श्रीगणेशाय नमः।
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ — पृष्ठ 101–110
श्रीमद्भागवत महापुराण - २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 101–110
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इधर तो ब्रह्मा आदि बड़े आनन्दसे भगवान्की लीलाओंका गान कर रहे थे और उधर जब भगवान्को यह मालूम हुआ कि भरतजी केवल गोमूत्रमें पकाया हुआ जौका दलिया खाते हैं, वल्कल पहनते हैं और पृथ्वीपर डाभ बिछाकर सोते हैं एवं उन्होंने जटाएँ बढ़ा रखी हैं, तब वे बहुत दुःखी हुए । उनकी दशाका स्मरण कर परम करुणाशील भगवान्का हृदय भर आया । जब भरतको मालूम हुआ कि मेरे बड़े भाई भगवान् श्रीरामजी आ रहे हैं, तब वे पुरवासी, मन्त्री और पुरोहितोंको साथ लेकर एवं भगवान्की पादुकाएँ सिरपर रखकर उनकी अगवानीके लिये चले । जब भरतजी अपने रहनेके स्थान नन्दिग्रामसे चले, तब लोग उनके साथ- साथ मंगलगान करते, बाजे बजाते चलने लगे । वेदवादी ब्राह्मण बार- बार वेदमन्त्रोंका उच्चारण करने लगे और उसकी ध्वनि चारों ओर गूँजने लगी । सुनहरी कामदार पताकाएँ फहराने लगीं । सोनेसे मढ़े हुए तथा रंग- बिरंगी ध्वजाओंसे सजे हुए रथ, सुनहले साजसे सजाये हुए सुन्दर घोड़े तथा सोनेके कवच पहने हुए सैनिक उनके साथ- साथ चलने लगे । सेठ साहूकार, श्रेष्ठ वारांगनाएँ, पैदल चलनेवाले सेवक और महाराजाओंके योग्य छोटी- बड़ी सभी वस्तुएँ उनके साथ चल रही थीं । भगवान्को देखते ही प्रेमके उद्रेकसे भरतजीका हृदय गद्गद हो गया, नेत्रोंमें आँसू छलक आये, वे भगवान्के चरणोंपर गिर पड़े ॥३४-३९ ॥ उन्होंने प्रभुके सामने उनकी पादुकाएँ रख दीं और हाथ जोड़कर खड़े हो गये । नेत्रोंसे आँसूकी धारा बहती जा रही थी । भगवान्ने अपने दोनों हाथोंसे पकड़कर बहुत देरतक भरतजीको हृदयसे लगाये रखा । भगवान्के नेत्रजलसे भरतजीका स्नान हो गया ॥४० ॥ इसके बाद
सीताजी और लक्ष्मणजीके साथ भगवान् श्रीरामजीने ब्राह्मण और पूजनीय गुरुजनोंको नमस्कार किया तथा सारी प्रजाने बड़े प्रेमसे सिर झुकाकर भगवान्के चरणोंमें प्रणाम किया ॥४१ ॥ उस समय उत्तरकोसल देशकी रहनेवाली समस्त प्रजा अपने स्वामी
भगवान्को बहुत दिनोंके बाद आये देख अपने दुपट्टे हिला -हिलाकर पुष्पोंकी वर्षा करती हुई आनन्दसे नाचने लगी ॥४२ ॥ भरतजीने भगवान्की पादुकाएँ लीं, विभीषणने श्रेष्ठ चँवर,
सुग्रीवने पंखा और श्रीहनुमानजीने श्वेत छत्र ग्रहण किया ॥ ४३ ॥ परीक्षित्! शत्रुघ्नजीने धनुष
और तरकस, सीताजीने तीर्थोंके जलसे भरा कमण्डलु, अंगदने सोनेका खड्ग और जाम्बवान्ने ढाल ले ली ॥४४ ॥
सदश्वे रुक्मसन्नाहैर्भटैः पुरटवर्मभिः ।
