श्रीगणेशाय नमः।

सगरोपाख्यान : अहङ्कारवश तपस्वी का अपमान करने पर क्या परिणाम भुगतने पड़े?

अहङ्कार और भक्ति का अन्तर

श्रीमद्भागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · नवम स्कन्ध · अध्याय 8 · पृष्ठ 77–83

567 शब्द · 3 मिनटका पाठ · 5 श्लोक

श्रीशुक ने परीक्षित से कहा

सगर के पुत्रों द्वारा कपिलमुनि के तिरस्कार और भस्म होने की घटना पर प्रश्न आने पर

श्रीशुकदेव जी कहते हैं— हे परीक्षित! जब राजा सगर के पुत्रों द्वारा कपिलमुनि के तिरस्कार और उनके भस्म होने की घटना का प्रश्न आया, तब यह कथा सुनाई गई।

सगर -चरित्र श्रीशुक' उवाच हरितो रोहितसुतश्चम्पस्तस्माद् विनिर्मिता ।
चम्पापुरी सुदेवोऽतो विजयो यस्य चात्मजः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 1पृष्ठ 78

वृक और उसके पुत्र बाहुक की कथा से यह प्रसङ्ग आरम्भ होता है। शत्रुओं ने बाहुक से उसका राज्य छीन लिया, जिसके कारण वह अपनी पत्नी के साथ वन में चला गया। बुढ़ापे के कारण जब वन में ही बाहुक की मृत्यु हो गई, तब उसकी पत्नी सती होने को उद्यत हुई। परन्तु महर्षि और्व को यह ज्ञात था कि वह गर्भवती है, इसलिए उन्होंने उसे सती होने से रोक दिया। जब उसकी सौतों को इस बात का पता चला, तो उन्होंने उसे भोजन के साथ गर यानी विष दे दिया। किन्तु उस विष का गर्भ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा; बल्कि उस विष को लिये हुए ही एक बालक का जन्म हुआ, जो गर के कारण 'सगर' कहलाया। सगर बड़े यशस्वी और चक्रवर्ती सम्राट् हुए। उनके पुत्रों ने पृथ्वी खोदकर समुद्र बना दिया था। राजा सगर ने अपने गुरुदेव और्व की आज्ञा मानकर तालजङ्घ, यवन, शक, हैहय और बर्बर जातियों का वध करने के स्थान पर उन्हें विरूप बना दिया— किसी के सिर मुड़वा दिए, किसी की मूँछ-दाढ़ी रखवा दी, तो किसी को आधा मुँडवा दिया।

आज्ञायास्यै सपत्नीभिर्गरी दत्तोऽन्धसा सह ।
सह३ तेनैव संजातः सगराख्यो महायशाः ॥

वृक और वृकका पुत्र हुआ बाहुक । शत्रुओंने बाहुकसे राज्य छीन लिया, तब वह अपनी पत्नीके साथ वनमें चला गया || २ || वनमें जानेपर बुढ़ापेके कारण जब बाहुककी मृत्यु हो गयी, तब उसकी पत्नी भी उसके साथ सती होनेको उद्यत हुई । परन्तु महर्षि और्वको यह मालूम था कि इसे गर्भ है । इसलिये उन्होंने उसे सती होनेसे रोक दिया ॥३ ॥ जब उसकी सौतोंको यह बात मालूम हुई तो उन्होंने उसे भोजनके साथ गर ( विष ) दे दिया । परन्तु गर्भपर उस विषका कोई प्रभाव नहीं पड़ा; बल्कि उस विषको लिये हुए ही एक बालकका जन्म हुआ जो गरके साथ पैदा होनेके कारण ' सगर ' कहलाया । सगर बड़े यशस्वी राजा हुए ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 4पृष्ठ 78

