श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1211–1220
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1211–1220
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मद्विनाशात् परिद्यूनाविति मे वर्तते मतिः ॥ ३८ ॥
‘ वे मेरे विनाशसे उत्साहशून्य हो जायँगे, अपने बल और पराक्रम खो बैठेंगे और सर्वथा शक्तिहीन हो जायँगे, ऐसा मेरा विश्वास है ' ॥ ३८ ॥
एवंविधं बहु तदा विललाप वृकोदरः भुजङ्गभोगसंरुद्धो नाशकच्च विचेष्टितुम् ॥ ३ ९ ॥ जनमेजय! उस समय भीमसेनने इस तरहकी बहुत - सी बातें कहकर देरतक विलाप किया । वे सर्पके शरीरसे इस प्रकार जकड़ गये थे कि हिल- डुल भी नहीं सकते थे ॥ ३ ९ ॥
युधिष्ठिरस्तु कौन्तेयो बभूवास्वस्थचेतनः ।
अनिष्टदर्शनान् घोरानुत्पातान् परिचिन्तयन् ॥ ४० ॥
उधर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर अनिष्टसूचक भयंकर उत्पातोंको देखकर बड़ी चिन्तामें पड़े । वे व्याकुल हो गये ॥ ४० ॥
दारुणं ह्यशिवं नादं शिवा दक्षिणतः स्थिता ।
दीप्तायां दिशि वित्रस्ता रौति तस्याश्रमस्य ह ॥ ४१ ॥
उनके आश्रमसे दक्षिण दिशामें, जहाँ आग लगी हुई थी, एक डरी हुई सियारिन खड़ी हो दारुण अमंगलसूचक आर्तनाद करने लगी ॥ ४१ ॥
एकपक्षाक्षिचरणा वर्तिका घोरदर्शना ।
रक्तं वमन्ती ददृशे प्रत्यादित्यमभासुरा ॥ ४२ ॥
एक पाँख, एक आँख तथा एक पैरवाली भयंकर और मलिन वर्तिका ( बटेर चिड़िया ) सूर्यकी ओर रक्त उगलती हुई दिखायी दी ॥ ४२ ॥
प्रववौ चानिलो रूक्षश्चण्डः शर्करकर्षणः ।
अपसव्यानि सर्वाणि मृगपक्षिरुतानि च ॥ ४३ ॥
उस समय कंकड़ बरसानेवाली रूखी और प्रचण्ड वायु बह रही थी और पशु- पक्षियोंके सम्पूर्ण शब्द दाहिनी ओर हो रहे थे ॥ ४३ ॥
पृष्ठतो वायसः कृष्णो याहि याहीति शंसति ।
मुहुर्मुहुः स्फुरति च दक्षिणोऽस्य भुजस्तथा ॥ ४४ ॥
पीछेकी ओरसे काला कौवा ' जाओ-जाओ ' की रट लगा रहा था और उनकी दाहिनी बाँह बार- बार फड़क उठती थी ॥ ४४ ॥
हृदयं चरणश्चापि वामो s स्य परितप्यति ।
सव्यस्याक्ष्णो विकारश्चाप्यनिष्टः समपद्यत ॥ ४५ ॥
उनके हृदय तथा बायें पैरमें पीड़ा होने लगी । बायीं आँखमें अनिष्टसूचक विकार उत्पन्न हो गया ॥ ४५ ॥
धर्मराजोऽपि मेधावी मन्यमानो महद् भयम् ।
द्रौपदीं परिपप्रच्छ क्व भीम इति भारत ॥ ४६ ॥
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भारत! परम बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरने भी अपने मनमें महान् भय मानते हुए द्रौपदीसे पूछा— ' भीमसेन कहाँ है? ' ॥ ४६ ॥
शशंस तस्मै पाञ्चाली चिरयातं वृकोदरम् ।