श्रेणीभिर्वारमुख्याभिर्भृत्यैश्चैव पदानुगैः ॥३८
पारमेष्ठ्यान्युपादाय पण्यान्युच्चावचानि च ।
पादयोर्न्यपतत् प्रेम्णा प्रक्लिन्नहृदयेक्षणः ॥ ३ ९
पादुके न्यस्य पुरतः प्रांजलिर्बाष्पलोचनः ।
तमाश्लिष्य चिरं दोर्भ्यां स्नापयन् नेत्रजैर्जलैः ॥ ४०
रामो लक्ष्मणसीताभ्यां विप्रेभ्यो येऽर्हसत्तमाः ।
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तेभ्यः स्वयं नमश्चक्रे प्रजाभिश्च नमस्कृतः ॥ ४१
धुन्वन्त उत्तरासंगान् पतिं वीक्ष्य चिरागतम् ।
उत्तराः कोसला माल्यैः किरन्तो ननृतुर्मुदा ॥४२
पादुके भरतोऽगृह्णाच्चामरव्यजनोत्तमे ।
विभीषणः ससुग्रीवः श्वेतच्छत्रं मरुत्सुतः ॥४३
धनुर्निषंगाञ्छत्रुघ्नः २ सीता तीर्थकमण्डलुम् ।
अबिभ्रदंगदः खड्गं हैमं चर्मर्क्षराण् नृप ॥४४
पुष्पकस्थोऽन्वितः स्त्रीभिः स्तूयमानश्च वन्दिभिः ।
विरेजे भगवान् राजन् ग्रहैश्चन्द्र इवोदितः ॥४५
भ्रातृभिर्नन्दितः सोऽपि सोत्सवां प्राविशत् पुरीम् ।
प्रविश्य राजभवनं गुरुपत्नीः स्वमातरम् ॥४६
गुरून् वयस्यावरजान् पूजितः प्रत्यपूजयत् ।
वैदेही लक्ष्मणश्चैव यथावत् समुपेयतुः ॥४७
पुत्रान् स्वमातरस्तास्तु प्राणांस्तन्व इवोत्थिताः ।
आरोप्याङ्केऽभिषिंचन्त्यो बाष्पौघैर्विजहुः शुचः ॥४८
जटा निर्मुच्य विधिवत् कुलवृद्धैः समं गुरुः ।
अभ्यषिंचद् यथैवेन्द्रं चतुःसिन्धुजलादिभिः ॥४९
एवं कृतशिरःस्नानः सुवासाः स्रग्व्यलंकृतः ।
स्वलंकृतैः सुवासोभिर्भ्रातृभिर्भार्यया बभौ ॥५०
अग्रहीदासनं भ्रात्रा प्रणिपत्य प्रसादितः ।
प्रजाः स्वधर्मनिरता वर्णाश्रमगुणान्विताः ।
गोप पितृवद् रामो मेनिरे पितरं च तम् ॥५१
इन लोगोंके साथ भगवान् पुष्पक विमानपर विराजमान हो गये, चारों तरफ यथास्थान स्त्रियाँ बैठ गयीं, वन्दीजन स्तुति करने लगे । उस समय पुष्पक विमानपर भगवान् श्रीरामकी ऐसी शोभा हुई, मानो ग्रहोंके साथ चन्द्रमा उदय हो रहे हों ॥४५ ॥
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इस प्रकार भगवान्ने भाइयोंका अभिनन्दन स्वीकार करके उनके साथ अयोध्यापुरीमें प्रवेश किया । उस समय वह पुरी आनन्दोत्सवसे परिपूर्ण हो रही थी । राजमहलमें प्रवेश करके उन्होंने अपनी माता कौसल्या, अन्य माताओं, गुरुजनों, बराबरके मित्रों और छोटोंका यथायोग्य सम्मान किया तथा उनके द्वारा किया हुआ सम्मान स्वीकार किया । श्रीसीताजी और लक्ष्मणजीने भी भगवान् के साथ- साथ सबके प्रति यथायोग्य व्यवहार किया ॥४६-४७ ॥ उस समय जैसे मृतक शरीरमें प्राणोंका संचार हो जाय, वैसे ही माताएँ अपने पुत्रोंके आगमनसे हर्षित हो उठीं । उन्होंने उनको अपनी गोद में बैठा लिया और अपने आँसुओंसे उनका अभिषेक किया । उस समय उनका सारा शोक मिट गया ॥४८ ॥ इसके बाद
