श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1101–1110
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1101–1110
पृष्ठ 1101
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
‘ पाण्डुनन्दन! तुम्हें भीमसेनपर क्रोध नहीं करना चाहिये । ये यक्ष और राक्षस कालके
द्वारा पहले ही मारे गये थे । तुम्हारे भाई तो इसमें निमित्तमात्र हुए हैं ॥ ४४ ॥
व्रीडा चात्र न कर्तव्या साहसं यदिदं कृतम् ।
दृष्टश्चापि सुरैः पूर्वं विनाशो यक्षरक्षसाम् ॥ ४५ ॥
‘ भीमसेनने जो यह दुःसाहसका कार्य किया है, इसके लिये तुम्हें लज्जित नहीं होना चाहिए; क्योंकि यक्ष तथा राक्षसोंका यह विनाश देवताओंको पहले ही प्रत्यक्ष हो चुका था ॥ ४५ ॥
न भीमसेने कोपो मे प्रीतोऽस्मि भरतर्षभ ।
कर्मणाः भीमसेनस्य मम तुष्टिरभूत् पुरा ॥ ४६ ॥
‘ भरतश्रेष्ठ! भीमसेनपर मेरा क्रोध नहीं है। मैं इनपर प्रसन्न हूँ । भीमसेनके कार्यसे मुझे पहले भी प्रसन्नता प्राप्त हो चुकी है ' ॥ ४६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा तु राजानं भीमसेनमभाषत ।
नैतन्मनसि मे तात वर्तते कुरुसत्तम ॥ ४७ ॥
यदिदं साहसं भीम कृष्णार्थे कृतवानसि ।
मामनादृत्य देवांश्च विनाशं यक्षरक्षसाम् ॥ ४८ ॥
स्वबाहुबलमाश्रित्य तेनाहं प्रीतिमांस्त्वयि ।
शापादद्य विनिर्मुक्तो घोरादस्मि वृकोदर ॥ ४ ९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! राजा युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर कुबेरने भीमसेनसे कहा — ' तात! कुरुश्रेष्ठ भीम! तुमने द्रौपदीके लिये जो यह साहसपूर्ण कार्य किया है, इसके लिये मेरे मनमें कोई विचार नहीं है । तुमने मेरी तथा देवताओंकी अवहेलना करके अपने बाहुबलके भरोसे यक्षों तथा राक्षसोंका विनाश किया है, इससे तुमपर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। वृकोदर! आज मैं एक भयंकर शापसे छूट गया हूँ ॥ ४७–४९ ॥
अहं पूर्वमगस्त्येन क्रुद्धेन परमर्षिणा ।
शप्तोऽपराधे कस्मिंश्चित् तस्यैषा निष्कृतिः कृता ॥ ५० ॥
दृष्टो हि मम संक्लेशः पुरा पाण्डवनन्दन ।
न तवात्रापराधोऽस्ति कथंचिदपि पाण्डव ॥ ५१ ॥
' पूर्वकालकी बात है, महर्षि अगस्त्यने किसी अपराधपर कुपित हो मुझे शाप दे दिया था; उसका तुम्हारे द्वारा निराकरण हुआ । पाण्डव-नन्दन! मुझे पूर्वकालसे ही यह दुःख देखना बदा था । इसमें तुम्हारा किसी तरह भी कोई अपराध नहीं है ' ॥ ५०-५१ ॥ युधिष्ठिर उवाच कथं शप्तोऽसि भगवन्नगस्त्येन महात्मना ।
पृष्ठ 1102
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रोतुमिच्छाम्यहं देव तवैतच्छापकारणम् ॥ ५२ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! महात्मा अगस्त्यने आपको कैसे शाप दे दिया? देव! आपको शाप मिलनेका क्या कारण है? यह मैं सुनना चाहता हूँ ॥ ५२ ॥