स प्रतस्थे महाबाहुर्धौम्येन सहितो नृपः ॥ ४७ ॥
- द्रौपदीने उत्तर दिया—' उनको यहाँसे गये बहुत देर हो गयी' – यह सुनकर महाबाहु महाराज युधिष्ठिर महर्षि धौम्यके साथ उनकी खोजके लिये चल दिये ॥ ४७ ॥
द्रौपद्या रक्षणं कार्यमित्युवाच धनंजयम् ।
नकुलं सहदेवं च व्यादिदेश द्विजान् प्रति ॥ ४८ ॥
जाते समय उन्होंने अर्जुनसे कहा– 'द्रौपदीकी रक्षा करना । ' फिर उन्होंने नकुल और सहदेवको ब्राह्मणोंकी रक्षा एवं सेवाके लिये आज्ञा दी ॥ ४८ ॥
स तस्य पदमुन्नीय तस्मादेवाश्रमात् प्रभुः ।
मृगयामास कौन्तेयो भीमसेनं महावने ॥ ४ ९ ॥
शक्तिशाली कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने उस महान् वनमें भीमसेनके पदचिह्न देखते हुए उस आश्रमसे निकलकर सब ओर खोजा ॥ ४ ९ ॥
स प्राचीं दिशमास्थाय महतो गजयूथपान् ।
ददर्श पृथिवीं चिह्वैर्भीमस्य परिचिह्निताम् ॥ ५० ॥
पहले पूर्व दिशामें जाकर हाथियोंके बड़े- बड़े यूथपतियोंको देखा। वहाँकी भूमि भीमसेनके पद - चिह्नोंसे चिह्नित थी ॥ ५० ॥
ततो मृगसहस्राणि मृगेन्द्राणां शतानि च ।
पतितानि वने दृष्ट्वा मार्गं तस्याविशन्नृपः ॥ ५१ ॥
वहाँसे आगे बढ़नेपर उन्होंने वनमें सैकड़ों सिंह और हजारों अन्य हिंसक पशु पृथ्वीपर पड़े देखे । देखकर भीमसेनके मार्गका अनुसरण करते हुए राजाने उसी वनमें प्रवेश किया ॥ ५१ ॥
धावतस्तस्य वीरस्य मृगार्थं वातरंहसः ।
ऊरुवातविनिर्भग्ना द्रुमा व्यावर्जिताः पथि ॥ ५२ ॥
वायुके समान वेगशाली वीरवर भीमसेनके शिकारके लिये दौड़नेपर मार्गमें उनकी जाँघोंके आघातसे टूटकर पड़े हुए बहुत - से वृक्ष दिखायी दिये ॥ ५२ ॥
स गत्वा तैस्तदा चिह्नैर्ददर्श गिरिगह्वरे ।
रूक्षमारुतभूयिष्ठे निष्पत्रद्रुमसंकुले ॥ ५३ ॥
ईरिणे निर्जले देशे कण्टकिद्रुमसंकुले ।
अश्मस्थाणुक्षुपाकीर्णे सुदुर्गे विषमोत्कटे ।
गृहीतं भुजगेन्द्रेण निश्चेष्टमनुजं तदा ॥ ५४ ॥
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तब उन्हीं पद - चिह्नोंके सहारे जाकर उन्होंने पर्वतकी कन्दरामें अपने भाई भीमसेनको देखा, जो अजगरकी पकड़में आकर चेष्टाशून्य हो गये थे । उक्त पर्वतकी कन्दरामें विशेष रूपसे रूक्ष वायु चलती थी । वह गुफा ऐसे वृक्षोंसे ढकी थी, जिनमें नाममात्रके लिये भी पत्ते नहीं थे । इतना ही नहीं, वह स्थान ऊसर, निर्जल, काँटेदार वृक्षोंसे भरा हुआ, पत्थर, ठूंठ और छोटे वृक्षोंसे व्याप्त, अत्यन्त दुर्गम और ऊँचा- नीचा था ॥ ५३-५४ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आजगरपर्वणि युधिष्ठिर भीमदर्शने एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत आजगरपर्वमें युधिष्ठिरको भीमसेनके दर्शनसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ उनासीवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १७९ ॥
