श्रीगणेशाय नमः।

श्रीरामोपाख्यान : लोक-निन्दा के भय से सीताजी का परित्याग क्यों हुआ?

लोकापवाद और कर्तव्य का द्वन्द्व

श्रीमद्भागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · नवम स्कन्ध · अध्याय 11 · पृष्ठ 104–111

530 शब्द · 3 मिनटका पाठ · 4 श्लोक

श्रीशुकदेवजी ने परीक्षित् से कहा

राजा परीक्षित को धर्म का मर्म समझाने हेतु

श्रीशुकदेवजी ने परीक्षित् को सुनाना आरम्भ किया—एक ऐसा समय था जब किसी को न तो मानसिक चिन्ता थी और न ही शारीरिक रोग। बुढ़ापा, दुर्बलता, दुःख, शोक, भय अथवा थकावट का नामोनिशान तक नहीं था। उस काल में भगवान श्रीराम एकपत्नी व्रत धारण किए हुए थे; उनका चरित्र अत्यन्त पवित्र और राजर्षियों के समान था। वे गृहस्थों को स्वधर्म की शिक्षा देने के लिए स्वयं उस धर्म का आचरण करते थे।

महारानी सीताजी अपने पति के हृदय के भाव जानती थीं। वे प्रेम, सेवा, शील, विनय और लज्जा जैसे गुणों से भगवान श्रीराम का चित्त चुरा लेती थीं। एक बार उन्होंने उत्तम सामग्रियों से युक्त यज्ञों द्वारा स्वयं के स्वयम्प्रकाश आत्मा का यजन किया। उन्होंने होता को पूर्व, ब्रह्मा को दक्षिण, अध्वर्यु को पश्चिम और उद्गाता को उत्तर दिशा प्रदान कर दी। उनके बीच जो भूमि शेष बची, उसे उन्होंने आचार्य को सौंप दिया; उनका निश्चय था कि सम्पूर्ण भूमण्डल का एकमात्र अधिकारी निःस्पृह ब्राह्मण ही है। इस प्रकार सारा भूमण्डल दान करने के पश्चात उनके पास केवल अपने वस्त्र और आभूषण ही बचे। जब ब्राह्मणों ने देखा कि श्रीराम ब्राह्मणों को अपना इष्टदेव मानते हैं और उनके हृदय में अनन्त स्नेह है, तो उनका हृदय प्रेम से द्रवित हो गया। उन्होंने प्रसन्न होकर सारी पृथ्वी भगवान को लौटाते हुए कहा—"प्रभो! आप सब लोकों के एकमात्र स्वामी हैं। आप हमारे हृदय में रहकर अपनी ज्योति से अज्ञानान्धकार का नाश कर रहे हैं। आपका ज्ञान अनन्त है। पवित्र कीर्तिवाले पुरुषों में आप सर्वश्रेष्ठ हैं। उन महात्माओं को, जो किसी को पीड़ा नहीं पहुँचाते, आपने अपने चरणकमल दे रखे हैं; फिर भी आप ब्राह्मणों को अपना इष्टदेव मानते हैं। भगवन! आपके इस रामरूप को हम नमस्कार करते हैं।"

स्तुति श्रीशुक उवाच

नमो ब्रह्मण्यदेवाय रामायाकुण्ठमेधसे ।
उत्तमश्लोकधुर्याय न्यस्तदण्डार्पिताङ्घ्रये ॥

आपका ज्ञान अनन्त है । पवित्र कीर्तिवाले पुरुषोंमें आप सर्वश्रेष्ठ हैं । उन महात्माओंको, जो किसीको किसी प्रकारकी पीड़ा नहीं पहुँचाते, आपने अपने चरणकमल दे रखे हैं । ऐसा होनेपर भी आप ब्राह्मणोंको अपना इष्टदेव मानते हैं । भगवन्! आपके इस रामरूपको हम नमस्कार करते हैं '

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 11 · श्लोक 7पृष्ठ 105

परीक्षित्! एक बार अपनी प्रजा की स्थिति जानने के लिए श्रीराम रात के समय बिना किसी को बताए छिपकर घूम रहे थे। उस समय उन्होंने किसी का यह वचन सुना, जो अपनी पत्नी से कह रहा था—"अरी! तू दुष्ट और कुलटा है। तू पराये घर में रह आयी है। स्त्री-लोभी राम भले ही सीता को रख लें, परन्तु मैं तुझे फिर नहीं रख सकता।" सचमुच, सबको प्रसन्न रखना कठिन है क्योंकि मूर्खों की कमी नहीं होती। जब श्रीराम ने बहुतों के मुँह से ऐसी बातें सुनीं, तो वे लोकापवाद से भयभीत हो गए और उन्होंने श्रीसीताजी का परित्याग कर दिया।

