श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1001–1010
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1001–1010
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गर्जन - तर्जन वज्रपातकी गड़गड़ाहटके समान था । वे विद्युत्पातके सदृश चञ्चल प्रतीत होते थे ॥ ७६ ॥
बाहुस्वस्तिकविन्यस्तपीनह्रस्वशिरोधरम् ।
स्कन्धभूयिष्ठकायत्वात् तनुमध्यकटीतटम् ॥ ७७ ॥
किंचिच्चाभुग्नशीर्षेण दीर्घरोमाञ्चितेन च ।
लाङ्गूलेनोर्ध्वगतिना ध्वजेनेव विराजितम् ॥ ७८ ॥
उनक कंधे चौड़े और पुष्ट थे । अतः उन्होंने बाँहके मूलभागको तकिया बनाकर उसीपर अपनी मोटी और छोटी ग्रीवाको रख छोड़ा था और उनके शरीरका मध्यभाग एवं कटिप्रदेश पतला था । उनकी लंबी पूँछका अग्रभाग कुछ मुड़ा हुआ था। उसकी रोमावलि घनी थी तथा वह पूँछ ऊपरकी ओर उठकर फहराती हुई ध्वजा-सी सुशोभित होती थी ॥ ७७-७८ ॥
ह्रस्वौष्ठं ताम्रजिह्वास्यं रक्तकर्णं चलद्ध्रुवम् ।
विवृत्तदंष्ट्रादशनं शुक्लतीक्ष्णाग्रशोभितम् ॥ ७९ ॥
अपश्यद् वदनं तस्य रश्मिवन्तमिवोडुपम् ।
वदनाभ्यन्तरगतैः शुक्लैर्दन्तैरलंकृतम् ॥ ८० ॥
उनके ओठ छोटे थे । जीभ और मुखका रंग ताँबेके समान था । कान भी लाल रंगके ही थे और भौंहें चञ्चल हो रही थीं । उनके खुले हुए मुखमें श्वेत चमकते हुए दाँत और दाढ़ें अपने सफेद और तीखे अग्रभागके द्वारा अत्यन्त शोभा पा रही थीं । इन सबके कारण उनका मुख किरणोंसे प्रकाशित चन्द्रमाके समान दिखायी देता था । मुखके भीतरकी श्वेत दन्तावलि उसकी शोभा बढ़ानेके लिये आभूषणका काम दे रही थी ॥ ७ ९-८० ॥
केसरोत्करसम्मिश्रमशोकानामिवोत्करम् ।
हिरण्मयीनां मध्यस्थं कदलीनां महाद्युतिम् ॥ ८१ ॥
सुवर्णमय कदली - वृक्षोंके बीच विराजमान महातेजस्वी हनुमान्जी ऐसे जान पड़ते थे मानो केसरोंकी क्यारीमें अशोकपुष्पोंका गुच्छ रख दिया गया हो ॥ ८१ ॥
दीप्यमानेन वपुषा स्वर्चिष्मन्तमिवानलम् ।
निरीक्षन्तममित्रघ्नं लोचनैर्मधुपिङ्गलैः ॥ ८२ ॥
वे शत्रुसूदन वानरवीर अपने कान्तिमान् शरीरसे प्रज्वलित अग्निके समान जान पड़ते थे और अपनी मधुके समान पीली आँखोंसे इधर- उधर देख रहे थे ॥
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तं वानरवरं धीमानतिकायं महाबलम् ।
स्वर्गपन्थानमावृत्य हिमवन्तमिव स्थितम् ॥ ८३ ॥
दृष्ट्वा चैनं महाबाहुरेकं तस्मिन् महावने ।
अथोपसृत्य तरसा विभीर्भीमस्ततो बली ॥ ८४ ॥
सिंहनादं चकारोग्रं वज्राशनिसमं बली ।
तेन शब्देन भीमस्य वित्रेसुर्मृगपक्षिणः ॥ ८५ ॥
परम बुद्धिमान् बलवान् महाबाहु भीमसेन उस महान् वनमें विशालकाय महाबली वानरराज हनुमान्जीको अकेले ही स्वर्गका मार्ग रोककर हिमालयके समान स्थित देख निर्भय होकर वेगपूर्वक उनके पास गये और वज्र- गर्जनाके समान भयंकर सिंहनाद करने लगे । भीमसेनके उस सिंहनादसे वहाँके मृग और पक्षी थर्रा उठे ॥ ८३–८५ ॥ हनूमांश्च महासत्त्व ईषदुन्मील्य लोचने ।
