श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 131–140

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 131–140

पृष्ठ 131

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मातासहित पाण्डवोंको वहाँ धरतीपर सोते देख कामसे पीड़ित हो उस राक्षसीने भीमसेनकी कामना की ॥ ९ ५ ॥

भीमस्य पादौ कृत्वा तु स्व उत्सङ्गे ततोऽबला ।

पर्यमर्दत संहृष्टा कल्याणी मृदुपाणिना ॥ ९ ६ ॥

भीमके पैरोंको अपनी गोदमें लेकर वह कल्याणमयी अबला अपने कोमल हाथोंसे प्रसन्नतापूर्वक दबाने लगी ॥ ९ ६ ॥

तामबुध्यदमेयात्मा बलवान् सत्यविक्रमः ।

पर्यपृच्छत तां भीमः किमिहेच्छस्यनिन्दिते ॥ ९ ७ ॥

उसका स्पर्श पाकर बलवान् सत्यपराक्रमी तथा अमेयात्मा भीमसेन जाग उठे ।

जागनेपर उन्होंने पूछा- ' सुन्दरी! तुम यहाँ क्या चाहती हो? ' ॥ ९ ७ ॥

एवमुक्ता तु भीमेन राक्षसी कामरूपिणी ।

भीमसेनं महात्मानमाह चैवमनिन्दिता ॥ ९ ८ ॥

इस प्रकार पूछनेपर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली उस अनिन्द्य सुन्दरी राक्षसकन्याने महात्मा भीमसे कहा- ॥ ९ ८ ॥

पलायध्वमितः क्षिप्रं मम भ्रातैष वीर्यवान् ।

आगमिष्यति वो हन्तुं तस्माद् गच्छत मा चिरम् ॥ ९९ ॥

‘ आपलोग यहाँसे जल्दी भाग जायँ, मेरा यह बलवान् भाई हिडिम्ब आपको मारनेके लिये आयेगा; अतः आपलोग जल्दी चले जाइये, देर न कीजिये ' ॥ ९९ ॥

अथ भीमोऽभ्युवाचैनां साभिमानमिदं वचः ।

नोद्विजेयमहं तस्मान्निहनिष्येऽहमागतम् ॥ १०० ॥

यह सुनकर भीमने अभिमानपूर्वक कहा - ' मैं उस राक्षससे नहीं डरता । यदि यहाँ आयेगा तो मैं ही उसे मार डालूँगा ' ॥ १०० ॥

तयोः श्रुत्वा तु संजल्पमागच्छद् राक्षसाधमः ।

भीमरूपो महानादान् विसृजन् भीमदर्शनः ॥ १०१ ॥

उन दोनोंकी बातचीत सुनकर वह भीमरूपधारी भयंकर एवं नीच राक्षस बड़े जोरसे गर्जना करता हुआ वहाँ आ पहुँचा ॥ १०१ ॥

राक्षस उवाच

केन सार्धं कथयसि आनयैनं ममान्तिकम् ।

हिडिम्बे भक्षयिष्यामो न चिरं कर्तुमर्हसि ॥ १०२ ॥

राक्षस बोला — हिडिम्बे! ' तू किससे बात कर रही है? लाओ इसे मेरे पास । हमलोग खायँगे । अब तुम्हें देर नहीं करनी चाहिये ॥ १०२ ॥

सा कृपासंगृहीतेन हृदयेन मनस्विनी ।

पृष्ठ 132

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नैनमैच्छत् तदाख्यातुमनुक्रोशादनिन्दिता ॥ १०३ ॥

मनस्विनी एवं अनिन्दिता हिडिम्बाने स्नेहयुक्त हृदयके कारण दयावश यह क्रूरतापूर्ण संदेश भीमसेनसे कहना उचित न समझा ॥ १०३ ॥

स नादान् विनदन् घोरान् राक्षसः पुरुषादकः ।

अभ्यद्रवत वेगेन भीमसेनं तदा किल ॥ १०४ ॥

इतनेहीमें वह नरभक्षी राक्षस घोर गर्जना करता हुआ बड़े वेगसे भीमसेनकी ओर दौड़ा ॥ १०४ ॥

