श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 121–130

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 121–130

पृष्ठ 121

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सम्पूर्ण लोकोंपर विजय पानेवाले आप लोकेश्वर प्रभुने वह कर्म करके सामना करनेके लिये आये हुए समस्त दैत्यों और दानवोंका युद्धस्थलमें वध किया ॥ १ ९ ॥ ततः सर्वेश्वरत्वं च सम्प्रदाय शचीपतेः मानुषेषु महाबाहो प्रादुर्भूतोऽसि केशव ॥ २० ॥

महाबाहु केशव! तदनन्तर शचीपतिको सर्वेश्वर-पद प्रदान करके आप इस समय मनुष्योंमें प्रकट हुए हैं ॥ २० ॥

स त्वं नारायणो भूत्वा हरिरासीः परंतप ।

ब्रह्मा सोमश्च सूर्यश्च धर्मो धाता यमोऽनलः ॥ २१ ॥

वायुर्वैश्रवणो रुद्रः कालः खं पृथिवी दिशः ।

अजश्चराचरगुरुः स्रष्टा त्वं पुरुषोत्तम ॥ २२ ॥

परंतप! पुरुषोत्तम! आप ही पहले नारायण होकर फिर हरिरूपमें प्रकट हुए । ब्रह्मा, सोम, सूर्य, धर्म, धाता, यम, अनल, वायु, कुबेर, रुद्र, काल, आकाश, पृथ्वी, दिशाएँ, चराचरगुरु तथा सृष्टिकर्ता एवं अजन्मा आप ही हैं ॥ २१-२२ ॥

परायणं देवमूर्धा क्रतुभिर्मधुसूदन ।

अयजो भूरितेजा वै कृष्ण चैत्ररथे वने ॥ २३ ॥

मधुसूदन श्रीकृष्ण! आपने चैत्ररथवनमें अनेक यज्ञोंका अनुष्ठान किया है । आप सबके उत्तम आश्रय, देवशिरोमणि और महातेजस्वी हैं ॥ २३ ॥

शतं शतसहस्राणि सुवर्णस्य जनार्दन ।

एकैकस्मिंस्तदा यज्ञे परिपूर्णानि भागशः ॥ २४ ॥

जनार्दन! उस समय आपने प्रत्येक यज्ञमें पृथक्- पृथक् एक-एक करोड़ स्वर्णमुद्राएँ दक्षिणाके रूपमें दीं ॥ २४ ॥

अदितेरपि पुत्रत्वमेत्य यादवनन्दन ।

त्वं विष्णुरिति विख्यात इन्द्रादवरजो विभुः ॥ २५ ॥

यदुनन्दन! आप अदितिके पुत्र हो, इन्द्रके छोटे भाई होकर सर्वव्यापी विष्णुके नामसे विख्यात हैं ॥ २५ ॥

शिशुर्भूत्वा दिवं खं च पृथिवीं च परंतप ।

त्रिभिर्विक्रमणैः कृष्ण क्रान्तवानसि तेजसा ॥ २६ ॥

परंतप श्रीकृष्ण! आपने वामनावतारके समय छोटे -से बालक होकर भी अपने तेजसे तीन डगोंद्वारा द्युलोक, अन्तरिक्ष और भूलोक- तीनोंको नाप लिया ॥ २६ ॥

सम्प्राप्य दिवमाकाशमादित्यस्यन्दने स्थितः ।

अत्यरोचश्च भूतात्मन् भास्करं स्वेन तेजसा ॥ २७ ॥

भूतात्मन्! आपने सूर्यके रथपर स्थित हो द्युलोक और आकाशमें व्याप्त होकर अपने तेजसे भगवान् भास्करको भी अत्यन्त प्रकाशित किया है ॥ २७ ॥

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प्रादुर्भावसहस्रेषु तेषु तेषु त्वया विभो ।

अधर्मरुचयः कृष्ण निहताः शतशोऽसुराः ॥ २८ ॥

विभो! आपने सहस्रों अवतार धारण किये हैं और उन अवतारोंमें सैकड़ों असुरोंका, जो अधर्ममें रुचि रखनेवाले थे, वध किया है ॥ २८ ॥

सादिता मौरवाः पाशा निसुन्दनरकौ हतौ ।

कृतः क्षेमः पुनः पन्थाः पुरं प्राग्ज्योतिषं प्रति ॥ २ ९ ॥

आपने मुर दैत्यके लोहमय पाश काट दिये, निसुन्द और नरकासुरको मार डाला और पुनः प्राग्ज्योतिषपुरका मार्ग सकुशल यात्रा करनेयोग्य बना दिया ॥ २ ९ ॥