वसिष्ठजीने दूसरे गुरुजनोंके साथ विधि पूर्वक भगवान्की जटा उतरवायी और बृहस्पतिने जैसे इन्द्रका अभिषेक किया था, वैसे ही चारों समुद्रोंके जल आदिसे उनका अभिषेक किया ॥४९ ॥ इस प्रकार सिरसे स्नान करके भगवान् श्रीरामने सुन्दर वस्त्र, पुष्पमालाएँ और
अलंकार धारण किये । सभी भाइयों और श्रीजानकीजीने भी सुन्दर सुन्दर वस्त्र और अलंकार धारण किये । उनके साथ भगवान् श्रीरामजी अत्यन्त शोभायमान हुए ॥ ५० ॥ भरतजीने
उनके चरणोंमें गिरकर उन्हें प्रसन्न किया और उनके आग्रह करनेपर भगवान् श्रीरामने राजसिंहासन स्वीकार किया । इसके बाद वे अपने - अपने धर्ममें तत्पर तथा वर्णाश्रमके आचारको निभानेवाली प्रजाका पिताके समान पालन करने लगे । उनकी प्रजा भी उन्हें अपना पिता ही मानती थी ॥ ५१ ॥
त्रेतायां वर्तमानायां कालः कृतसमोऽभवत् ।
रामे राजनि धर्मज्ञे सर्वभूतसुखावहे ॥५२
वनानि नद्यो गिरयो वर्षाणि द्वीपसिन्धवः ।
सर्वे कामदुघा आसन् प्रजानां भरतर्षभ ॥ ५३
नाधिव्याधिजराग्लानिदुःखशोकभयक्लमाः’ ।
मृत्युश्चानिच्छतां नासीद् रामे राजन्यधोक्षजे ॥५४
एकपत्नीव्रतधरो राजर्षिचरितः शुचिः ।
स्वधर्मं गृहमेधीयं शिक्षयन् स्वयमाचरत् ॥५५
प्रेम्णानुवृत्त्या शीलेन प्रश्रयावनता सती ।
धिया ह्रिया च भावज्ञा भर्तुः सीताहरन्मनः ॥५६
परीक्षित्! जब समस्त प्राणियोंको सुख देनेवाले परम धर्मज्ञ भगवान् श्रीराम राजा हुए तब था तो त्रेतायुग, परन्तु मालूम होता था मानो सत्ययुग ही है ॥ ५२ ॥ परीक्षित्! उस समय वन,
नदी, पर्वत, वर्ष, द्वीप और समुद्र - सब- के - सब प्रजाके लिये कामधेनुके समान समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले बन रहे थे ॥५३ ॥ इन्द्रियातीत भगवान् श्रीरामके राज्य करते
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समय किसीको मानसिक चिन्ता या शारीरिक रोग नहीं होते थे । बुढ़ापा, दुर्बलता, दुःख, शोक, भय और थकावट नाममात्रके लिये भी नहीं थे । यहाँतक कि जो मरना नहीं चाहते थे, उनकी मृत्यु भी नहीं होती थी ॥ ५४ ॥ भगवान् श्रीरामने एकपत्नीका व्रत धारण कर रखा था,
उनके चरित्र अत्यन्त पवित्र एवं राजर्षियोंके से थे । वे गृहस्थोचित स्वधर्मकी शिक्षा देनेके लिये स्वयं उस धर्मका आचरण करते थे ॥ ५५ ॥ सती-शिरोमणि सीताजी अपने पतिके हृदयका
भाव जानती रहतीं । वे प्रेमसे, सेवासे, शीलसे, अत्यन्त विनयसे तथा अपनी बुद्धि और लज्जा आदि गुणोंसे अपने पति भगवान् श्रीरामजीका चित्त चुराती रहती थीं ॥५६ ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे रामचरिते ’ दशमोऽध्यायः ॥१० ॥