तमभिद्रुत्य संक्रुद्धो वेगेन महता बली ।

अगृह्णात् पाणिना पाणिं भीमसेनस्य राक्षसः ॥ १०५ ॥

इन्द्राशनिसमस्पर्शं वज्रसंहननं दृढम् ।

संहत्य भीमसेनाय व्याक्षिपत् सहसा करम् ॥ १०६ ॥

क्रोधमें भरे हुए उस बलवान् राक्षसने बड़े वेगसे निकट जाकर अपने हाथसे भीमसेनका हाथ पकड़ लिया । भीमसेनके हाथका स्पर्श इन्द्रके वज्रके समान था । उनका शरीर भी वैसा ही सुदृढ़ था । राक्षसने भीमसेनसे भिड़कर उनके हाथको सहसा झटक दिया ॥ १०५-१०६ ॥

गृहीतं पाणिना पाणिं भीमसेनस्य रक्षसा ।

नामृष्यत महाबाहुस्तत्राक्रुध्यद् वृकोदरः ॥ १०७ ॥

राक्षसने भीमसेनके हाथको अपने हाथसे पकड़ लिया; यह बात महाबाहु भीमसेन नहीं सह सके । वे वहीं कुपित हो गये ॥ १०७ ॥

तदाऽऽसीत् तुमुलं युद्धं भीमसेनहिडिम्बयोः ।

सर्वास्त्रविदुषोर्घोरं वृत्रवासवयोरिव ॥ १०८ ॥

उस समय सम्पूर्ण अस्त्र - शस्त्रोंके ज्ञाता भीमसेन और हिडिम्बमें इन्द्र और वृत्रासुरके समान भयानक एवं घमासान युद्ध होने लगा ॥ १०८ ॥

विक्रीड्य सुचिरं भीमो राक्षसेन सहानघ ।

निजघान महावीर्यस्तं तदा निर्बलं बली ॥ १० ९ ॥

निष्पाप श्रीकृष्ण! महापराक्रमी और बलवान् भीमसेनने उस राक्षसके साथ बहुत देरतक खिलवाड़ करके उसके निर्बल हो जानेपर उसे मार डाला ॥ १० ९ ॥

हत्वा हिडिम्बं भीमोऽथ प्रस्थितो भ्रातृभिः सह ।

हिडिम्बामग्रतः कृत्वा यस्यां जातो घटोत्कचः ॥ ११० ॥

इस प्रकार हिडिम्बको मारकर हिडिम्बाको आगे किये भीमसेन अपने भाइयोंके साथ आगे बढ़े । उसी हिडिम्बासे घटोत्कचका जन्म हुआ ॥ ११० ॥

ततः सम्प्राद्रवन् सर्वे सह मात्रा परंतपाः ।

एकचक्रामभिमुखाः संवृता ब्राह्मणव्रजैः ॥ १११ ॥

पृष्ठ 133

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तदनन्तर सब परंतप पाण्डव अपनी माताके साथ आगे बढ़े । ब्राह्मणोंसे घिरे हुए ये लोग एकचक्रा नगरीकी ओर चल दिये ॥ १११ ॥

प्रस्थाने व्यास एषां च मन्त्री प्रियहिते रतः ।

ततोऽगच्छन्नेकचक्रां पाण्डवाः संशितव्रताः ॥ ११२ ॥

उस यात्रामें इनके प्रिय एवं हितमें लगे हुए व्यासजी ही इनके परामर्शदाता हुए । उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पाण्डव उन्हींकी सम्मतिसे एकचक्रापुरीमें गये ॥ ११२ ॥

तत्राप्यासादयामासुर्बकं नाम महाबलम् ।

पुरुषादं प्रतिभयं हिडिम्बेनैव सम्मितम् ॥ ११३ ॥

वहाँ जानेपर भी इन्हें नरभक्षी राक्षस महाबली बकासुर मिला। वह भी हिडिम्बके ही समान भयंकर था ॥ ११३ ॥

तं चापि विनिहत्योग्रं भीमः प्रहरतां वरः ।

सहितो भ्रातृभिः सर्वैर्द्रुपदस्य पुरं ययौ ॥ ११४ ॥

योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीम उस भयंकर राक्षसको मारकर अपने सब भाइयोंके साथ मेरे पिता द्रुपदकी राजधानीमें गये ॥ ११४ ॥