जारूथ्यामाहुतिः क्राथः शिशुपालो जनैः सह ।

जरासंधश्च शैब्यश्च शतधन्वा च निर्जितः ॥ ३० ॥

भगवन्! आपने जारूथी नगरीमें आहुति, क्राथ, साथियोंसहित शिशुपाल, जरासंध, शैब्य और शतधन्वाको परास्त किया ॥ ३० ॥

तथा पर्जन्यघोषेण रथेनादित्यवर्चसा ।

अवाप्सीर्महिषीं भोज्यां रणे निर्जित्य रुक्मिणम् ॥ ३१ ॥

इसी प्रकार मेघके समान घर्घर शब्द करनेवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी रथके द्वारा कुण्डिनपुरमें जाकर आपने रुक्मीको युद्धमें जीता और भोजवंशकी कन्या रुक्मिणीको अपनी पटरानीके रूपमें प्राप्त किया ॥ ३१ ॥

इन्द्रद्युम्नो हतः कोपाद् यवनश्च कसेरुमान् ।

हतः सौभपतिः शाल्वस्त्वया सौभं च पातितम् ॥ ३२ ॥

प्रभो! आपने क्रोधसे इन्द्रद्युम्नको मारा और यवनजातीय कसेरुमान् एवं सौभपति शाल्वको भी यमलोक पहुँचा दिया । साथ ही शाल्वके सौभ विमानको भी छिन्न- भिन्न करके धरतीपर गिरा दिया ॥ ३२ ॥

एवमेते युधि हता भूयश्चान्याञ्छृणुष्व ह ।

इरावत्यां हतो भोजः कार्तवीर्यसमो युधि ॥ ३३ ॥

इस प्रकार इन पूर्वोक्त राजाओंको आपने युद्धमें मारा है । अब आपके द्वारा मारे हुए औरोंके भी नाम सुनिये । इरावतीके तटपर आपने कार्तवीर्य अर्जुनके सदृश पराक्रमी भोजको युद्धमें मार गिराया ३३ ॥

गोपतिस्तालकेतुश्च त्वया विनिहतावुभौ ।

तां च भोगवतीं पुण्यामृषिकान्तां जनार्दन ॥ ३४ ॥

द्वारकामात्मसात् कृत्वा समुद्रं गमयिष्यसि । गोपति और तालकेतु- ये दोनों भी आपके ही हाथसे मारे गये । जनार्दन! भोग-सामग्रियोंसे सम्पन्न तथा ऋषि- मुनियोंकी प्रिय अपने अधीन की हुई पुण्यमयी द्वारका नगरीको आप अन्तमें समुद्रमें विलीन कर देंगे ॥ ३४३ ॥

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न क्रोधो न च मात्सर्यं नानृतं मधुसूदन ।

त्वयि तिष्ठति दाशार्ह न नृशंस्यं कुतोऽनृजु ॥ ३५ ॥

आसीनं चैत्यमध्ये त्वां दीप्यमानं स्वतेजसा ।

आगम्य ऋषयः सर्वेऽयाचन्ताभयमच्युत ॥ ३६ ॥

मधुसूदन! वास्तवमें आपमें न तो क्रोध है, न मात्सर्य है, न असत्य है, न निर्दयता ही है । दाशार्ह! फिर आपमें कठोरता तो हो ही कैसे सकती है? अच्युत! महलके मध्यभागमें बैठे और अपने तेजसे उद्भासित हुए आपके पास आकर सम्पूर्ण ऋषियोंने अभयकी याचना की ॥ ३५-३६ ॥

युगान्ते सर्वभूतानि संक्षिप्य मधुसूदन ।

आत्मनैवात्मसात् कृत्वा जगदासीः परंतप ॥ ३७ ॥

परंतप मधुसूदन! प्रलयकालमें समस्त भूतोंका संहार करके इस जगत्को स्वयं ही अपने भीतर रखकर आप अकेले ही रहते हैं ॥ ३७ ॥

युगादौ तव वार्ष्णेय नाभिपद्मादजायत ।

ब्रह्मा चराचरगुरुर्यस्येदं सकलं जगत् ॥ ३८ ॥

वार्ष्णेय! सृष्टिके प्रारम्भकालमें आपके नाभि- कमलसे चराचरगुरु ब्रह्मा उत्पन्न हुए, जिनका रचा हुआ यह सम्पूर्ण जगत् है ॥ ३८ ॥

