श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1541–1550
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1541–1550
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शिवा बोली— अग्निदेव! तुम हमें सदा ही प्रिय रहे हो; परंतु हमलोग तुमसे सदा डरती आ रही हैं । इन दिनों तुम्हारी चेष्टाओंसे मनकी बात जानकर मेरी सखियोंने मुझे तुम्हारे पास भेजा है । मैं समागमकी इच्छासे यहाँ आयी हूँ । तुम स्वतः प्राप्त हुए काम- सुखका शीघ्र उपभोग करो । हुताशन! वे भगिनीस्वरूपा सखियाँ मेरी राह देख रही हैं, अतः मैं शीघ्र चली जाऊँगी ॥ ५-६ ॥ मार्कण्डेय उवाच
ततोऽग्निरुपयेमे तां शिवां प्रीतिमुदायुतः ।
प्रीत्या देवी समायुक्ता शुक्रं जग्राह पाणिना ॥ ७ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! तब अग्निदेवने प्रेम और प्रसन्नताके साथ उस शिवाको हृदयसे लगाया । ( शिवाके रूपमें) ' स्वाहा' देवीने प्रेमपूर्वक अग्निदेवसे समागम करके उनके वीर्यको हाथमें ले लिया ॥ ७ ॥
अचिन्तयन्ममेदं ये रूपं द्रक्ष्यन्ति कानने ।
ते ब्राह्मणीनामनृतं दोषं वक्ष्यन्ति पावक ॥ ८ ॥
तत्पश्चात् उसने कुछ सोचकर कहा– ' अग्निकुलनन्दन! ' जो लोग वनमें मेरे इस रूपको देखेंगे वे ब्राह्मण- पत्नियोंको झूठा दोष लगायेंगे ॥ ८ ॥
तस्मादेतद् रक्ष्यमाणा गरुडी सम्भवाम्यहम् ।
वनान्निर्गमनं चैव सुखं मम भविष्यति ॥ ९ ॥
‘ अतः मैं इस रहस्यको गुप्त रखनेके लिये ' गरुडी ' पक्षिणीका रूप धारण कर लेती हूँ । इस प्रकार मेरा इस वनसे सुखपूर्वक निकलना सम्भव हो सकेगा' ॥ ९ ॥
मार्कण्डेय उवाच
सुपर्णी सा तदा भूत्वा निर्जगाम महावनात् ।
अपश्यत् पर्वतं श्वेतं शरस्तम्बैः सुसंवृतम् ॥ १० ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! ऐसा कहकर वह तत्काल गरुडीका रूप धारण करके उस महान् वनसे बाहर निकल गयी । आगे जानेपर उसने सरकंडोंके समूहसे आच्छादित श्वेतपर्वतके शिखरको देखा ॥ १० ॥
दृष्टीविषैः सप्तशीर्षैर्गुप्तं भोगिभिरद्भुतैः ।
रक्षोभिश्च पिशाचैश्च रौद्रैर्भूतगणैस्तथा ॥ ११ ॥
राक्षसीभिश्च सम्पूर्णमनेकैश्च मृगद्विजैः । सात सिरोंवाले अद्भुत नाग, जिनकी दृष्टिमें ही विष भरा था, उस पर्वतकी रक्षा करते थे। इनके सिवा राक्षस, पिशाच, भयानक भूतगण, राक्षसी समुदाय तथा अनेक पशु-पक्षियोंसे भी वह पर्वत भरा हुआ था ॥ ११ ॥
( नदीप्रस्रवणोपेतं नानातरुसमाचितम् । )
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सा तत्र सहसा गत्वा शैलपृष्ठं सुदुर्गमम् ॥ १२ ॥
प्राक्षिपत् काञ्चने कुण्डे शुक्रं सा त्वरिता शुभा । अनेकानेक नदी और झरने वहाँ बहते थे, तथा नाना प्रकारके वृक्ष उस पर्वतकी शोभा बढ़ाते थे । शुभस्वरूपा स्वाहा देवीने सहसा उस दुर्गम शैलशिखरपर जाकर एक सुवर्णमय कुण्डमें शीघ्रतापूर्वक उस शुक्र ( वीर्य ) को डाल दिया ॥ १२ ॥