दृष्ट्वा तमथ सावज्ञं लोचनैर्मधुपिङ्गलैः ।
स्मितेन चैनमासाद्य हनूमानिदमब्रवीत् ॥ ८६ ॥
तब महान् धैर्यशाली हनुमानजीने आँखें कुछ खोलकर अपने मधुपिंगल नेत्रोंद्वारा अवहेलनापूर्वक उनकी ओर देखा और उन्हें निकट पाकर उनसे मुसकराते हुए इस प्रकार कहा ॥ ८६ ॥
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हनूमानुवाच
किमर्थं सरुजस्तेऽहं सुखसुप्तः प्रबोधितः ।
ननु नाम त्वया कार्या दया भूतेषु जानता ॥ ८७ ॥
हनुमान्जी बोले- भाई! मैं तो रोगी हूँ और यहाँ सुखसे सो रहा था । तुमने क्यों मुझे
जगा दिया? तुम समझदार हो । तुम्हें सब प्राणियोंपर दया करनी चाहिये ॥ ८७ ॥
वयं धर्म न जानीमस्तिर्यग्योनिमुपाश्रिताः ।
नरास्तु बुद्धिसम्पन्ना दयां कुर्वन्ति जन्तुषु ॥ ८८ ॥
हमलोग तो पशुयोनिके प्राणी हैं, अतः धर्मकी बात नहीं जानते; परंतु मनुष्य बुद्धिमान् होते हैं, अतः वे सब जीवोंपर दया करते हैं ॥ ८८ ॥
क्रूरेषु कर्मसु कथं देहवाक्चित्तदूषिषु ।
धर्मघातिषु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधाः ॥ ८९ ॥
किंतु पता नहीं, तुम्हारे - जैसे बुद्धिमान्लोग धर्मका नाश करनेवाले तथा मन, वाणी और शरीरको भी दूषित कर देनेवाले क्रूर कर्मोंमें कैसे प्रवृत्त होते हैं? ॥ ८ ९ ॥
न त्वं धर्मं विजानासि बुधा नोपासितास्त्वया ।
अल्पबुद्धितया बाल्यादुत्सादयसि यन्मृगान् ॥ ९० ॥
तुम्हें धर्मका बिलकुल ज्ञान नहीं है । मालूम होता है, तुमने विद्वानोंकी सेवा नहीं की है । मन्दबुद्धि होनेके कारण अज्ञानवश तुम यहाँके मृगोंको कष्ट पहुँचाते हो ॥ ९ ० ॥
ब्रूहि कस्त्वं किमर्थं वा किमिदं वनमागतः ।
वर्जितं मानुषैर्भावैस्तथैव पुरुषैरपि ॥ ९ १ ॥
बोलो तो, तुम कौन हो? इस वनमें तुम क्यों और किसलिये आये हो? यहाँ तो न कोई मानवीय भाव हैं और न मनुष्योंका ही प्रवेश है ॥ ९ १ ॥
क्व च त्वयाद्य गन्तव्यं प्रब्रूहि पुरुषर्षभ ।
अतः परमगम्योऽयं पर्वतः सुदुरारुहः ॥ ९ २ ॥
पुरुषश्रेष्ठ! ठीक - ठीक बतलाओ, तुम्हें आज इधर कहाँतक जाना है? यहाँसे आगे तो यह पर्वत अगम्य है । इसपर चढ़ना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है ॥ ९ २ ॥
विना सिद्धगतिं वीर गतिरत्र न विद्यते ।
देवलोकस्य मार्गोऽयमगम्यो मानुषैः सदा ॥ ९ ३ ॥
वीर! सिद्ध पुरुषोंके सिवा और किसीकी यहाँ गति नहीं है । यह देवलोकका मार्ग है, जो मनुष्योंके लिये सदा अगम्य है ॥ ९ ३ ॥
कारुण्यात् त्वामहं वीर वारयामि निबोध मे ।
नातः परं त्वया शक्यं गन्तुमाश्वसिहि प्रभो ॥ ९ ४ ॥
वीरवर! मैं दयावश ही तुम्हें आगे जानेसे रोकता हूँ । मेरी बात सुनो । प्रभो! यहाँसे आगे
तुम किसी प्रकार जा नहीं सकते । इसपर विश्वास करो ॥ ९ ४ ॥
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स्वागतं सर्वथैवेह तवाद्य मनुजर्षभ ।
इमान्यमृतकल्पानि मूलानि च फलानि च ॥ ९ ५ ॥
भक्षयित्वा निवर्तस्व मा वृथा प्राप्स्यसे वधम् ।
ग्राह्यं यदि वचो मह्यं हितं मनुजपुङ्गव ॥ ९ ६ ॥