१. मकटाक्षविटंकपात ० । २. नूनं । ३. रनेकै ० । १. कोष० । २. पालक० । ३. महति । १. स्वयन्ते । २. रुदत्यस्ता० । १. कावने । २. प्रत्युद्गतो । ३. शंसद्भि० । १. तन्मूर्ध्ना । २. ङ्गं शत्रु० । १. स्थो वृतः । २. पत्नीं । ३. चतुर्भिः सागराम्बुभिः ।
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अथैकादशोऽध्यायः भगवान् श्रीरामकी शेष लीलाओंका वर्णन श्रीशुक उवाच
भगवानात्मनाऽऽत्मानं राम उत्तमकल्पकैः ३ ।
सर्वदेवमयं ४ देवमीज आचार्यवान् मखैः ॥ १
होत्रेऽददाद' दिशं प्राचीं ब्रह्मणे दक्षिणां प्रभुः ।
अध्वर्यवे प्रतीचीं च उदीचीं सामगाय सः ॥२
आचार्याय ददौ शेषां यावती भूस्तदन्तरा ।
मन्यमान इदं कृत्स्नं ब्राह्मणोऽर्हति निःस्पृहः ॥ ३
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - परीक्षित्! भगवान् श्रीरामने गुरु वसिष्ठजीको अपना आचार्य बनाकर उत्तम सामग्रियोंसे युक्त यज्ञोंके द्वारा अपने- आप ही अपने सर्वदेवस्वरूप स्वयंप्रकाश आत्माका यजन किया ॥१ ॥ उन्होंने होताको पूर्व दिशा, ब्रह्माको दक्षिण, अध्वर्युको पश्चिम
और उद्गाताको उत्तर दिशा दे दी ॥२ ॥ उनके बीचमें जितनी भूमि बच रही थी, वह उन्होंने
आचार्यको दे दी । उनका यह निश्चय था कि सम्पूर्ण भूमण्डलका एकमात्र अधिकारी निःस्पृह ब्राह्मण ही है ॥३ ॥ इस प्रकार सारे भूमण्डलका दान करके उन्होंने अपने शरीरके वस्त्र और
अलंकार ही अपने पास रखे । इसी प्रकार महारानी सीताजीके पास भी केवल मांगलिक वस्त्र और आभूषण ही बच रहे ॥४ ॥
इत्ययं तदलंकारवासोभ्यामवशेषितः ।
तथा राज्ञ्यपि वैदेही सौमंगल्यावशेषिता ॥४
ते तु ब्रह्मण्यदेवस्य वात्सल्यं वीक्ष्य संस्तुतम् ।
प्रीताः क्लिन्नधियस्तस्मै प्रत्यर्य्येदं बभाषिरे ॥५
अप्रत्तं नस्त्वया किं नु भगवन् भुवनेश्वर ।
यन्नोऽन्तर्हृदयं विश्य तमो हंसि स्वरोचिषा ॥६
नमो ब्रह्मण्यदेवाय रामायाकुण्ठमेधसे ।
उत्तमश्लोकधुर्याय न्यस्तदण्डार्पिताङ्घ्रये ॥७
कदाचिल्लोकजिज्ञासुर्गूढो रात्र्यामलक्षितः ।
चरन् वाचोऽशृणोद् रामो भार्यामुद्दिश्य कस्यचित् ॥८
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नाहं बिभर्मि त्वां दुष्टामसतीं परवेश्मगाम् ।
स्त्रीलोभी बिभृयात् सीतां रामो नाहं भजे पुनः ॥९
इति लोकाद् बहुमुखाद् दुराराध्यादसंविदः ।
पत्या भीतेन सा त्यक्ता प्राप्ता प्राचेतसाश्रमम् ॥१०
अन्तर्वत्न्यागते काले यमौ सा सुषुवे सुतौ ।
कुशो लव इति ख्यातौ तयोश्चक्रे क्रिया मुनिः ॥ ११