सप्तानामपि सा देवी सप्तर्षीणां महात्मनाम् ॥ १३ ॥
पत्नीसरूपतां कृत्वा कामयामास पावकम् ।
दिव्यरूपमरुन्धत्याः कर्तुं न शकितं तया ॥ १४ ॥
तस्यास्तपःप्रभावेण भर्तृशुश्रूषणेन च ।
षट्कृत्वस्तत् तु निक्षिप्तमग्ने रेतः कुरूत्तम ॥ १५ ॥
कुरुश्रेष्ठ! उस देवीने सातों महात्मा सप्तर्षियोंकी पत्नियोंके समान रूप धारण करके अग्निदेवके साथ समागमकी इच्छा की थी; किंतु अरुन्धतीकी तपस्या तथा पति- शुश्रूषाके प्रभावसे वह उनका दिव्य रूप धारण न कर सकी, इसलिये छः बार ही अग्निके वीर्यको वहाँ डालनेमें सफल हुई ॥ १३–१५ ॥
तस्मिन् कुण्डे प्रतिपदि कामिन्या स्वाहया तदा ।
तत् स्कन्नं तेजसा तत्र संवृतं जनयत् सुतम् ॥ १६ ॥
ऋषिभिः पूजितं स्कन्नमनयत् स्कन्दतां ततः ।
षट्शिरा द्विगुणश्रोत्रो द्वादशाक्षिभुजक्रमः ॥ १७ ॥
अग्निदेवकी कामना रखनेवाली स्वाहाने प्रतिपदाको उस कुण्डमें उनका वीर्य डाला था । स्कन्दित ( स्खलित ) हुए उस वीर्यने वहाँ एक तेजस्वी पुत्रको जन्म दिया । ऋषियोंने उसका बड़ा सम्मान किया । वह स्कन्दित होनेके कारण स्कन्द कहलाया । उसके छः सिर, बारह कान, बारह नेत्र और बारह भुजाएँ थीं ॥ १६-१७ ॥
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एकग्रीवैकजठरः कुमारः समपद्यत ।
द्वितीयायामभिव्यक्तस्तृतीयायां शिशुर्बभौ ॥ १८ ॥
परंतु उस कुमारका कण्ठ और पेट एक- एक ही था । वह द्वितीयाको अभिव्यक्त हुआ और तृतीयाको शिशुरूपमें सुशोभित होने लगा ॥ १८ ॥
अङ्गप्रत्यङ्गसम्भूतश्चतुर्थ्यामभवद् गुहः ।
लोहिताभ्रेण महता संवृतः सह विद्युता ॥ १ ९ ॥
लोहिताभ्रे सुमहति भाति सूर्य इवोदितः । चतुर्थीको वे कुमार स्कन्द सभी अंग- उपांगोंसे सम्पन्न हो गये । उस समय कुमार लाल रंगके विशाल बिजलीयुक्त बादलसे आच्छादित थे । अतः अरुण रंगके मेघोंकी विशाल घटाके भीतर उदित हुए सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहे थे ॥ १ ९ ३ ॥ गृहीतं तु धनुस्तेन विपुलं लोमहर्षणम् ॥ २० ॥
न्यस्तं यत् त्रिपुरघ्नेन सुरारिविनिकृन्तनम् ।
तद् गृहीत्वा धनुः श्रेष्ठं ननाद बलवांस्तदा ॥ २१ ॥
त्रिपुरनाशक भगवान् शिवने देवशत्रुओंका विनाश करनेवाले जिस विशाल तथा रोमाञ्चकारी श्रेष्ठ धनुषको रख छोड़ा था उसे बलवान् स्कन्दने उठा लिया और बड़े जोरसे गर्जना की ॥ २०-२१ ॥ सम्मोहयन्निवेमान् स त्रीँल्लोकान् सचराचरान् ।
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तस्य तं निनदं श्रुत्वा महामेघौघनिःस्वनम् ॥ २२ ॥
उत्पेततुर्महानागौ चित्रश्चैरावतश्च ह ।
तावापतन्तौ सम्प्रेक्ष्य स बालोऽर्कसमद्युतिः ॥ २३ ॥
द्वाभ्यां गृहीत्वा पाणिभ्यां शक्तिं चान्येन पाणिना ।
अपरेणाग्निदायादस्ताम्रचूडं भुजेन सः ॥ २४ ॥
महाकायमुपश्लिष्टं कुक्कुटं बलिनां वरम् ।