तं हन्तुमुद्यतौ घोरौ दानवौ मधुकैटभौ ।

तयोर्व्यतिक्रमं दृष्ट्वा क्रुद्धस्य भवतो हरेः ॥ ३ ९ ॥

ललाटाज्जातवाञ्छम्भुः शूलपाणिस्त्रिलोचनः ।

इत्थं तावपि देवेशौ त्वच्छरीरसमुद्भवौ ॥ ४० ॥

जब ब्रह्माजी उत्पन्न हुए, उस समय दो भयंकर दानव मधु और कैटभ उनके प्राण लेनेको उद्यत हो गये । उनका यह अत्याचार देखकर क्रोधमें भरे हुए आप श्रीहरिके ललाटसे भगवान् शंकरका प्रादुर्भाव हुआ, जिनके हाथोंमें त्रिशूल शोभा पा रहा था । उनके तीन नेत्र थे । इस प्रकार वे दोनों देव ब्रह्मा और शिव आपके ही शरीरसे उत्पन्न हुए हैं ॥ ३ ९ -४० ॥

त्वन्नियोगकरावेताविति मे नारदोऽब्रवीत् ।

तथा नारायण पुरा क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ॥ ४१ ॥

इष्टवांस्त्वं महासत्रं कृष्ण चैत्ररथे वने ।

नैवं परे नापरे वा करिष्यन्ति कृतानि वा ॥ ४२ ॥

यानि कर्माणि देव त्वं बाल एव महाबलः ।

कृतवान् पुण्डरीकाक्ष बलदेवसहायवान् ।

कैलासभवने चापि ब्राह्मणैर्न्यवसः सह ॥ ४३ ॥

वे दोनों आपकी ही आज्ञाका पालन करनेवाले हैं, यह बात मुझे नारदजीने बतलायी थी । नारायण श्रीकृष्ण! इसी प्रकार पूर्वकालमें चैत्ररथवनके भीतर आपने प्रचुर

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दक्षिणाओंसे सम्पन्न अनेक यज्ञों तथा महासत्रका अनुष्ठान किया था। भगवान् पुण्डरीकाक्ष! आप महान् बलवान् हैं । बलदेवजी आपके नित्य सहायक हैं । आपने बचपनमें ही जो- जो महान् कर्म किये हैं, उन्हें पूर्ववर्ती अथवा परवर्ती पुरुषोंने न तो किया है और न करेंगे । आप ब्राह्मणोंके साथ कुछ कालतक कैलास पर्वतपर भी रहे हैं ॥ ४१– ४३ ॥ वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा महात्मानमात्मा कृष्णस्य पाण्डवः ।

तूष्णीमासीत् ततः पार्थमित्युवाच जनार्दनः ॥ ४४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! श्रीकृष्णके आत्मस्वरूप पाण्डुनन्दन अर्जुन उन महात्मासे ऐसा कहकर चुप हो गये । तब भगवान् जनार्दनने कुन्तीकुमारसे इस प्रकार कहा ॥ ४४ ॥

ममैव त्वं तवैवाहं ये मदीयास्तवैव ते ।

यस्त्वां द्वेष्टि स मां द्वेष्टि यस्त्वामनु स मामनु ॥ ४५ ॥

' पार्थ! तुम मेरे ही हो, मैं तुम्हारा ही हूँ । जो मेरे हैं, वे तुम्हारे ही हैं । जो तुमसे द्वेष रखता है, वह मुझसे भी रखता है । जो तुम्हारे अनुकूल है, वह मेरे भी अनुकूल है ॥ ४५ ॥

नरस्त्वमसि दुर्धर्ष हरिर्नारायणो ह्यहम् ।

काले लोकमिमं प्राप्तौ नरनारायणावृषी ॥ ४६ ॥

' दुर्द्धर्ष वीर! तुम नर हो और मैं नारायण श्रीहरि हूँ । इस समय हम दोनों नर- नारायण ऋषि ही इस लोकमें आये हैं ॥ ४६ ॥

अनन्यः पार्थ मत्तस्त्वं त्वत्तश्चाहं तथैव च ।

नावयोरन्तरं शक्यं वेदितुं भरतर्षभ ॥ ४७ ॥

' कुन्तीकुमार! तुम मुझसे अभिन्न हो और मैं तुमसे पृथक् नहीं हूँ । भरतश्रेष्ठ! हम दोनोंका भेद जाना नहीं जा सकता' ॥ ४७ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्ते तु वचने केशवेन महात्मना ।