उस समय महारानी सुमतिका गर्भ से उत्पन्न सगर के पुत्रों ने अपने पिता की आज्ञानुसार यज्ञपशु घोड़े के लिए सारी पृथ्वी छान डाली। जब उन्हें कहीं घोड़ा नहीं मिला, तब वे बड़े घमण्ड से सब ओर से पृथ्वी को खोद डालने लगे। खोदते-खोदते उन्हें पूर्व और उत्तर के कोने पर कपिलमुनि के पास अपना घोड़ा दिखाई दिया। घोड़े को देखकर वे साठ हजार राजकुमार शस्त्र उठाकर चिल्लाते हुए उनकी ओर दौड़ पड़े— 'यही हमारे घोड़े को चुराने वाला चोर है! देखो तो सही, इसने इस समय कैसे आँखें मूँद रखी हैं! यह पापी है, इसको मार डालो, इसको मार डालो!' उसी क्षण कपिलमुनि ने अपनी पलकें खोलीं और वे सब जलकर खाक हो गए। परीक्षित! सगर के लड़के कपिलमुनि के क्रोध से जले, ऐसा कहना उचित नहीं है; क्योंकि वे तो शुद्ध सत्त्वगुण के परम आश्रय हैं। उनका शरीर जगत् को पवित्र करता रहता है। उनमें भला क्रोध रूप तमोगुण की सम्भावना कैसे हो सकती है?

भरुकस्तत्सुतस्तस्माद् वृकस्तस्यापि बाहुकः ।
सोऽरिभिर्हृतभू राजा सभार्यो वनमाविशत् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 2पृष्ठ 78

जब अयोध्या के नागरिकों ने देखा कि बालक लौट आए हैं, तो उन्हें असीम आश्चर्य हुआ और राजा सगर को भी बड़ा पश्चात्ताप हुआ। इसके पश्चात राजा सगर की आज्ञा से अंशुमान घोड़े को ढूँढ़ने के लिए निकले। उन्होंने अपने चाचाओं द्वारा खोदे गए समुद्र के किनारे-किनारे चलते हुए उनके शरीर की भस्म के पास ही उस घोड़े को देखा। वहीं भगवान के अवतार कपिलमुनि बैठे हुए थे। उन्हें देखकर उदारहृदय अंशुमान ने उनके चरणों में प्रणाम किया और हाथ जोड़कर एकाग्र मन से उनकी स्तुति की।

अनन्तर्वाससः कांश्चिदबहिर्वाससोऽपरान् ।
सोऽश्वमेधैरयजत सर्ववेदसुरात्मकम् ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 7पृष्ठ 79

जब अंशुमान ने भगवान कपिलमुनि के प्रभाव का इस प्रकार गान किया, तब उन्होंने मन ही मन अंशुमान पर बड़ा अनुग्रह किया और कहा— 'बेटा! यह घोड़ा तुम्हारे पितामह का यज्ञपशु है। इसे तुम ले जाओ। तुम्हारे जले हुए चाचाओं का उद्धार केवल गङ्गाजल से होगा, और कोई उपाय नहीं है।' अंशुमान ने बड़ी नम्रता से उन्हें प्रसन्न करके उनकी परिक्रमा की और वे घोड़े को लेकर आ गए।

अश्वोऽयं नीयतां वत्स पितामहपशुस्तव ।
इमे च पितरो दग्धा गंगाम्भोऽर्हन्ति नेतरत् ॥

श्रीभगवान्ने कहा — ' बेटा! यह घोड़ा तुम्हारे पितामहका यज्ञपशु है । इसे तुम ले जाओ । तुम्हारे जले हुए चाचाओंका उद्धार केवल गंगाजलसे होगा, और कोई उपाय नहीं है '

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 8 · श्लोक 29पृष्ठ 83

राजा सगर ने उस यज्ञपशु के द्वारा यज्ञ की शेष क्रिया समाप्त की। तत्पश्चात राजा सगर ने अंशुमान को राज्य का भार सौंप दिया और वे स्वयं विषयों से निःस्पृह एवं बन्धनमुक्त होकर, महर्षि और्व द्वारा बताए हुए मार्ग से परमपद की प्राप्ति करते हुए मोक्ष प्राप्त कर गए।

In English

The Story of King Sagara and Kapil Muni

After Bahuk died in the forest, his pregnant wife gave birth to a son named Sagara. Sagara's sons searched the earth for a sacrificial horse and eventually found it near the sage Kapil Muni, who burned them to ashes after they insulted him. Later, Sagara's descendant Anshuman found the horse and met Kapil Muni, who told him that only the water of the Ganges could save his ancestors.

This page answers

  • How was sagara born?
  • Why did kapil muni burn the sons of sagara?
  • Who found the sacrificial horse of sagara?
  • How can the ancestors of sagara be saved?
  • What happened to anshuman after meeting kapil muni?

Also written: Sagaropakhyana, Sagara, Bahuka, Sumata, Asamanjasa, Anshumana, Kapilamuni, सगरोपाख्यान