श्रीगणेशाय नमः।

पृथुकोपाख्यान : परमेश्वर के अनन्य भक्त को क्या प्राप्त होता है?

अनन्य भक्ति और मुक्ति

श्रीमद्भागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · दशम स्कन्ध · अध्याय 81 · पृष्ठ 926–933

707 शब्द · 4 मिनटका पाठ · 6 श्लोक

श्रीशुकदेव ने परीक्षित से कहा

कर्मबन्धन से मुक्ति का मार्ग समझाने हेतु

श्रीशुकदेवजी ने कहा— प्रिय परीक्षित! भगवान् श्रीकृष्ण सबके मन की बात जानते हैं। वे ब्राह्मणों के परम भक्त, उनके क्लेशों के नाशक तथा सन्तों के एकमात्र आश्रय हैं। उस समय वे ब्राह्मण-देवता के साथ बहुत देर तक बातचीत करते रहे। अब वे अपने प्यारे सखा उन ब्राह्मण से तनिक मुसकराकर विनोद करते हुए बोले।

श्रीशुक उवाच

स इत्थं द्विजमुख्येन सह संकथयन् हरिः ।
सर्वभूतमनोऽभिज्ञः स्मयमान उवाच तम् ॥

श्रीशुकदेवजी कहते हैं - प्रिय परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्ण सबके मनकी बात जानते हैं । वे ब्राह्मणोंके परम भक्त, उनके क्लेशोंके नाशक तथा संतोंके एकमात्र आश्रय हैं । वे पूर्वोक्त प्रकारसे उन ब्राह्मणदेवताके साथ बहुत देरतक बातचीत करते रहे । अब वे अपने प्यारे सखा उन ब्राह्मणसे तनिक मुसकराकर विनोद करते हुए बोले । उस समय भगवान् श्रीकृष्ण उन ब्राह्मण - देवताकी ओर प्रेमभरी दृष्टिसे देख रहे थे ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · दशम स्कन्ध · अध्याय 81 · श्लोक 1पृष्ठ 927

भगवान् श्रीकृष्ण उन ब्राह्मण-देवता की ओर प्रेमभरी दृष्टि से देख रहे थे। उन्होंने विचार करके उनके वस्त्रों में से चिथड़े की एक पोटली में बँधा हुआ चिउड़ा देखा और 'यह क्या है?'—ऐसा कहकर स्वयं ही वह पोटली छीन ली। वे बड़े आदर से कहने लगे— 'प्यारे मित्र! यह तो तुम मेरे लिये अत्यन्त प्रिय भेंट ले आये हो। ये चिउड़े न केवल मुझे, बल्कि सारे संसार को तृप्त करने के लिये पर्याप्त हैं।' ऐसा कहकर उन्होंने उसमें से एक मुट्ठी चिउड़ा खा लिया। दूसरी मुट्ठी ज्यों ही भरी, त्यों ही रुक्मिणी के रूप में स्वयं भगवती लक्ष्मीजी ने भगवान् श्रीकृष्ण का हाथ पकड़ लिया! क्योंकि वे तो एकमात्र भगवान् की परायण हैं, उन्हें छोड़कर और कहीं जा नहीं सकतीं।

इति मुष्टिं सकृज्जग्ध्वा द्वितीयां जग्धुमाददे ।
तावच्छ्रीर्जगृहे हस्तं तत्परा परमेष्ठिनः ॥

विचार करके उनके वस्त्रमेंसे चिथड़ेकी एक पोटलीमें बँधा हुआ चिउड़ा ' यह क्या है' - ऐसा कहकर स्वयं ही छीन लिया || ८ || और बड़े आदरसे कहने लगे – ' प्यारे मित्र! यह तो तुम मेरे लिये अत्यन्त प्रिय भेंट ले आये हो । ये चिउड़े न केवल मुझे, बल्कि सारे संसारको तृप्त करनेके लिये पर्याप्त हैं ' ॥९ ॥ ऐसा कहकर वे उसमेंसे एक मुट्ठी चिउड़ा खा गये और दूसरी मुट्ठी ज्यों ही भरी, त्यों ही रुक्मिणीके रूपमें स्वयं भगवती लक्ष्मीजीने भगवान् श्रीकृष्णका हाथ पकड़ लिया! क्योंकि वे तो एकमात्र भगवान्‌के परायण हैं, उन्हें छोड़कर और कहीं जा नहीं सकतीं ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · दशम स्कन्ध · अध्याय 81 · श्लोक 10पृष्ठ 928