लब्धाहमपि तत्रैव वसता सव्यसाचिना ।

यथा त्वया जिता कृष्ण रुक्मिणी भीष्मकात्मजा ॥ ११५ ॥

श्रीकृष्ण! जैसे आपने भीष्मकनन्दिनी रुक्मिणीको जीता था, उसी प्रकार मेरे पिताकी राजधानीमें रहते समय सव्यसाची अर्जुनने मुझे जीता ॥ ११५ ॥

एवं सुयुद्धे पार्थेन जिताहं मधुसूदन ।

स्वयंवरे महत् कर्म कृत्वा न सुकरं परैः ॥ ११६ ॥

मधुसूदन! स्वयंवरमें, जो महान् कर्म दूसरोंके लिये दुष्कर था, वह करके भारी युद्धमें भी अर्जुनने मुझे जीत लिया था ॥ ११६ ॥

एवं क्लेशैः सुबहुभिः क्लिश्यमाना सुदुःखिता ।

निवसाम्यार्यया हीना कृष्ण धौम्यपुरःसरा ॥ ११७ ॥

परंतु आज मैं इन सबके होते हुए भी अनेक प्रकारके क्लेश भोगती और अत्यन्त दुःखमें डूबी रहकर अपनी सास कुन्तीसे अलग हो धौम्यजीको आगे रखकर वनमें निवास करती हूँ ॥ ११७ ॥

इमे सिंहविक्रान्ता वीर्येणाभ्यधिकाः परैः ।

विहीनैः परिक्लिश्यन्तीं समुपैक्षन्त मां कथम् ॥ ११८ ॥

ये सिंहके समान पराक्रमी पाण्डव बल- वीर्यमें शत्रुओंसे बढ़े- चढ़े हैं, इनसे सर्वथा हीन कौरव मुझे भरी सभामें कष्ट दे रहे थे, तो भी इन्होंने क्यों मेरी उपेक्षा की? ॥ ११८ ॥

एतादृशानि दुःखानि सहन्ती दुर्बलीयसाम् ।

दीर्घकालं प्रदीप्तास्मि पापानां पापकर्मणाम् ॥ ११ ९ ॥

पृष्ठ 134

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पापकर्मोंमें लगे हुए अत्यन्त दुर्बल पापी शत्रुओंके दिये हुए ऐसे -ऐसे दुःख मैं सह रही हूँ और दीर्घकालसे चिन्ताकी आगमें जल रही हूँ ॥ ११ ९ ॥

कुले महति जातास्मि दिव्येन विधिना किल ।

पाण्डवानां प्रिया भार्या स्नुषा पाण्डोर्महात्मनः ॥ १२० ॥

यह प्रसिद्ध है कि मैं दिव्य विधिसे एक महान् कुलमें उत्पन्न हुई हूँ । पाण्डवोंकी प्यारी पत्नी और महाराज पाण्डुकी पुत्रवधू हूँ ॥ १२० ॥

कचग्रहमनुप्राप्ता सास्मि कृष्ण वरा सती ।

पञ्चानां पाण्डुपुत्राणां प्रेक्षतां मधुसूदन ॥ १२१ ॥

मधुसूदन श्रीकृष्ण! मैं श्रेष्ठ और सती- साध्वी होती हुई भी इन पाँचों पाण्डवोंके देखते-देखते केश पकड़कर घसीटी गयी ॥ १२१ ॥

इत्युक्त्वा प्रारुदत् कृष्णा मुखं प्रच्छाद्य पाणिना ।

पद्मकोशप्रकाशेन मृदुना मृदुभाषिणी ॥ १२२ ॥

ऐसा कहकर मृदुभाषिणी द्रौपदी कमलकोशके समान कान्तिमान् एवं कोमल हाथसे अपना मुँह ढककर फूट- फूटकर रोने लगी ॥ १२२ ॥

