श्रीगणेशाय नमः।

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 1–10

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1–10

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॥ श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः ॥ 27 श्रीमद्भागवत महापुराण [द्वितीय-खण्ड ] [ सचित्र, हिन्दी- व्याख्यासहित ] गीताप्रेसगोरखपुरर GITA PRESS, GORAKHPUR गीताप्रेस, गोरखपुर

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27 27 ॥ श्रीहरिः ॥ महर्षि वेदव्यास-प्रणीत श्रीमद्भागवतमहापुराण [सचित्र, सरल हिन्दी-व्याख्यासहित ] ( द्वितीय खण्ड ) [स्कन्ध ९ से १२ तक ] त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव । त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव त्वमेव विद्या द्रविणं देवदेव ॥ त्वमेव सर्वं मम गीताप्रेस, गोरखपुर

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१०,०००सं० २०७१ बयासीवाँ पुनर्मुद्रण कुल मुद्रण ६,८०,५०० प्रकाशक-गीताप्रेस, गोरखपुर– २७३००५ (गोबिन्दभवन - कार्यालय, कोलकाता का संस्थान) फोन: ( ०५५१ ) २३३४७२१, २३३१२५०; फैक्स: ( ०५५१ ) २३३६ ९९ ७ e - mail: booksales@gitapress.org website: www.gitapress.

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॥ श्रीहरिः ॥ विषय-सूची द्वितीय खण्ड अध्याय विषय नवम स्कन्ध १ - वैवस्वत मनुके पुत्र राजा सुद्युम्नकी कथा २ - पृषध्र आदि मनुके पाँच पुत्रोंका वंश ३- महर्षि च्यवन और सुकन्याका चरित्र, राजा शर्यातिका वंश ४ - नाभाग और अम्बरीषकी कथा ५ - दुर्वासाजीकी दुःखनिवृत्ति ६- इक्ष्वाकुके वंशका वर्णन, मान्धाता और सौभरि ऋषिकी कथा ७ - राजा त्रिशंकु और हरिश्चन्द्रकी कथा ८ - सगर-चरित्र ९- भगीरथ- चरित्र और गंगावतरण १० - भगवान् श्रीरामकी लीलाओंका वर्णन ११ - भगवान् श्रीरामकी शेष लीलाओंका वर्णन १२ - इक्ष्वाकुवंशके शेष राजाओंका वर्णन १३ - राजा निमिके वंशका वर्णन १४ - चन्द्रवंशका वर्णन १५ -ऋचीक, जमदग्नि और परशुरामजीका चरित्र १६- परशुरामजीके द्वारा क्षत्रिय- संहार और विश्वामित्रजीके वंशकी कथा १७ - क्षत्रवृद्ध, रजि आदि राजाओंके वंशका वर्णन १८ -ययाति- चरित्र १ ९ - ययातिका गृहत्याग २० - पूरुके वंश, राजा दुष्यन्त और भरतके चरित्रका वर्णन २१ - भरतवंशका वर्णन, राजा रन्तिदेवकी कथा २२ - पांचाल, कौरव और मगधदेशीय राजाओंके वंशका वर्णन २३ - अनु, द्रुह्यु, तुर्वसु और यदुके वंशका वर्णन २४ - विदर्भके वंशका वर्णन