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अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः युधिष्ठिरका भीमसेनके पास पहुँचना और सर्परूपधारी नहुषके प्रश्नोंका उत्तर देना वैशम्पायन उवाच
युधिष्ठिरस्तमासाद्य सर्पभोगेन वेष्टितम् ।
दयितं भ्रातरं धीमानिदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! सर्पके शरीरसे बँधे हुए अपने प्रिय भाई भीमसेनके पास पहुँचकर परम बुद्धिमान् युधिष्ठिरने इस प्रकार पूछा- ॥ १ ॥
कुन्तीमातः कथमिमामापदं त्वमवाप्तवान् ।
कश्चायं पर्वताभोगप्रतिमः पन्नगोत्तमः ॥ २ ॥
स धर्मराजमालक्ष्य भ्राता भ्रातरमग्रजम् ।
कथयामास तत् सर्वं ग्रहणादि विचेष्टितम् ॥ ३ ॥
‘ कुन्तीनन्दन! तुम कैसे इस विपत्तिमें फँस गये? और यह पर्वतके समान लम्बा - चौड़ा श्रेष्ठ नाग कौन है? ' अपने बड़े भ्राता धर्मराज युधिष्ठिरको वहाँ उपस्थित देख भाई भीमसेनने अपने पकड़े जाने आदिकी सारी चेष्टाएँ कह सुनायीं ॥ २-३ ॥ भीम उवाच
अयमार्य महासत्वो भक्षार्थं मां गृहीतवान् ।
नहुषो नाम राजर्षिः प्राणवानिव संस्थितः ॥ ४ ॥
भीम बोले - आर्य! ये वायुभक्षी सर्पके रूपमें बैठे हुए महान् शक्तिशाली साक्षात् राजर्षि नहुष हैं, इन्होंने मुझे अपना आहार बनानेके लिये पकड़ रखा है ॥ ४ ॥
युधिष्ठिरउवाच
मुच्यतामयमायुष्मन् भ्राता मेऽमितविक्रमः ।
वयमाहारमन्यं ते दास्यामः क्षुन्निवारणम् ॥ ५ ॥
तब युधिष्ठिरने सर्पसे कहा – आयुष्मन्! आप मेरे इस अनन्त पराक्रमी भाईको छोड़ दें। हमलोग आपकी भूख मिटानेके लिये दूसरा भोजन देंगे ॥ ५ ॥
सर्पउवाच
आहाते राजपुत्रोऽयं मया प्राप्तो मुखागतः ।
गम्यतां नेह स्थातव्यं श्वो भवानपि मे भवेत् ॥ ६ ॥
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- सर्प बोला — राजन्! यह राजकुमार मेरे मुखके पास स्वयं आकर मुझे आहाररूपमें प्राप्त हुआ है । तुम जाओ, यहाँ ठहरना उचित नहीं है; अन्यथा कलतक तुम भी मेरे आहार बन जाओगे ॥ ६ ॥
व्रतमेतन्महाबाहो विषयं मम यो व्रजेत् ।
स मे भक्षो भवेत् तात त्वं चापि विषये मम ॥ ७ ॥
महाबाहो! मेरा यह नियम है कि मेरी अधिकृत भूमिके भीतर जो भी आ जायगा, वह मेरा भक्ष्य बन जायगा । तात! इस समय तुम भी मेरे अधिकारकी सीमामें ही आ गये हो ॥ ७ ॥
चिरेणाद्य मयाऽऽहारः प्राप्तोऽयमनुजस्तव ।