स्तनावपतितौ पीनौ सुजातौ शुभलक्षणौ ।

अभ्यवर्षत पाञ्चाली दुःखजैरश्रुबिन्दुभिः ॥ १२३ ॥

पांचालराजकुमारी कृष्णा अपने कठोर, उभरे हुए, शुभलक्षण तथा सुन्दर स्तनोंपर दुःखजनित अश्रुबिन्दुओंकी वर्षा करने लगी ॥ १२३ ॥

चक्षुषी परिमार्जन्ती निःश्वसन्ती पुनः पुनः ।

बाष्पपूर्णेन कण्ठेन क्रुद्धा वचनमब्रवीत् ॥ १२४ ॥

कुपित हुई द्रौपदी बार- बार सिसकती और आँसू पोंछती हुई आँसूभरे कण्ठसे बोली - ॥ १२४ ॥

नैव मे पतयः सन्ति न पुत्रा न च बान्धवाः ।

न भ्रातरो न च पिता नैव त्वं मधुसूदन ॥ १२५ ॥

'मधुसूदन! मेरे लिये न पति हैं, न पुत्र हैं, न बान्धव हैं, न भाई हैं, न पिता हैं और न आप ही हैं ॥ १२५ ॥

मां विप्रकृतां क्षुद्रैरुपेक्षध्वं विशोकवत् ।

न च मे शाम्यते दुःखं कर्णो यत् प्राहसत् तदा ॥ १२६ ॥

‘ क्योंकि आप सब लोग, नीच मनुष्योंद्वारा जो मेरा अपमान हुआ था, उसकी उपेक्षा कर रहे हैं, मानो इसके लिये आपके हृदयमें तनिक भी दुःख नहीं है । उस समय कर्णने जो मेरी हँसी उड़ायी थी, उससे उत्पन्न हुआ दुःख मेरे हृदयसे दूर नहीं होता है ॥ १२६ ॥

चतुर्भिः कारणैः कृष्ण त्वया रक्ष्यास्मि नित्यशः ।

सम्बन्धाद् गौरवात् सख्यात् प्रभुत्वेनैव केशव ॥ १२७ ॥

पृष्ठ 135

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‘ श्रीकृष्ण! चार कारणोंसे आपको सदा मेरी रक्षा करनी चाहिये । एक तो आप मेरे सम्बन्धी हैं, दूसरे अग्निकुण्डमें उत्पन्न होनेके कारण मैं गौरवशालिनी हूँ, तीसरे आपकी सच्ची सखी हूँ और चौथे आप मेरी रक्षा करनेमें समर्थ हैं ' ॥ १२७ ॥

वैशम्पायन उवाच अथ तामब्रवीत् कृष्णस्तस्मिन् वीरसमागमे । वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! यह सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने वीरोंके उस समुदायमें द्रौपदीसे इस प्रकार कहा ॥ १२७३ ॥

वासुदेव उवाच

रोदिष्यन्ति स्त्रियो ह्येवं येषां क्रुद्धासि भाविनि ।

बीभत्सुशरसंच्छन्नाञ्छोणितौघपरिप्लुतान् ॥ १२८ ॥

निहतान् वल्लभान् वीक्ष्य शयानान् वसुधातले ।

यत् समर्थं पाण्डवानां तत् करिष्यामि मा शुचः ॥ १२ ९ ॥

श्रीकृष्ण बोले — भाविनि! तुम जिनपर क्रुद्ध हुई हो, उनकी स्त्रियाँ भी अपने प्राणप्यारे पतियोंको अर्जुनके बाणोंसे छिन्न -भिन्न और खूनसे लथपथ हो मरकर धरतीपर पड़ा देख इसी प्रकार रोयेंगी । पाण्डवोंके हितके लिये जो कुछ भी सम्भव है, वह सब करूँगा, शोक न करो ॥ १२८-१२९ ॥

पृष्ठ 136

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सत्यं ते प्रतिजानामि राज्ञां राज्ञी भविष्यसि ।

