श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1201–1210
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1201–1210
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चकोरैरुपचक्रैश्च पक्षिभिर्जीवजीवकैः कोकिलैर्भृङ्गराजैश्च तत्र तत्र निनादितान् ॥ ७ ॥
वहाँ भिन्न - भिन्न स्थानोंमें चकोर, उपचक्र, जीव -जीवक, कोकिल और भृंगराज आदि पक्षी कलरव करते थे ॥ ७ ॥
नित्यपुष्पफलैर्वक्षैर्हिमसंस्पर्शकोमलैः उपेतान् बहुलच्छायैर्मनोनयननन्दनैः ॥ ८ ॥
वहाँके वृक्ष सदा फूल और फल देते थे । हिमके स्पर्शसे उनमें कोमलता आ गयी थी । उनकी छाया बहुत घनी थी और वे दर्शनमात्रसे मन एवं नेत्रोंको आनन्द प्रदान करते थे ॥ ८ ॥
स सम्पश्यन् गिरिनदीर्वैदूर्यमणिसंनिभैः सलिलैर्हिमसंकाशैर्हंसकारण्डवायुतैः ॥ ९ ॥
उन वृक्षोंसे सुशोभित प्रदेशों तथा वैदूर्यमणिके समान रंगवाले, हिमसदृश स्वच्छ,
शीतल सलिल - समूहसे संयुक्त पर्वतीय नदियोंकी शोभा निहारते हुए वे सब ओर घूमते थे ।
नदियोंकी उस जलराशिमें हंस और कारण्डव आदि सहस्रों पक्षी किलोलें करते थे ॥
वनानि देवदारूणां मेघानामिव वागुराः हरिचन्दनमिश्राणि तुङ्गकालीयकान्यपि ॥ १० ॥
हरिचन्दन, तुंग और कालीयक आदि वृक्षोंसे युक्त ऊँचे -ऊँचे देवदारुके वन ऐसे जान पड़ते थे मानो बादलोंको फँसानेके लिये फंदे हों ॥ १० ॥
मृगयां परिधावन् स समेषु मरुधन्वसु विध्यन् मृगान् शरैः शुद्धैश्चचार स महाबलः ॥ ११ ॥
महाबली भीम सारे मरु प्रदेशमें शिकारके लिये दौड़ते और केवल बाणोंद्वारा हिंसक पशुओंको घायल करते हुए विचरा करते थे ॥ ११ ॥
भीमसेनस्तु विख्यातो महान्तं दंष्ट्रिणं बलात् निघ्नन् नागशतप्राणो वने तस्मिन् महाबलः ॥ १२ ॥
भीमसेन अपने महान् बलके लिये विख्यात थे । उनमें सैकड़ों हाथियोंकी शक्ति थी । वे उस वनमें विकराल दाढ़ोंवाले बड़े - से - बड़े सिंहको भी पछाड़ देते थे ॥ १२ ॥
मृगाणां स वराहाणां महिषाणां महाभुजः विनिघ्नंस्तत्र तत्रैव भीमो भीमपराक्रमः ॥ १३ ॥
भीमसेनका पराक्रम भी उनके नामके अनुसार ही भयानक था । उनकी भुजाएँ विशाल थीं । वे मृगयामें प्रवृत्त होकर जहाँ- तहाँ हिंसक पशुओं, वराहों और भैंसोंको भी मारा करते थे ॥ १३ ॥
स मातङ्गशतप्राणो मनुष्यशतवारणः सिंहशार्दूलविक्रान्तो वने तस्मिन् महाबलः ॥ १४ ॥
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वृक्षानुत्पाटयामास तरसा वै बभञ्ज च पृथिव्याश्च प्रदेशान् वै नादयंस्तु वनानि च ॥ १५ ॥
उनमें सैकड़ों मतवाले गजराजोंके समान बल था । वे एक साथ सौ - सौ मनुष्योंका वेग रोक सकते थे । उनका पराक्रम सिंह और शार्दूलके समान था महाबली भीम उस वनमें वृक्षोंको उखाड़ते और उन्हें वेगपूर्वक पुनः तोड़ डालते थे । वे अपनी गर्जनासे उस वन्य भूमिके प्रदेशों तथा समूचे वनको गुँजाते रहते थे ॥ १४-१५ ॥ पर्वताग्राणि वै मृद्नन् नादयानश्च विज्वरः प्रक्षिपन् पादपांश्चापि नादेनापूरयन् महीम् ॥ १६ ॥
