श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1381–1390
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1381–1390
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धारां वसूनां प्रतिमुञ्चतीव ॥ ४१ ॥
जो अपने परिश्रमसे उपार्जित और संचित किया हुआ धन- धान्य सुशील ब्राह्मणको दान करता है, उसके ऊपर वसुधादेवी अत्यन्त संतुष्ट होती और उसके लिये धनकी धारा-सी बहाती हैं ॥ ४१ ॥
अन्नदाः प्रथमं यान्ति सत्यवाक् तदनन्तरम् ।
अयाचितप्रदाता च समं यान्ति त्रयो जनाः ॥ ४२ ॥
अन्न-दान करनेवाले पुरुष पहले स्वर्गमें प्रवेश करते हैं । उसके बाद सत्यवादी जाता है । फिर बिना माँगे ही दान करनेवाला पुरुष जाता है । इस प्रकार ये तीनों पुण्यात्मा मानव समान गतिको प्राप्त होते हैं ॥ ४२ ॥
वैशम्पायन उवाच
कौतूहलसमुत्पन्नः पर्यपृच्छ्द् युधिष्ठिरः ।
मार्कण्डेयं महात्मानं पुनरेव सहानुजः ॥ ४३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर भाइयोंसहित धर्मराज युधिष्ठिरके मनमें बड़ा कौतूहल हुआ और उन्होंने महात्मा मार्कण्डेयजीसे पुनः इस प्रकार प्रश्न किया - ॥ ४३ ॥
यमलोकस्य चाध्वानमन्तरं मानुषस्य च ।
कीदृशं किम्प्रमाणं वा कथं वा तन्महामुने ।
तरन्ति पुरुषाश्चैव केनोपायेन शंस मे ॥ ४४ ॥
‘ महामुने! इस मनुष्यलोकसे यमलोक कितनी दूर है, कैसा है, कितना बड़ा है? और किस उपायसे मनुष्य वहाँके संकटोंसे पार हो सकते हैं? ये मुझे बतलाइये ' ॥ ४४ ॥
मार्कण्डेय उवाच
सर्वगुह्यतमं प्रश्नं पवित्रमृषिसंस्तुतम् ।
कथयिष्यामि ते राजन् धर्म्यं धर्मभृतां वर ॥ ४५ ॥
मार्कण्डेयजीने कहा - धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! तुमने ऐसे विषयके लिये प्रश्न किया है, जो सबसे अधिक गोपनीय, पवित्र, धर्मसम्मत तथा ऋषियोंके लिये भी आदरणीय है । सुनो, मैं इस विषयका वर्णन करता हूँ ॥ ४५ ॥
षडशीतिसहस्राणि योजनानां नराधिप ।
यमलोकस्य चाध्वानमन्तरं मानुषस्य च ॥ ४६ ॥
महाराज! मनुष्यलोक और यमलोकके मार्गमें छियासी हजार योजनोंका अन्तर है ॥ ४६ ॥
आकाशं तदपानीयं घोरं कान्तारदर्शनम् ।
न तत्र वृक्षच्छाया वा पानीयं केतनानि च ॥ ४७ ॥
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विश्रमेद् यत्र वै श्रान्तः पुरुषोऽध्वनि कर्शितः । उसके मार्गमें जलरहित शून्य आकाशमात्र है । वह देखनेमें बड़ा भयानक और दुर्गम है । वहाँ न तो वृक्षोंकी छाया है, न पानी है और न कोई ऐसा स्थान ही है जहाँ रास्तेका थका-माँदा जीव क्षणभर भी विश्राम कर सके ॥ ४७ ॥
नीयते यमदूतैस्तु यमस्याज्ञाकरैर्बलात् ॥ ४८ ॥
नराः स्त्रियस्तथैवान्ये पृथिव्यां जीवसंज्ञिताः । यमराजकी आज्ञाका पालन करनेवाले यमदूत इस पृथ्वीपर आकर यहाँके पुरुषों, स्त्रियों तथा अन्य जीवोंको बलपूर्वक पकड़ ले जाते हैं ॥ ४८३ ॥
ब्राह्मणेभ्यः प्रदानानि नानारूपाणि पार्थिव ॥ ४ ९ ॥