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दशम स्कन्ध ( पूर्वार्ध) १- भगवान्के द्वारा पृथ्वीको आश्वासन, वसुदेव- देवकीका विवाह और कंसके द्वारा देवकीके छः पुत्रोंकी हत्या २ - भगवान्का गर्भ-प्रवेश और देवताओंद्वारा गर्भस्तुति ३ - भगवान् श्रीकृष्णका प्राकट्य ४ - कंसके हाथसे छूटकर योगमायाका आकाशमें जाकर भविष्यवाणी करना ५ - गोकुलमें भगवान्का जन्ममहोत्सव ६- पूतना- उद्धार ७ - शकट- भंजन और तृणावर्त- उद्धार ८ - नामकरण- संस्कार और बाललीला ९- श्रीकृष्णका ऊखलसे बाँधा जाना १० - यमलार्जुनका उद्धार ११ - गोकुलसे वृन्दावन जाना तथा वत्सासुर और बकासुरका उद्धार १२ - अघासुरका उद्धार १३- ब्रह्माजीका मोह और उसका नाश १४ -ब्रह्माजीके द्वारा भगवान्की स्तुति १५ - धेनुकासुरका उद्धार और ग्वालबालोंको कालियनागके विषसे बचाना १६ - कालियपर कृपा १७- कालियके कालियदहमें आनेकी कथा तथा भगवान्‌का व्रजवासियोंको दावानलसे बचाना १८ - प्रलम्बासुर- उद्धार १ ९ - गौओं और गोपोंको दावानलसे बचाना २० - वर्षा और शरऋतुका वर्णन २१- वेणुगीत २२ - चीरहरण २३ - यज्ञपत्नियोंपर कृपा २४ - इन्द्रयज्ञ- निवारण २५ - गोवर्धनधारण २६- नन्दबाबासे गोपोंकी श्रीकृष्णके प्रभावके विषयमें बातचीत २७-१ 9- श्रीकृष्णका अभिषेक २८ - वरुणलोकसे नन्दजीको छुड़ाकर लाना २ ९ - रासलीलाका आरम्भ ३० - श्रीकृष्णके विरहमें गोपियोंकी दशा ३१-१ -गोपिकागीत ३२ - भगवान्का प्रकट होकर गोपियोंको सान्त्वना देना ३३ - महारास

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३४ - सुदर्शन और शंखचूडका उद्धार ३५ युगलगीत ३६ - अरिष्टासुरका उद्धार और कंसका श्री अक्रूरजीको व्रजमें भेजना ३७ - केशी और व्योमासुरका उद्धार तथा नारदजीके द्वारा भगवान्की स्तुति ३८ - अक्रूरजीकी व्रजयात्रा ३ ९ - श्रीकृष्ण- बलरामका मथुरागमन ४० - अक्रूरजीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति ४१ - श्रीकृष्णका मथुराजीमें प्रवेश ४२ - कुब्जापर कृपा, धनुषभंग और कंसकी घबड़ाहट ४३ कुवलयापीड़का उद्धार और अखाड़ेमें प्रवेश ४४ -चाणूर, मुष्टिक आदि पहलवानोंका तथा कंसका उद्धार ४५- श्रीकृष्ण- बलरामका यज्ञोपवीत और गुरुकुल प्रवेश ४६ - उद्धवजीकी व्रजयात्रा ४७ - उद्धव तथा गोपियोंकी बातचीत और भ्रमरगीत ४८ - भगवान्का कुब्जा और अक्रूरजीके घर जाना ४ ९ - अक्रूरजीका हस्तिनापुर जाना दशम स्कन्ध ( उत्तरार्ध ) ५० - जरासन्धसे युद्ध और द्वारकापुरीका निर्माण ५१ - कालयवनका भस्म होना, मुचुकुन्दकी कथा ५२ - द्वारकागमन, श्रीबलरामजीका विवाह तथा श्रीकृष्णके पास रुक्मिणीजीका सन्देशा लेकर ब्राह्मणका आना ५३ - रुक्मिणीहरण ५४ - शिशुपालके साथी राजाओंकी और रुक्मीकी हार तथा श्रीकृष्ण -रुक्मिणी-विवाह ५५- प्रद्युम्नका जन्म और शम्बरासुरका वध ५६- स्यमन्तकमणिकी कथा, जाम्बवती और सत्यभामाके साथ श्रीकृष्णका विवाह ५७ - स्यमन्तक - हरण, शतधन्वाका उद्धार और अक्रूरजीको फिरसे द्वारका बुलाना ५८ - भगवान् श्रीकृष्णके अन्यान्य विवाहोंकी कथा ५ ९ - भौमासुरका उद्धार और सोलह हजार एक सौ राजकन्याओंके साथ भगवान्का विवाह ६० - श्रीकृष्ण - रुक्मिणी- संवाद ६१ - भगवान्की सन्ततिका वर्णन तथा अनिरुद्धके विवाहमें रुक्मीका मारा जाना ६२ - ऊषा- अनिरुद्ध - मिलन ६३ - भगवान् श्रीकृष्णके साथ बाणासुरका युद्ध ६४ - नृग राजाकी कथा ६५ - श्रीबलरामजीका व्रजगमन