इदं चाश्चर्यभूतं मे यत् क्रोधात् तस्य धीमतः ।
तदैव त्वं न निर्दग्धः सबलः सपदानुगः ॥ ५३ ॥
मुझे इस बातके लिये बड़ा आश्चर्य होता है कि उन बुद्धिमान् महर्षिके क्रोधसे आप उसी समय अपने सेवकों और सैनिकोंसहित जलकर भस्म क्यों नहीं हो गये? ॥ ५३ ॥
धनेश्वर उवाच
देवतानामभून्मन्त्रः कुशवत्यां नरेश्वर ।
वृतस्तत्राहमगमं महापद्मशतैस्त्रिभिः ॥ ५४ ॥
कुबेर बोले- नरेश्वर! प्राचीन कालमें कुशवतीमें देवताओंकी मन्त्रणा- सभा बैठी थी ।
उसमें मुझे भी बुलाया गया था। मैं तीन सौ महापद्म यक्षोंके साथ वहाँ गया ॥ ५४ ॥
यक्षाणां घोररूपाणां विविधायुधधारिणाम् ।
अध्वन्यहमथापश्यमगस्त्यमृषिसत्तमम् ॥ ५५ ॥
उग्रं तपस्तप्यमानं यमुनातीरमाश्रितम् ।
नानापक्षिगणाकीर्ण पुष्पितद्रुमशोभितम् ॥ ५६ ॥
वे भयानक यक्ष नाना प्रकारके अस्त्र- शस्त्र लिये हुए थे । रास्तेमें मुझे मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजी दिखायी दिये, जो यमुनाके तटपर कठोर तपस्या कर रहे थे । वह प्रदेश भाँति-भाँतिके पक्षियोंसे व्याप्त और विकसित वृक्षावलियोंसे सुशोभित था ॥ ५५-५६ ॥
तमूर्ध्वबाहुं दृष्ट्वैव सूर्यस्याभिमुखे स्थितम् ।
तेजोराशिं दीप्यमानं हुताशनमिवैधितम् ॥ ५७ ॥
महर्षि अगस्त्य अपनी दोनों बाँहें ऊपर उठाये सूर्यकी ओर मुँह करके खड़े थे । वे तेजोराशि महात्मा प्रज्वलित अग्निके समान उद्दीप्त हो रहे थे ॥ ५७ ॥
राक्षसाधिपतिः श्रीमान् मणिमान्नाम मे सखा ।
मौर्य्यादज्ञान भावाच्च दर्पान्मोहाच्च पार्थिव ॥ ५८ ॥
न्यष्ठीवदाकाशगतो महर्षेस्तस्य मूर्धनि ।
स कोपान्मामुवाचेदं दिशः सर्वा दहन्निव ॥ ५ ९ ॥
राजन्! उन्हें देखकर ही मेरे एक मित्र राक्षसराज श्रीमणिमान्ने मूर्खता, अज्ञान, अभिमान एवं मोहके कारण आकाशसे उन महर्षिके मस्तकपर थूक दिया । तब वे क्रोधसे मानो सारी दिशाओंको दग्ध करते हुए मुझसे इस प्रकार बोले- ॥ ५८–५९ ॥
मामवज्ञाय दुष्टात्मा यस्मादेष सखा तव ।
धर्षणां कृतवानेतां पश्यतस्ते धनेश्वर ॥ ६० ॥
पृष्ठ 1103
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तस्मात् सहैभिः सैन्यैस्ते वधं प्राप्स्यति मानुषात् ।
त्वं चाप्येभिर्हतैः सैन्यैः क्लेशं प्राप्येह दुर्मतिः ।
तमेव मानुषं दृष्ट्वा किल्बिषाद् विप्रमोक्ष्यसे ॥ ६१ ॥
' धनेश्वर! तुम्हारे इस दुष्टात्मा सखाने मेरी अवहेलना करके तुम्हारे देखते - देखते जो मेरा इस प्रकार तिरस्कार किया है, उसके फलस्वरूप इन समस्त सैनिकोंके साथ यह एक मनुष्यके हाथसे मारा जायगा । तुम्हारी बुद्धि खोटी हो गयी है, अतः इन सब सैनिकोंके मारे जानेपर उनके लिये दुःख उठानेके पश्चात् तुम फिर उसी मनुष्यका दर्शन करके मेरे शाप एवं पापसे छुटकारा पा सकोगे ॥
सैन्यानां तु तवैतेषां पुत्रपौत्रबलान्वितम् ।