हयादीनां प्रकृष्टानि तेऽध्वानं यान्ति वै नराः ।
संनिवार्यातपं यान्ति छत्रेणैव हि छत्रदाः ॥ ५० ॥
राजन्! जिनके द्वारा यहाँ ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके अश्व आदि वाहनोंका उत्कृष्ट दान किया गया है, वे उस मार्गपर ( उन्हीं वाहनोंद्वारा सुखसे ) यात्रा करते हैं । छत्र - दान करनेवाले मनुष्य वहाँ प्राप्त हुए छत्रके द्वारा ही धूपका निवारण करते हुए चलते हैं ॥ ४ ९-५० ॥
तृप्ताश्चैवान्नदातारो ह्यतृप्ताश्चाप्यनन्नदाः ।
वस्त्रिणो वस्त्रदा यान्ति अवस्त्रा यान्त्यवस्त्रदाः ॥ ५१ ॥
अन्न -दान करनेवाले जीव वहाँ भोजनसे तृप्त होकर यात्रा करते हैं; किंतु जिन्होंने अन्नदान नहीं किया है वे भूखका कष्ट सहते हुए चलते हैं। वस्त्र देनेवाले लोग कपड़े पहनकर जाते हैं और जिन्होंने वस्त्रदान नहीं किया है, उन्हें नंगे होकर जाना पड़ता है ॥ ५१ ॥
हिरण्यदाः सुखं यान्ति पुरुषास्त्वभ्यलंकृताः ।
भूमिदास्तु सुखं यान्ति सर्वैः कामैः सुतर्पिताः ॥ ५२ ॥
सुवर्णका दान करनेवाले मनुष्य उस मार्गपर नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो बड़े सुखसे यात्रा करते हैं । भूमिका दान करनेवाले दाता सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगोंसे तृप्त हो वहाँ बड़े आनन्दसे जाते हैं ॥ ५२ ॥
यान्ति चैवापरिक्लिष्टा नसः सस्यप्रदायकाः ।
नराः सुखतरं यान्ति विमानेषु गृहप्रदाः ॥ ५३ ॥
खेतमें लगी हुई खेती दान करनेवाले मनुष्य बिना किसी कष्टके जाते हैं । गृहदान करनेवाले मानव विमानोंपर बैठकर अत्यन्त सुख- सुविधाके साथ जाते हैं ॥ ५३ ॥
पानीयदा ह्यतृषिताः प्रहृष्टमनसो नराः ।
पन्थानं द्योतयन्तश्च यान्ति दीपप्रदाः सुखम् ॥ ५४ ॥
जिन्होंने जल- दान किया है, उन्हें प्यासका कष्ट नहीं भोगना पड़ता, वे लोग प्रसन्नचित्त होकर वहाँ जाते हैं । दीपदान करनेवाले मनुष्य उस मार्गको प्रकाशित करते हुए सुखसे
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यात्रा करते हैं ॥ ५४ ॥
गोप्रदास्तु सुखं यान्ति निर्मुक्ताः सर्वपातकैः ।
विमानैर्हंससंयुक्तैर्यान्ति मासोपवासिनः ॥ ५५ ॥
गोदान करनेवाले मनुष्य सब पापोंसे मुक्ता हो सुखपूर्वक जाते हैं । एक मासतक उपवास- व्रत करनेवाले लोग हंसजुते हुए विमानोंद्वारा यात्रा करते हैं ॥ ५५ ॥
तथा बर्हिप्रयुक्तैश्च षष्ठरात्रोपवासिनः ।
त्रिरात्रं क्षपते यस्तु एकभक्तेन पाण्डव ॥ ५६ ॥
अन्तरा चैव नाश्नाति तस्य लोका ह्यनामयाः । जो लोग छठी राततक उपवास करते हैं, वे मोर जुते हुए विमानोंद्वारा जाते हैं । पाण्डुनन्दन! जो लोग एक बार भोजन करके उसीपर तीन रात काट ले जाते हैं और बीचमें भोजन नहीं करते, उन्हें रोग- शोकसे रहित पुण्यलोक प्राप्त होते हैं ॥ ५६३ ॥
पानीयस्य गुणा दिव्याः प्रेतलोकसुखावहाः ॥ ५७ ॥
तत्र पुष्योदका नाम नदी तेषां विधीयते ।
शीतलं सलिलं तत्र पिबन्ति ह्यमृतोपमम् ॥ ५८ ॥