जब आचार्य आदि ब्राह्मणोंने देखा कि भगवान् श्रीराम तो ब्राह्मणोंको ही अपना इष्टदेव मानते हैं, उनके हृदयमें ब्राह्मणोंके प्रति अनन्त स्नेह है, तब उनका हृदय प्रेमसे द्रवित हो गया । उन्होंने प्रसन्न होकर सारी पृथ्वी भगवान्को लौटा दी और कहा || ५ || ' प्रभो! आप सब लोकोंके एकमात्र स्वामी हैं। आप तो हमारे हृदयके भीतर रहकर अपनी ज्योतिसे अज्ञानान्धकारका नाश कर रहे हैं । ऐसी स्थितिमें भला, आपने हमें क्या नहीं दे रखा है ॥६ ॥
आपका ज्ञान अनन्त है । पवित्र कीर्तिवाले पुरुषोंमें आप सर्वश्रेष्ठ हैं । उन महात्माओंको, जो किसीको किसी प्रकारकी पीड़ा नहीं पहुँचाते, आपने अपने चरणकमल दे रखे हैं । ऐसा होनेपर भी आप ब्राह्मणोंको अपना इष्टदेव मानते हैं । भगवन्! आपके इस रामरूपको हम नमस्कार करते हैं ' ॥७ ॥
परीक्षित्! एक बार अपनी प्रजाकी स्थिति जाननेके लिये भगवान् श्रीरामजी रातके समय छिपकर बिना किसीको बतलाये घूम रहे थे । उस समय उन्होंने किसीकी यह बात सुनी । वह अपनी पत्नीसे कह रहा था || || ' अरी! तू दुष्ट और कुलटा है । तू पराये घरमें रह आयी है । स्त्री- लोभी राम भले ही सीताको रख लें, परन्तु मैं तुझे फिर नहीं रख सकता' ॥९ ॥ सचमुच
सब लोगोंको प्रसन्न रखना टेढ़ी खीर है । क्योंकि मूर्खोकी तो कमी नहीं है । जब भगवान् श्रीरामने बहुतोंके मुँहसे ऐसी बात सुनी, तो वे लोकापवादसे कुछ भयभीत - से हो गये । उन्होंने श्रीसीताजीका परित्याग कर दिया और वे वाल्मीकि मुनिके आश्रममें रहने लगीं ॥१० ॥
सीताजी उस समय गर्भवती थीं । समय आनेपर उन्होंने एक साथ ही दो पुत्र उत्पन्न किये ।
उनके नाम हुए — कुश और लव । वाल्मीकि मुनिने उनके जात- कर्मादि संस्कार किये ॥११ ॥
अंगदश्चित्रकेतुश्च' लक्ष्मणस्यात्मजौ स्मृतौ ।
तक्षः पुष्कल इत्यास्तां भरतस्य महीपते ॥ १२
सुबाहुः श्रुतसेनश्च शत्रुघ्नस्य बभूवतुः ।
गन्धर्वान् कोटिशो जघ्ने भरतो विजये दिशाम् ॥१३
तदीयं धनमानीय सर्वं राज्ञे न्यवेदयत् । शत्रुघ्नश्च मधोः पुत्रं लवणं नाम राक्षसम् ।
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हत्वा मधुवने चक्रे मथुरां नाम वै पुरीम् ॥ १४
नौ निक्षिप्य तनयौ सीता भर्त्रा विवासिता ।
ध्यायन्ती रामचरणौ विवरं प्रविवेश ह ॥ १५
तच्छ्रुत्वा भगवान् रामो रुन्धन्नपि धिया शुचः ।
स्मरंस्तस्या गुणांस्तांस्तान्नाशक्नोद् रोद्धुमीश्वरः ॥१६
स्त्रीपुंप्रसंग एतादृक्सर्वत्र त्रासमावहः ।
अपीश्वराणां किमुत ग्राम्यस्य गृहचेतसः ॥१७
तत ऊर्ध्वं ब्रह्मचर्यं धारयन्नजुहोत् प्रभुः ।
त्रयोदशाब्दसाहस्रमग्निहोत्रमखण्डितम् ॥१८
स्मरतां हृदि विन्यस्य विद्धं दण्डककण्टकैः ।
स्वपादपल्लवं राम आत्मज्योतिरगात् ततः ॥१९
