रों की जिज्ञासा के प्रत्युत्तर में

शौनकादि ऋषियों की ब्रह्मवादी सभा में जब राजा परीक्षित ने मनुवंश के वंशजों और उनके चरित्रों के बारे में जिज्ञासा प्रकट की, तब धर्म के परम मर्मज्ञ श्रीशुकदेवजी कहने लगे— "हे राजन! तुम मनुवंश का सङ्क्षेप में वर्णन सुनो। इस विश्व का आदि केवल वही परम पुरुष परमात्मा है; प्रलय काल में केवल वही था। उनकी नाभि से सुवर्णमय कमल निकला और उसमें चतुर्मुख ब्रह्माजी का आविर्भाव हुआ। ब्रह्माजी के मन से मरीचि हुए और उनसे कश्यप प्रकट हुए। दक्षनन्दिनी अदिति से विवस्वान् हुए और विवस्वान् की पत्नी सञ्ज्ञा से श्राद्धदेव मनु का जन्म हुआ।"

श्राद्धदेव मनु ने अपनी पत्नी श्रद्धा के गर्भ से दस पुत्रों को जन्म दिया, जिनमें इक्ष्वाकु, नृग, शर्याति, दिष्ट, धृष्ट, करूष, नरिष्यन्त, पृषध्र, नभग और कवि प्रमुख थे। किन्तु उस समय एक विचित्र घटना घटी। मनु की इला नाम की कन्या हुई। इस कन्या के जन्म से मनु का मन प्रसन्न नहीं हुआ। उन्होंने व्याकुल होकर अपने गुरु वसिष्ठजी से कहा— "भगवन्! आप लोग तो ब्रह्मवादी हैं, आपका कर्म इस प्रकार विपरीत फल देने वाला कैसे हो गया? यह तो बड़े दुःख की बात है। वैदिक कर्म का ऐसा विपरीत फल कभी नहीं होना चाहिए। आप तो जितेन्द्रिय और निष्पाप हैं, फिर आपके सङ्कल्प का यह उलटा फल कैसे हुआ?"

यूयं मन्त्रविदो युक्तास्तपसा दग्धकिल्बिषाः ।
कुतः संकल्पवैषम्यमनृतं विबुधेष्विव ॥

स्थानपर इला नामकी कन्या हुई । उसे देखकर श्राद्धदेव मनुका मन कुछ विशेष प्रसन्न नहीं हुआ । उन्होंने अपने गुरु वसिष्ठजीसे कहा- ॥१६ ॥ ' भगवन्! आपलोग तो ब्रह्मवादी हैं, आपका कर्म इस प्रकार विपरीत फल देनेवाला कैसे हो गया? अरे, यह तो बड़े दुःखकी बात है । वैदिक कर्मका ऐसा विपरीत फल तो कभी नहीं होना चाहिये ॥१७ ॥ आप लोगोंका मन्त्रज्ञान तो पूर्ण है ही; इसके अतिरिक्त आपलोग जितेन्द्रिय भी हैं तथा तपस्याके कारण निष्पाप हो चुके हैं । देवताओंमें असत्यकी प्राप्तिके समान आपके संकल्पका यह उलटा फल कैसे हुआ? '

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 1 · श्लोक 18पृष्ठ 12

वसिष्ठ जी ने जब मनु की यह व्यथा सुनी, तो वे समझ गए कि यज्ञ के 'होता' ने विपरीत सङ्कल्प किया है। उन्होंने मनु से कहा— "राजन्! तुम्हारे होता के विपरीत सङ्कल्प से ही मेरा सङ्कल्प ठीक-ठीक पूरा नहीं हुआ। फिर भी अपने तप के प्रभाव से मैं तुम्हें श्रेष्ठ पुत्र दूँगा।" ऐसा निश्चय कर वसिष्ठ जी ने उस कन्या को पुरुष बनाने हेतु परम पुरुषोत्तम भगवान् नारायण की स्तुति की। श्रीहरि उनकी भक्ति से सन्तुष्ट हुए और उन्हें मुँहमाँगा वर दिया, जिसके प्रभाव से वह कन्या सुद्युम्न नामक श्रेष्ठ पुत्र बन गई।