नाहमेनं विमोक्ष्यामि न चान्यमभिकाङ्क्षये ॥ ८ ॥
दीर्घकालतक उपवास करनेके बाद आज यह तुम्हारा छोटा भाई मुझे आहाररूपमें प्राप्त हुआ है, अतः न तो मैं इसे छोडूंगा और न इसके बदलेमें दूसरा आहार ही लेना चाहता हूँ॥ ८ ॥
युधिष्ठिर उवाच देवो वा यदि वा दैत्य उरगो वा भवान् यदि ।
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सत्यं सर्प वचो ब्रूहि पृच्छति त्वां युधिष्ठिरः ।
किमर्थं च त्वया ग्रस्तो भीमसेनो भुजङ्गम ॥ ९ ॥
युधिष्ठिरने कहा — सर्प! तुम कोई देवता हो या दैत्य अथवा वास्तवमें सर्प ही हो? सच बताओ, तुमसे युधिष्ठिर प्रश्न कर रहा है । भुजंगम! किस लिये तुमने भीमसेनको ही अपना ग्रास बनाया है? ॥ ९ ॥
किमाहृत्य विदित्वा वा प्रीतिस्ते स्याद् भुजङ्गम् ।
किमाहारं प्रयच्छामि कथं मुञ्चेद् भवानिमम् ॥ १० ॥
बोलो, तुम्हारे लिये क्या ला दिया जाय? अथवा तुम्हें किस बातका ज्ञान करा दिया जाय? जिससे तुम प्रसन्न होओगे । मैं कौन-सा आहार दे दूँ अथवा किस उपायका अवलम्बन करूँ, जिससे तुम इन्हें छोड़ सकते हो? ॥ १० ॥
सर्पउवाच
नहुषो नाम राजाहमासं पूर्वस्तवानघ ।
प्रथितः पञ्चमः सोमादायोः पुत्रेो नराधिप ॥ ११ ॥
सर्प बोला – निष्पाप नरेश! मैं पूर्वजन्ममें तुम्हारा विख्यात पूर्वज नहुष नामका राजा था। चन्द्रमासे पाँचवीं पीढ़ीमें जो आयु नामक राजा हुए थे, उन्हींका मैं पुत्र हूँ ॥ ११ ॥
क्रतुभिस्तपसा चैव स्वाध्यायेन दमेन च ।
त्रैलोक्यैश्वर्यमव्यग्रं प्राप्तोऽहं विक्रमेण च ॥ १२ ॥
मैंने अनेक यज्ञ किये, तपस्या की, स्वाध्याय किया तथा अपने मन और इन्द्रियोंके संयमरूप योगका अभ्यास किया । इन सत्कर्मोंसे तथा अपने पराक्रमसे भी मुझे तीनों लोकोंका निष्कण्टक साम्राज्य प्राप्त हुआ था ॥ १२ ॥
तदैश्वर्यं समासाद्य दर्पो मामगमत् तदा ।
सहस्रं हि द्विजातीनामुवाह शिबिकां मम ॥ १३ ॥
ऐश्वर्यमदमत्तोऽहमवमन्य ततो द्विजान् ।
इमामगस्त्येन दशामानीतः पृथिवीपते ॥ १४ ॥
न तु मामजहात् प्रज्ञा यावदद्येति पाण्डव ।
तस्यैवानुग्रहाद् राजन्नगस्त्यस्य महात्मनः ॥ १५ ॥
तब उस ऐश्वर्यको पाकर मेरा अहंकार बढ़ गया । मैंने सहस्रों ब्राह्मणोंसे अपनी पालकी ढुलवायी। तदनन्तर ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त हो मैंने बहुत- से ब्राह्मणोंका अपमान किया । पृथ्वीपते! इससे कुपित हुए महर्षि अगस्त्यने मुझे इस अवस्थाको पहुँचा दिया । पाण्डुनन्दन नरेश! उन्हीं महात्मा अगस्त्यकी कृपासे आजतक मेरी स्मरणशक्ति मुझे छोड़ नहीं सकी है । ( मेरी स्मृति ज्यों - की - त्यों बनी हुई है ) ॥ १३ – १५ ॥ षष्ठे काले मयाऽऽहारः प्राप्तोऽयमनुजस्तव ।