न शापं प्राप्यते घोरं तत् तवाज्ञां करिष्यति ॥ ६२ ॥
' इन सैनिकोंमेंसे जो तुम्हारी आज्ञाका पालन करेगा, वह पुत्र, पौत्र तथा सेनापर लागू होनेवाले इस भयंकर शापके प्रभावसे अलग रहेगा' ॥ ६२ ॥
एष शापो मया प्राप्तः प्राक् तस्मादृषिसत्तमात् ।
स भीमेन महाराज भ्रात्रा तव विमोक्षितः ॥ ६३ ॥
महाराज युधिष्ठिर! पूर्व कालमें उन मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यसे यही शाप मुझे प्राप्त हुआ था, जिससे तुम्हारे भाई भीमसेनने छुटकारा दिलाया है ॥ ६३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि यक्षयुद्धपर्वणि कुबेरदर्शने एकषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत यक्षयुद्धपर्वमें कुबेरदर्शनविषयक एक सौ इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६१ ॥
पृष्ठ 1104
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः कुबेरका युधिष्ठिर आदिको उपदेश और सान्त्वना देकर अपने भवनको प्रस्थान धनद उवाच
युधिष्ठिर धृतिर्दाक्ष्यं देशकालपराक्रमाः ।
लोकतन्त्रविधानानामेष पञ्चविधो विधिः ॥ १ ॥
कुबेर बोले- युधिष्ठिर! धैर्य, दक्षता, देश, काल और पराक्रम -ये पाँच लौकिक कार्योंकी सिद्धिके हेतु हैं ॥ १ ॥
धृतिमन्तश्च दक्षाश्च स्वे स्वे कर्मणि भारत ।
पराक्रमविधानज्ञा नरा कृतयुगेऽभवन् ॥ २ ॥
भारत! सत्ययुगमें सब मनुष्य धैर्यवान्, अपने -अपने कार्यमें कुशल तथा पराक्रमविधिके ज्ञाता थे ॥ २ ॥
धृतिमान् देशकालज्ञः सर्वधर्मविधानवित् ।
क्षत्रियः क्षत्रियश्रेष्ठ प्रशास्ति पृथिवीं चिरम् ॥ ३ ॥
क्षत्रियश्रेष्ठ! जो क्षत्रिय धैर्यवान्, देश-कालको समझनेवाला तथा सम्पूर्ण धर्मोंके विधानका ज्ञाता है, वह दीर्घकालतक इस पृथ्वीका शासन कर सकता है ॥ ३ ॥
य एवं वर्तते पार्थ पुरुषः सर्वकर्मसु ।
स लोके लभते वीर यशः प्रेत्य च सद्गतिम् ॥ ४ ॥
देशकालान्तरप्रेप्सुः कृत्वा शक्रः पराक्रमम् ।
सम्प्राप्तस्त्रिदिवे राज्यं वृत्रहा वसुभिः सह ॥ ५ ॥
वीर पार्थ! जो पुरुष इसी प्रकार सब कर्मोंमें प्रवृत्त होता है, वह लोकमें सुयश और परलोकमें उत्तम गति पाता है । देश- कालके अन्तरपर दृष्टि रखनेवाले वृत्रासुर- विनाशक इन्द्रने वसुओंसहित पराक्रम करके स्वर्गका राज्य प्राप्त किया है ॥ ४-५ ॥
यस्तु केवलसंरम्भात् प्रपातं न निरीक्षते ।
पापात्मा पापबुद्धिर्यः पापमेवानुवर्तते ॥ ६ ॥
जो केवल क्रोधके वशीभूत हो अपने पतनको नहीं देखता है, वह पापबुद्धि पापात्मा पुरुष पापका ही अनुसरण करता है ॥ ६ ॥
कर्मणामविभागज्ञः प्रेत्य चेह विनश्यति ।
अकालज्ञः सुदुर्मेधाः कार्याणामविशेषवित् ॥ ७ ॥
पृष्ठ 1105
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