वे पर्वतशिखरोंको रौंदते, वृक्षोंको तोड़कर इधर- उधर बिखेरते और निश्चिन्त होकर अपने सिंहनादसे भूमण्डलको प्रतिध्वनित किया करते थे ॥ १६ ॥
वेगेन न्यपतद् भीमो निर्भयश्च पुनः पुनः आस्फोटयन् क्ष्वेडयंश्च तलतालांश्च वादयन् ॥ १७ ॥
वे निर्भय होकर बार- बार वेगपूर्वक कूदते - फाँदते, ताल ठोंकते, सिंहनाद करते और तालियाँ बजाते थे ॥ १७ ॥
चिरसम्बद्धदर्पस्तु भीमसेनो वने तदा गजेन्द्राश्च महासत्त्वा मृगेन्द्राश्च महाबलाः ॥ १८ ॥
भीमसेनस्य नादेन व्यमुञ्जन्त गुहा भयात् वनमें घूमते हुए भीमसेनका बलाभिमान दीर्घकालसे बहुत बढ़ा हुआ था । उस समय उनकी सिंह - गर्जनासे महान् बलशाली गजराज और मृगराज भी भयसे अपना स्थान छोड़कर भाग गये ॥ १८३ ॥
क्वचित् प्रधावंस्तिष्ठंश्च क्वचिच्चोपविशंस्तथा ॥ १ ९ ॥ मृगप्रेप्सुर्महारौद्रे वने चरति निर्भयः स तत्र मनुजव्याघ्रो वने वनचरोपमः ॥ २० ॥
पद्भ्यामभिसमापेदे भीमसेनो महाबलः स प्रविष्टो महारण्ये नादान् नदति चाद्भुतान् ॥ २१ ॥
त्रासयन् सर्वभूतानि महासत्त्वपराक्रमः वे कहीं दौड़ते, कहीं खड़े होते और कहीं बैठते हुए शिकार पानेकी अभिलाषासे उस महाभयंकर वनमें निर्भय विचरते रहते थे । वे नरश्रेष्ठ महाबली भीम उस वनमें वनचर भीलोंकी भाँति पैदल ही चलते थे, उनका साहस और पराक्रम महान् था । वे गहन वनमें प्रवेश करके समस्त प्राणियोंको डराते हुए अद्भुत गर्जना करते थे ॥ १ ९ –२१३ ॥ ततो भीमस्य शब्देन भीताः सर्पा गुहाशयाः ॥ २२ ॥
अतिक्रान्तास्तु वेगेन जगामानुसृतः शनैः ततोऽमरवरप्रख्यो भीमसेनो महाबलः ॥ २३ ॥
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स ददर्श महाकायं भुजङ्गं लोमहर्षणम् गिरिदुर्गे समापन्नं कायेनावृत्य कन्दरम् ॥ २४ ॥
तदनन्तर एक दिनकी बात है, भीमसेनके सिंहनादसे भयभीत हो गुफाओंमें रहनेवाले सारे सर्प बड़े वेगसे भागने लगे और भीमसेन धीरे- धीरे उन्हींका पीछा करने लगे । श्रेष्ठ देवताओंके समान कान्तिमान् महाबली भीमसेनने आगे जाकर एक विशालकाय अजगर देखा, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था । वह अपने शरीरसे एक ( विशाल) कन्दराको घेरकर पर्वतके एक दुर्गम स्थानमें रहता था ॥ २२–२४ ॥ पर्वताभोगवर्ष्माणमतिकायं महाबलम् चित्राङ्गमङ्गजैश्चित्रैर्हरिद्रासदृशच्छविम् ॥ २५ ॥
गुहाकारेण वक्त्रेण चतुर्दंष्ट्रेण राजता दीप्ताक्षेणातिताम्रेण लिहानं सृक्किणी मुहुः ॥ २६ ॥
त्रासनं सर्वभूतानां कालान्तकयमोपमम् निःश्वासक्ष्वेडनादेन भर्त्सयन्तमिव स्थितम् ॥ २७ ॥