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नाहमेनं विमोक्ष्यामि न चान्यदपि कामये ॥ १६ ॥
महर्षिके शापके अनुसार दिनके छठे भागमें तुम्हारा यह छोटा भाई मुझे भोजनके रूपमें प्राप्त हुआ है । अतः मैं न तो इसे छोडूंगा और न इसके बदले दूसरा आहार लेना चाहता हूँ ॥ १६ ॥
प्रश्नानुच्चारितानद्य व्याहरिष्यसि चेन्मम ।
अथ पश्चाद् विमोक्ष्यामि भ्रातरं ते वृकोदरम् ॥ १७ ॥
परंतु एक बात है, यदि तुम मेरे पूछे हुए कुछ प्रश्नोंका अभी उत्तर दे दोगे, तो उसके बाद मैं तुम्हारे भाई भीमसेनको छोड़ दूँगा ॥ १७ ॥
युधिष्ठिरउवाच
ब्रूहि सर्प यथाकामं प्रतिवक्ष्यामि ते वचः ।
अपि चेच्छक्नुयां प्रीतिमाहर्तुं ते भुजङ्गम ॥ १८ ॥
युधिष्ठिरने कहा — सर्प! तुम इच्छानुसार प्रश्न करो। मैं तुम्हारी बातका उत्तर दूँगा । भुजंगम! यदि हो सका, तो तुम्हें प्रसन्न करनेका प्रयत्न करूँगा ॥ १८ ॥
वेद्यं च ब्राह्मणेनेह तद् भवान् वेत्ति केवलम् ।
सर्पराज ततः श्रुत्वा प्रतिवक्ष्यामि ते वचः ॥ १ ९ ॥
सर्पराज! ब्राह्मणको इस जीवनमें जो कुछ जानना चाहिये, वह केवल तत्त्व तुम जानते हो या नहीं । यह सुनकर मैं तुम्हारे प्रश्नोंका उत्तर दूँगा ॥ १ ९ ॥ सर्पउवाच
ब्राह्मणः को भवेद् राजन् वेद्यं किं च युधिष्ठिर ।
ब्रवीह्यतिमतिं त्वां हि वाक्यैरनुमिमीमहे ॥ २० ॥
सर्प बोला— राजा युधिष्ठिर! यह बताओ कि ब्राह्मण कौन है और उसके लिये जाननेयोग्य तत्त्व क्या है? तुम्हारी बातें सुननेसे मुझे ऐसा अनुमान होता है कि तुम अतिशय बुद्धिमान् हो ॥ २० ॥
युधिष्ठिर उवाच
सत्यं दानं क्षमा शीलमानृशंस्यं तपो घृणा ।
दृश्यन्ते यत्र नागेन्द्र स ब्राह्मण इति स्मृतः ॥ २१ ॥
युधिष्ठिरने कहा – नागराज! जिसमें सत्य, दान, क्षमा, सुशीलता, क्रूरताका अभाव, तपस्या और दया — से सद्गुण दिखायी देते हों, वही ब्राह्मण कहा गया है ॥ २१ ॥
वेद्यं सर्प परं ब्रह्म निर्दुःखमसुखं च यत् ।
यत्र गत्वा न शोचन्ति भवतः किं विवक्षितम् ॥ २२ ॥
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सर्प! जाननेयोग्य तत्त्व तो परम ब्रह्म ही है, जो दुःख और सुखसे परे है तथा जहाँ पहुँचकर अथवा जिसे जानकर मनुष्य शोकके पार हो जाता है । बताओ, तुम्हें अब इस विषयमें क्या कहना है? ॥ २२ ॥
सर्पउवाच चातुर्वर्ण्यं प्रमाणं च सत्यं च ब्रह्म चैव हि ।
शूद्रेष्वपि च सत्यं च दानमक्रोध एव च ।
आनृशंस्यमहिंसा च घृणा चैव युधिष्ठिर ॥ २३ ॥