नेदं यशो रघुपतेः सुरयाच्ञयाऽऽत्त- लीलातनोरधिकसाम्यविमुक्तधाम्नः । रक्षोवध जलधिबन्धनमस्त्रपूगैः ३ किं तस्य शत्रुहनने कपयः सहायाः ॥२० लक्ष्मणजीके दो पुत्र हुए- अंगद और चित्रकेतु । परीक्षित्! इसी प्रकार भरतजीके भी दो ही पुत्र थे— तक्ष और पुष्कल ॥१२ ॥ तथा शत्रुघ्नके भी दो पुत्र हुए- सुबाहु और श्रुतसेन ।
भरतजीने दिग्विजयमें करोड़ों गन्धर्वोंका संहार किया ॥ १३ ॥ उन्होंने उनका सब धन लाकर
अपने बड़े भाई भगवान् श्रीरामकी सेवामें निवेदन किया । शत्रुघ्नजीने मधुवनमें मधुके पुत्र लवण नामक राक्षसको मारकर वहाँ मथुरा नामकी पुरी बसायी । । १४ ॥ भगवान् श्रीरामके द्वारा निर्वासित सीताजीने अपने पुत्रोंको वाल्मीकिजीके हाथोंमें सौंप दिया और भगवान् श्रीरामके चरणकमलोंका ध्यान करती हुई वे पृथ्वीदेवीके लोकमें चली गयीं || १५ || यह समाचार सुनकर भगवान् श्रीरामने अपने शोका -वेशको बुद्धिके द्वारा रोकना चाहा, परन्तु परम समर्थ होनेपर भी वे उसे रोक न सके । क्योंकि उन्हें जानकीजीके पवित्र गुण बार- बार स्मरण हो आया करते थे ॥१६ ॥ परीक्षित्! यह स्त्री और पुरुषका सम्बन्ध सब कहीं इसी
प्रकार दुःखका कारण है । यह बात बड़े - बड़े समर्थ लोगोंके विषयमें भी ऐसी ही है, फिर गृहासक्त विषयी पुरुषके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है ॥१७ ॥
इसके बाद भगवान् श्रीरामने ब्रह्मचर्य धारण करके तेरह हजार वर्षतक अखण्डरूपसे अग्निहोत्र किया ॥१८ ॥ तदनन्तर अपना स्मरण करनेवाले भक्तोंके हृदयमें अपने उन
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चरणकमलोंको स्थापित करके, जो दण्डकवनके काँटोंसे बिंध गये थे, अपने स्वयंप्रकाश परम ज्योतिर्मय धाममें चले गये ॥ १ ९ ॥ परीक्षित्! भगवान्के समान प्रतापशाली और कोई नहीं है, फिर उनसे बढ़कर तो हो ही कैसे सकता है । उन्होंने देवताओंकी प्रार्थनासे ही यह लीला - विग्रह धारण किया था। ऐसी स्थितिमें रघुवंश- शिरोमणि भगवान् श्रीरामके लिये यह कोई बड़े गौरवकी बात नहीं है कि उन्होंने अस्त्र- शस्त्रोंसे राक्षसोंको मार डाला या समुद्रपर पुल बाँध दिया । भला, उन्हें शत्रुओंको मारनेके लिये बंदरोंकी सहायताकी भी आवश्यकता थी क्या? यह सब उनकी लीला ही है ॥२० ॥
यस्यामलं नृपसदस्सु यशोऽधुनापि
गायन्त्यघघ्नमृषयो दिगिभेन्द्रपट्टम् ।
तं नाकपालवसुपालकिरीटजुष्ट- पादाम्बुजं रघुपतिं शरणं प्रपद्ये ॥२१
स यैः स्पृष्टोऽभिदृष्टो वा संविष्टोऽनुगतोऽपि वा ।
कोसला 'ययुः स्थानं यत्र गच्छन्ति योगिनः ॥ २२
पुरुषो रामचरितं श्रवणैरुपधारयन् ।
आनृशंस्यपरो राजन् कर्मबन्धैर्विमुच्यते ॥२३
राजोवाच
कथं स भगवान् रामो भ्रातॄन् वा स्वयमात्मनः ।
तस्मिन् वा तेऽन्ववर्तन्त प्रजाः पौराश्च ईश्वरे ॥२४
श्रीशुक उवाच
