श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1721–1730
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1721–1730
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दूतगण तेज चलनेवाले वाहनोंपर सवार हो जिन्हें जैसी आज्ञा मिली थी, उसके अनुसार कर्तव्यपालनके लिये प्रस्थित हुए। उन्हींमेंसे एक जाते हुए दूतसे दुःशासनने कहा
॥७गच्छ॥द्वैतवनं शीघ्रं पाण्डवान् पापपूरुषान् ।
निमन्त्रय यथान्यायं विप्रांस्तस्मिन् वने तदा ॥ ८ ॥
' तुम शीघ्रतापूर्वक द्वैतवनमें जाओ और पापात्मा पाण्डवों तथा उस वनमें रहनेवाले ब्राह्मणोंको यथोचित रीतिसे निमन्त्रण दे आओ ' ॥ ८ ॥
स गत्वा पाण्डवान् सर्वानुवाचाभिप्रणम्य च ।
दुर्योधनो महाराज यजते नृपसत्तमः ॥ ९ ॥
स्ववीर्यार्जितमर्थौघमवाप्य कुरुसत्तमः ।
तत्र गच्छन्ति राजानो ब्राह्मणाश्च ततस्ततः ॥ १० ॥
उस दूतने समस्त पाण्डवोंके पास जाकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा ——महाराज! कुरुकुलके श्रेष्ठ पुरुष नृपतिशिरोमणि दुर्योधन अपने पराक्रमसे अतुल धनराशि प्राप्तकर एक यज्ञ कर रहे हैं । उसमें ( विभिन्न स्थानोंसे ) बहुत - से राजा और ब्राह्मण पधार रहे हैं ॥ ९ -१० ॥
अहं तु प्रेषितो राजन् कौरवेण महात्मना ।
आमन्त्रयति वो राजा धार्तराष्ट्रो जनेश्वरः ॥ ११ ॥
मनोऽभिलषितं राज्ञस्तं क्रतुं द्रष्टुमर्हथ । ‘ राजन्! महामना दुःशासनने मुझे आपके पास भेजा है। जननायक महाराज दुर्योधन आपलोगोंको उस यज्ञमें बुला रहे हैं । आपलोग चलकर राजाके मनोवांछित उस यज्ञका दर्शन कीजिये ' ॥ ११३ ॥
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ततो युधिष्ठिरो राजा तच्छ्रुत्वा दूतभाषितम् ॥ १२ ॥
अब्रवीन्नृपशार्दूलो दिष्ट्या राजा सुयोधनः ।
यजते क्रतुमुख्येन पूर्वेषां कीर्तिवर्धनः ॥ १३ ॥
दूतका यह कथन सुनकर राजाओंमें सिंहके समान महाराज युधिष्ठिरने इस प्रकार उत्तर दिया- ' सौभाग्यकी बात है कि पूर्वजोंकी कीर्ति बढ़ानेवाले राजा सुयोधन श्रेष्ठ यज्ञके द्वारा भगवान्का यजन कर रहे हैं ॥ १२-१३ ॥
वयमप्युपयास्यामो न त्विदानीं कथंचन ।
समयः परिपाल्यो नो यावद् वर्षं त्रयोदशम् ॥ १४ ॥
' हम भी उस यज्ञमें चलते, परंतु इस समय यह किसी तरह सम्भव नहीं है । हमें तेरह वर्षतक वनमें रहनेकी अपनी प्रतिज्ञाका पालन करना है' ॥ १४ ॥
श्रुत्वैतद् धर्मराजस्य भीमो वचनमब्रवीत् ।
तदा तु नृपतिर्गन्ता धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ १५ ॥
अस्त्रशस्त्रप्रदीप्तेऽग्नौ यदा तं पातयिष्यति ।
वर्षात् त्रयोदशादूर्ध्वं रणसत्रे नराधिपः ॥ १६ ॥
यदा क्रोधहविर्मोक्ता धार्तराष्ट्रेषु पाण्डवः ।
आगन्ताहं तदास्मीति वाच्यस्ते स सुयोधनः ॥ १७ ॥
