श्रीदामचरित : परमेश्वर के सखा बनने हेतु किस प्रकार का आत्मिक समर्पण आवश्यक है?
निस्वार्थ भक्ति और सख्य भाव
श्रीमद्भागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · दशम स्कन्ध · अध्याय 80 · पृष्ठ 918–926
650 शब्द · 4 मिनटका पाठ · 5 श्लोक
श्रीशुकदेव ने राजा परीक्षित से कहा
परमेश्वर के अनन्त स्वरूप की जिज्ञासा शान्त करने हेतु
जब राजा परीक्षित ने भगवान् बलराम के अनन्त स्वरूप और उनके चरित्रों के विषय में जिज्ञासा प्रकट की, तब शौनकादि ऋषियों के सम्मुख उपस्थित श्रीशुकदेव जी का हृदय भगवान् श्रीकृष्ण के ध्यान में तल्लीन हो गया। उन्होंने गम्भीर स्वर में कहा— "हे परीक्षित! भगवान् श्रीकृष्ण के परम मित्र एक ब्राह्मण थे, जो बड़े ब्रह्मज्ञानी, विषयों से विरक्त, शान्तचित्त और जितेन्द्रिय थे। वे गृहस्थ होते हुए भी किसी प्रकार का सङ्ग्रह-परिग्रह नहीं रखते थे और प्रारब्ध के अनुसार जो कुछ मिल जाता, उसी में सन्तुष्ट रहते थे। उनके वस्त्र फटे-पुराने थे और उनकी पत्नी भी उनके समान ही भूख से दुबली हो रही थी।"
योऽनुस्मरेत रामस्य कर्माण्यद्भुतकर्मणः ।
सायं प्रातरनन्तस्य विष्णोः स दयितो भवेत् ॥
परीक्षित्! भगवान् बलराम स्वयं अनन्त हैं । उनका स्वरूप मन और वाणीके परे है । उन्होंने लीलाके लिये ही यह मनुष्योंका - सा शरीर ग्रहण किया है । उन बलशाली बलरामजीके ऐसे- ऐसे चरित्रोंकी गिनती भी नहीं की जा सकती ॥३३ ॥ जो पुरुष अनन्त, सर्वव्यापक, अद्भुतकर्मा भगवान् बलरामजीके चरित्रोंका सायं प्रातः स्मरण करता है, वह भगवान्का अत्यन्त प्रिय हो जाता है ।
एक दिन वह दरिद्रता की प्रतिमूर्ति दुःखिनी ब्राह्मणी अपने मुरझाए हुए मुख से अपने पति के पास पहुँची और बोली— "भगवान् श्रीकृष्ण का दर्शन हो जाएगा, यह तो जीवन का बहुत बड़ा लाभ है!" अपनी पत्नी के इस आग्रह से प्रभावित होकर ब्राह्मणदेव ने जाने का निश्चय किया। उन्होंने पूछा— "कल्याणी! घर में कुछ भेंट देने योग्य वस्तु भी है क्या? यदि हो तो दे दो।" तब उस ब्राह्मणी ने पड़ोस के ब्राह्मणों के घर से चार मुट्ठी चिउड़े माँगकर एक कपड़े में बाँध दिए और अपने पति को भेंट स्वरूप सौंप दिए।
श्रीकृष्णके द्वारा सुदामाजीका स्वागत राजोवाच भगवन् यानि चान्यानि मुकुन्दस्य महात्मनः ।
वीर्याण्यनन्तवीर्यस्य श्रोतुमिच्छामहे प्रभो ॥
वे ब्राह्मणदेव उन चिउड़ों को लेकर द्वारका की ओर चल पड़े। मार्ग में उनके मन में केवल एक ही विचार था— 'मुझे भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन कैसे प्राप्त होंगे?' जब वे द्वारका पहुँचे, तो अन्य ब्राह्मणों के साथ सैनिकों की तीन छावनियाँ और तीन ड्योढ़ियाँ पार करते हुए वे उन महलों में जा पहुँचे जहाँ तक पहुँचना अत्यन्त कठिन है। वहाँ श्रीकृष्ण की सोलह हजार रानियों के महल थे। एक भव्य और शोभा-युक्त महल में प्रवेश करते ही उन्हें ऐसा अनुभव हुआ मानो वे ब्रह्मानन्द के समुद्र में डूब रहे हों।
को`नु श्रुत्वासकृद् ब्रह्मन्नुत्तमश्लोकसत्कथाः ।
विरमेत विशेषज्ञो विषण्णः काममार्गणैः ॥
वहाँ उपस्थित रानियाँ आपस में विस्मय से कहने लगीं— "इस नङ्ग-धड़ङ्ग, निर्धन और निकृष्ट भिखमङ्गे ने ऐसा कौन-सा पुण्य किया है, जिससे त्रिलोकी-गुरु श्रीनिवास श्रीकृष्ण स्वयं इसका आदर-सत्कार कर रहे हैं? देखो तो सही, इन्होंने अपने पलङ्ग पर सेवा करती हुई स्वयं लक्ष्मीरूपिणी रुक्मिणीजी को छोड़कर इस ब्राह्मण को अपने बड़े भाई बलरामजी के समान हृदय से लगाया है!"