सुद्युम्न कुछ मन्त्रियों के साथ शिकार खेलने वन में गए। वे कवच पहनकर, हाथ में सुन्दर धनुष और अद्भुत बाण लेकर हिरणों का पीछा करते हुए उत्तर दिशा में बहुत आगे बढ़ गए। अन्ततः वे मेरुपर्वत की तलहटी के एक वन में जा पहुँचे। वह ऐसा वन था जहाँ भगवान् शङ्कर पार्वती के साथ विहार करते हैं। उस वन में प्रवेश करते ही सुद्युम्न ने देखा कि वह स्वयं स्त्री हो गया है और उसका घोड़ा भी घोड़ी बन चुका है। उनके सभी अनुचरों ने भी अपने आप को स्त्री रूप में देखा। वे सब एक-दूसरे का मुँह देखने लगे और उनका चित्त अत्यन्त उदास हो गया।

राजा परीक्षित ने कौतूहलवश पूछा— "हे भगवन्! उस भूखण्ड में ऐसा विचित्र गुण कैसे आ गया? किसने उसे ऐसा बना दिया?" श्रीशुकदेवजी बोले— "हे राजन! उस वन में भगवान् शङ्कर ने यह नियम बनाया था कि उनके सिवा जो भी पुरुष उस स्थान पर आएगा, वह स्त्री हो जाएगा। जब सुद्युम्न स्त्री रूप में थे, तब वे बुध से मिलित हुए और उन्होंने पुरूरवा नामक पुत्र उत्पन्न किया।"

वैवस्वत मनुके पुत्र राजा सुद्युम्नकी कथा राजोवाच मन्वन्तराणि सर्वाणि त्वयोक्तानि श्रुतानि मे ।
वीर्याण्यनन्तवीर्यस्य हरेस्तत्र कृतानि च ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 1 · श्लोक 1पृष्ठ 10

सुद्युम्न की इस दशा को देखकर उनके कुलपुरोहित वसिष्ठजी के हृदय में पीड़ा हुई। उन्होंने सुद्युम्न को पुनः पुरुष बनाने हेतु भगवान् शङ्कर की आराधना की। भगवान् शङ्कर वसिष्ठ जी पर प्रसन्न होकर अपनी वाणी को सत्य रखते हुए बोले— "वसिष्ठ! तुम्हारा यह यजमान एक महीने तक पुरुष रहेगा और एक महीने तक स्त्री। इस व्यवस्था से सुद्युम्न इच्छानुसार पृथ्वी का पालन करे।"

योऽसौ सत्यव्रतो नाम राजर्षिर्द्रविडेश्वरः ।
ज्ञानं योऽतीतकल्पान्ते लेभे पुरुषसेवया ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 1 · श्लोक 2पृष्ठ 10

इस प्रकार वसिष्ठ जी के अनुग्रह से सुद्युम्न ने व्यवस्था पूर्वक अभीष्ट पुरुषत्व प्राप्त किया और पृथ्वी का पालन करने लगे। उनके तीन पुत्र हुए— उत्कल, गय और विमल, जो दक्षिणापथ के राजा हुए। बहुत समय बीतने पर, वृद्धावस्था में प्रतिष्ठान नगरी के अधिपति सुद्युम्न ने अपने पुत्र पुरूरवा को राज्य सौंप दिया और स्वयं तपस्या करने के लिए वन की यात्रा पर निकल गए।

तस्योत्कलो गयो राजन् विमलश्च सुतास्त्रयः ।
दक्षिणापथराजानो बभूवुर्धर्मवत्सलाः ॥

इस प्रकार वसिष्ठजीके अनुग्रहसे व्यवस्था- पूर्वक अभीष्ट पुरुषत्व लाभ करके सुद्युम्न पृथ्वीका पालन करने लगे । परंतु प्रजा उनका अभिनन्दन नहीं करती थी ॥ ४० ॥ उनके तीन पुत्र हुए — उत्कल, गय और विमल। परीक्षित्! वे सब दक्षिणापथके राजा हुए ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 1 · श्लोक 41पृष्ठ 15

In English

The Story of Sudyumna

Manu's daughter is transformed into a son named Sudyumna through the prayers of Vashistha to Lord Narayana. Later, while hunting in a forest protected by Lord Shiva, Sudyumna and his men are turned into women. Through further prayers to Shiva, Sudyumna is granted a life where he alternates between being a man and a woman every month.

This page answers

  • How did the daughter of manu become sudyumna?
  • Why did sudyumna and his men turn into women in the forest?
  • What was the rule of the forest where lord shiva stayed?
  • How did vashistha restore sudyumna's masculinity?
  • Who was the son of sudyumna and pururava?

Also written: Ilopakhyana, Ilopa, Shraddha, Hota, Vasishtha, Sudyumna, Budha, Pururava, Ikshvaku, इलोपाख्यान