अथादिशद् दिग्विजये भ्रातॄंस्त्रिभुवनेश्वरः ।
आत्मानं दर्शयन् स्वानां पुरीमैक्षत सानुगः ॥२५
आसिक्तमार्गां गन्धोदैः करिणां मदशीकरैः ।
स्वामिनं प्राप्तमालोक्य मत्तां वा सुतरामिव ॥ २६
प्रासादगोपुरसभाचैत्यदेवगृहादिषु ।
विन्यस्तहेमकलशैः पताकाभिश्च मण्डिताम् ॥२७
भगवान् श्रीरामका निर्मल यश समस्त पापोंको नष्ट कर देनेवाला है । वह इतना फैल गया है कि दिग्गजोंका श्यामल शरीर भी उसकी उज्ज्वलतासे चमक उठता है । आज भी बड़े - बड़े ऋषि- महर्षि राजाओंकी सभामें उसका गान करते रहते हैं । स्वर्गके देवता और पृथ्वीके
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नरपति अपने कमनीय किरीटोंसे उनके चरणकमलोंकी सेवा करते रहते हैं । मैं उन्हीं रघुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीरामचन्द्रकी शरण ग्रहण करता हूँ ॥२१ ॥
जिन्होंने भगवान् श्रीरामका दर्शन और स्पर्श किया, उनका सहवास अथवा अनुगमन किया — वे सब - के - सब तथा कोसलदेशके निवासी भी उसी लोकमें गये, जहाँ बड़े - बड़े योगी योग- साधनाके द्वारा जाते हैं ॥२२ ॥
जो पुरुष अपने कानोंसे भगवान् श्रीरामका चरित्र सुनता है— उसे सरलता, कोमलता आदि गुणोंकी प्राप्ति होती है । परीक्षित्! केवल इतना ही नहीं, वह समस्त कर्म - बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है ॥२३ ॥
राजा परीक्षित्ने पूछा- भगवान् श्रीराम स्वयं अपने भाइयोंके साथ किस प्रकारका व्यवहार करते थे? तथा भरत आदि भाई, प्रजाजन और अयोध्यावासी भगवान् श्रीरामके प्रति कैसा बर्ताव करते थे? ॥२४ ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - त्रिभुवनपति महाराज श्रीरामने राजसिंहासन स्वीकार करनेके बाद अपने भाइयोंको दिग्विजयकी आज्ञा दी और स्वयं अपने निजजनोंको दर्शन देते हुए अपने अनुचरोंके साथ वे पुरीकी देख- रेख करने लगे ॥२५ ॥
उस समय अयोध्यापुरीके मार्ग सुगन्धित जल और हाथियोंके मदकणोंसे सिंचे रहते । ऐसा जान पड़ता, मानो यह नगरी अपने स्वामी भगवान् श्रीरामको देखकर अत्यन्त मतवाली हो रही है ॥२६ ॥
उसके महल, फाटक, सभाभवन, विहार और देवालय आदिमें सुवर्णके कलश रखे हुऐ थे और स्थान- स्थानपर पताकाएँ फहरा रही थीं ॥२७ ॥
पूगैः सवृन्तै रम्भाभिः पट्टिकाभिः सुवाससाम् ।
आदर्शैरंशुकैः स्रग्भिः कृतकौतुकतोरणाम् ॥२८
तमुपेयुस्तत्र' तत्र पौरा अर्हणपाणयः ।
आशिषो युयुजुर्देव पाहीमां प्राक् त्वयोद्धृताम् ॥ २ ९
ततः प्रजा वीक्ष्य पतिं चिरागतं
दिदृक्षयोत्सृष्टगृहाः स्त्रियो नराः ।
आरुह्य हर्म्याण्यरविन्दलोचन- मतृप्तनेत्राः कुसुमैरवाकिरन् ॥३०
अथ प्रविष्टः स्वगृहं जुष्टं स्वैः पूर्वराजभिः ।