गृहीत्वा व्यनदद् भीमं चिक्रीड च महाभुजः ॥ २५ ॥
ये उस गर्जनाद्वारा चराचर प्राणियोंसहित इन तीनों लोकोंको मूर्च्छित - सा कर रहे थे । महान् मेघोंकी गम्भीर ध्वनिके समान उनकी उस गर्जनाको सुनकर चित्र और ऐरावत नामक दो महागज वहाँ दौड़े आये । कुमार स्कन्द सूर्यकी कान्तिके समान उद्भासित हो रहे थे । उन दोनों हाथियोंको आते देख उन अग्निकुमारने उन्हें दो हाथोंसे पकड़ लिया तथा एक हाथमें शक्ति और दूसरेमें अरुण शिखासे विभूषित और बलवानोंमें श्रेष्ठ एवं विशाल शरीरवाले एक समीपवर्ती कुक्कुट ( मुर्गे) -को पकड़कर उन महाबाहु कुमारने भयंकर गर्जना की और ( उन हाथी- मुर्गे आदिको लिये हुए) क्रीडा करने लगे ॥ २२–२५ ॥
द्वाभ्यां भुजाभ्यां बलवान् गृहीत्वा शङ्खमुत्तमम् ।
प्राध्यापयत भूतानां त्रासनं बलिनामपि ॥ २६ ॥
तत्पश्चात् उन बलवान् वीरने दोनों हाथोंमें उत्तम शंख लेकर बजाया, जो बलवान् प्राणियोंको भी भयभीत कर देनेवाला था ॥ २६ ॥
द्वाभ्यां भुजाभ्यामाकाशं बहुशो निजघान ह ।
कीडन् भाति महासेनस्त्रीँल्लोकान् वदनैः पिबन् ॥ २७ ॥
फिर वे दो भुजाओंसे आकाशको बार- बार पीटने लगे । इस प्रकार क्रीडा करते हुए कुमार महासेन ऐसे जान पड़ते थे मानो वे अपने मुखोंसे तीनों लोकोंको पी जायँगे ॥ २७ ॥
पर्वताग्रेऽप्रमेयात्मा रश्मिमानुदये यथा ।
स तस्य पर्वतस्याग्रे निषण्णोऽद्भुतविक्रमः ॥ २८ ॥
व्यलोकयदमेयात्मा मुखैर्नानाविधैर्दिशः ।
स पश्यन् विविधान् भावांश्चकार निनदं पुनः ॥ २ ९ ॥
तस्य तं निनदं श्रुत्वा न्यपतन् बहुधा जनाः ।
भीताश्चोद्विग्नमनसस्तमेव शरणं ययुः ॥ ३० ॥
अपरिमित आत्मबलसे सम्पन्न और अद्भुत पराक्रमी स्कन्द पर्वतके शिखरपर उदयकालमें अंशुमाली सूर्यकी भाँति शोभा पा रहे थे । फिर वे उस पर्वतकी चोटीपर बैठ गये और अपने अनेक मुखोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखने लगे । भाँति - भाँतिकी वस्तुओंको देखकर वे अमेयात्मा स्कन्द पुनः बालोचित कोलाहल करने लगे । उनकी इस
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गर्जनाको सुनकर बहुत - से प्राणी पृथ्वीपर गिर गये । फिर भयभीत और उद्विग्नचित्त होकर उन सबने उन्हींकी शरण ली ॥ २८-३० ॥
ये तु तं संश्रिता देवं नानावर्णास्तदा जनाः ।
तानप्याहुः पारिषदान् ब्राह्मणाः सुमहाबलान् ॥ ३१ ॥
उस समय जिन -जिन नाना वर्णवाले जीवोंने उन स्कन्ददेवकी शरण ली, उन सबको ब्राह्मणोंने उनका महाबलवान् पार्षद बताया है ॥ ३१ ॥
स तूत्थाय महाबाहुरुपसान्त्व्य च तान् जनान् ।
धनुर्विकृष्य व्यसृजद् बाणान् श्वेते महागिरौ ॥ ३२ ॥
उन महाबाहुने उठकर उन सब प्राणियोंको सान्त्वना दी और महापर्वत श्वेतपर खड़े-खड़े धनुष खींचकर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ ३२ ॥
बिभेद स शरैः शैलं क्रौञ्चं हिमवतः सुतम् ।