मानवशिरोमणे! आज यहाँ सब प्रकारसे तुम्हारा स्वागत है । ये अमृतके समान मीठे फल - मूल खाकर यहींसे लौट जाओ, अन्यथा व्यर्थ ही तुम्हारे प्राण संकटमें पड़ जायँगे । नरपुंगव! यदि मेरा कथन हितकर जान पड़े तो इसे अवश्य मानो ॥ ९ ५ - ९ ६ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां भीमकदलीषण्डप्रवेशे षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४६ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें भीमसेनका कदलीवनमें प्रवेशविषयक एक सौ छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४६ ॥
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सप्तचत्वारिशंदधिकशततमोऽध्यायः श्रीहनुमान् और भीमसेनका संवाद वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य वानरेन्द्रस्य धीमतः ।
भीमसेनस्तदा वीरः प्रोवाचामित्रकर्षणः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! उस समय परम बुद्धिमान् वानरराज हनुमान्जीका यह वचन सुनकर शत्रुसूदन वीरवर भीमसेनने इस प्रकार कहा ॥ १ ॥
भीमउवाच
को भवान् किं निमित्तं वा वानरं वपुरास्थितः ।
ब्राह्मणानन्तरो वर्णः क्षत्रियस्त्वां तु पृच्छति ॥ २ ॥
भीमसेनने पूछा- आप कौन हैं? और किसलिये वानरका रूप धारण कर रखा है? मैं ब्राह्मणके बादका वर्ण- क्षत्रिय हूँ, और मैं आपसे आपका परिचय पूछता हूँ ॥ २ ॥
कौरवः सोमवंशीयः कुन्त्या गर्भेण धारितः ।
पाण्डवो वायुतनयो भीमसेन इति श्रुतः ॥ ३ ॥
मेरा परिचय इस प्रकार है - मैं चन्द्रवंशी क्षत्रिय हूँ । मेरा जन्म कुरुकुलमें हुआ है । माता कुन्तीने मुझे गर्भमें धारण किया था । मैं वायुपुत्र पाण्डव हूँ । मेरा नाम भीमसेन है ॥ ३ ॥
स वाक्यं कुरुवीरस्य स्मितेन प्रतिगृह्य तत् ।
हनूमान् वायुतनयो वायुपुत्रमभाषत ॥ ४ ॥
कुरुवीर भीमसेनका वह वचन मन्द मुसकानके साथ सुनकर वायुपुत्र हनुमान्जीने वायुके ही पुत्र भीमसेनसे इस प्रकार कहा ॥ ४ ॥
हनूमानुवाच
वानरोऽहं न ते मार्गं प्रदास्यामि यथेप्सितम् ।
साधु गच्छ निवर्तस्व मा त्वं प्राप्स्यसि वैशसम् ॥ ५ ॥
हनुमान्जी बोले – भैया! मैं वानर हूँ। तुम्हें तुम्हारी इच्छाके अनुसार मार्ग नहीं दूँगा । अच्छा तो यह होगा कि तुम यहींसे लौट जाओ, नहीं तो तुम्हारे प्राण संकटमें पड़ जायँगे ॥ ५ ॥
भीमसेन उवाच
वैशसं वास्तु यद्वान्यन्न त्वां पृच्छामि वानर ।
प्रयच्छ मार्गमुत्तिष्ठ मा मत्तः प्राप्स्यसे व्यथाम् ॥ ६ ॥
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भीमसेनने कहा – वानर! मेरे प्राण संकटमें पड़े या और कोई दुष्परिणाम भोगना पड़े, इसके विषयमें तुमसे कुछ नहीं पूछता हूँ । उठो और मुझे आगे जानेके लिये रास्ता दो । ऐसा होनेपर तुमको मेरे हाथोंसे किसी प्रकारका कष्ट नहीं उठाना पड़ेगा ॥ ६ ॥
हनूमानुवाच
नास्ति शक्तिर्ममोत्थातुं व्याधिना क्लेशितो ह्यहम् ।
यद्यवश्यं प्रयातव्यं लङ्घयित्वा प्रयाहि माम् ॥ ७ ॥