जलदान करनेका प्रभाव अत्यन्त अलौकिक है । वह परलोकमें सुख पहुँचानेवाला है । जो जलदान करते हैं उन पुण्यात्माओंके लिये उस मार्गमें पुष्पोदका नामवाली नदी प्राप्त होती है । वे उसका शीतल और अमृतके समान मधुर जल पीते हैं ॥ ५७-५८ ॥
ये च दुष्कृतकर्माणः पूयं तेषां विधीयते ।
एवं नदी महाराज सर्वकामप्रदा हि सा ॥ ५ ९ ॥
महाराज! इस प्रकार वह नदी सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली है; किंतु जो पापी जीव हैं उनके लिये उस नदीका जल पीब बन जाता है ॥ ५ ९ ॥
तस्मात् त्वमपि राजेन्द्र पूजयैनान् यथाविधि ।
अध्वनि क्षीणगात्रश्च पथि पांसुसमन्वितः ॥ ६० ॥
पृच्छते ह्यन्नदातारं गृहमायाति चाशया ।
तं पूजयाथ यत्नेन सोऽतिथिर्ब्राह्मणश्च सः ॥ ६१ ॥
अतः राजेन्द्र! तुम भी इन ब्राह्मणोंका विधिपूर्वक पूजन करो । जो रास्ता चलनेसे थककर दुबला हो गया है, जिसका शरीर धूलसे भरा है और जो अन्नदाताका पता पूछता हुआ भोजनकी आशासे घरपर आ जाता है, उसका तुम यत्नपूर्वक सत्कार करो; क्योंकि
वह अतिथि है, इसलिये ब्राह्मण ही है । अर्थात् ब्राह्मणके ही तुल्य है ॥
तं यान्तमनुगच्छन्ति देवाः सर्वे सवासवाः ।
तस्मिन् सम्पूजिते प्रीता निराशा यान्त्यपूजिते ॥ ६२ ॥
ऐसा अतिथि जब किसीके घरपर जाता है तब उसके पीछे इन्द्रादि सम्पूर्ण देवता भी वहाँतक जाते हैं । यदि वहाँ उस अतिथिका आदर होता है तो वे देवता भी प्रसन्न होते हैं
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और यदि आदर नहीं होता, तो वे देवगण भी निराश लौट जाते हैं ॥ ६२ ॥
तस्मात् त्वमपि राजेन्द्र पूजयैनं यथाविधि ।
एतत् ते शतशः प्रोक्तं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ६३ ॥
अतः राजेन्द्र! तुम भी अतिथिका विधिपूर्वक सत्कार करते रहो । यह बात मैं तुमसे कई बार कह चुका हूँ, अब और क्या सुनना चाहते हो! ॥ ६३ ॥
युधिष्ठिर उवाच
पुनः पुनरहं श्रीतुं कथां धर्मसमाश्रयाम् ।
पुण्यामिच्छामि धर्मज्ञ कथ्यमानां त्वया विभो ॥ ६४ ॥
युधिष्ठिरने कहा - धर्मज्ञ विभो! आपके द्वारा कही हुई पुण्यमय धर्मकी चर्चा मैं बारंबार सुनना चाहता हूँ ॥ ६४ ॥
मार्कण्डेय उवाच
धर्मान्तरं प्रति कथां कथ्यमानां मया नृप ।
सर्वपापहरां नित्यं शृणुष्वावहितो मम ॥ ६५ ॥
मार्कण्डेयजी बोले – राजन्! अब मैं धर्मसम्बन्धी दूसरी बातें बता रहा हूँ, जो सदा
सब पापोंका नाश करनेवाली हैं । तुम सावधान होकर सुनो ॥ ६५ ॥
कपिलायां तु दत्तायां यत् फलं ज्येष्ठपुष्करे ।
तत् फलं भरतश्रेष्ठ विप्राणां पादधावने ॥ ६६ ॥
भरतश्रेष्ठ! ज्येष्ठपुष्करतीर्थमें कपिला गौ दान करनेसे जो फल मिलता है वही ब्राह्मणोंका चरण धोनेसे प्राप्त होता है ॥ ६६ ॥
द्विजपादोदकक्लिन्ना यावत् तिष्ठति मेदिनी ।
तावत् पुष्करपर्णेन पिबन्ति पितरो जलम् ॥ ६७ ॥
ब्राह्मणोंके चरण पखारनेके जलसे जबतक पृथ्वी भीगी रहती है, तबतक पितरलोग कमलके पत्तेसे जल पीते हैं ॥ ६७ ॥