सर्प बोला — युधिष्ठिर! सत्य एवं प्रमाणभूत ब्रह्म तो चारों वर्णोंके लिये हितकर है । सत्य, दान, अक्रोध, क्रूरताका अभाव, अहिंसा और दया आदि सद्गुण तो शूद्रोंमें भी रहते हैं ॥ २३ ॥
वेद्यं यच्चात्र निर्दुःखमसुखं च नराधिप ।
ताभ्यां हीनं पदं चान्यन्न तदस्तीति लक्षये ॥ २४ ॥
नरेश्वर! तुमने यहाँ जो जाननेयोग्य तत्त्वको दुःख और सुखसे परे बताया है, सो दुःख और सुखसे रहित किसी दूसरी वस्तुकी सत्ता ही मैं नहीं देखता हूँ ॥ २४ ॥
युधिष्ठिर उवाच
शूद्रे तु यद् भवेल्लक्ष्म द्विजे तच्च न विद्यते ।
न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मणः ॥ २५ ॥
यत्रैतल्लक्ष्यते सर्प वृत्तं स ब्राह्मणः स्मृतः ।
यत्रैतन्न भवेत् सर्प तं शूद्रमिति निर्दिशेत् ॥ २६ ॥
युधिष्ठिरने कहा – यदि शूद्रमें सत्य आदि उपर्युक्त लक्षण हैं और ब्राह्मणमें नहीं हैं तो वह शूद्र शूद्र नहीं है और वह ब्राह्मण ब्राह्मण नहीं है । सर्प! जिसमें ये सत्य आदि लक्षण मौजूद हों, वह ब्राह्मण माना गया है और जिसमें इन लक्षणोंका अभाव हो, उसे शूद्र कहना चाहिये ॥ २५-२६ ॥
यत् पुनर्भवता प्रोक्तं न वेद्यं विद्यतीति च ।
ताभ्यां हीनमतोऽन्यत्र पदमस्तीति चेदपि ॥ २७ ॥
एवमेतन्मतं सर्प ताभ्यां हीनं न विद्यते ।
यथा शीतोष्णयोर्मध्ये भवेन्नोष्णं न शीतता ॥ २८ ॥
एवं वै सुखदुःखाभ्यां हीनमस्ति पदं क्वचित् ।
एषा मम मतिः सर्प यथा वा मन्यते भवान् ॥ २ ९ ॥
अब तुमने जो यह कहा कि सुख- दुःखसे रहित कोई दूसरा वेद्य तत्त्व है ही नहीं, सो तुम्हारा यह मत ठीक है। सुख-दुःखसे शून्य कोई पदार्थ नहीं है । किंतु एक ऐसा पद है भी । जिस प्रकार बर्फमें उष्णता और अग्निमें शीतलता कहीं नहीं रहती, उसी प्रकार जो वेद्य- पद
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है, वह वास्तवमें सुख - दुःखसे रहित ही है । नागराज! मेरा तो यही विचार है, फिर आप जैसा मानें ॥ २७–२९ ॥ सर्पउवाच
यदि ते वृत्ततो राजन् ब्राह्मणः प्रसमीक्षितः ।
वृथा जातिस्तदाऽऽयुष्मन् कृतिर्यावन्न विद्यते ॥ ३० ॥
सर्प बोला — आयुष्मन् नरेश! यदि आचारसे ही ब्राह्मणकी परीक्षा की जाय, तब तो जबतक उसके अनुसार कर्म न हो जाति व्यर्थ ही है ॥ ३० ॥
युधिष्ठिर उवाच
जातिरत्र महासर्प मनुष्यत्वे महामते ।
संकरात् सर्ववर्णानां दुष्परीक्ष्येति मे मतिः ॥ ३१ ॥
युधिष्ठिरने कहा – महासर्प! महामते! मनुष्योंमें जातिकी परीक्षा करना बहुत ही कठिन है; क्योंकि इस समय सभी वर्णोंका परस्पर संकर ( सम्मिश्रण ) हो रहा है, ऐसा मेरा विचार है ॥ ३१ ॥
सर्वे सर्वास्वपत्यानि जनयन्ति सदा नराः ।