तेन हंसाश्च गृध्राश्च मेरुं गच्छन्ति पर्वतम् ॥ ३३ ॥
उन बाणोंद्वारा उन्होंने हिमालयके पुत्र क्रौञ्च पर्वतको विदीर्ण कर दिया । उसी छिद्रमें होकर हंस और गृध्र पक्षी मेरु पर्वतको जाते हैं ॥ ३३ ॥
स विशीर्णोऽपतच्छैलो भृशमार्तस्वरान् रुवन् ।
तस्मिन् निपतिते त्वन्ये नेदुः शैला भृशं तदा ॥ ३४ ॥
स्कन्दके बाणोंसे छिन्न- भिन्न हो वह क्रौञ्च पर्वत अत्यन्त आर्तनाद करता हुआ गिर पड़ा । उस समय उसके गिरनेपर दूसरे पर्वत भी जोर- जोरसे चीत्कार करने लगे ॥ ३४ ॥
स तं नादं भृशार्तानां श्रुत्वापि बलिनां वरः ।
न प्राच्यवदमेयात्मा शक्तिमुद्यम्य चानदत् ॥ ३५ ॥
बलवानोंमें श्रेष्ठ और अमित आत्मबलसे सम्पन्न कुमार उन अत्यन्त आर्त पर्वतोंके उस चीत्कारको सुनकर भी विचलित नहीं हुए, अपितु हाथसे शक्तिको उठाकर सिंहनाद करने लगे ॥ ३५ ॥
सा तदा विमला शक्तिः क्षिप्ता तेन महात्मना ।
बिभेद शिखरं घोरं श्वेतस्य तरसा गिरेः ॥ ३६ ॥
उन महात्माने उस समय अपनी चमचमाती हुई शक्ति चलायी और उसके द्वारा श्वेत गिरिके भयानक शिखरको बड़े वेगसे विदीर्ण कर डाला ॥ ३६ ॥
स तेनाभिहतो दीर्णो गिरिः श्वेतोऽचलैः सह ।
उत्पपात महीं त्यक्त्वा भीतस्तस्मान्महात्मनः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार कार्तिकेयद्वारा शक्तिके आघातसे विदीर्ण होकरश्वेत पर्वत उन महात्माके भयसे डर गया और ( दूसरे ) पर्वतोंके साथ इस पृथ्वीको छोड़कर आकाशमें उड़ गया ॥ ३७ ॥
ततः प्रव्यथिता भूमिर्व्यशीर्यत समन्ततः ।
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आर्ता स्कन्दं समासाद्य पुनर्बलवती बभौ ॥ ३८ ॥
इससे पृथ्वीको बड़ी पीड़ा हुई । वह सब ओरसे फट गयी और पीड़ित हो कार्तिकेयजीकी ही शरणमें जानेपर पुनः बलवती हो शोभा पाने लगी ॥ ३८ ॥
पर्वताश्च नमस्कृत्य तमेव पृथिवीं गताः ।
अथैनमभजल्लोकः स्कन्दं शुक्लस्य पञ्चमीम् ॥ ३ ९ ॥
तत्पश्चात् पर्वतोंने भी उन्हींके चरणोंमें मस्तक झुकाया और वे फिर पृथ्वीपर आ गये । तभीसे लोग प्रत्येक मासके शुक्लपक्षकी पञ्चमीको स्कन्ददेवका पूजन करने लगे ॥ ३ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आंगिरसे कुमारोत्पत्तौ पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आङ्गिरसोपाख्यानके प्रसंगमें कुमारोत्पत्तिविषयक दो सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल ३ ९ ३ श्लोक हैं)
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षड्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः विश्वामित्रका स्कन्दके जातकर्मादि तेरह संस्कार करना और विश्वामित्रके समझानेपर भी ऋषियोंका अपनी पत्नियोंको स्वीकार न करना तथा अग्निदेव आदिके द्वारा बालक स्कन्दकी रक्षा करना मार्कण्डेय उवाच
तस्मिञ्जाते महासत्त्वे महासेने महाबले ।