जो कर्मोंके विभागको नहीं जानता, समयको नहीं पहचानता और कार्योंके वैशिष्ट्यको नहीं समझता है, वह खोटी बुद्धिवाला मनुष्य इहलोक तथा परलोकमें भी नष्ट ही होता है ॥ ७ ॥
वृथाऽऽचारसमारम्भः प्रेत्य चेह विनश्यति ।
साहसे वर्तमानानां निकृतीनां दुरात्मनाम् ॥ ८ ।
साहसके कार्योंमें लगे हुए ठग एवं दुरात्मा पुरुषोंके उत्तम कर्मोंका अनुष्ठान इस लोक और परलोकमें भी व्यर्थ नष्टप्राय ही है ॥ ८ ॥
सर्वसामर्थ्यलिप्सूनां पापो भवति निश्चयः ।
अधर्मज्ञोऽवलिप्तश्च बालबुद्धिरमर्षणः ॥ ९ ॥
निर्भयो भीमसेनोऽयं तं शाधि पुरुषर्षभ । सब प्रकारकी ( सांसारिक ) सामर्थ्यके इच्छुक मनुष्योंका निश्चय पापपूर्ण होता है । पुरुषरत्न युधिष्ठिर! ये भीमसेन धर्मको नहीं जानते, इन्हें अपने बलका बड़ा अभिमान है, इनकी बुद्धि अभी बालकोंकी - सी है तथा ये अत्यन्त क्रोधी और निर्भय हैं, अतः तुम इन्हें उपदेश देकर काबूमें रखो ॥ ९ ३ ॥ आर्ष्टिषेणस्य राजर्षेः प्राप्य भूयस्त्वमाश्रमम् ॥ १० ॥
तामिस्रं प्रथमं पक्षं वीतशोकभयो वस । नरेश्वर! अब पुनः तुम यहाँसे राजर्षि आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाकर कृष्णपक्षभर शोक और भयसे रहित होकर रहो ॥ १०१ ॥
अलकाः सह गन्धर्वैर्यक्षाश्च सह किन्नरैः ॥ ११ ॥
मन्नियुक्ता मनुष्येन्द्र सर्वे च गिरिवासिनः ।
रक्षिष्यन्ति महाबाहो सहितं द्विजसत्तमैः ॥ १२ ॥
महाबाहु नरश्रेष्ठ! वहाँ अलकानिवासी यक्ष तथा इस पर्वतपर रहनेवाले सभी प्राणी मेरी आज्ञाके अनुसार गन्धर्वों और किन्नरोंके साथ सदा इन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसहित तुम्हारी रक्षा करेंगे ॥ ११-१२ ॥
साहसादनुसम्प्राप्तः प्रतिबुध्यः वृकोदरः ।
वार्यतां साध्वयं राजंस्त्वया धर्मभृतां वर ॥ १३ ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ नरेश! भीमसेन यहाँ दुःसाहस- पूर्वक आये हैं, यह बात समझाकर इन्हें अच्छी तरह मना कर दो ( जिससे ये पुनः कोई अपराध न कर बैठें ) ॥ १३ ॥
अतः परं च वो राजन् द्रक्ष्यन्ति वनगोचराः ।
उपस्थास्यन्ति वो राजन् रक्षिष्यन्ते च वः सदा ॥ १४ ॥
राजन्! अबसे इस वनमें रहनेवाले सब यक्ष तुमलोगोंकी देख- भाल करेंगे, तुम्हारी सेवामें उपस्थित होंगे और सदा तुम सब लोगोंके संरक्षणमें तत्पर रहेंगे ॥ १४ ॥
तथैव चान्नपानानि स्वादूनि च बहूनि च ।
पृष्ठ 1106
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
आहरिष्यन्ति मत्प्रेष्याः सदा वः पुरुषर्षभाः ॥ १५ ॥
पुरुषरत्न पाण्डवो! इसी प्रकार हमारे सेवक तुम्हारे लिये वहाँ सदा स्वादिष्ट अन्न- पान प्रचुर मात्रामें प्रस्तुत करते रहेंगे ॥ १५ ॥
यथा जिष्णुर्महेन्द्रस्य यथा वायोर्वृकोदरः ।
धर्मस्य त्वं यथा तात योगोत्पन्नो निजः सुतः ॥ १६ ॥
आत्मज्ञावात्मसम्पन्नौ यमौ चोभौ यथाश्विनोः ।
रक्ष्यास्तद्वन्ममापीह यूयं सर्वे युधिष्ठिर ॥ १७ ॥