स्वागतेनाग्नयस्तृप्ता आसनेन शतक्रतुः ।
पितरः पादशौचेन अन्नाद्येन प्रजापतिः ॥ ६८ ॥
ब्राह्मणका स्वागत करनेसे अग्नि, उसे आसन देनेसे इन्द्र, उसके पैर धोनेसे पितर और उसको भोजनके योग्य अन्न प्रदान करनेसे ब्रह्माजी तृप्त होते हैं ॥ ६८ ॥
यावद् वत्सस्य वै पादौ शिरश्चैव प्रदृश्यते ।
तस्मिन् काले प्रदातव्या प्रयत्नेनान्तरात्मना ॥ ६ ९ ॥
गर्भिणी गौ जिस समय बच्चा दे रही हो और उस बछड़ेका केवल मुख तथा दो पैर ही बाहर निकले दिखायी देते हों, उसी समय पवित्र भावसे प्रयत्नपूर्वक उस गौका दान कर देना चाहिये ॥ ६ ९ ॥
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अन्तरिक्षगतो वत्सो यावद् योन्यां प्रदृश्यते ।
तावत् गौ पृथिवी ज्ञेया यावद् गर्भं न मुञ्चति ॥ ७० ॥
जबतक बछड़ा योनिसे निकलते समय आकाशमें ही लटकता दिखायी दे, जबतक गाय अपने बछड़ेको पूर्णतः योनिसे अलग न कर दे, तबतक उस गौको पृथ्वीरूप ही समझना चाहिये ॥ ७० ||
यावन्ति तस्या रोमाणि वत्सस्य च युधिष्ठिर ।
तावद् युगसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते ॥ ७१ ॥
युधिष्ठिर! उसका दान करनेसे उस गौ तथा बछड़ेके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं उतने हजार युगोंतक दाता स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ७१ ॥
सुवर्णनासां यः कृत्वा सुखुरां कृष्णधेनुकाम् ।
तिलैः प्रच्छादितां दद्यात् सर्वरत्नैरलंकृताम् ॥ ७२ ॥
प्रतिग्रहं गृहीत्वा यः पुनर्ददति साधवे ।
फलानां फलमश्नाति तदा दत्त्वा च भारत ॥ ७३ ॥
भारत! जो सोनेकी नाक और सुन्दर चाँदीके खुरोंसे विभूषित, सब प्रकारके रत्नोंसे अलंकृत, काली गौको तिलोंसे प्रच्छादित करके उसका दान करता है और जो उस दानको लेकर पुनः किसी दूसरे श्रेष्ठ पुरुषको अर्पित कर देता है, वह सर्वोत्तम फलका भागी होता है ॥ ७२-७३ ॥
ससमुद्रगुहा तेन सशैलवनकानना ।
चतुरन्ता भवेद् दत्ता पृथिवी नात्र संशयः ॥ ७४ ॥
उस गौके दानसे समुद्र, गुफा, पर्वत, वन और काननोंसहित चारों दिशाओंकी भूमिके दानका पुण्य प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ७४ ॥
अन्तर्जानुशयो यस्तु भुङ्क्ते संसक्तभाजनः ।
यो द्विजः शब्दरहितं स क्षमस्तारणाय वै ॥ ७५ ॥
जो द्विज अपने हाथोंको घुटनोंके भीतर किये मौनभावसे पात्रमें एक हाथ लगाये रखकर भोजन करता है, वह अपनेको और दूसरोंको तारनेमें समर्थ होता है ॥ ७५ ॥
अपानपा न गदितास्तथान्ये ये द्विजातयः ।
जपन्ति संहितां सम्यक् ते नित्यं तारणक्षमाः ॥ ७६ ॥
जो मदिरा नहीं पीते, जिनपर किसी प्रकारका दोष नहीं लगाया गया है तथा जो अन्य द्विज विधिपूर्वक वेदोंकी संहिताका पाठ करते हैं, वे सदा दूसरोंको तारनेमें समर्थ होते ॥ ७६ ॥
हव्यं कव्यं च यत् किंचित् सर्वं तच्छ्रोत्रियोऽर्हति ।
दत्तं हि श्रोत्रिये साधौ ज्वलितेऽग्नौ यथा हुतम् ॥ ७७ ॥