तस्मिन् वीरसमावाये संरब्धेष्वथ राजसु ॥ ४८ ॥

धृष्टद्युम्नमुखैर्वीरैर्भ्रातृभिः परिवारिता ।

पाञ्चाली पुण्डरीकाक्षमासीनं भ्रातृभिः सह ।

अभिगम्याब्रवीत् क्रुद्धा शरण्यं शरणैषिणी ॥ ४ ९ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! रोषावेशसे भरे हुए राजाओंकी मण्डलीमें उस वीरसमुदायके मध्य महात्मा केशवके ऐसा कहनेपर धृष्टद्युम्न आदि भाइयोंसे घिरी और

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कुपित हुई पांचालराजकुमारी द्रौपदी भाइयोंके साथ बैठे हुए शरणागतवत्सल श्रीकृष्णके पास जा उनकी शरणकी इच्छा रखती हुई उनसे बोली ॥ ४८-४९ ॥ द्रौपद्युवाच

पूर्वे प्रजाभिसर्गे त्वामाहुरेकं प्रजापतिम् ।

स्रष्टारं सर्वलोकानामसितो देवलोऽब्रवीत् ॥ ५० ॥

द्रौपदीने कहा – प्रभो! ऋषिलोग प्रजासृष्टिके प्रारम्भकालमें एकमात्र आपको ही सम्पूर्ण जगत्का स्रष्टा एवं प्रजापति कहते हैं । महर्षि असित - देवलका यही मत है ॥ ५० ॥

विष्णुस्त्वमसि दुर्धर्ष त्वं यज्ञो मधुसूदन ।

यष्टा त्वमसि यष्टव्यो जामदग्न्यो यथाब्रवीत् ॥ ५१ ॥

दुर्द्धर्ष मधुसूदन! आप ही विष्णु हैं, आप ही यज्ञ हैं, आप ही यजमान हैं और आप ही यजन करने योग्य श्रीहरि हैं, जैसा कि जमदग्निनन्दन परशुरामका कथन है ॥ ५१ ॥

ऋषयस्त्वां क्षमामाहुः सत्यं च पुरुषोत्तम ।

सत्याद् यज्ञोऽसि सम्भूतः कश्यपस्त्वां यथाब्रवीत् ॥ ५२ ॥

पुरुषोत्तम! कश्यपजीका कहना है कि महर्षिगण आपको क्षमा और सत्यका स्वरूप कहते हैं । सत्यसे प्रकट हुए यज्ञ भी आप ही हैं ॥ ५२ ॥

साध्यानामपि देवानां शिवानामीश्वरेश्वर ।

भूतभावन भूतेश यथा त्वां नारदोऽब्रवीत् ॥ ५३ ॥

भूतभावन भूतेश्वर! आप साध्य देवताओं तथा कल्याणकारी रुद्रोंके अधीश्वर हैं ।

नारदजीने आपके विषयमें यही विचार प्रकट किया है ॥ ५३ ॥

ब्रह्मशंकरशक्राद्यैर्दैववृन्दैः पुनः पुनः ।

क्रीडसे त्वं नरव्याघ्र बालः क्रीडनकैरिव ॥ ५४ ॥

नरश्रेष्ठ! जैसे बालक खिलौनोंसे खेलता है, उसी प्रकार आप ब्रह्मा, शिव तथा इन्द्र आदि देवताओंसे बारंबार क्रीडा करते रहते हैं ॥ ५४ ॥

द्यौश्च ते शिरसा व्याप्ता पद्भयां च पृथिवी प्रभो ।

जठरं त इमे लोकाः पुरुषोऽसि सनातनः ॥ ५५ ॥

प्रभो! स्वर्गलोक आपके मस्तकसे और पृथ्वी आपके चरणोंसे व्याप्त है । ये सब लोक

आपके उदरस्वरूप हैं । आप सनातन पुरुष हैं ॥ ५५ ॥

विद्यातपोऽभितप्तानां तपसा भावितात्मनाम् ।

आत्मदर्शनतृप्तानामृषीणामसि सत्तमः ॥ ५६ ॥

विद्या और तपस्यासे सम्पन्न तथा तपके द्वारा शोधित अन्तःकरणवाले आत्मज्ञानसे तृप्त महर्षियोंमें आप ही परम श्रेष्ठ हैं ॥ ५६ ॥

राजर्षीणां पुण्यकृतामाहवेष्वनिवर्तिनाम् ।

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सर्वधर्मोपपन्नानां त्वं गतिः पुरुषर्षभ ।