समुत्तस्थुर्महोत्पाता घोररूपाः पृथग्विधाः ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! उन महान् धैर्यशाली और महाबली महासेनके जन्म लेनेपर भाँति - भाँतिके बड़े भयंकर उत्पात प्रकट होने लगे ॥ १ ॥
स्त्रीपुंसोर्विपरीतं च तथा द्वन्द्वानि यानि च ।
ग्रहा दीप्ता दिशः खं च ररास च मही भृशम् ॥ २ ॥
स्त्री- पुरुषोंका स्वभाव विपरीत हो गया। सर्दी आदि इन्होंनें भी ( अद्भुत) परिवर्तन दिखायी देने लगा । ग्रह, दिशाएँ और आकाश ये सब जलने लगे और पृथ्वी जोर- जोरसे गर्जना- सी करने लगी ॥ २ ॥
ऋषयश्च महाघोरान् दृष्ट्वोत्पातान् समन्ततः ।
अकुर्वञ्छान्तिमुद्विग्ना लोकानां लोकभावनाः ॥ ३ ॥
लोकहितकी भावना रखनेवाले महर्षि चारों ओर अत्यन्त भयंकर उत्पात देखकर उद्विग्न हो उठे और जगत्में शान्ति बनाये रखनेके लिये शास्त्रीय कर्मोंका अनुष्ठान करने लगे ॥ ३ ॥
निवसन्ति वने ये तु तस्मिंश्चैत्ररथे जनाः ।
तेऽब्रुवन्नेष नोऽनर्थः पावकेनाहितो महान् ॥ ४ ॥
संगम्य षड्भिः पत्नीभिः सप्तर्षीणामिति स्म ह । उस चैत्ररथ नामक वनमें जो लोग निवास करते थे, वे कहने लगे, ‘ अग्निने सप्तर्षियोंकी छः पत्नियोंके साथ समागम करके हमलोगोंपर यह बहुत बड़ा अनर्थ लाद दिया है' ॥ ४३ ॥
अपरे गरुडीमाहुस्त्वयानर्थोऽयमाहृतः ॥ ५ ॥
यैर्दृष्टा सा तदा देवी तस्या रूपेण गच्छती ।
न तु तत् स्वाहा कर्म कृतं जानाति वै जनः ॥ ६ ॥
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दूसरे लोगोंने उस गरुडी पक्षिणीसे कहा- ' तूने ही यह अनर्थ उपस्थित किया है' । यह उन लोगोंका विचार था, जिन्होंने स्वाहादेवीको गरुडीके रूपमें जाते देखा था । लोग यह नहीं जानते थे कि यह सारा कार्य स्वाहाने किया है ॥ ५-६ ॥
सुपर्णी तु वचः श्रुत्वा ममायं तनयस्त्विति ।
उपगम्य शनैः स्कन्दमाहाहं जननी तव ॥ ७ ॥
गरुडीने लोगोंकी बातें सुनकर कहा-' यह मेरा पुत्र है । ' फिर उसने धीरेसे स्कन्दके पास जाकर कहा — ‘ बेटा! मैं तुम्हें जन्म देनेवाली माता हूँ' ॥ ७ ॥
अथ सप्तर्षयः श्रुत्वा जातं पुत्रं महौजसम् ।
तत्यजुः षट् तदा पत्नीर्विना देवीमरुन्धतीम् ॥ ८ ॥
इधर सप्तर्षियोंने जब यह सुना कि हमारी छः पत्नियोंके रंगसे अग्निदेवके एक महातेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ है, तब उन्होंने अरुन्धती देवीके सिवा अन्य छः पत्नियोंको त्याग दिया ॥ ८ ॥
षड्भिरेव तदा जातमाहुस्तद्वनवासिनः ।
सप्तर्षीनाह च स्वाहा मम पुत्रोऽयमित्युत ॥ ९ ॥
अहं जाने नैतदेवमिति राजन् पुनः पुनः । क्योंकि उस वनके निवासियोंने उस समय छः पत्नियोंके गर्भसे ही उस बालककी उत्पत्ति बतायी थी । राजन्! यद्यपि स्वाहाने सप्तर्षियोंसे बार- बार कहा कि ' यह मेरा पुत्र है । मैं इसके जन्मका रहस्य जानती हूँ; लोग जैसी बात उड़ा रहे हैं, वैसी नहीं है । ' ( तो भी वे सहसा उसकी बातपर विश्वास न कर सके ) ॥ ९ ३ ॥ विश्वामित्रस्तु कृत्वेष्टिं सप्तर्षीणां महामुनिः ॥ १० ॥