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धर्मराजकी यह बात सुनकर भीमसेनने दूतसे इस प्रकार कहा - ' दूत! तुम राजा दुर्योधनसे जाकर यह कह देना कि सम्राट् धर्मराज युधिष्ठिर तेरह वर्ष बीतनेके पश्चात् उस समय वहाँ पधारेंगे जब कि रणयज्ञमें अस्त्र- शस्त्रोंद्वारा प्रज्वलित की हुई रोषाग्निमें वे तुम्हारी आहुति देंगे। जब रोषकी आगमें जलते हुए धृतराष्ट्रके पुत्रोंपर पाण्डव अपने क्रोधरूपी घीकी आहुति डालनेको उद्यत होंगे, उस समय मैं ( भीमसेन ) वहाँ पदार्पण करूँगा' ॥ १५–१७ ॥
शेषास्तु पाण्डवा राजन् नैवोचुः किंचिदप्रियम् ।
दूतश्चापि यथावृत्तं धार्तराष्ट्रे न्यवेदयत् ॥ १८ ॥
राजन्! शेष पाण्डवोंने कोई अप्रिय वचन नहीं कहा । दूतने भी लौटकर दुर्योधनसे सब समाचार ठीक - ठीक बता दिया ॥ १८ ॥
अथाजग्मुर्नरश्रेष्ठा नानाजनपदेश्वराः ।
ब्राह्मणाश्च महाभाग धार्तराष्ट्रपुरं प्रति ॥ १ ९ ॥
महाभाग! तदनन्तर विभिन्न देशोंके अधिपति नरश्रेष्ठ भूपाल तथा ब्राह्मण दुर्योधनकी राजधानी हस्तिनापुरमें आये ॥ १ ९ ॥
ते त्वर्चिता यथाशास्त्रं यथाविधि यथाक्रमम् ।
मुदा परमया युक्ताः प्रीताश्चापि नरेश्वराः ॥ २० ॥
उन सबकी शास्त्रीय विधिसे यथोचित सेवा- पूजा की गयी । इससे वे नरेशगण अत्यन्त -ही--मनम आनन्दका अनुभव करनेप्रसन्न हो मन- लगे ॥ २० ॥ धृतराष्ट्रोऽपि राजेन्द्र संवृतः सर्वकौरवैः ।
हर्षेण महता युक्तो विदुरं प्रत्यभाषत ॥ २१ ॥
राजेन्द्र! समस्त कौरवोंसे घिरे हुए धृतराष्ट्रको भी बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने विदुरसे कहा ॥ २१ ॥
यथा सुखी जनः सर्वः क्षत्तः स्यादन्नसंयुतः ।
तुष्येत् तु यज्ञसदने तथा क्षिप्रं विधीयताम् ॥ २२ ॥
‘ भैया! शीघ्र ऐसी व्यवस्था करो, जिससे इस यज्ञमण्डपमें पधारे हुए सभी लोग खान-पानसे संतुष्ट एवं सुखी हों' ॥ २२ ॥
विदुरस्तु तदाज्ञाय सर्ववर्णानरिंदम ।
यथा प्रमाणतो विद्वान् पूजयामास धर्मवित् ॥ २३ ॥
शत्रुदमन जनमेजय! धर्मज्ञ एवं विद्वान् विदुरजीने सब मनुष्योंकी ठीक- ठीक संख्याका ज्ञान करके उन सबका यथोचित स्वागत- सत्कार किया ॥ २३ ॥
भक्ष्यपेयान्नपानेन माल्यैश्चापि सुगन्धिभिः ।
वासोभिर्विविधैश्चैव योजयामास हृष्टवत् ॥ २४ ॥
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वे बड़े हर्षके साथ सभी अतिथियोंको उत्तम भक्ष्य, पेय, अन्न-पान, सुगन्धित पुष्पहार तथा नाना प्रकारके वस्त्र देने लगे ॥ २४ ॥
कृत्वा ह्यावसथान् वीरो यथाशास्त्रं यथाक्रमम् ।
सान्त्वयित्वा च राजेन्द्रो दत्त्वा च विविधं वसु ॥ २५ ॥
विसर्जयामास नृपान् ब्राह्मणांश्च सहस्रशः । वीर राजा दुर्योधनने सभीको शास्त्रानुसार यथायोग्य निवासगृह बनवाकर उनमें ठहराया था । उसने सब प्रकारसे आश्वासन तथा भाँति- भाँतिके रत्न देकर सहस्रों राजाओं तथा ब्राह्मणोंको विदा किया ॥ २५३ ॥