हनुमान्जी बोले — भाई! मैं रोगसे कष्ट पा रहा हूँ । मुझमें उठनेकी शक्ति नहीं है । यदि तुम्हें जाना अवश्य है तो मुझे लाँघकर चले जाओ ॥ ७ ॥
भीम उवाच
निर्गुणः परमात्मा तु देहं व्याप्यावतिष्ठते ।
तमहं ज्ञानविज्ञेयं नावमन्ये न लङ्घये ॥ ८ ॥
भीमसेनने कहा – निर्गुण परमात्मा समस्त प्राणियोंके शरीरमें व्याप्त होकर स्थित हैं ।
वे ज्ञानसे ही जाननेमें आते हैं । मैं उनका अपमान या उल्लंघन नहीं करूँगा ॥ ८ ॥
यद्यागमैर्न विद्यां च तमहं भूतभावनम् ।
क्रमेयं त्वां गिरिं चैव हनूमानिव सागरम् ॥ ९ ॥
यदि शास्त्रोंके द्वारा मुझे उन भूतभावन भगवान्के स्वरूपका ज्ञान न होता तो मैं तुम्हींको क्या इस पर्वतको भी उसी प्रकार लाँघ जाता, जैसे हनुमान्जी समुद्रको लाँघ गये थे ॥ ९ ॥
हनूमानुवाच
क एष हनुमान् नाम सागरो येन लङ्घितः ।
पृच्छामि त्वां नरश्रेष्ठ कथ्यतां यदि शक्यते ॥ १० ॥
हनुमानजी बोले – नरश्रेष्ठ! मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ, वह हनुमान् कौन था जो समुद्रको लाँघ गया था? उसके विषयमें यदि तुम कुछ कह सको तो कहो ॥ १० ॥
भीम उवाच
भ्राता मम गुणश्लाघ्यो बुद्धिसत्त्वबलान्वितः ।
रामायणेऽतिविख्यातः श्रीमान् वानरपुङ्गवः ॥ ११ ॥
- भीमसेनने कहा – वानरप्रवर श्रीहनुमान्जी मेरे बड़े भाई हैं। वे अपने सद्गुणोंके कारण सबके लिये प्रशंसनीय हैं । वे बुद्धि, बल, धैर्य एवं उत्साहसे युक्त हैं । रामायणमें उनकी बड़ी ख्याति है ॥ ११ ॥
रामपत्नीकृते येन शतयोजनविस्तृतः ।
सागरः प्लवगेन्द्रेण क्रमेणैकेन लङ्घितः ॥ १२ ॥
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वे वानरश्रेष्ठ हनुमान् श्रीरामचन्द्रजीकी पत्नी सीताजीकी खोज करनेके लिये सौ योजन विस्तृत समुद्रको एक ही छलाँगमें लाँघ गये थे ॥ १२ ॥
स मे भ्राता महावीर्यस्तुल्योऽहं तस्य तेजसा ।
बले पराक्रमे युद्धे शक्तोऽहं तव निग्रहे ॥ १३ ॥
वे महापराक्रमी वानरवीर मेरे भाई लगते हैं । मैं भी उन्हींके समान तेजस्वी, बलवान् और पराक्रमी हूँ तथा युद्धमें तुम्हें परास्त कर सकता हूँ ॥ १३ ॥
उत्तिष्ठ देहि मे मार्गं पश्य मे चाद्य पौरुषम् ।
मच्छासनमकुर्वाणं त्वां वा नेष्ये यमक्षयम् ॥ १४ ॥
उठो और मुझे रास्ता दो तथा आज मेरा पराक्रम अपनी आँखों देख लो । यदि मेरी आज्ञा नहीं मानोगे तो तुम्हें यमलोक भेज दूँगा ॥ १४ ॥
वैशम्पायन उवाच
विज्ञाय तं बलोन्मत्तं बाहुवीर्येण दर्पितम् ।
हृदयेनावहस्यैनं हनूमान् वाक्यमब्रवीत् ॥ १५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! भीमसेनको बलके अभिमानसे उन्मत्त तथा अपनी भुजाओंके पराक्रमसे घमंडमें भरा हुआ जान हनुमान्जीने मन- ही -मन उनका उपहास करते हुए उनसे इस प्रकार कहा ॥ १५ ॥
हनूमानुवाच
प्रसीद नास्ति मे शक्तिरुत्थातुं जरयानघ ।
ममानुकम्पया त्वेतत् पुच्छमुत्सार्य गम्यताम् ॥ १६ ॥