रुक्मिणीजी ने कहा— 'विश्वात्मन्! बस, बस। मनुष्य को इस लोक में तथा मरने के बाद परलोक में भी समस्त सम्पत्तियों की समृद्धि प्राप्त करने के लिये यह एक मुट्ठी चिउड़ा ही बहुत है; क्योंकि आपके लिये इतना ही प्रसन्नता का हेतु बन जाता है।'

श्रीशुक उवाच

ब्रह्मण्यो ब्राह्मणं कृष्णो भगवान् प्रहसन् प्रियम् ।
प्रेम्णा निरीक्षणेनैव प्रेक्षन् खलु सतां गतिः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · दशम स्कन्ध · अध्याय 81 · श्लोक 2पृष्ठ 927

ब्राह्मणदेवता कहने लगे— 'भाई हूँ! कहाँ तक कहूँ? मैं थका हुआ था, इसलिये स्वयं उनकी पटरानी रुक्मिणीजी ने अपने हाथों चँवर डुलाकर मेरी सेवा की। ओह, देवताओं के आराध्यदेव होकर भी ब्राह्मणों को अपना इष्टदेव माननेवाले प्रभु ने पाँव दबाकर, अपने हाथों खिला-पिलाकर मेरी अत्यन्त सेवा-शुश्रूषा की और देवता के समान मेरी पूजा की। स्वर्ग, मोक्ष, पृथ्वी और रसातल की सम्पत्ति तथा समस्त योगसिद्धियों की प्राप्तिका मूल उनके चरणों की पूजा ही है।'

ब्राह्मण उवाच

यस्यच्छन्दोमयं ब्रह्म देह आवपनं विभो ।
श्रेयसां तस्य गुरुषु वासोऽत्यन्तविडम्बनम् ॥

ब्राह्मणदेवताने कहा- देवताओंके आराध्यदेव जगद्गुरु श्रीकृष्ण! भला, अब हमें क्या करना बाकी है? क्योंकि आपके साथ, जो सत्यसंकल्प परमात्मा हैं, हमें गुरुकुलमें रहनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ था ॥४४ ॥ प्रभो! छन्दोमय वेद, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, चतुर्विध पुरुषार्थके मूल स्रोत हैं; और वे हैं आपके शरीर । वही आप वेदाध्ययनके लिये गुरुकुलमें निवास करें, यह मनुष्य- लीलाका अभिनय नहीं तो और क्या है?

श्रीमद्भागवत महापुराण · दशम स्कन्ध · अध्याय 81 · श्लोक 45पृष्ठ 926

वे आगे कहने लगे— 'फिर भी परमदयालु श्रीकृष्ण ने यह सोचकर मुझे थोड़ा-सा भी धन नहीं दिया कि कहीं यह दरिद्र धन पाकर बिलकुल मतवाला न हो जाय और मुझे न भूल बैठे।' उस समय वे यह सोच ही रहे थे कि देवताओं के समान सुन्दर-सुन्दर स्त्री-पुरुष गाजे-बाजे के साथ मङ्गलगीत गाते हुए उस महाभाग्यवान् ब्राह्मण की अगवानी करने के लिये आये। पतिदेव का शुभागमन सुनकर ब्राह्मणी को अपार आनन्द हुआ और वह हड़बड़ाकर जल्दी-जल्दी घर से निकल आयी; वह ऐसी मालूम होती थी मानो मूर्तिमती लक्ष्मीजी ही कमलवन से पधारी हों। पतिदेव को देखते ही पतिव्रता पत्नी के नेत्रों में प्रेम और उत्कण्ठा के आवेग से आँसू छलक आये। उसने अपने नेत्र बन्द कर लिये। ब्राह्मणी ने बड़े प्रेमभाव से उन्हें नमस्कार किया और मन-ही-मन उनका आलिङ्गन किया।

स चालब्ध्वा धनं कृष्णान्न तु याचितवान् स्वयम् ।
स्वगृहान् व्रीडितोऽगच्छन्महद्दर्शननिर्वृतः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · दशम स्कन्ध · अध्याय 81 · श्लोक 14पृष्ठ 929