उसका शरीर पर्वतके समान विशाल था । वह महाकाय होनेके साथ ही अत्यन्त बलवान् भी था । उसका प्रत्येक अंग शारीरिक विचित्र चिह्नोंसे चिह्नित होनेके कारण विचित्र दिखायी देता था । उसका रंग हल्दीके समान पीला था । प्रकाशमान चारों दाढ़ोंसे युक्त उसका मुख गुफा- सा जान पड़ता था । उसकी आँखें अत्यन्त लाल और आग उगलती - सी प्रतीत होती थीं । वह बार- बार अपने दोनों गलफरोंको चाट रहा था । कालान्तक तथा यमके समान समस्त प्राणियोंको भयभीत करनेवाला वह भयानक भुजंग अपने उच्छ्वास और सिंहनादसे दूसरोंकी भर्त्सना करता- सा प्रतीत होता था ॥ २५–२७ ॥ स भीमं सहसाभ्येत्य पृदाकुः कुपितो भृशम् जग्राहाजगरो ग्राहो भुजयोरुभयोर्बलात् ॥ २८ ॥
वह अजगर अत्यन्त क्रोधमें भरा हुआ था । ( मनुष्योंको ) जकड़नेवाले उस सर्पने सहसा भीमसेनके निकट पहुँचकर उनकी दोनों बाँहोंको बलपूर्वक जकड़ लिया ॥ २८ ॥
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तेन संस्पृष्टगात्रस्य भीमसेनस्य वै तदा संज्ञा मुमोह सहसा वरदानेन तस्य हि ॥ २९ ॥
उस समय भीमसेनके शरीरका उससे स्पर्श होते ही वे भीमसेन सहसा अचेत हो गये ।
ऐसा इसलिये हुआ कि उस सर्पको वैसा ही वरदान मिला था ॥ २ ९ ॥
दशनागसहस्राणि धारयन्ति हि यद् बलम् तद् बलं भीमसेनस्य भुजयोरसमं परैः ॥ ३० ॥
दस हजार गजराज जितना बल धारण करते हैं, उतना ही बल भीमसेनकी भुजाओंमें विद्यमान था । उनके बलकी और कहीं समता नहीं थी ॥ ३० ॥
स तेजस्वी तथा तेन भुजगेन वशीकृतः विस्फुरन् शनकैर्भीमो न शशाक विचेष्टितुम् ॥ ३१ ॥
ऐसे तेजस्वी भीम भी उस अजगरके वशमें पड़ गये । वे धीरे- धीरे छटपटाते रहे, परंतु छूटनेकी अधिक चेष्टा करनेमें सफल न हो सके ॥ ३१ ॥
नागायुतसमप्राणः सिंहस्कन्धो महाभुजः गृहीतो व्यजहात् सत्त्वं वरदानविमोहितः ॥ ३२ ॥
उनकी प्राणशक्ति दस सहस्र हाथियोंके समान थी । दोनों कंधे सिंहके कंधोंके समान थे और भुजाएँ बहुत बड़ी थीं । फिर भी सर्पको मिले हुए वरदानके प्रभावसे मोहित हो जानेके कारण सर्पकी पकड़में आकर वे अपना साहस खो बैठे ॥ ३२ ॥
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स हि प्रयत्नमकरोत् तीव्रमात्मविमोक्षणे न चैनमशकद् वीरः कथंचित् प्रतिबाधितुम् ॥ ३३ ॥
उन्होंने अपनेको छुड़ानेके लिये घोर प्रयत्न किया, किंतु वीरवर भीमसेन किसी प्रकार भी उस सर्पको पराजित करनेमें सफलता नहीं प्राप्त कर सके ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आजगरपर्वणि अजगरग्रहणे अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत आजगरपर्वमें भीमसेनका अजगरद्वारा ग्रहणसम्बन्धी एक सौ अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७८ ॥