तात युधिष्ठिर! जैसे अर्जुन देवराज इन्द्रके, भीमसेन वायुदेवके और तुम धर्मराजके योगबलसे उत्पन्न किये हुए निजी पुत्र होनेके कारण उनके द्वारा रक्षणीय हो तथा ये दोनों आत्मबलसम्पन्न नकुल सहदेव जैसे दोनों अश्विनीकुमारोंसे उत्पन्न होनेके कारण उनके पालनीय हैं, उसी प्रकार यहाँ मेरे लिये भी तुम सब लोग रक्षणीय हो ॥ १६-१७ ॥
अर्थतत्त्वविधानज्ञः सर्वधर्मविधानवित् ।
भीमसेनादवरजः फाल्गुनः कुशली दिवि ॥ १८ ॥
अर्थतत्त्वकी विधिके ज्ञाता और सम्पूर्ण धर्मोंके विधानमें कुशल अर्जुन, जो भीमसेनसे छोटे हैं, इस समय कुशलपूर्वक स्वर्गलोकमें विराज रहे हैं ॥ १८ ॥
याः काश्चन मता लोके स्वर्ग्याः परमसम्पदः ।
जन्मप्रभृति ताः सर्वाः स्थितास्तात धनंजये ॥ १ ९ ॥
तात! संसारमें जो कोई भी स्वर्गीय श्रेष्ठ सम्पत्तियाँ मानी गयी हैं, वे सब अर्जुनमें जन्मकालसे ही स्थित हैं ॥ १ ९ ॥
दमो दानं बलं बुद्धिर्हीर्धृतिस्तेज उत्तमम् ।
एतान्यपि महासत्त्वे स्थितान्यमिततेजसि ॥ २० ॥
अमित तेजस्वी और महान् सत्त्वशाली अर्जुनमें दम ( इन्द्रिय- संयम ), दान, बल, बुद्धि, लज्जा, धैर्य तथा उत्तम तेज- ये सभी सद्गुण विद्यमान हैं ॥ २० ॥
न मोहात् कुरुते जिष्णुः कर्म पाण्डव गर्हितम् ।
न पार्थस्य मृषोक्तानि कथयन्ति नरा नृषु ॥ २१ ॥
पाण्डुनन्दन! तुम्हारे भाई अर्जुन कभी मोहवश निन्दित कर्म नहीं करते । मनुष्य आपसमें कभी अर्जुनके मिथ्याभाषणकी चर्चा नहीं करते हैं ॥ २१ ॥
स देवपितृगन्धर्वैः कुरूणां कीर्तिवर्धनः ।
मानितः कुरुतेऽस्त्राणि शक्रसद्मनि भारत ॥ २२ ॥
भारत! कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले अर्जुन इन्द्रभवनमें देवताओं, पितरों तथा गन्धर्वोंसे सम्मानित हो अस्त्रविद्याका अभ्यास करते हैं ॥ २२ ॥
योऽसौ सर्वान् महीपालान् धर्मेण वशमानयत् ।
स शान्तनुर्महातेजाः पितुस्तव पितामहः ॥ २३ ॥
पृष्ठ 1107
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रीयते पार्थ पार्थेन दिवि गाण्डीवधन्वना ।
सम्यक् चासौ महावीर्यः कुलधुर्येण पार्थिवः ॥ २४ ॥
पार्थ! जिन्होंने सब राजाओंको धर्मपूर्वक अपने अधीन कर लिया था, वे महातेजस्वी, महापराक्रमी तथा सदाचारपरायण महाराज शान्तनु, जो तुम्हारे पिताके पितामह थे, स्वर्गलोकमें कुरुकुलधुरीण गाण्डीवधारी अर्जुनसे बहुत प्रसन्न रहते हैं ॥ २३-२४ ॥
पितॄन् देवानृषीन् विप्रान् पूजयित्वा महातपाः ।
सप्त मुख्यान् महामेधानाहरद् यमुनां प्रति ॥ २५ ॥
अधिराजः स राजंस्त्वां शान्तनुः प्रपितामहः ।
स्वर्गजिच्छक्रलोकस्थः कुशलं परिपृच्छति ॥ २६ ॥
महातपस्वी शान्तनुने देवताओं, पितरों, ऋषियों तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करके यमुना-तटपर सात बड़े -बड़े अश्वमेधयज्ञोंका अनुष्ठान किया था । राजन्! वे तुम्हारे प्रपितामह राजाधिराज शान्तनु स्वर्गलोकको जीतकर उसीमें निवास करते हैं । उन्होंने मुझसे तुम्हारी कुशल पूछी थी ॥ २५-२६ ॥ वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं धनदेन प्रभाषितम् ।