वहाँ भगवान् श्रीकृष्ण और वे ब्राह्मण दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़कर अपने पूर्वजीवन की उन आनन्ददायक घटनाओं का स्मरण करने लगे जो उनके गुरुकुल में रहते समय घटित हुई थीं। ब्राह्मणदेव ने भावपूर्ण स्वर में कहा— "हे जगद्गुरु श्रीकृष्ण! भला, अब हमें क्या करना बाकी है? क्योंकि आपके साथ, जो सत्यसङ्कल्प परमात्मा हैं, हमें गुरुकुल में रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। प्रभु! छन्दोमय वेद, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के मूल स्रोत तो आपके ही शरीर हैं; आप स्वयं वेदाध्ययन करने हेतु गुरुकुल में आए, यह मनुष्य-लीला का अभिनय नहीं तो और क्या है?"
उस समय दोनों ने गुरुदेव सान्दीपनि के आश्रम में बिताए कठिन समय को याद किया। ब्राह्मणदेव ने कहा— "ब्रह्मन्! जिस समय हम लोग गुरुकुल में निवास कर रहे थे; उस समय की वह बात आपको याद है क्या, जब हम दोनों को एक दिन हमारी गुरुपत्नी ने ईंधन लाने के लिये जङ्गल में भेजा था? उस समय हम एक घोर जङ्गल में थे और बिना ऋतु के ही भयङ्कर आँधी-पानी आ गया। आकाश में बिजली कड़कने लगी थी और सूर्यास्त के पश्चात चारों ओर इतना अन्धेरा और पानी हो गया कि पता ही नहीं चलता था कि कहाँ गड्ढा है और कहाँ किनारा!"
शिरस्तु तस्योभयलिंगमानमे- त्तदेव यत् पश्यति तद्धि चक्षुः ।
अंगानि विष्णोरथ तज्जनानां पादोदकं यानि भजन्ति नित्यम् ॥
है, वही सच्ची वाणी है । वे ही हाथ सच्चे हाथ हैं, जो भगवान्की सेवाके लिये काम करते हैं । वही मन सच्चा मन है, जो चराचर प्राणियोंमें निवास करनेवाले भगवान्का स्मरण करता है; और वे ही कान वास्तवमें कान कहनेयोग्य हैं, जो भगवान्की पुण्यमयी कथाओंका श्रवण करते हैं ॥३ ॥ वही सिर सिर है, जो चराचर जगत्को भगवानकी चल-अचल प्रतिमा समझकर नमस्कार करता है; और जो सर्वत्र भगवद्विग्रहका दर्शन करते हैं, वे ही नेत्र वास्तवमें नेत्र हैं । शरीरके जो अंग भगवान् और उनके भक्तोंके चरणोदकका सेवन करते हैं, वे ही अंग वास्तवमें अंग हैं; सच पूछिये तो उन्हींका होना सफल है ।
गुरुदेव सान्दीपनि ने उन शिष्यों को देखकर कहा था— "द्विज-शिरोमणिओं! मैं तुम लोगों से अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम्हारे सारे मनोरथ और अभिलाषाएँ पूर्ण हों। तुमने हमसे जो वेदाध्ययन किया है, वह तुम्हें सर्वदा कण्ठस्थ रहे और इस लोक एवं परलोक में कहीं भी निष्फल न हो।" गुरुदेव ने उन्हें आशीर्वाद दिया था क्योंकि उन्होंने अपने लिए कष्ट सहकर उनकी सेवा की थी।
यस्यच्छन्दोमयं ब्रह्म देह आवपनं विभो ।
श्रेयसां तस्य गुरुषु वासोऽत्यन्तविडम्बनम् ॥
ब्राह्मणदेवताने कहा- देवताओंके आराध्यदेव जगद्गुरु श्रीकृष्ण! भला, अब हमें क्या करना बाकी है? क्योंकि आपके साथ, जो सत्यसंकल्प परमात्मा हैं, हमें गुरुकुलमें रहनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ था ॥४४ ॥ प्रभो! छन्दोमय वेद, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, चतुर्विध पुरुषार्थके मूल स्रोत हैं; और वे हैं आपके शरीर । वही आप वेदाध्ययनके लिये गुरुकुलमें निवास करें, यह मनुष्य- लीलाका अभिनय नहीं तो और क्या है?
वहाँ श्रीकृष्ण ने अपने सखा का स्वागत किया और उन्हें प्रेमपूर्वक भुजपाश में बाँध लिया। भगवान् ने स्वयं अपने मित्र की पूजा की, उनके चरण पखारे और उन्हें तिलक लगाया। रुक्मिणी जी ने भी स्वयं चँवर डुलाकर उस मलिन वेशधारी ब्राह्मण की सेवा की।
In English
The Brahmin Friend of Krishna
A poor, ascetic Brahmin travels to Dwarka to meet Krishna after his wife provides him with a small gift of rice. Upon his arrival, Krishna welcomes him like a brother and treats him with great honor, recalling their shared time as students under Sage Sandipani.
This page answers
- What did the brahmin's wife give him for his journey?
- How did krishna welcome the poor brahmin in dwarka?
- Where did krishna and the brahmin study together?
- What happened to krishna and his friend while they were collecting fuel for sandipani?
Also written: Shridamacharita, Shridama, Shrikrishna, Sudama, Shrishukadeva, Rukmini, Kalyani, श्रीदामचरित