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एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः भीमसेन और सर्परूपधारी नहुषकी बातचीत, भीमसेनकी चिन्ता तथा युधिष्ठिरद्वारा भीमकी खोज वैशम्पायन उवाच स भीमसेनस्तेजस्वी तथा सर्पवशं गतः चिन्तयामास सर्पस्य वीर्यमत्यद्भुतं महत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! इस प्रकार सर्पके वशमें पड़े हुए वे तेजस्वी भीमसेन उस अजगरकी अत्यन्त अद्भुत शक्तिके विषयमें विचार करने लग गये ॥ १ ॥
उवाच च महासर्पं कामया ब्रूहि पन्नग कस्त्वं भो भुजगश्रेष्ठ किं मया च करिष्यसि ॥ २ ॥
पाण्डवो भीमसेनोऽहं धर्मराजादनन्तरः नागायुतसमप्राणस्त्वया नीतः कथं वशम् ॥ ३ ॥
सिंहाः केसरिणो व्याघ्रा महिषा वारणास्तथा समागताश्च शतशो निहताश्च मया युधि ॥ ४ ॥
राक्षसाश्च पिशाचाश्च पन्नगाश्च महाबलाः भुजवेगमशक्ता मे सोढुं पन्नगसत्तम ॥ ५ ॥
किं नु विद्याबलं किं नु वरदानमथो तव उद्योगमपि कुर्वाणो वशगोऽस्मि कृतस्त्वया ॥ ६ ॥
असत्यो विक्रमो नृणामिति मे धीयते मतिः यथेदं मे त्वया नाग बलं प्रतिहतं महत् ॥ ७ ॥
फिर उन्होंने उस महान् सर्पसे कहा– ' भुजंगप्रवर! आप स्वेच्छापूर्वक बताइये । आप कौन हैं? और मुझे पकड़कर क्या करेंगे? मैं धर्मराज युधिष्ठिरका छोटा भाई पाण्डुपुत्र भीमसेन हूँ । मुझमें दस हजार हाथियोंका बल है, फिर भी न जाने कैसे आपने मुझे अपने वशमें कर लिया? मेरे सामने सैकड़ों केसरी, सिंह, व्याघ्र, महिष और गजराज आये, किंतु मैंने सबको युद्धमें मार गिराया । पन्नगश्रेष्ठ! राक्षस, पिशाच और महाबली नाग भी मेरी ( इन ) भुजाओंका वेग नहीं सह सकते थे । परंतु छूटनेके लिये मेरे उद्योग करनेपर भी आपने मुझे वशमें कर लिया, इसका क्या कारण है? क्या आपमें किसी विद्याका बल है अथवा आपको कोई अद्भुत वरदान मिला है? नागराज! आज मेरी बुद्धिमें यही सिद्धान्त स्थिर हो रहा है कि मनुष्योंका पराक्रम झूठा है । जैसा कि इस समय आपने मेरे इस महान् बलको कुण्ठित कर दिया है ' ॥ २–७ ॥
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वैशम्पायन उवाच इत्येवंवादिनं वीर भीममक्लिष्टकारिणम् भोगेन महता गृह्य समन्तात् पर्यवेष्टयत् ॥ ८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! ऐसी बातें करनेवाले वीरवर भीमसेनको, जो अनायास ही महान् पराक्रम कर दिखानेवाले थे, उस अजगरने अपने विशाल शरीरसे जकड़कर चारों ओरसे लपेट लिया ॥ ८ ॥
निगृह्यैनं महाबाहुं ततः स भुजगस्तदा विमुच्यास्य भुजौ पीनाविदं वचनमब्रवीत् ॥ ९ ॥
तब इस प्रकार महाबाहु भीमसेनको अपने वशमें करके उस भुजंगमने उनकी दोनों मोटी- मोटी भुजाओंको छोड़ दिया और इस प्रकार कहा— ॥ ९ ॥
दिष्टस्त्वं क्षुधितस्याद्य देवैर्भक्षो महाभुज दिष्ट्या कालस्य महतः प्रियाः प्राणा हि देहिनाम् ॥ १० ॥