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६६ - पौण्ड्रक और काशिराजका उद्धार ६७ - द्विविदका उद्धार ६८ - कौरवोंपर बलरामजीका कोप और साम्बका विवाह ६ ९ - देवर्षि नारदजीका भगवान्की गृहचर्या देखना ७० - भगवान् श्रीकृष्णकी नित्यचर्या और उनके पास जरासन्धके कैदी राजाओंके दूतका आना ७१ - श्रीकृष्णभगवान्का इन्द्रप्रस्थ पधारना ७२ - पाण्डवोंके राजसूययज्ञका आयोजन और जरासन्धका उद्धार ७३ - जरासन्धके जेलसे छूटे हुए राजाओंकी विदाई और भगवान्‌का इन्द्रप्रस्थ लौट आना ७४ - भगवान्की अग्रपूजा और शिशुपालका उद्धार ७५ - राजसूययज्ञकी पूर्ति और दुर्योधनका अपमान ७६ - शाल्वके साथ यादवोंका युद्ध ७७- शाल्व - उद्धार ७८ - दन्तवक्त्र और विदूरथका उद्धार तथा तीर्थयात्रामें बलरामजीके हाथसे सूतजीका वध ७९- बल्वलका उद्धार और बलरामजीकी तीर्थयात्रा ८०-०- श्रीकृष्णके द्वारा सुदामाजीका स्वागत ८१ - सुदामाजीको ऐश्वर्यकी प्राप्ति ८२ - भगवान् श्रीकृष्ण- बलरामसे गोप - गोपियोंकी भेंट ८३ - भगवान्की पटरानियोंके साथ द्रौपदीकी बातचीत ८४ वसुदेवजीका यज्ञोत्सव ८५- श्रीभगवान्के द्वारा वसुदेवजीको ब्रह्मज्ञानका उपदेश तथा देवकीजीके छः पुत्रोंको लौटा लाना ८६ - सुभद्राहरण और भगवान्‌का मिथिलापुरीमें राजा जनक और श्रुतदेव ब्राह्मणके घर एक ही साथ जाना ८७- वेदस्तुति ८८ - शिवजीका संकटमोचन ८९- भृगुजीके द्वारा त्रिदेवोंकी परीक्षा तथा भगवान्‌का मरे हुए ब्राह्मण - बालकोंको वापस लाना ९ ० - भगवान् श्रीकृष्णके लीला - विहारका वर्णन एकादश स्कन्ध १- यदुवंशको ऋषियोंका शाप २ - वसुदेवजीके पास श्रीनारदजीका आना और उन्हें राजा जनक तथा नौ योगीश्वरोंका संवाद सुनाना ३ - माया, मायासे पार होनेके उपाय तथा ब्रह्म और कर्मयोगका निरूपण ४ - भगवान्के अवतारोंका वर्णन

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५- भक्तिहीन पुरुषोंकी गति और भगवान्‌की पूजाविधिका वर्णन ६-देवताओंकी भगवान् से स्वधाम सिधारनेके लिये प्रार्थना तथा यादवोंको जानेकी तैयारी करते देखकर उद्धवका भगवान्के पास आना ७ - अवधूतोपाख्यान– पृथ्वीसे लेकर कबूतरतक आठ गुरुओंकी कथा ८ - अवधूतोपाख्यान — अजगरसे लेकर पिंगलातक नौ गुरुओंकी कथा ९ - अवधूतोपाख्यान — कुररसे लेकर भृंगीतक सात गुरुओंकी कथा १० - लौकिक तथा पारलौकिक भोगोंकी असारताका निरूपण ११- बद्ध, मुक्त और भक्तजनोंके लक्षण १२ - सत्संगकी महिमा और कर्म तथा कर्मत्यागकी विधि १३ - हंसरूपसे सनकादिको दिये हुए उपदेशका वर्णन १४ - भक्तियोगकी महिमा तथा ध्यानविधिका वर्णन १५ - भिन्न-भिन्न सिद्धियोंके नाम और लक्षण १६- भगवान्की विभूतियोंका वर्णन १७ - वर्णाश्रम- धर्म-निरूपण १८ - वानप्रस्थ और संन्यासीके धर्म १ ९ - भक्ति, ज्ञान और यम- नियमादि साधनोंका वर्णन २० - ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग २१ -गुण- दोष व्यवस्थाका स्वरूप और रहस्य २२ - तत्त्वोंकी संख्या और पुरुष - प्रकृति- विवेक २३ - एक तितिक्षु ब्राह्मणका इतिहास २४ - सांख्ययोग २५- तीनों गुणोंकी वृत्तियोंका निरूपण २६- पुरूरवाकी वैराग्योक्ति २७ -क्रियायोगका वर्णन २८ - परमार्थनिरूपण २ ९- भागवतधर्मोंका निरूपण और उद्धवजीका बदरिकाश्रमगमन ३० - यदुकुलका संहार ३१ - श्रीभगवान्का स्वधामगमन द्वादश स्कन्ध १- कलियुगके राजवंशोंका वर्णन २ - कलियुगके धर्म ३ - राज्य, युगधर्म और कलियुगके दोषोंसे बचनेका उपाय--नामसंकीर्तन ४ -चार प्रकारके प्रलय ५- श्रीशुकदेवजीका अन्तिम उपदेश