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हव्य ( यज्ञ ) और कव्य ( श्राद्ध) - की जितनी भी वस्तुएँ हैं, श्रोत्रिय ब्राह्मण उन सबको पानेका अधिकारी है । श्रेष्ठ श्रोत्रियको दिया हुआ दान उतना ही सफल होता है, जैसे प्रज्वलित अग्निमें दी हुई आहुति ॥ ७७ ॥
मन्युप्रहरणा विप्रा न विप्राः शस्त्रयोधिनः ।
निहन्युर्मन्युना विप्रा वज्रपाणिरिवासुरान् ॥ ७८ ॥
ब्राह्मणोंका क्रोध ही अस्त्र- शस्त्र है । ब्राह्मण लोहेके हथियारोंसे नहीं लड़ा करते हैं । जैसे हाथमें वज्र लिये हुए इन्द्र असुरोंका संहार कर डालते हैं, उसी प्रकार ब्राह्मण क्रोधसे ही अपराधीको नष्ट कर देते हैं ॥ ७८ ॥
धर्माश्रितेयं तु कथा कथितेयं तवानघ ।
या श्रुत्वा मुनयः प्रीता नैमिषारण्यवासिनः ॥ ७९ ॥
निष्पाप युधिष्ठिर! यह मैंने धर्मयुक्त कथा कही है । इसे सुनकर नैमिषारण्यनिवासी मुनि बड़े प्रसन्न हुए थे ॥ ७९ ॥
वीतशोकभयक्रोधा विपाप्मानस्तथैव च ।
श्रुत्वेमां तु कथां राजन् न भवन्तीह मानवाः ॥ ८० ॥
राजन्! इस कथाको सुनकर मनुष्य शोक, भय, क्रोध और पापसे रहित हो फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेते हैं ॥ ८० ॥
युधिष्ठिर उवाच
किं तच्छौचं भवेद् येन विप्रः शुद्धः सदा भवेद् ।
तदिच्छामि महाप्राज्ञ श्रोतुं धर्मभृतां वर ॥ ८१ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाप्राज्ञ महर्ष! वह शौच क्या है जिससे ब्राह्मण सदा शुद्ध बना रहता है? मैं उसे सुनना चाहता हूँ ॥ ८१ ॥
मार्कण्डेय उवाच
वाक्शौचं कर्मशौचं च यच्च शौचं जलात्मकम् ।
त्रिभिः शौचैरुपेतो यः स स्वर्गी नात्र संशयः ॥ ८२ ॥
मार्कण्डेयजीने कहा- राजन्! शौच तीन प्रकारका होता है-वाक्शौच ( वाणीकी पवित्रता ), कर्मशौच ( क्रियाकी पवित्रता ) तथा जलशौच (जलसे शरीरकी शुद्धि) । जो इस तीन प्रकारके शौचसे सम्पन्न है, वह स्वर्गलोकका अधिकारी है, इसमें संशय नहीं ॥ ८२ ॥
सायं प्रातश्च संध्यां यो ब्राह्मणोऽभ्युपसेवते ।
प्रजपन् पावनीं देवीं गायत्रीं वेदमातरम् ॥ ८३ ॥
स तया पावितो देव्या ब्राह्मणो नष्टकिल्बिषः ।
न सीदेत् प्रतिगृह्णानो महीमपि ससागराम् ॥ ८४ ॥
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जो ब्राह्मण प्रातः और सायं- इन दोनों समयकी संध्या और सबको पवित्र करनेवाली वेदमाता गायत्री देवीके मन्त्रका जप करता है; वह ब्राह्मण उन्हीं गायत्री देवीकी कृपासे परम पवित्र और निष्पाप हो जाता है । वह समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीका भी दान ग्रहण कर ले, तो भी किसी संकटमें नहीं पड़ता ॥ ८३-८४ ॥
ये चास्य दारुणाः केचिद् ग्रहाः सूर्यादयो दिवि ।
ते चास्य सौम्या जायन्ते शिवाः शिवतराः सदा ॥ ८५ ॥
इतना ही नहीं, आकाशके सूर्य आदि ग्रहोंमेंसे जो कोई भी उसके लिये भयंकर होते हैं, वे उपर्युक्त गायत्री - झपके प्रभावसे उसके लिये सदा सौम्य, सुखद एवं परम मंगलकारी हो जाते हैं ॥ ८५ ॥
सर्वे नानुगतं चैनं दारुणाः पिशिताशनाः ।