पतेद् द्यौर्हिमवाञ्छीर्येत् पृथिवी शकलीभवेत् ॥ १३० ॥

शुष्येत् तोयनिधिः कृष्णे न मे मोघं वचो भवेत् ।

तच्छ्रुत्वा द्रौपदी वाक्यं प्रतिवाक्यमथाच्युतात् ॥ १३१ ॥

साचीकृतमवेक्षत् सा पाञ्चाली मध्यमं पतिम् ।

आबभाषे महाराज द्रौपदीमर्जुनस्तदा ॥ १३२ ॥

मैं सत्य प्रतिज्ञापूर्वक कह रहा हूँ कि तुम राजरानी बनोगी । कृष्णे! आसमान फट पड़े, हिमालय पर्वत विदीर्ण हो जाय, पृथ्वीके टुकड़े - टुकड़े हो जायँ और समुद्र सूख जाय, किंतु मेरी यह बात झूठी नहीं हो सकती । द्रौपदीने अपनी बातोंके उत्तरमें भगवान् श्रीकृष्णके

मुखसे ऐसी बातें सुनकर तिरछी चितवनसे अपने मझले पति अर्जुनकी ओर देखा ।

महाराज! तब अर्जुनने द्रौपदीसे कहा- ॥ १३०–१३२ ॥

मा रोदी: शुभताम्राक्षि यदाह मधुसूदनः ।

तथा तद् भविता देवि नान्यथा वरवर्णिनि ॥ १३३ ॥

‘ लालिमायुक्त सुन्दर नेत्रोंवाली देवि! वरवर्णिनि! रोओ मत । भगवान् मधुसूदन जो कुछ कह रहे हैं, वह अवश्य होकर रहेगा; टल नहीं सकता' ॥ १३३ ॥

धृष्टद्युम्नउवाच

अहं द्रोणं हनिष्यामि शिखण्डी तु पितामहम् ।

दुर्योधनं भीमसेनः कर्णं हन्ता धनंजयः ॥ १३४ ॥

रामकृष्णौ व्यपाश्रित्य अजेयाः स्म रणे स्वसः ।

अपि वृत्रहणा युद्धे किं पुनर्धृतराष्ट्रजे ॥ १३५ ॥

धृष्टद्युम्नने कहा – बहिन! मैं द्रोणको मार डालूँगा, शिखण्डी भीष्मका वध करेंगे, भीमसेन दुर्योधनको मार गिरायेंगे और अर्जुन कर्णको यमलोक भेज देंगे । भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामका आश्रय पाकर हमलोग युद्धमें शत्रुओंके लिये अजेय हैं । इन्द्र भी हमें रणमें परास्त नहीं कर सकते । फिर धृतराष्ट्रके पुत्रोंकी तो बात ही क्या है? ॥ १३४-१३५ ॥ वैशम्पायन उवाच

इत्युक्तेऽभिमुखा वीरा वासुदेवमुपास्थिताः ।

तेषां मध्ये महाबाहुः केशवो वाक्यमब्रवीत् ॥ १३६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! धृष्टद्युम्नके ऐसा कहनेपर वहाँ बैठे हुए वीर भगवान् श्रीकृष्णकी ओर देखने लगे । उनके बीचमें बैठे हुए महाबाहु केशवने उनसे ऐसा कहा ॥ १३६ ॥

पृष्ठ 137

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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्रौपद्याश्वासने द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें द्रौपदी-आश्वासनविषयक बारहवाँअध्याय पूराहुआ ॥ १२ ॥

• यत्रसायंगृह मुनि वे होते हैं, जो जहाँ सायंकाल हो जाता है वहीं घरकी तरह रातभर निवास करते हैं । * आदिपर्वके १४७ वें अध्यायके लाक्षागृहदाहप्रसंगमें बतलाया है कि ' भीमसेनने माताको तो कंधेपर चढ़ा लिया और नकुल- सहदेवको गोदमें उठा लिया तथा शेष दोनों भाइयोंको दोनों हाथोंसे पकड़कर उन्हें सहारा देते हुए चलने लगे । ' इस कथनसे द्रौपदीके वचन भिन्न हैं; क्योंकि द्रौपदीका उस समय विवाह नहीं हुआ था, अतः द्रौपदी इस बातको ठीक- ठीक नहीं जानती थी, इसीसे वह लोगोंके मुखसे सुनी- सुनायी बात अनुमानसे कह रही है; अतः लाक्षागृहदाहके प्रसंगकी बात ही ठीक है ।