त्वं प्रभुस्त्वं विभुश्च त्वं भूतात्मा त्वं विचेष्टसे ॥ ५७ ॥

पुरुषोत्तम! युद्धमें कभी पीठ न दिखानेवाले, सब धर्मोंसे सम्पन्न पुण्यात्मा राजर्षियोंके आप ही आश्रय हैं । आप ही प्रभु ( सबके स्वामी ), आप ही विभु ( सर्वव्यापी ) और आप ही सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा हैं। आप ही विविध प्राणियोंके रूपमें नाना प्रकारकी चेष्टाएँ कर रहे हैं ॥ ५७ ॥

लोकपालाश्च लोकाश्च नक्षत्राणि दिशो दश ।

नभश्चन्द्रश्च सूर्यश्च त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ ५८ ॥

लोक, लोकपाल, नक्षत्र, दसों दिशाएँ, आकाश, चन्द्रमा और सूर्य सब आपमें प्रतिष्ठित हैं ॥ ५८ ॥

मर्त्यता चैव भूतानाममरत्वं दिवौकसाम् ।

त्वयि सर्वं महाबाहो लोककार्यं प्रतिष्ठितम् ॥ ५ ९ ॥

महाबाहो! भूलोकके प्राणियोंकी मृत्युपरवशता, देवताओंकी अमरता तथा सम्पूर्ण जगत्का कार्य सब कुछ आपमें ही प्रतिष्ठित है ॥ ५ ९ ॥

सा तेऽहं दुःखमाख्यास्ये प्रणयान्मधुसूदन ।

ईशस्त्वं सर्वभूतानां ये दिव्या ये च मानुषाः ॥ ६० ॥

मधुसूदन! मैं आपके प्रति प्रेम होनेके कारण आपसे अपना दुःख निवेदन करूँगी; क्योंकि दिव्य और मानव जगत्में जितने भी प्राणी हैं, उन सबके ईश्वर आप ही हैं ॥ ६० ॥

कथं नु भार्या पार्थानां तव कृष्ण सखी विभो ।

धृष्टद्युम्नस्य भगिनी सभां कृष्येत मादृशी ॥ ६१ ॥

भगवन् कृष्ण! मेरे - जैसी स्त्री जो कुन्तीपुत्रोंकी पत्नी, आपकी सखी और धृष्टद्युम्न-जैसे वीरकी बहिन हो, क्या किसी तरह सभामें ( केश पकड़कर) घसीटकर लायी जा सकती है? ॥ ६१ ॥

स्त्रीधर्मिणी वेपमाना शोणितेन समुक्षिता ।

एकवस्त्रा विकृष्टास्मि दुःखिता कुरुसंसदि ॥ ६२ ॥

मैं रजस्वला थी, मेरे कपड़ोंपर रक्तके छींटे लगे थे, शरीरपर एक ही वस्त्र था और लज्जा एवं भयसे मैं थरथर काँप रही थी । उस दशामें मुझ दुःखिनी अबलाको कौरवोंकी सभामें घसीटकर लाया गया था ॥ ६२ ॥

राज्ञां मध्ये सभायां तु रजसातिपरिप्लुता ।

दृष्ट्वा च मां धार्तराष्ट्रा प्राहसन् पापचेतसः ॥ ६३ ॥

भरी सभामें राजाओंकी मण्डलीके बीच अत्यन्त रजस्राव होनेके कारण मैं रक्तसे भींगी जा रही थी । उस अवस्थामें मुझे देखकर धृतराष्ट्रके पापात्मा पुत्रोंने जोर - जोरसे हँसकर मेरी हँसी उड़ायी ॥ ६३ ॥

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दासीभावेन मां भोक्तुमीषुस्ते मधुसूदन ।

जीवत्सु पाण्डुपुत्रेषु पञ्चालेषु च वृष्णिषु ॥ ६४ ॥

मधुसूदन! पाण्डवों, पांचालों और वृष्णिवंशी वीरोंके जीते जी धृतराष्ट्रके पुत्रोंने दासीभावसे मेरा उपभोग करनेकी इच्छा प्रकट की ॥ ६४ ॥

नन्वहं कृष्ण भीष्मस्य धृतराष्ट्रस्य चोभयोः ।

स्नुषा भवामि धर्मेण साहं दासीकृता बलात् ॥ ६५ ॥

श्रीकृष्ण! मैं धर्मतः भीष्म और धृतराष्ट्र दोनोंकी पुत्रवधू हूँ, तो भी उनके सामने ही बलपूर्वक दासी बनायी गयी ॥ ६५ ॥