विसृज्य च नृपान् सर्वान् भ्रातृभिः परिवारितः ॥ २६ ॥
विवेश हास्तिनपुरं सहितः कर्णसौबलैः ॥ २७ ॥
इस प्रकार सब राजाओंको विदा देकर भाइयोंसे घिरे हुए दुर्योधनने कर्ण और शकुनिके साथ हस्तिनापुरमें प्रवेश किया ॥ २६-२७ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनयज्ञे षट्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनका यज्ञविषयक दो सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५६ ॥
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सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः दुर्योधनके यज्ञके विषयमें लोगोंका मत, कर्णद्वारा अर्जुनके वधकी प्रतिज्ञा, युधिष्ठिरकी चिन्ता तथा दुर्योधनकी शासननीति वैशम्पायन उवाच
प्रविशन्तं महाराज सूतास्तुष्टुवुरच्युतम् ।
जनाश्चापि महेष्वासं तुष्टुवू राजसत्तम ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -महाराज! राजश्रेष्ठ! नगरमें प्रवेश करते समय सूतों तथा अन्य लोगोंने भी अटल निश्चयी और महान् धनुर्धर राजा दुर्योधनकी भूरि- भूरि प्रशंसा की ॥ १ ॥
लाजैश्चन्दनचूर्णैश्च विकीर्य च जनास्ततः ।
ऊचुर्दिष्ट्या नृपाविघ्नः समाप्तोऽयं क्रतुस्तव ॥ २ ॥
तत्पश्चात् सब लोग लावा और चन्दनचूर्ण बिखेरकर कहने लगे — ' महाराज! आपका यह यज्ञ बिना किसी विघ्न- बाधाके पूर्ण हो गया, यह बड़े सौभाग्यकी बात है ' ॥ २ ॥
अपरे त्वब्रुवंस्तत्र वातिकास्तं महीपतिम् ।
युधिष्ठिरस्य यज्ञेन न समो ह्येष ते क्रतुः ॥ ३ ॥
वहीं कुछ ऐसे लोग भी थे, जिनका मस्तिष्क वातरोगसे विकृत था - कब क्या कहना उचित है, इसको वे नहीं जानते थे, अतः राजा दुर्योधनको सम्बोधित करके कहने लगे —‘राजन्! आपका यह यज्ञ युधिष्ठिरके यज्ञके समान नहीं था ' ॥ ३ ॥
नैव तस्य क्रतोरेष कलामर्हति षोडशीम् ।
एवं तत्राब्रुवन् केचिद् वातिकास्तं जनेश्वरम् ॥ ४ ॥
कुछ अन्य वायुरोगग्रस्त लोग राजा दुर्योधनसे इस प्रकार कहने लगे- ‘ यह यज्ञ तो युधिष्ठिरके यज्ञकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं है ' ॥ ४ ॥
सुहृदस्त्वब्रुवंस्तत्र अति सर्वानयं क्रतुः ।
ययातिर्नहुषश्चापि मान्धाता भरतस्तथा ॥ ५ ॥
क्रतुमेनं समाहृत्य पूताः सर्वे दिवं गताः । जो राजाके सुहृद् थे, वे वहाँ इस प्रकार बोले — ' यह यज्ञ पिछले सब यज्ञोंसे बढ़कर हुआ है । ययाति, नहुष, मांधाता और भरत भी इस यज्ञ कर्मका अनुष्ठान करके पवित्र हो सब-के-- सब स्वर्गलोकमें गये हैं' ॥ ५३ ॥
एता वाचः शुभाः शृण्वन् सुहृदां भरतर्षभ ॥ ६ ॥
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प्रविवेश पुरं हृष्टः स्ववेश्म च नराधिपः । भरतश्रेष्ठ! सुहृदोंकी ये सुन्दर बातें सुनता हुआ राजा दुर्योधन प्रसन्नतापूर्वक नगरमें प्रवेश करके अपने राजभवनमें गया ॥ ६३ ॥