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६- परीक्षित्की परमगति, जनमेजयका सर्पसत्र और वेदोंके शाखाभेद ७- अथर्ववेदकी शाखाएँ और पुराणोंके लक्षण ८ - मार्कण्डेयजीकी तपस्या और वर- प्राप्ति ९ - मार्कण्डेयजीका माया दर्शन १०- मार्कण्डेयजीको भगवान् शंकरका वरदान ११ - भगवान्के अंग, उपांग और आयुधोंका रहस्य तथा विभिन्न सूर्यगणोंका वर्णन १२- श्रीमद्भागवतकी संक्षिप्त विषय - सूची १३ - विभिन्न पुराणोंकी श्लोक संख्या और श्रीमद्भागवतकी महिमा श्रीमद्भागवतमाहात्म्य १ - परीक्षित् और वज्रनाभका समागम, शाण्डिल्य- मुनिके मुखसे भगवान्की लीलाके रहस्य और व्रजभूमिके महत्त्वका वर्णन २ - यमुना और श्रीकृष्णपत्नियोंका संवाद, कीर्तनोत्सवमें उद्धवजीका प्रकट होना ३ - श्रीमद्भागवतकी परम्परा और उसका माहात्म्य, भागवतश्रवणसे श्रोताओंको भगवद्धामकी प्राप्ति ४ - श्रीमद्भागवतका स्वरूप, प्रमाण, श्रोता-वक्ताके लक्षण, श्रवणविधि और माहात्म्य X x १ - श्रीमद्भागवत- पाठके विभिन्न प्रयोग २ - श्रीगोविन्ददामोदरस्तोत्रम् ३- श्रीमद्भागवतकी आरती

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॥ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ श्रीमद्भागवतमहापुराणम् नवमः स्कन्धः अथ प्रथमोऽध्यायः वैवस्वत मनुके पुत्र राजा सुद्युम्नकी कथा राजोवाच

मन्वन्तराणि सर्वाणि त्वयोक्तानि श्रुतानि मे ।

वीर्याण्यनन्तवीर्यस्य हरेस्तत्र कृतानि च ॥१

योऽसौ सत्यव्रतो नाम राजर्षिर्द्रविडेश्वरः ।

ज्ञानं योऽतीतकल्पान्ते लेभे पुरुषसेवया ॥२

स वै विवस्वतः पुत्रो मनुरासीदिति श्रुतम् ।

त्वत्तस्तस्य सुताश्चोक्ता इक्ष्वाकुप्रमुखा नृपाः ॥३

तेषां वंशं पृथग् ब्रह्मन् वंश्यानुचरितानि च ।

कीर्तयस्व महाभाग नित्यं शुश्रूषतां हि नः ॥४

ये भूता ये भविष्याश्च भवन्त्यद्यतनाश्च ये ।

तेषां नः पुण्यकीर्तीनां सर्वेषां वद २ विक्रमान् ॥५

सूत उवाच

एवं परीक्षिता राज्ञा सदसि ब्रह्मवादिनाम् ।

पृष्टः प्रोवाच भगवाञ्छुकः परमधर्मवित् ॥६

श्रीशुक उवाच

श्रूयतां मानवो वंशः प्राचुर्येण परंतप ।

न शक्यते विस्तरतो वक्तुं वर्षशतैरपि ॥७

परावरेषां भूतानामात्मा यः पुरुषः परः ।

स एवासीदिदं विश्वं कल्पान्तेऽन्यन्न किञ्चन ॥८

राजा परीक्षित्ने पूछा - भगवन्! आपने सब मन्वन्तरों और उनमें अनन्त शक्तिशाली भगवान्‌के द्वारा किये हुए ऐश्वर्यपूर्ण चरित्रोंका वर्णन किया और मैंने उनका श्रवण भी