गर्हये पाण्डवांस्त्वेव युधि श्रेष्ठान् महाबलान् ।

यत्क्लिश्यमानां प्रेक्षन्ते धर्मपत्नीं यशस्विनीम् ॥ ६६ ॥

मैं तो संग्राममें श्रेष्ठ इन महाबली पाण्डवोंकी ही निन्दा करती हूँ; जो अपनी यशस्विनी धर्मपत्नीको शत्रुओंद्वारा सतायी जाती हुई देख रहे थे ॥ ६६ ॥

धिग् बलं भीमसेनस्य धिक् पार्थस्य च गाण्डिवम् ।

यौ मां विप्रकृतां क्षुद्रैर्मर्षयेतां जनार्दन ॥ ६७ ॥

जनार्दन! भीमसेनके बलको धिक्कार है, अर्जुनके गाण्डीव धनुषको भी धिक्कार है, जो उन नराधमद्वारा मुझे अपमानित होती देखकर भी सहन करते रहे ॥ ६७ ॥

शाश्वतोऽयं धर्मपथः सद्भिराचरितः सदा ।

यद् भार्यां परिरक्षन्ति भर्तारोऽल्पबला अपि ॥ ६८ ॥

सत्पुरुषोंद्वारा सदा आचरणमें लाया हुआ यह धर्मका सनातन मार्ग है कि निर्बल पति भी अपनी पत्नीकी रक्षा करते हैं ॥ ६८ ॥

भार्यायां रक्ष्यमाणायां प्रजा भवति रक्षिता ।

प्रजायां रक्ष्यमाणायामात्मा भवति रक्षितः ॥ ६ ९ ॥

पत्नीकी रक्षा करनेसे अपनी संतान सुरक्षित होती है और संतानकी रक्षा होनेपर अपने आत्माकी रक्षा होती है ॥ ६ ९ ॥

आत्मा हि जायते तस्यां तस्माज्जाया भवत्युत ।

भर्ता च भार्यया रक्ष्यः कथं जायान्ममोदरे ॥ ७० ॥

अपना आत्मा ही स्त्रीके गर्भसे जन्म लेता है; इसीलिये वह जाया कहलाती है । पत्नीको भी अपने पतिकी रक्षा इसीलिये करनी चाहिये कि यह किसी प्रकार मेरे उदरसे जन्म ग्रहण करे ॥ ७० ॥

नन्विमे शरणं प्राप्तं न त्यजन्ति कदाचन ।

ते मां शरणमापन्नां नान्वपद्यन्त पाण्डवाः ॥ ७१ ॥

ये अपनी शरणमें आनेपर कभी किसीका भी त्याग नहीं करते; किंतु इन्हीं पाण्डवोंने मुझ शरणागत अबलापर तनिक भी दया नहीं की ॥ ७१ ॥

पृष्ठ 128

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पञ्चभिः पतिभिर्जाताः कुमारा मे महौजसः ।

एतेषामप्यवेक्षार्थं त्रातव्यास्मि जनार्दन ॥ ७२ ॥

जनार्दन! इन पाँच पतियोंसे उत्पन्न हुए मेरे महाबली पाँच पुत्र हैं। उनकी देखभालके लिये भी मेरी रक्षा आवश्यक थी ॥ ७२ ॥

प्रतिविन्ध्यो युधिष्ठिरात् सुतसोमो वृकोदरात् ।

अर्जुनाच्छ्रुतकीर्तिश्च शतानीकस्तु नाकुलिः ॥ ७३ ॥

कनिष्ठाच्छ्रुतकर्मा च सर्वे सत्यपराक्रमाः ।

प्रद्युम्नो यादृशः कृष्ण तादृशास्ते महारथाः ॥ ७४ ॥

युधिष्ठिरसे प्रतिविन्ध्य, भीमसेनसे सुतसोम, अर्जुनसे श्रुतकीर्ति, नकुलसे शतानीक और छोटे पाण्डव सहदेवसे श्रुतकर्माका जन्म हुआ है । ये सभी कुमार सच्चे पराक्रमी हैं । श्रीकृष्ण! आपका पुत्र प्रद्युम्न जैसा शूरवीर है, वैसे ही वे मेरे महारथी पुत्र भी हैं ॥ ७३-७४ ॥

नन्विमे धनुषि श्रेष्ठा अजेया युधि शात्रवैः ।

किमर्थं धार्तराष्ट्राणां सहन्ते दुर्बलीयसाम् ॥ ७५ ॥

ये धनुर्विद्यामें श्रेष्ठ तथा शत्रुओंद्वारा युद्धमें अजेय हैं तो भी दुर्बल धृतराष्ट्र- पुत्रोंका अत्याचार कैसे सहन करते हैं? ॥ ७५ ॥