अभिवाद्य ततः पादौ मातापित्रोर्विशाम्पते ॥ ७ ॥
भीष्मद्रोणकपादीनां विद्रस्य च धीमतः ।
अभिवादितः कनीयोभिर्भ्रातृभिर्भ्रातृनन्दनः ॥ ८ ॥
महाराज! उसने सबसे पहले अपने माता-पिताके चरणोंमें प्रणाम किया । तत्पश्चात् क्रमशः भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य आदिको तथा बुद्धिमान् विदुरजीको भी मस्तक झुकाया । तदनन्तर छोटे भाइयोंने आकर भ्राताओंका आनन्द बढ़ानेवाले दुर्योधनको प्रणाम किया ॥ ७-८ ॥
निषसादासने मुख्ये भ्रातृभिः परिवारितः ।
तमुत्थाय महाराजं सूतपुत्रोऽब्रवीद् वचः ॥ ९ ॥
इसके बाद सब भाइयोंसे घिरा हुआ अपने प्रमुख राजसिंहासनपर विराजमान हुआ ।
उस समय सूतपुत्र कर्णने उठकर महाराज दुर्योधनसे इस प्रकार कहा- ॥ ९ ॥
दिष्ट्या ते भरतश्रेष्ठ समाप्तोऽयं महाक्रतुः ।
हतेषु युधि पार्थेषु राजसूये तथा त्वया ॥ १० ॥
आहृतेऽहं नरश्रेष्ठ त्वां सभाजयिता पुनः । ‘ भरतश्रेष्ठ! सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारा यह महान् यज्ञ सकुशल समाप्त हुआ । नरश्रेष्ठ! जब युद्धमें पाण्डव मारे जायँगे, उस समय तुम्हारे द्वारा आयोजित राजसूययज्ञकी समाप्तिपर मैं पुनः इसी प्रकार तुम्हारा अभिनन्दन करूँगा' ॥ १०३ ॥
तमब्रवीन्महाराजो धार्तराष्ट्रो महायशाः ॥ ११ ॥
सत्यमेतत् त्वयोक्तं हि पाण्डवेषु दुरात्मसु ।
निहतेषु नरश्रेष्ठ प्राप्ते चापि महाक्रतौ ॥ १२ ॥
राजसूये पुनर्वीर त्वमेवं वर्धयिष्यसि । तब महायशस्वी महाराज दुर्योधनने उससे इस प्रकार कहा- ' वीर! तुम्हारा यह कथन सत्य है । नरश्रेष्ठ! जब दुरात्मा पाण्डव मारे जायँगे, उस समय महायज्ञ राजसूयके समाप्त होनेपर तुम पुनः इसी प्रकार मेरा अभिनन्दन करोगे' ॥ ११-१२ ॥ एवमुक्त्वा महाराज कर्णमाश्लिष्य भारत ॥ १३ ॥
राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं चिन्तयामास कौरवः । भरतकुलभूषण! महाराज! ऐसा कहकर दुर्योधनने कर्णको छातीसे लगा लिया और क्रतुश्रेष्ठ राजसूयका चिन्तन करने लगा ॥ १३३ ॥
सोऽब्रवीत् कौरवांश्चापि पार्श्वस्थान् नृपसत्तमः ॥ १४ ॥
कदा तु तं क्रतुवरं राजसूयं महाधनम् ।
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निहत्य पाण्डवान् सर्वानाहरिष्यामि कौरवाः ॥ १५ ॥
नृपश्रेष्ठ दुर्योधनने अपने पास खड़े हुए कौरवोंको सम्बोधित करके कहा — ' कुरुकुलके राजकुमारो! कब ऐसा समय आयगा जब मैं समस्त पाण्डवोंको मारकर प्रचुर धनसे सम्पन्न होनेवाले उस क्रतुश्रेष्ठ राजसूयका अनुष्ठान करूँगा' ॥ १४-१५ ॥
तमब्रवीत् तदा कर्णः शृणु मे राजकुञ्जर ।
पादौ न धावये तावद् यावन्न निहतोऽर्जुनः ॥ १६ ॥
कीलालजं न खादेयं करिष्ये चासुरव्रतम् ।
नास्तीति नैव वक्ष्यामि याचितो येन केनचित् ॥ १७ ॥