‘ महाबाहो! मैं दीर्घकालसे भूखा बैठा था, आज सौभाग्यवश देवताओंने तुम्हें ही मेरे लिये भोजनके रूपमें भेज दिया है । सभी देहधारियोंको अपने - अपने प्राण प्रिय होते हैं ॥ १० ॥
यथा त्विदं मया प्राप्तं सर्परूपमरिंदम तथावश्यं मया ख्याप्यं तवाद्य शृणु सत्तम ॥ ११ ॥
' शत्रुदमन! जिस प्रकार मुझे यह सर्पका शरीर प्राप्त हुआ है, वह आज अवश्य तुमसे बतलाना है । सज्जनशिरोमणे! तुम ध्यान देकर सुनो ॥ ११ ॥
इमामवस्थां सम्प्राप्तो ह्यहं कोपान्मनीषिणाम् शापस्यान्तं परिप्रेप्सुः सर्वं तत् कथयामि ते ॥ १२ ॥
' मैं मनीषी महात्माओंके कोपसे इस दुर्दशाको प्राप्त हुआ हूँ और इस शापके निवारणकी प्रतीक्षा करते हुए यहाँ रहता हूँ। शापका क्या कारण है? यह सब तुमसे कहता हूँ, सुनो ॥ १२ ॥
नहुषो नाम राजर्षिर्व्यक्तं ते श्रोत्रमागतः तवैव पूर्वः पूर्वेषामायोर्वंशधरः सुतः ॥ १३ ॥
' मैं राजर्षि नहुष हूँ, अवश्य ही यह मेरा नाम तुम्हारे कानोंमें पड़ा होगा । मैं तुम्हारे
पूर्वजोंका भी पूर्वज हूँ । महाराज आयुका वंशप्रवर्तक पुत्र हूँ ॥ १३ ॥
सोऽहं शापादगस्त्यस्थ ब्राह्मणानवमन्य च इमामवस्थामापन्नः पश्य दैवमिदं मम ॥ १४ ॥
‘ मैं ब्राह्मणोंका अनादर करके महर्षि अगस्त्यके शापसे इस अवस्थाको प्राप्त हुआ हूँ । मेरे इस दुर्भाग्यको अपने आँखों देख लो ॥ १४ ॥
त्वां चेदवध्यं दायादमतीव प्रियदर्शनम्
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अहमद्योपयोक्ष्यामि विधानं पश्य यादृशम् ॥ १५ ॥
' तुम यद्यपि अवध्य हो; क्योंकि मेरे ही वंशज हो । देखनेमें अत्यन्त प्रिय लगते हो
तथापि आज तुम्हें अपना आहार बनाऊँगा । देखो, विधाताका कैसा विधान है? ॥ १५ ॥
न हि मे मुच्यते कश्चित् कथंचित् प्रग्रहं गतः गजो वा महिषो वापि षष्ठे काले नरोत्तम ॥ १६ ॥
'नरश्रेष्ठ! दिनके छठे भागमें कोई भैंसा अथवा हाथी ही क्यों न हो, मेरी पकड़में आ जानेपर किसी तरह छूट नहीं सकता ॥ १६ ॥
नासि केवलसर्पेण तिर्यग्योनिषु वर्तता गृहीतः कौरवश्रेष्ठ वरदानमिदं मम ॥ १७ ॥
‘ कौरवश्रेष्ठ! तुम तिर्यग् योनिमें पड़े हुए किसी साधारण सर्पकी पकड़में नहीं आये हो । किंतु मुझे ऐसा ही वरदान मिला है ( इसीलिये मैं तुम्हें पकड़ सका हूँ) ॥ पतता हि विमानाग्रयान्मया शक्रासनाद् द्रुतम् कुरु शापान्तमित्युक्तो भगवान् मुनिसत्तमः ॥ १८ ॥
‘ जब मैं इन्द्रके सिंहासनसे भ्रष्ट हो शीघ्रतापूर्वक श्रेष्ठ विमानसे नीचे गिरने लगा, उस समय मैंने मुनिश्रेष्ठ भगवान् अगस्त्यसे प्रार्थना की कि प्रभो! मेरे शापका अन्त नियत कर दीजिये ॥ १८ ॥