उसका महल क्या था, मानो देवराज इन्द्र का निवासस्थान! इसमें मणियों के सैकड़ों खम्भे खड़े थे। हाथी के दाँत के बने हुए और सोने के पात से मँढे हुए पलङ्गों पर दूध के फेन की तरह श्वेत और कोमल बिछौने बिछ रहे थे। बहुत-से चँवर वहाँ रखे हुए थे, जिनमें सोने की डण्डियाँ लगी हुई थीं। सोने के सिंहासन शोभायमान हो रहे थे, जिन पर बड़ी कोमल-कोमल गद्दियाँ लगी हुई थीं! ऐसे चन्दोवे भी झिलमिला रहे थे जिनमें मोतियों की लड़ियाँ लटक रही थीं। स्फटिक मणियों की स्वच्छ भीतों पर पन्ने की पच्चीकारी की हुई थी। रत्ननिर्मित स्त्री-मूर्तियों के हाथों में रत्नों के दीपक जगमगा रहे थे।

ब्राह्मणदेवता ने विचार किया कि अजन्मा भगवान् श्रीकृष्ण सम्पत्ति आदिके दोष जानते हैं। वे देखते हैं कि बड़े-बड़े धनियों का धन और ऐश्वर्य के मद से पतन हो जाता है। इसलिये वे अपने अदूरदर्शी भक्त को उसके माँगते रहने पर भी तरह-तरह की सम्पत्ति, राज्य और ऐश्वर्य नहीं देते। यह उनकी बड़ी कृपा है।

प्रिय परीक्षित! अपनी बुद्धि से इस प्रकार निश्चय करके वे ब्राह्मणदेवता त्यागपूर्वक अनासक्त भाव से अपनी पत्नी के साथ भगवत्प्रसाद स्वरूप विषयों को ग्रहण करने लगे और दिनोंदिन उनकी प्रेम-भक्ति बढ़ने लगी। उन्होंने देखा कि 'यद्यपि भगवान् अजित हैं, किसीके अधीन नहीं हैं; फिर भी वे अपने सेवकों के अधीन हो जाते हैं, उनसे पराजित हो जाते हैं।' अब वे उन्हीं के ध्यान में तन्मय हो गये। ध्यान के आवेग से उनकी अविद्या की गाँठ कट गयी और उन्होंने थोड़े ही समय में भगवान् का धाम प्राप्त किया, जो सन्तों का एकमात्र आश्रय है। परीक्षित! ब्राह्मणों को अपना इष्टदेव माननेवाले भगवान् श्रीकृष्ण की इस ब्राह्मणभक्ति को जो सुनता है, उसे भगवान् के चरणों में प्रेमभाव प्राप्त हो जाता है और वह कर्मबन्धन से मुक्त हो जाता है।

एतद् ब्रह्मण्यदेवस्य श्रुत्वा ब्रह्मण्यतां नरः ।
लब्धभावो भगवति कर्मबन्धाद् विमुच्यते ॥

भी प्राणी जगत्में नहीं है ॥ ३ ९ ॥ इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णके प्यारे सखा उस ब्राह्मणने देखा कि ‘ यद्यपि भगवान् अजित हैं, किसीके अधीन नहीं हैं; फिर भी वे अपने सेवकोंके अधीन हो जाते हैं, उनसे पराजित हो जाते हैं, ' अब वे उन्हींके ध्यानमें तन्मय हो गये । ध्यानके आवेगसे उनकी अविद्याकी गाँठ कट गयी और उन्होंने थोड़े ही समयमें भगवान्का धाम, जो कि संतोंका एकमात्र आश्रय है, प्राप्त किया || ४० || परीक्षित्! ब्राह्मणोंको अपना इष्टदेव माननेवाले भगवान् श्रीकृष्णकी इस ब्राह्मणभक्तिको जो सुनता है, उसे भगवान्‌के चरणोंमें प्रेमभाव प्राप्त हो जाता है और वह कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · दशम स्कन्ध · अध्याय 81 · श्लोक 41पृष्ठ 933

In English

Krishna's Service to the Brahmin

Krishna visits a poor Brahmin and eats a small portion of flattened rice brought by him. Rukmini explains that even a handful of this food is enough for worldly and spiritual prosperity. The Brahmin realizes that Krishna withheld wealth from him to prevent him from becoming arrogant, leading the man to achieve spiritual liberation.

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  • What did krishna eat from the brahmin?
  • Why did rukmini stop krishna from eating more flattened rice?
  • Why did krishna not give the brahmin wealth or property?
  • How did the brahmin reach the abode of god?

Also written: Prithukopakhyana, Prithuka, Brahmanadevata, Rukmini, Brahmani, पृथुकोपाख्यान