पावकं कामसंतप्तमदृष्टः पृष्ठतोऽन्वगात् ।
तत् तेन निखिलं सर्वमवबुद्धं यथातथम् ॥ ११ ॥
महामुनि विश्वामित्र जब सप्तर्षियोंकी इष्टि पूर्ण कर चुके, तब वे भी कामपीड़ित अग्निके पीछे - पीछे गुप्तरूपसे चल दिये थे, उस समय कोई उन्हें देख नहीं पाता था । अतः उन्होंने यह सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे जान लिया ॥ १०-११ ॥
विश्वामित्रस्तु प्रथमं कुमारं शरणं गतः ।
स्तवं दिव्यं सम्प्रचक्रे महासेनस्य चापि सः ॥ १२ ॥
विश्वामित्रजी सबसे पहले कुमार कार्तिकेयकी शरणमें गये तथा उन्होंने महासेनकी दिव्य स्तोत्रोंद्वारा स्तुति भी की ॥ १२ ॥
मङ्गलानि च सर्वाणि कौमाराणि त्रयोदश ।
जातकर्मादिकास्तस्य क्रियाश्चक्रे महामुनिः ॥ १३ ॥
उन महामुनिने कुमारके सारे मांगलिक कृत्य सम्पन्न किये । जातकर्म आदि तेरह क्रियाओंका भी अनुष्ठान किया ॥ १३ ॥
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षड्वक्त्रस्य तु माहात्म्यं कुक्कुटस्य तु साधनम् ।
शक्त्या देव्याः साधनं च तथा पारिषदामपि ॥ १४ ॥
विश्वामित्रश्चकारैतत् कर्म लोकहिताय वै ।
तस्मादृषिः कुमारस्य विश्वामित्रोऽभवत् प्रियः ॥ १५ ॥
स्कन्दकी महिमा, उनके द्वारा कुक्कुट पक्षीका धारण, देवीके समान प्रभावशालिनी शक्तिका ग्रहण तथा पार्षदोंका वरण आदि कुमारके सभी कार्योंको विश्वामित्रने लोकहितके लिये आवश्यक सिद्ध किया । अतः विश्वामित्र मुनि कुमारके अधिक प्रिय हो गये ॥ १४-१५ ॥
अन्वजानाच्च स्वाहाया रूपान्यत्वं महामुनिः ।
अब्रवीच्च मुनीन् सर्वान् नापराध्यन्ति वै स्त्रियः ॥ १६ ॥
श्रुत्वा तु तत्त्वतस्तस्मात् ते पत्नीः सर्वतोऽत्यजन् । महामुनि विश्वामित्रने यह जान लिया था कि स्वाहाने अन्य ऋषिपत्नियोंके रूप धारण करके अग्निदेवसे सम्बन्ध स्थापित किया था; इसलिये उन्होंने सब ऋषियोंसे कहा ——आपकी स्त्रियोंका कोई अपराध नहीं है' उनके मुखसे यथार्थ बात जानकर भी ऋषियोंने अपनी पत्नियोंको सर्वथा त्याग ही दिया ॥ १६३ ॥
मार्कण्डेय उवाच स्कन्दं श्रुत्वा तदा देवा वासवं सहिताऽब्रुवन् ॥ १७ ॥
अविषह्यबलं स्कन्दं जहि शक्राशु माचिरम् ।
यदि वा न निहंस्येनं देवेन्द्रोऽयं भविष्यति ॥ १८ ॥
त्रैलोक्यं संनिगृह्यास्मांस्त्वां च शक्र महाबल । मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! उस समय स्कन्दके जन्म और बल - पराक्रमका समाचार सुनकर सब देवताओंने एकत्र हो इन्द्रसे कहा — ' देवेश्वर! स्कन्दका बल असह्य है । शीघ्र उन्हें मार डालिये; विलम्ब न कीजिये । महाबली इन्द्र! यदि आप इन्हें अभी नहीं मारते हैं तो ये त्रिलोकीको, हम सबको तथा आपको भी अपने वशमें करके ‘ देवेन्द्र ’ बन बैठेंगे' ॥ १७-१८३ ॥ स तानुवाच व्यथितो बालोऽयं सुमहाबलः ॥ १९ ॥