घोररूपा महाकाया धर्षयन्ति द्विजोत्तमम् ॥ ८६ ॥
भयंकर रूप और विशाल शरीरवाले, समस्त क्रूरकर्मा, मांसभक्षी राक्षस भी गायत्रीजपपरायण उस श्रेष्ठ द्विजपर आक्रमण नहीं कर सकते ॥ ८६ ॥
नाध्यापनाद्याजनाद् वा अन्यस्माद् वा प्रतिग्रहात् ।
दोषो भवति विप्राणां ज्वलिताग्निसमा द्विजाः ॥ ८७ ॥
वे संध्योपासक ब्राह्मण प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी होते हैं । पढ़ाने, यज्ञ कराने अथवा दूसरेसे दान लेनेके कारण भी उन्हें दोष नहीं छू सकता ( क्योंकि वे उनकी जीविकाके कर्म हैं ) ॥ ८७ ॥
दुर्वेदा वा सुवेदा वा प्राकृताः संस्कृतास्तथा ।
ब्राह्मणा नावमन्तव्या भस्मच्छन्ना इवाग्नयः ॥ ८८ ॥
ब्राह्मण अच्छी तरह वेद पढ़े हों या न पढ़े हों, उत्तम संस्कारोंसे युक्त हों या प्राकृत मनुष्योंकी भाँति संस्कारशून्य हों, उनका अपमान नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे राखमें छिपी हुई अताके समान हैं ॥ ८८ ॥
यथा श्मशाने दीप्तौजाः पावको नैव दुष्यति ।
एवं विद्वानविद्वान् वा ब्राह्मणो दैवतं महत् ॥ ८ ९ ॥
जैसे प्रज्वलित अग्नि श्मशानमें भी दूषित नहीं होती, उसी प्रकार ब्राह्मण विद्वान् हो या अविद्वान्, उसे महान् देवता ही मानना चाहिये ॥ ८ ९ ॥
प्राकारैश्च पुरद्वारैः प्रासादैश्च पृथग्विधैः ।
नगराणि न शोभन्ते हीनानि ब्राह्मणोत्तमैः ॥ ९० ॥
चहारदीवारियों, नगरद्वारों और भिन्न- भिन्न महलोंसे भी नगरोंकी तबतक शोभा नहीं होती जबतक वहाँ श्रेष्ठ ब्राह्मण न रहें ॥ ९ ० ॥
वेदाढ्या वृत्तसम्पन्ना ज्ञानवन्तस्तपस्विनः ।
यत्र तिष्ठन्ति वै विप्रास्तन्नाम नगरं नृप ॥ ९ १ ॥
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राजन्! वेदज्ञ, सदाचारी, ज्ञानी और तपस्वी ब्राह्मण जहाँ निवास करते हों, उसीका नाम नगर है ॥ ९ १ ॥
व्रजे वाप्यथवारण्ये यत्र सन्ति बहुश्रुताः ।
तत् तन्नगरमित्याहुः पार्थ तीर्थं च तद् भवेत् ॥ ९ २ ॥
कुन्तीनन्दन! व्रज ( गौओंके रहनेका स्थान) हो या वन, जहाँ बहुश्रुत विद्वान् रहते हों, उसे ‘ नगर' कहा गया है, वह तीर्थ भी माना गया है ॥ ९ २ ॥
रक्षितारं च राजानं ब्राह्मणं च तपस्विनम् ।
अभिगम्याभिपूज्याथ सद्यः पापात् प्रमुच्यते ॥ ९ ३ ॥
प्रजाकी रक्षा करनेवाले राजा और तपस्वी ब्राह्मणके पास जाकर उनकी सेवा - पूजा करके मनुष्य तत्काल सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ९ ३ ॥
पुण्यतीर्थाभिषेकं च पवित्राणां च कीर्तनम् ।
सद्भिः सम्भाषणं चैव प्रशस्तं कीर्त्यते बुधैः ॥ ९ ४ ॥
पुण्यतीर्थोंमें स्नान, पवित्र मन्त्रोंका कीर्तन और श्रेष्ठ पुरुषोंसे वार्तालाप–इन सबको विद्वान् पुरुषोंने उत्तम बताया है ॥ ९ ४ ॥
साधुसङ्गमपूतेन वाक्सुभाषितवारिणा ।
पवित्रीकृतमात्मानं सन्तो मन्यन्ति नित्यशः ॥ ९ ५ ॥
सत्संगसे पवित्र किये हुए वाणीके सुन्दर सम्भाषणरूप जलसे अभिषिक्त श्रेष्ठ पुरुष अपनेको सदा पवित्र हुआ मानते हैं ॥ ९ ५ ॥