स्त्रीपुंप्रसंग एतादृक्सर्वत्र त्रासमावहः ।
अपीश्वराणां किमुत ग्राम्यस्य गृहचेतसः ॥

द्वारा निर्वासित सीताजीने अपने पुत्रोंको वाल्मीकिजीके हाथोंमें सौंप दिया और भगवान् श्रीरामके चरणकमलोंका ध्यान करती हुई वे पृथ्वीदेवीके लोकमें चली गयीं || १५ || यह समाचार सुनकर भगवान् श्रीरामने अपने शोका -वेशको बुद्धिके द्वारा रोकना चाहा, परन्तु परम समर्थ होनेपर भी वे उसे रोक न सके । क्योंकि उन्हें जानकीजीके पवित्र गुण बार- बार स्मरण हो आया करते थे ॥१६ ॥ परीक्षित्! यह स्त्री और पुरुषका सम्बन्ध सब कहीं इसी प्रकार दुःखका कारण है । यह बात बड़े - बड़े समर्थ लोगोंके विषयमें भी ऐसी ही है, फिर गृहासक्त विषयी पुरुषके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 11 · श्लोक 17पृष्ठ 107

निर्वासित सीताजी वाल्मीकि मुनि के आश्रम में रहने लगीं। उस समय वे गर्भवती थीं और उन्होंने दो पुत्रों को जन्म दिया—कुश और लव। वाल्मीकि मुनि ने उन दोनों के जात-कर्मादि संस्कार किए। जब समय आया, तब सीताजी ने अपने पुत्रों को वाल्मीकि मुनि के हाथों में सौंप दिया और भगवान श्रीराम के चरणकमलों का ध्यान करते हुए वे पृथ्वीदेवी के लोक में समा गईं। यह समाचार सुनकर श्रीराम ने अपने शोकावेश को रोकने का प्रयास किया, किन्तु वे सफल न हो सके क्योंकि उन्हें जानकीजी के पवित्र गुण बार-बार स्मरण आते थे।

अन्तर्वत्न्यागते काले यमौ सा सुषुवे सुतौ ।
कुशो लव इति ख्यातौ तयोश्चक्रे क्रिया मुनिः ॥

सीताजी उस समय गर्भवती थीं । समय आनेपर उन्होंने एक साथ ही दो पुत्र उत्पन्न किये । उनके नाम हुए — कुश और लव । वाल्मीकि मुनिने उनके जात- कर्मादि संस्कार किये ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 11 · श्लोक 11पृष्ठ 106

उधर, शत्रुघ्न ने मधुवन में लवण नामक राक्षस का वध कर मथुरा नगरी बसाई। दूसरी ओर, श्रीराम ने तेरह हजार वर्ष तक अखण्ड ब्रह्मचर्य और अग्निहोत्र का पालन किया। अन्ततः, अपने स्मरण करने वाले भक्तों के हृदय में अपने उन चरणकमलों को स्थापित करके, जो दण्डकवन के काँटों से बिन्ध गए थे, वे अपने स्वयम्प्रकाश परम ज्योतिर्मय धाम में प्रस्थान कर गए।

बुभुजे च यथाकालं कामान् धर्ममपीडयन् ।
वर्षपूगान् बहून् नृणामभिध्याताङ्घ्रिपल्लवः ॥

सभी स्त्री- पुरुष जिनके चरणकमलोंका ध्यान करते रहते हैं, वे ही भगवान् श्रीराम बहुत वर्षोंतक धर्मकी मर्यादाका पालन करते हुए समयानुसार भोगोंका उपभोग करते रहे ।

श्रीमद्भागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 11 · श्लोक 36पृष्ठ 110

In English

The Life and Exile of Rama and Sita

After donating his entire kingdom to Brahmins, Rama abandons Sita due to public criticism regarding her character. Sita lives in Valmiki's ashram and gives birth to twin sons, Kusha and Lava, before returning to the Earth. After a long period of asceticism, Rama departs from the world to his divine abode.

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Also written: Shriramopakhyana, Shrirama, Sitaji, Kusha, Lava, Bharata, Shatrughna, Lavana, श्रीरामोपाख्यान