स मामुवाच तेजस्वी कृपयाभिपरिप्लुतः मोक्षस्ते भविता राजन् कस्माच्चित् कालपर्ययात् ॥ १ ९ ॥ ‘ उस समय उन तेजस्वी महर्षिने दयासे द्रवित होकर मुझसे कहा — ' राजन्! कुछ कालके पश्चात् तुम इस शापसे मुक्त हो जाओगे ' ॥ १ ९ ॥ ततोऽस्मि पतितो भूमौ न च मामजहात् स्मृतिः स्मार्तमस्ति पुराणं मे यथैवाधिगतं तथा ॥ २० ॥
‘ उनके इतना कहते ही मैं पृथ्वीपर गिर पड़ा । परंतु आज भी वह पुरानी स्मरण- शक्ति मुझे छोड़ नहीं सकी है । यद्यपि यह वृत्तान्त बहुत पुराना हो चुका है तथापि जो कुछ जैसे हुआ था; वह सब मुझे ज्यों- का- त्यों स्मरण है ॥ २० ॥
यस्तु तेते व्याहृतान् प्रश्नान् प्रतिब्रूयाद् विभागवित् ।
स त्वां मोक्षयिता शापादिति मामब्रवीदृषिः ॥ २१ ॥
‘ महर्षिने मुझसे कहा था कि ' जो तुम्हारे पूछे हुए प्रश्नोंका विभागपूर्वक उत्तर दे दे, वही तुम्हें शापसे छुड़ा सकता है ॥ २१ ॥
गृहीतस्य त्वया राजन् प्राणिनोऽपि बलीयसः सत्त्वभ्रंशोऽधिकस्यापि सर्वस्याशु भविष्यति ॥ २२ ॥
‘ राजन्! जिसे तुम पकड़ लोगे, वह बलवान् - से - बलवान् प्राणी क्यों न हो, उसका भी धैर्य छूट जायगा । एवं तुमसे अधिक शक्तिशाली पुरुष क्यों न हो, सबका साहस शीघ्र ही
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खो जायगा ' ॥ २२ ॥
इति चाप्यहमश्रौषं वचस्तेषां दयावताम् मयि संजातहार्दानामथ तेऽन्तर्हिता द्विजाः ॥ २३ ॥
इस प्रकार मेरे प्रति हार्दिक दयाभाव उत्पन्न हो जानेके कारण उन दयालु महर्षियोंने जो बात कही थी, वह भी मैंने स्पष्ट सुनी । तत्पश्चात् वे सारे ब्रह्मर्षि अन्तर्धान हो गये ॥ २३ ॥
सोऽहं परमदुष्कर्मा वसामि निरयेऽशुचौ सर्पयोनिमिमां प्राप्य कालाकाङ्क्षी महाद्युते ॥ २४ ॥
महाद्युते! इस प्रकार मैं अत्यन्त दुष्कर्मी होनेके कारण इस अपवित्र नरकमें निवास करता हूँ। इस सर्पयोनिमें पड़कर इससे छूटनेके अवसरकी प्रतीक्षा करता हूँ' ॥ २४ ॥
तमुवाच महाबाहुर्भीमसेनो भुजङ्गमम् न च कुप्ये महासर्प न चात्मानं विगर्हये ॥ २५ ॥
तब महाबाहु भीमने उस अजगरसे कहा -' महासर्प! न तो मैं आपपर क्रोध करता हूँ और न अपनी ही निन्दा करता हूँ ॥ २५ ॥
यस्मादभावी भावी वा मनुष्यः सुखदुःखयोः आगमे यदि वापाये न तत्र ग्लपयेन्मनः ॥ २६ ॥
' क्योंकि मनुष्य सुख- दुःखकी प्राप्ति अथवा निवृतिमें कभी असमर्थ होता है और कभी समर्थ । अतः किसी भी दशामें अपने मनमें ग्लानि नहीं आने देनी चाहिये ॥ २६ ॥
दैवं पुरुषकारेण को वञ्चयितुमर्हति दैवमेव परं मन्ये पुरुषार्थो निरर्थकः ॥ २७ ॥
'कौन ऐसा मनुष्य है, जो पुरुषार्थके बलसे दैवको वंचित कर सके । मैं तो दैवको ही बड़ा मानता हूँ, पुरुषार्थ व्यर्थ है ॥ २७ ॥
पश्य दैवोपघाताद्धि भुजवीर्यव्यपाश्रयम् इमामवस्थां सम्प्राप्तमनिमित्तमिहाद्य माम् ॥ २८ ॥
‘ देखिये, दैवके आघातसे आज मैं अकारण ही यहाँ इस दशाको प्राप्त हो गया हूँ । नहीं तो मुझे अपने बाहुबलका बड़ा भरोसा था ॥ २८ ॥