स्रष्टारमपि लोकानां युधि विक्रम्य नाशयेत् ।
न बालमुत्सहे हन्तुमिति शक्रः प्रभाषते ॥ २० ॥
तब इन्द्रने व्यथित होकर उन देवताओंसे कहा- ' देवताओ! यह बालक बड़ा बलवान् है । यह लोकस्रष्टा ब्रह्माको भी युद्धमें पराक्रम करके मार सकता है । अतः मुझमें इस
बालकको मारनेका साहस नहीं है । ' इन्द्र बार- बार यही बात दुहराने लगे ॥ १ ९-२० ॥
तेऽब्रुवन् नास्ति ते वीर्यं यत एवं प्रभाषसे ।
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सर्वास्त्वद्याभिगच्छन्तु स्कन्दं लोकस्य मातरः ॥ २१ ॥
कामवीर्या घ्नन्तु चैनं तथेत्युक्त्वा च ता ययुः । यह सुनकर देवता बोले- ' आपमें अब बल और पराक्रम नहीं रह गया है, इसीलिये ऐसी बातें कहते हैं । हमारी राय है कि सम्पूर्ण लोकमातृकाएँ स्कन्दके पास जायँ । ये इच्छानुसार पराक्रम प्रकट कर सकती हैं; अतः स्कन्दको मार डालें । ' तब ' बहुत अच्छा ’ कहकर वे मातृकाएँ वहाँसे चल दीं ॥ २१ ॥
तमप्रतिबलं दृष्ट्वा विषण्णवदनास्तु ताः ॥ २२ ॥
अशक्योऽयं विचिन्त्यैवं तमेव शरणं ययुः ।
ऊचुश्चैनं त्वमस्माकं पुत्रो भव महाबल ॥ २३ ॥
परंतु स्कन्दका अप्रतिम बल देखकर उनके मुखपर उदासी छा गयी । वे सोचने लगीं ——इस वीरको पराजित करना असम्भव है । ' ऐसा निश्चय होनेपर वे उन्हींकी शरणमें गयीं और बोलीं – ‘ महाबली कुमार! तुम हमारे पुत्र हो जाओ, हमें माता मान लो ॥ २२-२३ ॥
अभिनन्दस्व नः सर्वाः प्रस्नुताः स्नेहविक्लवाः ।
तासां तद् वचनं श्रुत्वा पातुकामः स्तानान् प्रभुः ॥ २४ ॥
'देखो, हम पुत्र- स्नेहसे विकल हो रही हैं, हमारे स्तनोंसे दूध झर रहा है इसे पीकर हम सबको सम्मानित और आनन्दित करो । ' मातृकाओंकी यह बात सुनकर समर्थ स्कन्दके मनमें उनके स्तनपानकी इच्छा जाग्रत हो गयी ॥ २४ ॥
ताः सम्पूज्य महासेनः कामांश्चासां प्रदाय सः ।
अपश्यदग्निमायान्तं पितरं बलिनां बली ॥ २५ ॥
फिर महासेनने उन सबका समादर करके उनकी मनोवाञ्छा पूर्ण की । तदनन्तर बलवानोंमें बलिष्ठ वीर स्कन्दने अपने पिता अग्निदेवको आते देखा ॥ २५ ॥
स तु सम्पूजितस्तेन सह मातृगणेन ह ।
परिवार्य महासेनं रक्षमाणः स्थितः शिवः ॥ २६ ॥
कुमार महासेनके द्वारा पूजित हो मंगलकारी अग्निदेव मातृकागणोंके साथ उन्हें घेरकर खड़े हो गये और उनकी रक्षा करने लगे ॥ २६ ॥
सर्वासां या तु मातॄणां नारी क्रोधसमुद्भवा ।
धात्री स्वपुत्रवत् स्कन्दं शूलहस्ताभ्यरक्षत ॥ २७ ॥
उस समय सम्पूर्ण मातृकाओंके क्रोधसे जो एक नारीमूर्ति प्रकट हुई थी, वह हाथमें त्रिशूल ले धायकी भाँति अपने पुत्रके समान प्रिय स्कन्दकी सब ओरसे रक्षा करने लगी ॥ २७ ॥
लोहितस्योदधेः कन्या क्रूरा लोहितभोजना ।
परिष्वज्य महासेनं पुत्रवत् पर्यरक्षत ॥ २८ ॥