अनन्ताखिलकोशाढ्यमनर्थ्योरुपरिच्छदम् ॥३१
विद्रुमोदुम्बरद्वारैर्वैदूर्यस्तम्भपङ्क्तिभिः ।
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स्थलैर्मारकतैः स्वच्छैर्भातस्फटिकभित्तिभिः ॥३२
चित्रस्रग्भिः पट्टिकाभिर्वासोमणिगणांशुकैः ।
मुक्ताफलैश्चिदुल्लासैः कान्तकामोपपत्तिभिः ॥ ३३
धूपदीपैः सुरभिभिर्मण्डितं पुष्पमण्डनैः ३ ।
स्त्रीपुम्भिः सुरसंकाशैर्जुष्टं भूषणभूषणैः ॥३४
तस्मिन् स भगवान् रामः स्निग्धया प्रिययेष्टया ।
रेमे स्वारामधीराणामृषभः सीतया किल ॥ ३५
वह डंठलसमेत सुपारी, केलेके खंभे और सुन्दर वस्त्रोंके पट्टोंसे सजायी हुई थी । दर्पण, वस्त्र और पुष्पमालाओंसे तथा मांगलिक चित्रकारियों और बंदनवारोंसे सारी नगरी जगमगा रही थी ॥ २८ ॥ नगरवासी अपने हाथोंमें तरह - तरह की भेंटें लेकर भगवान्के पास आते और
उनसे प्रार्थना करते कि ' देव! पहले आपने ही वराहरूपसे पृथ्वीका उद्धार किया था; अब आप ही इसका पालन कीजिये ॥ २ ९ ॥ परीक्षित्! उस समय जब प्रजाको मालूम होता कि बहुत दिनोंके बाद भगवान् श्रीरामजी इधर पधारे हैं, तब सभी स्त्री- पुरुष उनके दर्शनकी लालसासे घर- द्वार छोड़कर दौड़ पड़ते । वे ऊँची - ऊँची अटारियोंपर चढ़ जाते और अतृप्त नेत्रोंसे कमलनयन भगवान्को देखते हुए उनपर पुष्पोंकी वर्षा करते ॥ ३० ॥
इस प्रकार प्रजाका निरीक्षण करके भगवान् फिर अपने महलोंमें आ जाते । उनके वे महल पूर्ववर्ती राजाओंके द्वारा सेवित थे । उनमें इतने बड़े - बड़े सब प्रकारके खजाने थे, जो कभी समाप्त नहीं होते थे । वे बड़ी - बड़ी बहुमूल्य बहुत -सी सामग्रियोंसे सुसज्जित थे ॥३१ ॥
महलोंके द्वार तथा देहलियाँ मूँगेकी बनी हुई थीं । उनमें जो खंभे थे, वे वैदूर्यमणिके थे । मरकतमणिके बड़े सुन्दर-सुन्दर फर्श थे, तथा स्फटिकमणिकी दीवारें चमकती रहती थीं ॥३२ ॥ रंग- बिरंगी मालाओं, पताकाओं, मणियोंकी चमक, शुद्ध चेतनके समान उज्ज्वल
मोती, सुन्दर- सुन्दर भोग-सामग्री, सुगन्धित धूप- दीप तथा फूलोंके गहनोंसे वे महल खूब सजाये हुए थे । आभूषणोंको भी भूषित करनेवाले देवताओंके समान स्त्री- पुरुष उसकी सेवामें लगे रहते थे ॥३३-३४ ॥ परीक्षित्! भगवान् श्रीरामजी आत्माराम जितेन्द्रिय पुरुषोंके शिरोमणि थे । उसी महलमें वे अपनी प्राणप्रिया प्रेममयी पत्नी श्रीसीताजीके साथ विहार करते थे ॥३५ ॥
बुभुजे च यथाकालं कामान् धर्ममपीडयन् ।
वर्षपूगान् बहून् नृणामभिध्याताङ्घ्रिपल्लवः ॥ ३६
सभी स्त्री- पुरुष जिनके चरणकमलोंका ध्यान करते रहते हैं, वे ही भगवान् श्रीराम बहुत वर्षोंतक धर्मकी मर्यादाका पालन करते हुए समयानुसार भोगोंका उपभोग करते रहे ॥३६ ॥