हनुमान्जी बोले – अनघ! मुझपर कृपा करो । बुढ़ापेके कारण मुझमें उठनेकी शक्ति नहीं रह गयी है । इसलिये मेरे ऊपर दया करके इस पूँछको हटा दो और निकल जाओ ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ते हनुमता हीनवीर्यपराक्रमम् ।
मनसाचिन्तयद् भीमः स्वबाहुबलदर्पितः ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! हनुमानजीके ऐसा कहनेपर अपने बाहुबलका घमंड रखनेवाले भीमने मन - ही- मन उन्हें बल और पराक्रमसे हीन समझा ॥ १७ ॥
पुच्छे प्रगृह्य तरसा हीनवीर्यपराक्रमम् ।
सालोक्यमन्तकस्यैनं नयाम्यद्येह वानरम् ॥ १८ ॥
और भीतर- ही- भीतर यह संकल्प किया कि ' आज मैं इस बल और पराक्रमसे शून्य वानरको वेगपूर्वक इसकी पूँछ पकड़कर यमराजके लोकमें भेज देता हूँ' ॥ १८ ॥
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सावज्ञमथ वामेन स्मयञ्जग्राह पाणिना ।
न चाशकच्चालयितुं भीमः पुच्छं महाकपेः ॥ १ ९ ॥
ऐसा सोचकर उन्होंने बड़ी लापरवाही दिखाते और मुसकराते हुए अपने बायें हाथसे उस महाकपिकी पूँछ पकड़ी, किंतु वे उसे हिला -डुला भी न सके ॥ १ ९ ॥
उच्चिक्षेप पुनर्दोर्भ्यामिन्द्रायुधमिवोच्छ्रितम् ।
नोद्धर्तुमशकद् भीमो दोर्भ्यामपि महाबलः ॥ २० ॥
तब महाबली भीमसेनने उनकी इन्द्रधनुषके समान ऊँची पूँछको दोनों हाथोंसे उठानेका पुनः प्रयत्न किया, परंतु दोनों हाथ लगा देनेपर भी वे उसे उठा न सके ॥
उत्क्षिप्तभूर्विवृत्ताक्षः संहतभ्रुकुटीमुखः ।
स्विन्नगात्रोऽभवद् भीमो न चोद्धर्तुं शशाक तम् ॥ २१ ॥
फिर तो उनकी भौंहें तन गयीं, आँखें फटी - सी रह गयीं, मुखमण्डलमें भ्रुकुटी स्पष्ट दिखायी देने लगी और उनके सारे अंग पसीनेसे तर हो गये । फिर भी भीमसेन हनुमान्जीकी पूँछको किंचित् भी हिला न सके ॥ २१ ॥
यत्नवानपि तु श्रीमाँल्लाङ्गूलोद्धरणोद्धुरः ।
कपेः पार्श्वगतो भीमस्तस्थौ व्रीडानताननः ॥ २२ ॥
प्रणिपत्य च कौन्तेयः प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ।
प्रसीद कपिशार्दूल दुरुक्तं क्षम्यतां मम ॥ २३ ॥
यद्यपि श्रीमान् भीमसेन उस पूँछको उठानेमें सर्वथा समर्थ थे और उसके लिये उन्होंने बहुत प्रयत्न भी किया, तथापि सफल न हो सके । इससे उनका मुँह लज्जासे झुक गया और वे कुन्तीकुमार भीम हनुमान्जीके पास जाकर उनके चरणोंमें प्रणाम करके हाथ जोड़े हुए खड़े होकर बोले—' कपिप्रवर! मैंने जो कठोर बातें कही हों, उन्हें क्षमा कीजिये और मुझपर प्रसन्न होइये ॥
सिद्धो वा यदि वा देवो गन्धर्वो वाथ गुह्यकः ।
पृष्टः सन् काम्यया ब्रूहि कस्त्वं वानररूपधृक् ॥ २४ ॥
‘ आप कोई सिद्ध हैं या देवता? गन्धर्व हैं या गुह्यक? मैं परिचय जाननेकी इच्छासे पूछ रहा हूँ । बतलाइये, इस प्रकार वानरका रूप धारण करनेवाले आप कौन हैं? ॥ २४ ॥
न चेद् गुह्यं महाबाहो श्रोतव्यं चेद् भवेन्मम ।
शिष्यवत् त्वां तु पृच्छामि उपपन्नोऽस्मि तेऽनघ ॥ २५ ॥