पाण्डवाश्च ततस्तेन वभूवुः सम्प्रहर्षिताः ॥ २७ ॥
ततः शक्तिं गदां खड्गं धनुश्च भरतर्षभः ।
प्राध्वं कृत्वा नमश्चक्रे कुबेराय वृकोदरः ॥ २८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! कुबेरकी कही हुई ये बातें सुनकर पाण्डवोंको बड़ी प्रसन्नता हुई । तदनन्तर भरतकुल भूषण भीमसेनने उठायी हुई शक्ति गदा, खड्ग और धनुषको नीचे करके कुबेरको नमस्कार किया ॥
ततोऽब्रवीद् धनाध्यक्षः शरण्यः शरणागतम् ।
मानहा भव शत्रूणां सुहृदां नन्दिवर्धनः ॥ २ ९ ॥
तब शरण देनेवाले धनाध्यक्ष कुबेरने अपनी शरणमें आये हुए भीमसेनसे कहा ——पाण्डुनन्दन! तुम शत्रुओंका मान मर्दन और सुहृदोंका आनन्द वर्धन करनेवाले बनो ॥ २ ९ ॥
पृष्ठ 1108
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
स्वेषु वेश्मसु रम्येषु वसतामित्रतापनाः ।
कामान्न परिहास्यन्ति यक्षा वो भरतर्षभाः ॥ ३० ॥
‘ शत्रुओंको संताप देनेवाले भरतकुलभूषण पाण्डवो! तुम सब लोग अपने रमणीय आश्रमोंमें निवास करो । यक्षलोग तुम्हारी अभीष्ट वस्तुओंकी प्राप्तिमें बाधा नहीं डालेंगे ॥ ३० ॥
शीघ्रमेव गुडाकेशः कृतास्त्रः पुनरेष्यति ।
साक्षान्मघवता सृष्टः सम्प्राप्स्यति धनंजयः ॥ ३१ ॥
‘ निद्राविजयी अर्जुन अस्त्रविद्या सीखकर साक्षात् इन्द्रके भेजनेपर शीघ्र ही यहाँ आवेंगे और तुम सब लोगोंसे मिलेंगे ' ॥ ३१ ॥
एवमुत्तमकर्माणमनुशिष्य युधिष्ठिरम् ।
श्वेतं गिरिवरश्रेष्ठं प्रययौ गुह्यकाधिपः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार उत्तम कर्म करनेवाले युधिष्ठिरको उपदेश देकर यक्षराज कुबेर गिरिश्रेष्ठ कैलासको चले गये ॥ ३२ ॥
तं परिस्तोमसंकीर्णैर्नानारत्नविभूषितैः ।
यानैरनुययुर्यक्षा राक्षसाश्च सहस्रशः ॥ ३३ ॥
पृष्ठ 1109
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उनके पीछे सहस्रों यक्ष और राक्षस भी अपने - अपने वाहनोंपर आरूढ़ हो चल दिये । उनके वे वाहन नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे और उनकी पीठपर बहुरंगे कम्बल आदि कसे हुए थे ॥ ३३ ॥
पक्षिणामिव निर्घोषः कुबेरसदनं प्रति ।
बभूव परमाश्वानामैरावतपथे यथा ॥ ३४ ॥
जैसे इन्द्रपुरीके मार्गपर चलनेवाले विविध वाहनोंका कोलाहल सुनायी पड़ता है, उसी प्रकार कुबेरभवनके प्रति यात्रा करनेवाले उत्तम अश्वोंका शब्द ऐसा जान पड़ता था, मानो पक्षी उड़ रहे हों ॥ ३४ ॥
ते जग्मुस्तूर्णमाकाशं धनाधिपतिवाजिनः ।
प्रकर्षन्त इवाभ्राणि पिबन्त इव मारुतम् ॥ ३५ ॥
धनाध्यक्ष कुबेरके वे घोड़े अपने साथ बादलोंको खींचते और वायुको पीते हुए - से तीव्र गतिसे आकाशमें उड़ चले ॥ ३५ ॥