उस समय कर्णने दुर्योधनसे कहा – ' नृपश्रेष्ठ! मेरी यह प्रतिज्ञा सुन लो— ' जबतक अर्जुन मेरे हाथसे मारा नहीं जाता, तबतक मैं दूसरोंसे पैर नहीं धुलवाऊँगा, केवल जलसे उत्पन्न पदार्थ नहीं खाऊँगा और आसुरव्रत ( क्रूरता आदि ) नहीं धारण करूँगा । किसीके भी कुछ माँगनेपर ‘ नहीं है ', ऐसी बात नहीं कहूँगा' ॥ १६-१७ ॥
अथोत्क्रुष्टं महेष्वासैर्धार्तराष्ट्रैर्महारथैः ।
प्रतिज्ञाते फाल्गुनस्य वधे कर्णेन संयुगे ॥ १८ ॥
कर्णके द्वारा युद्धमें अर्जुनके वधकी प्रतिज्ञा करनेपर महान् धनुर्धर महारथी धृतराष्ट्रपुत्रोंने बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ १८ ॥
विजितांश्चाप्यमन्यन्त पाण्डवान् धृतराष्ट्रजाः ।
दुर्योधनोऽपि राजेन्द्र विसृज्य नरपुङ्गवान् ॥ १९ ॥
प्रविवेश गृहं श्रीमान् यथा चैत्ररथं प्रभुः ।
तेऽपि सर्वे महेष्वासा जग्मुर्वेश्मानि भारत ॥ २० ॥
उस दिनसे कौरव पाण्डवोंको पराजित ही मानने लगे । राजेन्द्र! तदनन्तर जैसे देवराज इन्द्र चैत्ररथ नामक उद्यानमें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार श्रीमान् राजा दुर्योधनने उन नरपुंगवोंको विदा करके अपने महलमें प्रवेश किया । भारत! तदनन्तर वे सभी महाधनुर्धर वीर अपने - अपने भवनमें चले गये ॥ १ ९ -२० ॥
पाण्डवाश्च महेष्वासा दूतवाक्यप्रचोदिताः ।
चिन्तयन्तस्तमेवार्थं नालभन्त सुखं क्वचित् ॥ २१ ॥
इधर महाधनुर्धर पाण्डव दूतके वाक्यसे प्रेरित हो उसी विषयका चिन्तन करते हुए कभी चैन नहीं पाते थे ॥
भूयश्च चारै राजेन्द्र प्रवृत्तिरुपपादिता ।
प्रतिज्ञा सूतपुत्रस्य विजयस्य वधं प्रति ॥ २२ ॥
महाराज! फिर उन्होंने गुप्तचरोंद्वारा वह समाचार भी प्राप्त कर लिया, जिसमें अर्जुनके वधके लिये सूतपुत्र कर्णकी प्रतिज्ञा दुहरायी गयी थी ॥ २२ ॥
एतच्छ्रुत्वा धर्मसुतः समुद्विग्नो नराधिप ।
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अभेद्यकवचं मत्वा कर्णमद्भुतविक्रमम् ॥ २३ ॥
अनुस्मरंश्च संक्लेशान् न शान्तिमुपयाति सः । राजन्! यह सब सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर उद्विग्न हो उठे । वे विचारने लगे— ' कर्णका कवच अभेद्य है और उसका पराक्रम भी अद्भुत है । ' यह मानकर तथा वनके क्लेशोंका स्मरण करके उन्हें शान्ति नहीं प्राप्त होती थी ॥ २३ ॥
तस्य चिन्तापरीतस्य बुद्धिर्जज्ञे महात्मनः ॥ २४ ॥
बहुव्यालमृगाकीर्णं त्यक्तुं द्वैतवनं वनम् । इस प्रकार चिन्तासे घिरे हुए महात्मा युधिष्ठिरके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि ‘ अनेक प्रकारके सर्पों तथा मृगोंसे भरे हुए इस द्वैतवनको छोड़कर हम कहीं अन्यत्र चले चलें' ॥ २४३ ॥
धार्तराष्ट्रोऽपि नृपतिः प्रशशास वसुन्धराम् ॥ २५ ॥
भ्रातृभिः सहितो वीरैर्भीष्मद्रोणकृपैस्तथा ।