त्रिदण्डधारणं मौनं जटाभारोऽथ मुण्डनम् ।
वल्कलाजिनसंवेष्टं व्रतचर्याभिषेचनम् ॥ ९ ६ ॥
अग्निहोत्रं वने वासः शरीरपरिशोषणम् ।
सर्वाण्येतानि मिथ्या स्युर्यदि भावो न निर्मलः ॥ ९ ७ ॥
त्रिदण्ड धारण करना, मौन रहना, सिरपर जटाका बोझ ढोना, मूँड़ मुँड़ाना, शरीरमें वल्कल और मृगचर्म लपेटे रहना, व्रतका आचरण करना, नहाना, अग्निहोत्र करना, वनमें रहना और शरीरको सुखा देना- ये सभी यदि भाव शुद्ध न हो तो व्यर्थ हैं ॥ ९ ६- ९ ७ ॥
न दुष्करमनाशित्वं सुकरं ह्यशनं विना ।
विशुद्धिं चक्षुरादीनां षण्णामिन्द्रियगामिनाम् ॥ ९ ८ ॥
विकारि तेषां राजेन्द्र सुदुष्करकरं मनः । राजेन्द्र! चक्षु आदि इन्द्रियोंके आहारको छोड़ देना कठिन नहीं है; क्योंकि इन्द्रियोंके छहों विषयोंका उपभोग न करनेसे वह अपने- आप सुगमतासे हो जाता है, परंतु उनमेंसे मन बड़ा विकारी है, इस कारण भावकी शुद्धिके बिना उसको वशमें करना अत्यन्त दुष्कर है ॥ ९ ८३ ॥ ये पापानि न कुर्वन्ति मनोवाक्कर्मबुद्धिभिः ।
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ते तपन्ति महात्मानो न शरीरस्य शोषणम् ॥ ९९ ॥
जो मन, वाणी, क्रिया और बुद्धिके द्वारा कभी पाप नहीं करते हैं, वे ही महात्मा तपस्वी हैं । शरीरको सुखा देना ही तपस्या नहीं है ॥ ९९ ॥
न ज्ञातिभ्यो दया यस्य शुक्लदेहोऽविकल्मषः ।
हिंसा सा तपसस्तस्य नानाशित्वं तपः स्मृतम् ॥ १०० ॥
जिसने व्रत, उपवास आदिके द्वारा शरीरको तो शुद्ध कर लिया और जो नाना प्रकारके पापकर्म भी नहीं करता, किंतु जिसके मनमें अपने कुटुम्बी जनोंके प्रति दया नहीं आती, उसकी वह निर्दयता उसके तपका नाश करनेवाली है; केवल भोजन छोड़ देनेका ही नाम तपस्या नहीं है ॥ १०० ॥
तिष्ठन् गृहे चैव मुनिर्नित्यं शुचिरलंकृतः ।
यावज्जीवं दयावांश्च सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १०१ ॥
जो निरन्तर घरपर रहकर भी पवित्र भावसे रहता है, सद्गुणोंसे विभूषित होता है और जीवनभर सब प्राणियोंपर दया रखता है, उसे मुनि ही समझना चाहिये; वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १०१ ॥
न हि पापानि कर्माणि शुद्धयबन्त्यनशनादिभिः ।
सीदत्यनशनादेव मांसशोणितलेपनः ॥ १०२ ॥
भोजन छोड़ने आदिसे पापकर्मोंका शोधन हो जाता हो, ऐसी बात नहीं है । हाँ, भोजन त्याग देनेसे यह रक्त - मांससे लिपा हुआ शरीर अवश्य क्षीण हो जाता है ॥
अज्ञातं कर्म कृत्वा च क्लेशो नान्यत् प्रहीयते ।
नाग्निर्दहति कर्माणि भावशून्यस्य देहिनः ॥ १०३ ॥
शास्त्रोंद्वारा जिनका विधान नहीं किया गया है, ऐसे कार्य करनेसे केवल क्लेश ही हाथ लगता है, उनसे पाप नष्ट नहीं किये जा सकते । अग्निहोत्र आदि शुभ कर्म भावशून्य अर्थात् श्रद्धारहित मनुष्यके पापकर्मोंको दग्ध नहीं कर सकते ॥ १०३ ॥
पुण्यादेव प्रव्रजन्ति शुद्धयन्त्यनशनानि च ।
न मूलफलभक्षित्वान्न मौनान्नानिलाशनात् ॥ १०४ ॥