ततस्तानि शरीराणि गतसत्त्वानि रक्षसाम् ।
अपाकृष्यन्त शैलाग्राद् धनाधिपतिशासनात् ॥ ३६ ॥
तदनन्तर कुबेरकी आज्ञासे राक्षसोंके वे निर्जीव शरीर उस पर्वतशिखरसे दूर हटा दिये गये ॥ ३६ ॥
तेषां हि शापकालः स कृतोऽगस्त्येन धीमता ।
समरे निहतास्तस्माच्छापस्यान्तोऽभवत् तदा ॥ ३७ ॥
पाण्डवाश्च महात्मानस्तेषु वेश्मसु तां क्षपाम् ।
सुखमूषुर्गतोद्वेगाः पूजिताः सर्वराक्षसैः ॥ ३८ ॥
बुद्धिमान् अगस्त्यने यक्षोंके लिये शापकी वही अवधि निश्चित की थी। जब वे युद्धमें मारे गये तब उनके शापका अन्त हो गया । महामना पाण्डव अपने उन आश्रमोंमें सम्पूर्ण राक्षसोंसे पूजित एवं उद्वेगशून्य होकर सुखसे रात्रि व्यतीत करने लगे ॥ ३७-३८ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि यक्षयुद्धपर्वणि कुबेरवाक्ये द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत यक्षयुद्धपर्वमें कुबेरवाक्यविषयक एक सौ बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६२ ॥
पृष्ठ 1110
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः धौम्यका युधिष्ठिरको मेरु पर्वत तथा उसके शिखरोंपर स्थित ब्रह्मा, विष्णु आदिके स्थानोंका लक्ष्य कराना और सूर्य - चन्द्रमाकी गति एवं प्रभावका वर्णन वैशम्पायन उवाच
ततः सूर्योदये धौम्यः कृत्वाऽऽह्निकमरिंदम ।
आर्ष्टिषेणेन सहितः पाण्डवानभ्यवर्तत ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - शत्रुदमन नरेश! तदनन्तर सूर्योदय होनेपर आर्ष्टिषेणसहित धौम्यजी नित्यकर्म पूरा करके पाण्डवोंके पास आये ॥ १ ॥
तेऽभिवाद्याष्र्ष्टिषेणस्य पादौ धौम्यस्य चैव ह ।
ततः प्राञ्जलयः सर्वे ब्राह्मणांस्तानपूजयन् ॥ २ ॥
तब समस्त पाण्डवोंने आर्ष्टिषेण तथा धौम्यके चरणोंमें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर सब ब्राह्मणोंका पूजन किया ॥ २ ॥
ततो युधिष्ठिरं धौम्यो गृहीत्वा दक्षिणे करे ।
प्राचीं दिशमभिप्रेक्ष्य महर्षिरिदमब्रवीत् ॥ ३ ॥
तदनन्तर महर्षि धौम्यने युधिष्ठिरका दाहिना हाथ पकड़कर पूर्व दिशाकी ओर देखते हुए कहा- ॥ ३ ॥
असौ सागरपर्यन्तां भूमिमावृत्य तिष्ठति ।
शैलराजो महाराज मन्दरोऽति विराजते ॥ ४ ॥
‘ महाराज! वह पर्वतराज मन्दराचल प्रकाशित हो रहा है, जो समुद्रतककी भूमिको घेरकर खड़ा है ॥ ४ ॥
इन्द्रवैश्रवणावेतां दिशं पाण्डव रक्षतः ।
पर्वतैश्च वनान्तैश्च काननैश्चैव शोभिताम् ॥ ५ ॥
‘पाण्डुनन्दन! पर्वतों, वनान्त प्रदेशों और काननोंसे सुशोभित इस पूर्व दिशाकी रक्षा इन्द्र और कुबेर करते हैं ॥
एतदाहुर्महेन्द्रस्य राज्ञो वैश्रवणस्य च ।
ऋषयः सर्वधर्मज्ञाः सद्म तात मनीषिणः ॥ ६ ॥
अतश्चोद्यन्तमादित्यमुपतिष्ठन्ति वै प्रजाः ।
ऋषयश्चापि धर्मज्ञाः सिद्धाः साध्याश्च देवताः ॥ ७ ॥