सङ्गम्य सूतपुत्रेण कर्णेनाहवशोभिना ॥ २६ ॥
( सततं प्रीयमाणो वै देविना सौबलेन च । ) इधर राजा दुर्योधन भी अपने वीर भाइयोंके साथ रहकर भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, युद्धमें शोभा पानेवाले सूतपुत्र कर्ण तथा द्यूतकुशल शकुनिसे मिलकर निरन्तर प्रसन्नताका अनुभव करता हुआ इस पृथ्वीका शासन करने लगा ॥
दुर्योधनः प्रिये नित्यं वर्तमानो महीभृताम् ।
पूजयामास विप्रेन्द्रान् क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ॥ २७ ॥
दुर्योधन सदा अपने अधीन रहनेवाले राजाओंका प्रिय करने लगा और प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका भी स्वागत- सत्कार करता रहा ॥ २७ ॥
भ्रातॄणां च प्रियं राजन् स चकार परंतपः ।
निश्चित्य मनसा वीरो दत्तभुक्तफलं धनम् ॥ २८ ॥
राजन्! शत्रुओंको संताप देनेवाला वीर दुर्योधन निरन्तर अपने भाइयोंका प्रिय कार्य किया करता था । ‘ धनके दो ही फल हैं- दान और भोग' ऐसा मन-ही- मन निश्चय करके वह इन्हींमें धनका उपयोग करता था ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि युधिष्ठिरचिन्तायां सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २५७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें युधिष्ठिरकी चिन्तासे सम्बन्ध रखनेवाला दो सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५७ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल २८३ श्लोक हैं )
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(मृगस्वप्नोद्भवपर्व ) अष्टपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः पाण्डवोंका काम्यकवनमें गमन जनमेजय उवाच
दुर्योधनं मोक्षयित्वा पाण्डुपुत्रा महाबलाः ।
किमकार्षुर्वने तस्मिंस्तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा — दुर्योधनको गन्धर्वोके बन्धनसे छुड़ाकर महाबली पाण्डवोंने उस वनमें कौन - सा कार्य किया? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततः शयानं कौन्तेयं रात्रौ द्वैतवने मृगाः ।
स्वप्नान्ते दर्शयामासुर्बाष्पकण्ठा युधिष्ठिरम् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजीने कहा - तदनन्तर एक रातमें जब कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर सो रहे थे, स्वप्नमें द्वैतवनके सिंह-बाघ आदि हिंस्र पशुओंने उन्हें दर्शन दिया । उन सबके कण्ठ आँसुओंसे रुँधे हुए थे ॥ २ ॥
तानब्रवीत् स राजेन्द्रो वेपमानान् कृताञ्जलीन् ।
ब्रूत यद् वक्तुकामाः स्थ के भवन्तः किमिष्यते ॥ ३ ॥
वे थर- थर काँपते हुए हाथ जोड़कर खड़े थे । महाराज युधिष्ठिरने उनसे पूछा ——आपलोग कौन हैं? क्या कहना चाहते हैं? आपकी क्या इच्छा है? बताइये ' ॥ ३ ॥
एवमुक्ताः पाण्डवेन कौन्तेयेन यशस्विना ।