पृष्ठ 138

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त्रयोदशोऽध्यायः श्रीकृष्णका जूएके दोष बताते हुए पाण्डवोंपर आयी हुई विपत्तिमें अपनी अनुपस्थितिको कारण मानना वासुदेव उवाच

नैतत् कृच्छ्रमनुप्राप्तो भवान् स्याद् वसुधाधिप ।

यद्यहं द्वारकायां स्यां राजन् संनिहितः पुरा ॥ १ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण बोले- राजन्! यदि मैं पहले द्वारकामें या उसके निकट होता तो आप इस भारी संकटमें नहीं पड़ते ॥ १ ॥

आगच्छेयमहं द्यूतमनाहूतोऽपि कौरवैः ।

आम्बिकेयेन दुर्धर्ष राज्ञा दुर्योधनेन च ।

वारयेयमहं द्यूतं बहून् दोषान् प्रदर्शयन् ॥ २ ॥

दुर्जय वीर! अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्र, राजा दुर्योधन तथा अन्य कौरवोंके बिना बुलाये भी मैं उस द्यूतसभामें आता और जूएके अनेक दोष दिखाकर उसे रोकनेकी चेष्टा करता ॥ २ ॥

भीष्मद्रोणौ समानाय्य कृपं बाह्लीकमेव च ।

वैचित्रवीर्यं राजानमलं द्यूतेन कौरव ॥ ३ ॥

पुत्राणां तव राजेन्द्र त्वन्निमित्तमिति प्रभो ।

तत्राचक्षमहं दोषान् यैर्भवान् व्यतिरोपितः ॥ ४ ॥

प्रभो! मैं आपके लिये भीष्म, द्रोण, कृप, बाह्लीक तथा राजा धृतराष्ट्रको बुलाकर कहता — ‘ कुरुवंशके महाराज! आपके पुत्रोंको जूआ नहीं खेलना चाहिये। ' राजन्! मैं द्यूतसभामें जूएके उन दोषोंको स्पष्टरूपसे बताता, जिनके कारण आपको अपने राज्यसे वंचित होना पड़ा है ॥ ३-४ ॥

वीरसेनसुतो यैस्तु राज्यात् प्रभ्रंशितः पुरा ।

अतर्कितविनाशश्च देवनेन विशाम्पते ॥ ५ ॥

तथा जिन दोषोंने पूर्वकालमें वीरसेनपुत्र महाराज नलको राजसिंहासनसे च्युत किया । नरेश्वर! जूआ खेलनेसे सहसा ऐसा सर्वनाश उपस्थित हो जाता है, जो कल्पनामें भी नहीं आ सकता ॥ ५ ॥

सातत्यं च प्रसङ्गस्य वर्णयेयं यथातथम् ॥ ६ ॥

इसके सिवा उससे सदा जूआ खेलनेकी आदत बन जाती है । यह सब बातें मैं ठीक-ठीक बता रहा हूँ ॥ ६ ॥

पृष्ठ 139

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स्त्रियोऽक्षा मृगया पानमेतत् कामसमुत्थितम् ।

दुःखं चतुष्टयं प्रोक्तं यैर्नरो भ्रश्यते श्रियः ॥ ७ ॥

तत्र सर्वत्र वक्तव्यं मन्यन्ते शास्त्रकोविदाः ।

विशेषतश्च वक्तव्यं द्यूते पश्यन्ति तद्विदः ॥ ८ ॥

स्त्रियोंके प्रति आसक्ति, जूआ खेलना, शिकार खेलनेका शौक और मद्यपान — ये चार प्रकारके भोग कामनाजनित दुःख बताये गये हैं, जिनके कारण मनुष्य अपने धन - ऐश्वर्यसे भ्रष्ट हो जाता है । शास्त्रोंके निपुण विद्वान् सभी परिस्थितियोंमें इन चारोंको निन्दनीय मानते हैं; परंतु द्यूतक्रीडाको तो जूएके दोष जाननेवाले लोग विशेषरूपसे निन्दनीय समझते हैं ॥ ७-८ ॥