शिरसो मुण्डनाद् वापि न स्थानकुटिकासनात् ।
न जटाधारणाद् वापि न तु स्थण्डिलशय्यया ॥ १०५ ॥
नित्यं ह्यनशनाद् वापि नाग्निशुश्रूषणादपि ।
न चोदकप्रवेशेन न च क्ष्माशयनादपि ॥ १०६ ॥
मनुष्य पुण्यके प्रभावसे ही उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं । उपवास भी पुण्यसे अर्थात् निष्कामभावसे ही शुद्धिका कारण होता है । ( बिना शुद्धभावके ) केवल फल - मूल खाने, मौन रहने, हवा पीने, सिर मुँड़ाने, एक स्थानपर कुटी बनाकर रहने, सिरपर जटा रखाने, वेदीपर
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सोने, नित्य उपवास, अग्निसेवन, जलप्रवेश तथा भूमिशयन करनेसे भी शुद्धि नहीं होती है ॥ १०४—१०६ ॥
ज्ञानेन कर्मणा वापि जरामरणमेव च ।
व्याधयश्च प्रहीयन्ते प्राप्यते चोत्तमं पदम् ॥ १०७ ॥
तत्त्वज्ञान या सत्कर्मसे ही जरा, मृत्यु तथा रोगोंका नाश होता है और उत्तम पद ( मुक्ति ) - की प्राप्ति होती है ॥ १०७ ॥
बीजानि ह्यग्निदग्धानि न रोहन्ति पुनर्यथा ।
ज्ञानदग्धैस्तथा क्लेशैर्नात्मा संयुज्यते पुनः ॥ १०८ ॥
जैसे आगमें जले हुए बीज फिर नहीं उगते हैं, उसी प्रकार ज्ञानके द्वारा अविद्या आदि क्लेशोंके नष्ट हो जानेपर आत्माका पुनः उनसे संयोग नहीं होता ॥ १०८ ॥
आत्मना विप्रहीणानि काष्ठकुड्योपमानि च ।
विनश्यन्ति न संदेहः फेनानीव महार्णवे ॥ १० ९ ॥
जीवात्मासे परित्यक्त होनेपर सारे शरीर काठ और दीवारकी भाँति जडवत् होकर महासागरमें उठे हुए फेनोंकी तरह नष्ट हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥
आत्मानं विन्दते येन सर्वभूतगुहाशयम् ।
श्लोकेन यदि वार्धेन क्षीणं तस्य प्रयोजनम् ॥ ११० ॥
एक या आधे श्लोकसे भी यदि सम्पूर्ण भूतोंके हृदयदेशमें शयन करनेवाले परमात्माका ज्ञान हो जाय, तो उसके लिये सम्पूर्ण शास्त्रोंके अध्ययनका प्रयोजन समाप्त हो जाता है ॥ ११० ॥
द्वयक्षरादभिसंधाय केचिच्छ्लोकपदाङ्कितैः ।
शतैरन्यैः सहस्रैश्च प्रत्ययो मोक्षलक्षणम् ॥ १११ ॥
कोई ‘ तत्त्वम्’ अथवा राम, कृष्ण, विष्णु, शिव आदि दो अक्षरोंसे ही परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं । कोई श्लोक और पदोंसे अंकित अन्य सैकड़ों तथा सहस्रों शास्त्रवाक्योंसे परमात्माके स्वरूपको जानते हैं । जैसे भी हो, बोध ही मोक्षका लक्षण है ॥ १११ ॥
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ।
ऊचुर्ज्ञानविदो वृद्धाः प्रत्ययो मोक्षलक्षणम् ॥ ११२ ॥
जिसके मनमें संशय भरा हुआ है, उसके लिये न यह लोक है न परलोक है और न सुख ही है । ‘ ज्ञान ही मोक्षका लक्षण है' – यह वृद्ध, ज्ञानी पुरुषोंका कथन है ॥ ११२ ॥
विदितार्थस्तु वेदानां परिवेद प्रयोजनम् ।
उद्विजेत् स तु वेदेभ्यो दावाग्नेरिव मानवः ॥ ११३ ॥
जब मनुष्य वेदोंके वास्तविक प्रयोजनको जान जाता है, तब वह वेदवेत्ता मानव ( कर्मविधायक ) समस्त वेदोंसे उसी प्रकार उपरत हो जाता है, जैसे मनुष्य दावानलसे हट