प्रत्यब्रुवन् मृगास्तत्र हतशेषा युधिष्ठिरम् ॥ ४ ॥
यशस्वी पाण्डव कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर मरनेसे बचे हुए हिंसक पशुओंने उनसे कहा— ॥ ४ ॥
वयं मृगा द्वैतवने हतशिष्टास्तु भारत ।
नोत्सीदेम महाराज क्रियतां वासपर्ययः ॥ ५ ॥
‘ भारत! हम द्वैतवनके पशु हैं । आपलोगोंके मारनेसे हमारी इतनी ही संख्या शेष रह गयी है । महाराज! हमारा सर्वथा संहार न हो जाय, इसके लिये आप अपना निवासस्थान बदल दीजिये ॥ ५ ॥
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भवतो भ्रातरः शूराः सर्व एवास्त्रकोविदाः ।
कुलान्यल्पावशिष्टानि कृतवन्तो वनौकसाम् ॥ ६ ॥
' आपके सभी भाई शूरवीर एवं अस्त्रविद्याके पण्डित हैं । इन्होंने हम वनवासी हिंसक पशुओंके कुलोंको थोड़ी ही संख्यामें जीवित छोड़ा है ॥ ६ ॥
बीजभूता वयं केचिदवशिष्टा महामते ।
विवर्धेमहि राजेन्द्र प्रसादात् ते युधिष्ठिर ॥ ७ ॥
‘ महामते! हम सिंह, बाघ आदि पशु थोड़ी- सी संख्यामें अपने वंशके बीजमात्र शेष रह गये हैं । महाराज युधिष्ठिर! आपकी कृपासे हमारे वंशकी वृद्धि हो, यही हम निवेदन करते हैं ' ॥ ७ ॥
तान् वेपमानान् वित्रस्तान् बीजमात्रावशेषितान् ।
मृगान् दृष्ट्वा सुदुःखार्तो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ८ ॥
वे सिंह - बाघ आदि पशु त्रस्त होकर थर- थर काँप रहे थे और बीजमात्र ही शेष रह गये थे । उनकी यह दयनीय दशा देखकर धर्मराज युधिष्ठिर अत्यन्त दुःखसे व्याकुल हो गये ॥ ८ ॥
तांस्तथेत्यब्रवीद् राजा सर्वभूतहिते रतः ।
यथा भवन्तो ब्रुवते करिष्यामि च तत् तथा ॥ ९ ॥
समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले राजा युधिष्ठिरने उनसे कहा — ' बहुत अच्छा, तुमलोग जैसा कहते हो, वैसा ही करूंगा' ॥ ९ ॥
इत्येवं प्रतिबुद्धः स रात्र्यन्ते राजसत्तमः ।
अब्रवीत् सहितान् भ्रातॄन् दयापन्नो मृगान् प्रति ॥ १० ॥
उक्तो रात्रौ मृगैरस्मि स्वप्नान्ते हतशेषितैः ।
तन्तुभूताः स्म भद्रं ते दया नः क्रियतामिति ॥ ११ ॥
इस प्रकार रात बीतनेपर जब सबेरे उनकी नींद खुली, तब वे नृपतिशिरोमणि हिंसक पशुओंके प्रति दयाभावसे द्रवित हो अपने सब भाइयोंसे बोले – ' बन्धुओ! रातको सपनेमें मरनेसे बचे हुए इस वनके पशुओंने मुझसे कहा है- ' राजन्! आपका भला हो । हम अपनी वंशपरम्पराके एक- एक तन्तुमात्र शेष रह गये हैं। अब हमलोगोंपर दया कीजिये ' ॥ १०-११ ॥
ते सत्यमाहुः कर्तव्या दयास्माभिर्वनौकसाम् ।
साष्टमासं हि नो वर्षं यदेतदुपयुङ्क्ष्महे ॥ १२ ॥
' मेरी समझमें वे पशु ठीक कहते हैं । हमलोगोंको वनवासी हिंस्र जीवोंपर भी दया करनी चाहिये । अबतक हमलोगोंको इस द्वैतवनमें रहते हुए एक वर्ष आठ महीने बीत चुके हैं ॥ १२ ॥
पुनर्बहुमृगं रम्यं काम्यकं काननोत्तमम् ।