एकाहाद् द्रव्यनाशोऽत्र ध्रुवं व्यसनमेव च ।

अभुक्तनाशश्चार्थानां वाक्पारुष्यं च केवलम् ॥ ९ ॥

एतच्चान्यच्च कौरव्य प्रसङ्गिकटुकोदयम् ।

द्यूते ब्रूयां महाबाहो समासाद्याम्बिकासुतम् ॥ १० ॥

जूएसे एक ही दिनमें सारे धनका नाश हो जाता है । साथ ही जूआ खेलनेसे उसके प्रति आसक्ति होनी निश्चित है । समस्त भोग- पदार्थोंका बिना भोगे ही नाश हो जाता है और बदलेमें केवल कटुवचन सुननेको मिलते हैं। कुरुनन्दन! ये तथा और भी बहुत - से दोष हैं, जो जूएके प्रसंगसे कटु परिणाम उत्पन्न करनेवाले हैं । महाबाहो! मैं धृतराष्ट्रसे मिलकर एके ये सभी दोष बतलाता ॥ ९ -१० ॥

एवमुक्तो यदि मया गृह्णीयाद् वचनं मम ।

अनामयं स्याद् धर्मश्च कुरूणां कुरुवर्धन ॥ ११ ॥

कुरुवर्धन! मेरे इस प्रकार समझाने -बुझानेपर यदि वे मेरी बात मान लेते तो कौरवोंमें शान्ति बनी रहती और धर्मका भी पालन होता ॥ ११ ॥

न चेत् स मम राजेन्द्र गृह्णीयान्मधुर वचः ।

पथ्यं च भरतश्रेष्ठ निगृह्णीयां बलेन तम् ॥ १२ ॥

राजेन्द्र! भरतश्रेष्ठ! यदि वे मेरे मधुर एवं हितकर वचनको सुनकर उसे न मानते तो मैं उन्हें बलपूर्वक रोक देता ॥ १२ ॥

अथैनमपनीतेन सुहृदो नाम दुर्हृदः ।

सभासदोऽनुवर्तेरंस्तांश्च हन्यां दुरोदरान् ॥ १३ ॥

यदि वहाँ सुहृद्नामधारी शत्रु अन्यायका आश्रय ले इस धृतराष्ट्रका साथ देते तो मैं उन सभासद जुआरियोंको मार डालता ॥ १३ ॥

असांनिध्यं तु कौरव्य ममानर्तेष्वभूत् तदा ।

येनेदं व्यसनं प्राप्ता भवन्तो द्यूतकारितम् ॥ १४ ॥

पृष्ठ 140

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कुरुश्रेष्ठ! मैं उन दिनों आनर्तदेशमें ही नहीं था, इसीलिये आपलोगोंपर यह द्यूतजनित संकट आ गया ॥ १४ ॥

सोऽहमेत्य कुरुश्रेष्ठ द्वारकां पाण्डुनन्दन ।

अश्रौषं त्वां व्यसनिनं युयुधानाद् यथातथम् ॥ १५ ॥

कुरुप्रवर पाण्डुनन्दन! जब मैं द्वारकामें आया, तब सात्यकिसे आपके संकटमें पड़नेका यथावत् समाचार सुना ॥ १५ ॥

श्रुत्वैव चाहं राजेन्द्र परमोद्विग्नमानसः ।

तूर्णमभ्यागतोऽस्मि त्वां द्रष्टुकामो विशाम्पते ॥ १६ ॥

राजेन्द्र! वह सुनते ही मेरा मन अत्यन्त उद्विग्न हो उठा और प्रजेश्वर! मैं तुरंत ही आपसे मिलनेके लिये चला आया ॥ १६ ॥

अहो कृच्छ्रमनुप्राप्ताः सर्वे स्म भरतर्षभ ।

सोऽहं त्वां व्यसने मग्नं पश्यामि सह सोदरैः ॥ १७ ॥

भरतकुलभूषण! अहो! आप सब लोग बड़ी कठिनाई में पड़ गये हैं । मैं तो आपको सब भाइयोंसहित विपत्तिके समुद्रमें डूबा हुआ देख रहा हूँ ॥ १७ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि वासुदेववाक्ये त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें वासुदेववाक्यविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