अधर्मेण हृतं राज्यं सर्वे दासाः कृतास्तथा ।

सभायां परिकृष्टाहमेकवस्त्रा रजस्वला ॥ ७६ ॥

अधर्मसे सारा राज्य हरण कर लिया गया, सब पाण्डव दास बना दिये गये और मैं एकवस्त्रधारिणी रजस्वला होनेपर भी सभामें घसीटकर लायी गयी ॥ ७६ ॥

नाधिज्यमपि यच्छक्यं कर्तुमन्येन गाण्डिवम् ।

अन्यत्रार्जुनभीमाभ्यां त्वया वा मधुसूदन ॥ ७७ ॥

मधुसूदन! अर्जुनके पास जो गाण्डीव धनुष है, उसपर अर्जुन, भीम अथवा आपके सिवा दूसरा कोई प्रत्यंचा भी नहीं चढ़ा सकता ( तो भी ये मेरी रक्षा न कर सके ) ॥ ७७ ॥

धिग् बलं भीमसेनस्य धिक् पार्थस्य च पौरुषम् ।

यत्र दुर्योधनः कृष्ण मुहूर्तमपि जीवति ॥ ७८ ॥

कृष्ण! भीमसेनके बलको धिक्कार है, अर्जुनके पुरुषार्थको भी धिक्कार है, जिसके होते हुए दुर्योधन इतना बड़ा अत्याचार करके दो घड़ी भी जीवित रह रहा है ॥ ७८ ॥

य एतानाक्षिपद् राष्ट्रात् सह मात्राविहिंसकान् ।

अधीयानान् पुरा बालान् व्रतस्थान् मधुसूदन ॥ ७९ ॥

मधुसूदन! पहले बाल्यावस्थामें, जब कि पाण्डव ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए अध्ययनमें लगे थे, किसीकी हिंसा नहीं करते थे, जिन दुष्टने इन्हें इनकी माताके साथ राज्यसे बाहर निकाल दिया था ॥ ७ ९ ॥

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भोजने भीमसेनस्य पापः प्राक्षेपयद् विषम् ।

कालकूटं नवं तीक्ष्णं सम्भूतं लोमहर्षणम् ॥ ८० ॥

जिस पापीने भीमसेनके भोजनमें नूतन, तीक्ष्ण, परिमाणमें अधिक एवं रोमांचकारी कालकूट नामक विष डलवा दिया था ॥ ८० ॥

तज्जीर्णमविकारेण सहान्नेन जनार्दन ।

सशेषत्वान्महाबाहो भीमस्य पुरुषोत्तम ॥ ८१ ॥

महाबाहु नरश्रेष्ठ जनार्दन! भीमसेनकी आयु शेष थी, इसीलिये वह घातक विष अन्नके साथ ही पच गया और उसने कोई विकार नहीं उत्पन्न किया ( इस प्रकार उस दुर्योधनके अत्याचारोंको कहाँतक गिनाया जाय ) ॥ ८१ ॥

प्रमाणकोट्यां विश्वस्तं तथा सुप्तं वृकोदरम् ।

बद्ध्वैनं कृष्ण गङ्गायां प्रक्षिप्य पुरमाव्रजत् ॥ ८२ ॥

श्रीकृष्ण! प्रमाणकोटितीर्थमें, जब भीमसेन विश्वस्त होकर सो रहे थे, उस समय दुर्योधनने इन्हें बाँधकर गंगामें फेंक दिया और स्वयं चुपचाप राजधानीमें लौट आया ॥ ८२ ॥

यदा विबुद्धः कौन्तेयस्तदा संच्छिद्य बन्धनम् ।

उदतिष्ठन्महाबाहुर्भीमसेनो महाबलः ॥ ८३ ॥

जब इनकी आँख खुली तो ये महाबली महाबाहु भीमसेन सारे बन्धनोंको तोड़कर जलसे ऊपर उठे ॥ ८३ ॥

आशीविषैः कृष्णसर्पैर्भीमसेनमदंशयत् ।

सर्वेष्वेवाङ्गदेशेषु न ममार च शत्रुहा ॥ ८४ ॥

इनके सारे अंगोंमें विषैले काले सर्पोंसे डँसवाया; परंतु शत्रुहन्ता भीमसेन मर न सके ॥ ८४ ॥

प्रतिबुद्धस्तु कौन्तेयः सर्वान् सर्पानपोथयत् ।

सारथिं चास्य दयितमपहस्तेन जघ्निवान् ॥ ८५ ॥

जागनेपर कुन्तीनन्दन भीमने सब सर्पोंको उठा-उठाकर पटक दिया। दुर्योधनने भीमसेनके प्रिय सारथिको भी उलटे हाथसे मार डाला ॥ ८५ ॥