वाङ्मैथुनमथो जन्म मरणं च समं नृणाम् ॥ ३२ ॥
इदमार्षं प्रमाणं च ये यजामह इत्यपि ।
तस्माच्छीलं प्रधानेष्टं विदुर्ये तत्त्वदर्शिनः ॥ ३३ ॥
सभी मनुष्य सदा सब जातियोंकी स्त्रियोंसे संतान उत्पन्न कर रहे हैं। वाणी, मैथुन तथा जन्म और मरण — ये सब मनुष्योंमें एक- से देखे जाते हैं । इस विषयमें यह आर्षप्रमाण भी मिलता है — ‘ ये यजामहे' यह श्रुति जातिका निश्चय न होनेके कारण ही जो हमलोग यज्ञ कर रहे हैं, ऐसा सामान्यरूपसे निर्देश करती है । इसलिये जो तत्त्वदर्शी विद्वान् हैं, वे शीलको ही प्रधानता देते हैं और उसे ही अभीष्ट मानते हैं ॥ ३२-३३ ॥
प्राङ्नाभिवर्धनात् पुंसो जातकर्म विधीयते ।
तत्रास्य माता सावित्री पिता त्वाचार्य उच्यते ॥ ३४ ॥
जब बालकका जन्म होता है, तब नालच्छेदनके पूर्व उसका जातकर्म - संस्कार किया जाता है । उसमें उसकी माता सावित्री कहलाती है और पिता आचार्य ॥
तावच्छूद्रसमो ह्येष यावद् वेदे न जायते ।
तस्मिन्नेवं मतिद्वैधे मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥ ३५ ॥
कृतकृत्याः पुनर्वर्णा यदि वृत्तं न विद्यते ।
संकरस्त्वत्र नागेन्द्र बलवान् प्रसमीक्षितः ॥ ३६ ॥
जबतक बालकका संस्कार करके उसे वेदका स्वाध्याय न कराया जाय, तबतक वह शूद्रहीके समान है । जातिविषयक संदेह होनेपर स्वायम्भुव मनुने यही निर्णय दिया है ।
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नागराज! यदि वैदिक संस्कार करके वेदाध्ययन करनेपर भी ब्राह्मणादि वर्णोंमें अपेक्षित शील और सदाचारका उदय नहीं हुआ तो उसमें प्रबल वर्णसंकरता है, ऐसा विचारपूर्वक निश्चय किया गया है ॥
यत्रेदानीं महासर्प संस्कृतं वृत्तमिष्यते ।
तं ब्राह्मणमहं पूर्वमुक्तवान् भुजगोत्तम ॥ ३७ ॥
महासर्प! भुजंगमप्रवर! इस समय जिसमें संस्कारके साथ - साथ सदाचारकी उपलब्धि
हो, वही ब्राह्मण है । यह बात मैं पहले ही बता चुका हूँ ॥ ३७ ॥
सर्पउवाच
श्रुतं विदितवेद्यस्य तव वाक्यं युधिष्ठिर ।
भक्षयेयमहं कस्माद् भ्रातरं ते वृकोदरम् ॥ ३८ ॥
सर्प बोला- युधिष्ठिर! तुम जाननेयोग्य सभी बातें जानते हो । मैंने तुम्हारी बात अच्छी तरह सुन ली । अब मैं तुम्हारे भाई भीमसेनको कैसे खा सकता हूँ? ॥ ३८ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आजगरपर्वणि युधिष्ठिरसर्पसंवादे अशीत्यधिकशततमोऽयायः ॥ १८० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत आजगरपर्वमें युधिष्ठिरसर्पसंवादविषयक एक सौ अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८० ॥