' महाबाहो! यदि कोई गुप्त बात न हो और वह मेरे सुननेयोग्य हो, तो बताइये । अनघ! मैं आपकी शरणमें आया हूँ और शिष्यभावसे पूछता हूँ। अतः अवश्य बतानेकी कृपा करें' ॥ २५ ॥
हनूमानुवाच
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यत् ते मम परिज्ञाने कौतूहलमरिंदम ।
तत् सर्वमखिलेन त्वं शृणु पाण्डवनन्दन ॥ २६ ॥
हनुमानजी बोले – शत्रुदमन पाण्डुनन्दन! तुम्हारे मनमें मेरा परिचय प्राप्त करनेके लिये जो कौतूहल हो रहा है उसकी शान्तिके लिये सब बातें विस्तारपूर्वक सुनो ॥
अहं केसरिणः क्षेत्रे वायुना जगदायुषा ।
जातः कमलपत्राक्ष हनूमान् नाम वानरः ॥ २७ ॥
कमलनयन भीम! मैं वानरश्रेष्ठ केसरीके क्षेत्रमें जगत्के प्राणस्वरूप वायुदेवसे उत्पन्न हुआ हूँ । मेरा नाम हनुमान् वानर है ॥ २७ ॥
सूर्यपुत्रं च सुग्रीवं शक्रपुत्रं च वालिनम् ।
सर्वे वानरराजानस्तथा वानरयूथपाः ॥ २८ ॥
उपतस्थुर्महावीर्या मम चामित्रकर्षण ।
सुग्रीवेणाभवत् प्रीतिरनिलस्याग्निना यथा ॥ २ ९ ॥
पूर्वकालमें सभी वानरराज और वानरयूथपति, जो महान् पराक्रमी थे, सूर्यनन्दन सुग्रीव तथा इन्द्रकुमार वालीकी सेवामें उपस्थित रहते थे । शत्रुसूदन भीम! उन दिनों सुग्रीवके साथ मेरी वैसी ही प्रेमपूर्ण मित्रता थी, जैसी वायुकी अग्निके साथ मानी गयी है ॥ २८-२९ ॥
निकृतः स ततो भ्रात्रा कस्मिंश्चित् कारणान्तरे ।
ऋष्यमूके मया सार्धं सुग्रीवो न्यवसच्चिरम् ॥ ३० ॥
किसी कारणान्तरसे वालीने अपने भाई सुग्रीवको घरसे निकाल दिया, तब बहुत दिनोंतक वे मेरे साथ ऋष्यमूक पर्वतपर रहे ॥ ३० ॥
अथ दाशरथिर्वीरो रामो नाम महाबलः ।
विष्णुर्मानुषरूपेण चचार वसुधातलम् ॥ ३१ ॥
उस समय महाबली वीर दशरथनन्दन श्रीराम, जो साक्षात् भगवान् विष्णु ही थे, मनुष्यरूप धारण करके इस भूतलपर विचर रहे थे ॥ ३१ ॥
स पितुः प्रियमन्विच्छन् सहभार्यः सहानुजः ।
सधनुर्धन्विनां श्रेष्ठो दण्डकारण्यमाश्रितः ॥ ३२ ॥
वे अपने पिताकी आज्ञा पालन करनेके लिये पत्नी सीता और छोटे भाई लक्ष्मणके साथ दण्डकारण्यमें चले आये । धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ रघुनाथजी सदा धनुष-बाण लिये रहते थे ॥ ३२ ॥
तस्य भार्या जनस्थानाच्छलेनापहृता बलात् ।
राक्षसेन्द्रेण बलिना रावणेन दुरात्मना ॥ ३३ ॥
सुवर्णरत्नचित्रेण मृगरूपेण रक्षसा ।
वञ्चयित्वा नरव्याघ्रं मारीचेन तदानघ ॥ ३४ ॥
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अनघ! दण्डकारण्यमें आकर वे जनस्थानमें रहा करते थे । एक दिन अत्यन्त बलवान् दुरात्मा राक्षसराज रावण मायासे सुवर्ण- रत्नमय विचित्र मृगका रूप धारण करनेवाले मारीच नामक राक्षसके द्वारा नरश्रेष्ठ श्रीरामको धोखेमें डालकर उनकी पत्नी सीताको छल-बलपूर्वक हर ले गया ॥ ३३-३४ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां हनुमद्भीमसंवादे सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें हनुमान्जी और भीमसेनका संवादविषयक एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४७ ॥