किंतु नाद्यानुशोचामि तथाऽऽत्मानं विनाशितम् यथा तु विपिने न्यस्तान् भ्रातॄन् राज्यपरिच्युतान् ॥ २ ९ ॥ ‘ परंतु आज मैं अपनी मृत्युके लिये उतना शोक नहीं करता हूँ, जितना कि राज्यसे वंचित हो वनमें पड़े हुए अपने भाइयोंके लिये मुझे शोक हो रहा है ॥ २ ९ ॥ हिमवांश्च सुदुर्गोऽयं यक्षराक्षससंकुलः मां समुद्वीक्षमाणास्ते प्रपतिष्यन्ति विह्वलाः ॥ ३० ॥
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‘ यक्षों तथा राक्षसोंसे भरा हुआ यह हिमालय अत्यन्त दुर्गम है, मेरे भाई व्याकुल होकर जब मुझे खोजेंगे, तब अवश्य कहीं खंदकमें गिर पड़ेंगे ॥ ३० ॥
विनष्टमथ मां श्रुत्व भविष्यन्ति निरुद्यमाः धर्मशीला मया ते हि बाध्यन्ते राज्यगृद्धिना ॥ ३१ ॥
'मेरी मृत्यु हुई सुनकर वे राज्य -प्राप्तिका सारा उद्योग छोड़ बैठेंगे । मेरे सभी भाई स्वभावतः धर्मात्मा हैं । मैं ही राज्यके लोभसे उन्हें युद्धके लिये बाध्य करता रहता हूँ ॥ ३१ ॥
अथवा नार्जुनो धीमान् विषादमुपयास्यति सर्वास्त्रविदनाधृष्यो देवगन्धर्वराक्षसैः ॥ ३२ ॥
‘ अथवा बुद्धिमान् अर्जुन विषादमें नहीं पड़ेंगे; क्योंकि वे सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता हैं । देवता, गन्धर्व तथा राक्षस भी उन्हें पराजित नहीं कर सकते ॥ ३२ ॥
समर्थः स महाबाहुरेकोऽपि सुमहाबलः देवराजमपि स्थानात् प्रच्यावयितुमञ्जसा ॥ ३३ ॥
' महाबली महाबाहु अर्जुन अकेले ही देवराज इन्द्रको भी अनायास ही अपने स्थानसे हटा देनेमें समर्थ हैं ॥ ३३ ॥
किं पुनर्धृतराष्ट्रस्य पुत्रं दुर्द्यूतदेविनम् विद्विष्टं सर्वलोकस्य दम्भमोहपरायणम् ॥ ३४ ॥
'फिर उस धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको जीतना उनके लिये कौन बड़ी बात है, जो कपटद्यूतका सेवन करनेवाला, लोकद्रोही, दम्भी तथा मोहमें डूबा हुआ है ॥ मातरं चैव शोचामि कृपणां पुत्रगृद्धिनीम् यास्माकं नित्यमाशास्ते महत्त्वमधिकं परैः ॥ ३५ ॥
‘ मैं पुत्रोंके प्रति स्नेह रखनेवाली अपनी उस दीन माताके लिये शोक करता हूँ, जो सदा यह आशा रखती है कि हम सभी भाइयोंका महत्त्व शत्रुओंसे बढ़- चढ़कर हो ॥ ३५ ॥
तस्याः कथं त्वनाथाया मद्विनाशाद् भुजङ्गम सफलास्ते भविष्यन्ति मयि सर्वे मनोरथाः ॥ ३६ ॥
‘ भुजंगम! मेरे मरनेसे मेरी अनाथ माताके वे सभी मनोरथ जो मुझपर अवलम्बित थे, कैसे सफल हो सकेंगे? ॥ ३६ ॥
नकुलः सहदेवश्च यमौ च गुरुवर्तिनौ मद्बाहुबलसंगुप्तौ नित्यं पुरुषमानिनौ ॥ ३७ ॥
'एक साथ जन्म लेनेवाले नकुल और सहदेव सदा गुरुजनोंकी आज्ञाके पालनमें लगे रहते हैं । मेरे बाहुबलसे सुरक्षित हो वे दोनों भाई सर्वदा अपने पौरुषपर अभिमान रखते ॥ ३७ ॥
भविष्यतो निरुत्साहौ भ्रष्टवीर्यपराक्रमौ