पुनः सुप्तानुपाधाक्षीद् बालकान् वारणावते ।

शयानानार्यया सार्धं को नु तत् कर्तुमर्हति ॥ ८६ ॥

इतना ही नहीं, वारणावतमें आर्या कुन्तीके साथमें ये बालक पाण्डव सो रहे थे, उस

समय उसने घरमें आग लगवा दी । ऐसा दुष्कर्म दूसरा कौन कर सकता है? ॥ ८६ ॥

यत्रार्या रुदती भीता पाण्डवानिदमब्रवीत् ।

महद् व्यसनमापन्ना शिखिना परिवारिता ॥ ८७ ॥

पृष्ठ 130

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 130 का मूल पृष्ठ
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उस समय वहाँ आर्या कुन्ती भयभीत हो रोती हुई पाण्डवोंसे इस प्रकार बोलीं – ' मैं बड़े भारी संकटमें पड़ी, आगसे घिर गयी ॥ ८७ ॥

हा हतास्मि कुतो न्वद्य भवेच्छान्तिरिहानलात् ।

अनाथा विनशिष्यामि बालकैः पुत्रकैः सह ॥ ८८ ॥

‘ हाय! हाय! मैं मारी गयी, अब इस आगसे कैसे शान्ति प्राप्त होगी? मैं अनाथकी तरह अपने बालक पुत्रोंके साथ नष्ट हो जाऊँगी' ॥ ८८ ॥

तत्र भीमो महाबाहुर्वायुवेगपराक्रमः ।

आर्यामाश्वासयामास भ्रातॄंश्चापि वृकोदरः ॥ ८ ९ ॥

वैनतेयो यथा पक्षी गरुत्मान् पततां वरः ।

तथैवाभिपतिष्यामि भयं वो नेह विद्यते ॥ ९ ० ॥

उस समय वहाँ वायुके समान वेग और पराक्रमवाले महाबाहु भीमसेनने आर्या कुन्ती तथा भाइयोंको आश्वासन देते हुए कहा- ' पक्षियोंमें श्रेष्ठ विनतानन्दन गरुड जैसे उड़ा करते हैं, उसी प्रकार मैं भी तुम सबको लेकर यहाँसे चल दूँगा । अतः तुम्हें यहाँ तनिक भी भय नहीं है ' ॥ ८ ९ - ९ ० ॥

आर्यामङ्केन वामेन राजानं दक्षिणेन च ।

अंसयोश्च यमौ कृत्वा पृष्ठे बीभत्सुमेव च ॥ ९ १ ॥

सहसोत्पत्य वेगेन सर्वानादाय वीर्यवान् ।

भ्रातॄनार्यां च बलवान् मोक्षयामास पावकात् ॥ ९ २ ॥

ऐसा कहकर पराक्रमी एवं बलवान् भीमने आर्या कुन्तीको बायें अंकमें, धर्मराजको दाहिने अंकमें, नकुल और सहदेवको दोनों कंधोंपर तथा अर्जुनको पीठपर चढ़ा लिया और सबको लिये - दिये सहसा वेगसे उछलकर इन्होंने उस भयंकर अग्निसे भाइयों तथा माताकी रक्षा की* ॥ ९ १ - ९ २ ॥

ते रात्रौ प्रस्थिताः सर्वे सह मात्रा यशस्विनः ।

अभ्यगच्छन्महारण्ये हिडिम्बवनमन्तिकात् ॥ ९ ३ ॥

फिर वे सब यशस्वी पाण्डव माताके साथ रातमें ही वहाँसे चल दिये और हिडिम्बवनके पास एक भारी वनमें जा पहुँचे ॥ ९ ३ ॥

श्रान्ताः प्रसुप्तास्तत्रेमे मात्रा सह सुदुःदुःखिताः ।

सुप्तांश्चैनानभ्यगच्छद्धिडिम्बा नाम राक्षसी ॥ ९ ४ ॥

वहाँ मातासहित ये दुःखी पाण्डव थककर सो गये । सो जानेपर इनके निकट हिडिम्बा नामक राक्षसी आयी ॥ ९ ४ ॥

सा दृष्ट्वा पाण्डवांस्तत्र सुप्तान् मात्रा सह क्षितौ ।

हृच्छयेनाभिभूतात्मा भीमसेनमकामयत् ॥ ९ ५ ॥